लघुकथा: मेरे मन की बात


मधुदीप
इस लेख के माध्यम से मैं पाठकों से अपने मन की बात साँझा कर रहा हूँ। यह सब किसी क्रम में नहीं है बल्कि लघुकथा को लेकर मेरे मन में जब-जैसा विचार उत्पन्न हुआ मैंने उसे लिख लिया है और अब मैं बिना किसी तारतम्य के उसे पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। मुझे उम्मीद है कि इन विचारों से लघुकथा को लेकर कई गम्भीर विमर्श लघुकथा के शुभचिन्तकों के समक्ष उपस्थित होंगे और उनपर चर्चा करके हम किसी ठोस नतीजे पर पहुँचेंगे।

प्राय: कहा जाता है की लघुकथा का भविष्य क्या है ! कुछ अजीब-सा प्रश्न नहीं है यह ? साहित्य की किसी भी विधा का भविष्य उस विधा के लेखकों के सामर्थ्य पर निर्भर करता है। लेखन दमदार होगा तो पाठक उसे कैसे नकारेगा ? जिन्हें अपने लेखन पर भरोसा नहीं होता या जो फिर साहित्य में अपना स्थान बनाने की बहुत जल्दी में होते हैं वे ही ऐसी बेतुकी बातें करते हैं। साहित्य जब काव्य से उपन्यास की तरफ और उपन्यास से कहानी की तरफ मुड़ा तब भी शायद ऐसे ही प्रश्न उठे होंगे मगर उपन्यास या कहानी अपने समय में साहित्य के केन्द्र में रहे हैं, इस बात को कतई नहीं नकारा जा सकता। साहित्य की वही विधा केन्द्र में रहेगी जिसमें जन-मानस की भावनाओं की अभिव्यक्ति होते हुए दमदार लेखन होगा। सिर्फ गाल बजाने से कुछ नहीं होगा।

विश्वास रखें, आनेवाला समय, खासतौर पर 2020 के बाद के दस वर्ष लघुकथा के होंगे। इसके पीछे कई कारण हैं जो हम सबके सामने हैं, उन्हें दोहराकर पन्ने रँगने से कोई लाभ नहीं। आवश्यकता हम लघुकथाकारों द्वारा अपने पर विश्वास रखते हुए निरन्तर और दमदार लेखन करने की है। हमें जन-भावनाओं और जन-आकंक्षाओं पर अपनी पकड़ मजबूत रखते हुए सामायिक समस्याओं को अपने लेखन का आधार बनाना है। कोई भी लेखन अपने समय से कटकर जिन्दा नहीं रह सकता। इस बात पर अब विवाद करना बेमानी है कि लघुकथा में क्या और कितना-कुछ कहा जा सकता है। लेखक में दम होना चाहिए, हर स्थिति और समस्या को इस विधा में उकेरा जा सकता है और बहुत ही प्रभावी ढंग से उकेरा जा सकता है। पिछले दिनों लघुकथा में जो लेखन हुआ है उससे यह बात साबित भी हो चुकी है।

हमें साहित्य की किसी विधा से कोई विरोध कतई नहीं है तथा किसी को होना भी नहीं चाहिए। मगर आनेवाले समय की दस्तक को न पहचानना सच्चाई से आँखें मूँदना ही होगा। कहानी के आने से उपन्यास का महत्त्व कम नहीं हुआ और न ही लघुकथा के साहित्य के केन्द्र में आने से कहानी का ही महत्त्व कम होगा। यह तो समय की अपनी माँग होती है कि किस समय में साहित्य की कौनसी विधा केन्द्र में रहती है। कभी काव्य को ही साहित्य माना जाता था मगर समय ने गद्य को केन्द्र में ला दिया। हम क्यों न आशा करें कि 2020 के बाद का समय लघुकथा के उत्कर्ष का समय होगा। इसके लिए जोर-शोर से काम भी हो रहा है। हाँ, इसे हमारा किसी भी अन्य विधा के प्रति द्वेष न समझा जाए। मैं पहले उपन्यासकार हूँ, फिर कहानीकार और अब बाद में लघुकथाकार। यह और बात है कि समय ने मुझ पर पूरी तरह लघुकथाकार का ठप्पा लगा दिया है। बहरहाल, मैं स्वीकार करता हूँ और अपने सभी साथी लघुकथाकारों से यह स्वीकार करने का आग्रह करता हूँ कि साहित्य की कोई भी विधा किसी दूसरी विधा से छोटी या बड़ी नहीं होती अपितु यह समय ही है जो आवश्यकतानुसार कभी एक विधा को केन्द्र में ले आता है तो कभी दूसरी विधा को। कभी काव्य में महाकाव्य, खण्डकाव्य, कभी उपन्यास में बृहद उपन्यास, लघु उपन्यास तो कभी कहानी में लम्बी कहानी, सामान्य कहानी, कभी नाटक में लम्बे नाटक और एकांकी तो कभी गद्य में व्यंग्य और लघुकथा। आपस में सभी सहोदर हैं तो फिर एक-दूसरे के उत्कर्ष से ईर्ष्या कतई नहीं होनी चाहिए। वैसे सही बात यह भी है कि सहोदरों के मध्य ईर्ष्या होती ही है मगर वह अपनों की होती है, गैरों की नहीं। मित्रो, मैं कामना करता हूँ कि साहित्य की प्रत्येक विधा अपने चरम की ओर अग्रसर हो। वो कहते हैं ना कि सबके भले में ही अपना भला होता है तो उस दृष्टि से साहित्य के सम्पूर्ण विकास में ही लघुकथा का विकास भी निहित है अन्यथा तो पाठकों के अभाव का संकट तो पूरे साहित्य के समक्ष ही दैत्य के रूप में खड़ा है। हमें अलग-अलग खेमों में बँटकर नहीं, मिलकर तथा एकजुट होकर इस दैत्य का सामना करना होगा।

लघुकथा को लेकर जो भी प्रश्न, शंका-कुशंका, उलझन-उद्वेग मेरे मन को मथते हैं उन सब को मैं आपसे साँझा कर लेना चाहता हूँ। कुछ उलझनें ऐसी होती हैं जिसमें व्यक्ति मकड़जाल की तरह उलझता रहता है मगर उन उलझनों को किसी से कह-सुन लिया जाए तो वे बहुत ही आसानी से सुलझ जाती हैं। इसीलिए कहा भी गया है कि वार्ताएँ और सलाह-मश्वरे कभी बन्द नहीं होने चाहिए।

मेरा मानना है कि लघुकथा में हमें अस्वभाविकता, अतिरंजना एवं अतिरेक से बचना चाहिए। लघुकथा तथा व्यंग्य के बीच जो सीमारेखा होती है वह उपरोक्त तीनों के चलते बहुत ही धुँधली हो जाती है और इनकी उपस्थिति में लघुकथा पूरी तरह व्यंग्य की तरफ झुक जाती है। कभी सारिका पत्रिका के जमाने में व्यंग्य आधारित छोटी रचनाओं को ही लघुकथा समझने का भ्रम व्याप्त हुआ था मगर अन्तत: उससे मुक्ति मिली और लघुकथा में कथातत्व तथा मानवीय संवेदना को प्रमुखता मिलने लगी। आज की लघुकथा प्रारम्भिक दौर की उस लघुकथा से काफी आगे आ चुकी है मगर कुछ हैं जो वहीं खड़े कदमताल कर रहे हैं। दरअसल वे पढ़ बहुत कम रहे हैं और अपने लिखे को पढ़वाने पर अधिक जोर दे रहे हैं। हमें अपने छात्र को सदैव अपने में जीवित रखना होगा ताकि हम कदमताल छोड़कर समय से कदम मिलाकर चल सकें। सच ही तो कहा है---सीखने की कोई उम्र नहीं होती।

नए लघुकथाकार और कुछ पुराने लघुकथाकार भी लघुकथा में कालदोष को लेकर बहुत ही चिन्तित (और भ्रमित भी) हैं। यह सत्य है कि लघुकथा में लघु कालखण्ड को लेना ही अधिक श्रेयकर होता है मगर मेरा मानना है कि इसे लघुकथा की सीमा कतई न बनाया जाए। मेरी लघुकथा ‘समय का पहिया घूम रहा है’ में 400 वर्ष का कालखण्ड है और अशोक भाटिया की एक श्रेष्ठ लघुकथा ‘नमस्ते की वापसी’ में भी कालदोष दिखाई पड़ सकता है मगर ये पूरी तरह लघुकथाएँ हैं इसमें किसी को सन्देह नहीं होना चाहिए। लघुकथाकार पूर्वदीप्ति (Flashback) को अपनाकर इस दुविधा/समस्या से बच सकता है। और भी तरीके हैं जो निरन्तर अभ्यास से जाने और समझे जा सकते हैं। लघुकथा में बड़ी बात कहने के लिए हमें इसके इर्द-गिर्द खींची गई अनावश्यक बाड़ों को हटाकर इसका दायरा विस्तृत करना होगा अन्यथा घिसे-पिटे पुराने कथ्यों के दोहराव से हम स्वयं को बचा नहीं पाएँगे। आज लघुकथा से पाठक की अपेक्षाएँ बढ़ती जा रही हैं और वह आज की हर संवेदना और समस्या से लघुकथा में रूबरू होना चाहता है। इस सत्य को कतई नहीं नकारा जा सकता कि वही विधा हमेशा साहित्य के केन्द्र में रहती है जो पाठकों की अपेक्षा पर खरी उतरती है। यह सत्य है कि 2020 से आनेवाले दशक में लघुकथा साहित्य के केन्द्र में होगी मगर हमें इसके लिए इस विधा को तैयार भी करना है। हाँ, यहाँ मैं स्पष्ट तौर पर कह देना चाहता हूँ कि इस अतिरेक में हमें लघुकथा को कहानी के संक्षिप्तीकरण से भी बचाकर रखने की महती आवश्यकता होगी। यहीं पर तो लघुकथाकार के कौशल की असली परीक्षा होगी। हमें लघुकथा में निरन्तर प्रयोग भी करने हैं और इसे गद्य की अन्य विधाओं के स्वरूप से भिन्न भी बनाए रखना है।

इधर फेस बुक पर जो लघुकथा की समीक्षा/आलोचना देखने में आ रही है उसमें लघुकथा की अंतिम लाइन, जिसे पंच-लाइन कहा जाता है उस पर बहुत अधिक जोर दिया जाता है और उसी के प्रभाव के आधार पर लघुकथा को परखा जाता है। अर्थात लघुकथा को उसकी सम्पूर्णता के प्रभाव की अपेक्षा उसकी अन्तिम लाइन के प्रभाव की कसौटी पर परखने का प्रचलन आजकल जोर पकड़ता जा रहा है। मेरे लिए यह कसौटी थोड़ी नई है और मैं इसे समझने का प्रयास कर रहा हूँ।

पड़ाव और पड़ताल के अब तक के 25 खण्डों में लगभग 1200 पृष्ठों के 125 समीक्षा-आलेख हैं और इस विधा पर इन खण्डों में लघुकथा विधा के बारे में 250-300 पृष्ठों के लगभग 25 आलेख भी हैं लेकिन उनमें (जहाँ तक मुझे ध्यान है) पंच-लाइन का कहीं कोई अधिक जिक्र नहीं है। मैं नहीं जानता कि पंच-लाइन की अवधारणा लघुकथा विधा में कब से आई है क्योंकि 1976 से लघुकथा लेखन में आने के बाद मैं 1995 से 2012 तक इसमें से अनुपस्थित रहा हूँ। हाँ, इन दिनों यह काफी चर्चा में है।

मैं लघुकथा में नए का और नए प्रयोगों का सदैव हिमायती रहा हूँ क्योंकि मेरा मानना है कि किसी भी विधा में यदि नए प्रयोग न हों तो उसके जड़ हो जाने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। लघुकथा में मेरे द्वारा किए गए कुछ प्रयोगों से मेरे कुछ मित्र बहुत ही असहमत भी रहे हैं। यह उनका दृष्टिकोण है और प्रयोग करना मेरा विधागत धर्म।

बहरहाल, बात लघुकथा में पंच-लाइन को लेकर हो रही थी। इस विषय में मेरे कुछ संशय हैं। एक समय लघुकथा में व्यंग्य की अनिवार्यता पर बहुत जोर दिया जाता था। उस समय भी मैंने कहा था कि लघुकथा में “व्यंग्य भी” तो चल सकता है, “व्यंग्य ही” को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि ऐसा करना लघुकथा के दायरे को बहुत ही संकुचित कर देगा और वे रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं को पूरी तरह अभिव्यक्त करने के स्थान पर लघु-व्यंग्य बनकर रह जायेंगी। इस तरह लघुकथा व्यंग्य की, जिसे कि उस समय तक विधा का दर्जा भी हासिल नहीं हुआ था, उसकी उपविधा बनकर रह जायेगी।

बात लघुकथा में पंच-लाइन और तदानुसार उसकी समीक्षा की है जोकि आजकल फेसबुक पर बहुत प्रचलित है। लघुकथा में पंच-लाइन पर जोर देने और उसके अनुरूप समीक्षा के मानदण्ड निर्धारित करने का एक खतरा यह है कि इसके अनुसार लघुकथा की सम्पूर्ण संप्रेषणीयता पर जोर देने की बजाय पंच-लाइन पर जोर देने का प्रचलन लघुकथा लेखन में बढ़ सकता है जोकि आगे चलकर इसकी सीमा भी बन सकता है। यह एक तरह से लघुकथा के दायरे को संकुचित करने का कारक भी बन सकता है। लघुकथाकार पहले पंच-लाइन निर्धारित करके यदि लेखक लघुकथा-लेखन करेगा तो उसकी रचना में कला और संवेदना पक्ष कमजोर पड़ जाने का पूरा खतरा है। पाठक का ध्यान भी पूरी लघुकथा पर टिकने की बजाय उसकी अंतिम लाइन पर टिककर रह जायेगा।

मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं लघुकथा का समीक्षक नहीं हूँ और न ही मैं लघुकथा समीक्षा का गहन अध्येता ही रहा हूँ। मैं लघुकथा की समीक्षा के इस पक्ष को समझने का प्रयास कर रहा हूँ।

आजकल शीर्षक आधारित या विषय आधारित लघुकथाएँ लिखने की जो होड़ फेसबुक पर चल रही है और उसके परिणाम स्वरूप जो फैक्ट्री-मेड लघुकथाएँ आ रही हैं उनसे इस विधा के कला-पक्ष को नुकसान तो हुआ ही है। आगे चलकर यह भी हो सकता है कि हम लघुकथा लेखन में अपने प्राचीन गद्य लेखन की तरह निष्कर्ष लाइन या उपदेश लाइन की तरफ न बढ़ जाएँ। क्या यह इस विधा के लिए स्वीकार्य होगा ? मेरा यह मानना है कि लघुकथा में किसी एक पक्ष पर अधिक जोर देने की बजाय उसे उसकी सम्पूर्णता में देखने की परम्परा विकसित करनी चाहिए। इस सम्पूर्णता में रचना का कथ्य, उसकी भाषा, उसकी संवेदना, उसकी संप्रेषणीयता तथा उसके कला-पक्ष का अध्ययन किया जाना चाहिए। यही लघुकथा की समीक्षा की सर्वांगीण अवधारणा होगी।

अब मैं आपसे फेस बुक और लघुकथा के सम्बन्ध और सन्दर्भ में कुछ बातें करना चाहता हूँ। इनमें कुछ कड़वी बातें भी हो सकती हैं मगर वे भी आपको सुननी तो होंगी ही।

आजकल फेस बुक साहित्य का दौर है। छोटे आकार की रचना को फेस बुक पर सरलता से पोस्ट किया जा सकता है। इसलिए कविता, क्षणिका व हाइकू के साथ-साथ लघुकथाएँ भी बहुतायत से फेस बुक पर पोस्ट की जा रही हैं। अब तो फेस बुक पर पोस्ट की गई लघुकथाओं के संकलन प्रकाशित करने/करवाने का प्रचलन भी जोर पकड़ता जा रहा है।

फेस बुक पर लघुकथाओं को पोस्ट किया जाना इस विधा के प्रचार-प्रसार के लिए एक शुभ लक्षण भी हो सकता है। आज सोशल मीडिया का युग है और इसके माध्यम से आप अपने विचार तथा रचनाएँ द्रुत गति से अन्य लोगों/पाठकों तक पहुँचा सकते हैं। नि:सन्देह किसी भी विधा के प्रसार के लिए सोशल मीडिया एक सशक्त माध्यम हो सकता है मगर इसके अपने खतरे भी कम नहीं हैं।

पिछले कुछ दिनों/महीनों से फेस बुक पर लघुकथा-समूहों की बाढ़-सी आ गई है। कम-से-कम आठ-दस समूह तो मेरी नजर से भी गुजरे हैं। मजे की बात यह है की जो नवोदित लेखक इस विधा के प्रारम्भिक दौर से गुजरते हुए इस विधा को समझने का प्रयास कर रहे हैं वे इन समूहों के ‘एडमिन’ बने बैठे हैं। ऐसे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है की उन समूहों में किस तरह की या किस स्तर की लघुकथाएँ पोस्ट हो रही हैं। उस पर तुर्रा यह की उनमें से अधिकतर समूह लघुकथाओं की प्रतियोगिताएँ आयोजित कर रहे हैं तथा श्रेष्ठ लघुकथाओं के प्रमाण-पत्र भी बाँट रहे हैं।

अब मैं फेस बुक पर व्यक्तिगत या लघुकथा-समूहों पर पोस्ट की जा रही लघुकथाओं तथा उससे इस विधा के हो रहे अहित के मुद्दे पर बात करना चाहता हूँ। यदि आप फेस बुक से जुड़े हैं तो अवश्य ही आप वहाँ पर लघुकथा-समूहों की गतिविधियों से तथा वहाँ पर पोस्ट की जा रही लघुकथाओं तथा उनकी गुणवत्ता से भी रूबरू होते होंगे। मेरे दोस्तो ! बुरा मत मानना, कितनी ही कमजोर तथा अधकचरी रचनाएँ वहाँ पर प्रस्तुत की जा रही हैं, यह आपसे छिपा हुआ नहीं है। उन रचनाओं को एक-दूसरे की प्रशंसा और भ्रमित करनेवाली टिप्पणियाँ भी मिलती हैं। इस झूठी प्रशंसा से नवोदित लेखक दिग्भ्रमित होता है और मेरा यह मानना है कि इससे उसका विकास रुक जाता है। एक रचनाकार जो भी रचता है उसकी दृष्टि में वह श्रेष्ठ ही होता है। अगर उसकी दृष्टि में वह पूर्ण और श्रेष्ठ न हो तो वह उसे कागज पर उतारेगा ही नहीं। लेखक अपनी रचना की सही-सही परख कभी नहीं कर सकता क्योंकि वह उसकी अपनी रचना होती है। यह बात नवोदितों पर ही नहीं पुराने रचनाकारों पर भी लागू होती है। रचना के गुण-दोषों की परख तो कोई दूसरा निष्पक्ष व्यक्ति ही कर सकता है और यह दूसरा होता है पाठक, अन्य वरिष्ठ लेखक, समीक्षक या सम्पादक। पहले जब लेखन होता था तो उसके सृजन तथा प्रकाशन के मध्य सम्पादक होता था जोकि रचना के गुण-दोष के आधार पर उसका प्रकाशन स्वीकार या अस्वीकार करता था। इस तरह रचना की पड़ताल हो जाती थी तथा कमजोर रचना बाहर हो जाती थी। मगर फेस बुक पर ऐसा नहीं हो पाता। यहाँ पर यह सुविधा उपलब्ध है की जो कुछ भी आप लिखें उसे वहाँ पर पोस्ट कर दें। ऐसे रचनाकारों का एक समूह बन जाता है जो एक-दूसरे की रचनाओं की जी-खोलकर प्रशंसा भी कर देते हैं। अब तो स्थिति इतनी विकट और विकृत हो गई है कि यदि कोई वरिष्ठ रचनाकार उन्हें सही बात समझाना चाहता है तो वे एकदम आक्रामक मुद्रा में आ जाते हैं और वरिष्ठ को ही अपनी इज्जत सँभालकर वहाँ से खिसकना पड़ता है। यह बात सब पर नहीं तो अधिकतर पर तो अवश्य ही लागू होती है। मैंने ‘पड़ाव और पड़ताल’ के एक खण्ड में वरिष्ठ लघुकथाकारों से आग्रह किया था की वे कमजोर लघुकथाओं के संग्रह की अतिश्योक्तपूर्ण भूमिका लिखकर किसी नवोदित को दिग्भ्रमित न करें। इससे लघुकथा का बहुत अहित हो रहा है। ऐसा देखा जा रहा है कि किसी-किसी लघुकथाकार के दो-तीन संग्रह भी आ जाते हैं मगर उनमें से 8-10 श्रेष्ठ लघुकथाओं का चयन करना भी कठिन हो जाता है। यहाँ पर मैं ऐसा ही निवेदन/आग्रह फेस बुक पर लघुकथा-समूहों के ‘एडमिन’ से भी करना चाहता हूँ की वे लघुकथा विधा को गहराई से समझें और अपने-अपने समूह में लघुकथा पोस्ट किये जाने के लिए कुछ नियम-कायदे अपनाएँ। ‘आप मेरी प्रशंसा करें, मैं आपकी प्रशंसा करूँ’ की नीति से लघुकथा के विकास में बाधा आ रही है --- इस बात को आप भी आज नहीं तो कल अवश्य ही समझेंगे। ‘लघुकथा साहित्य’ समूह ने इस विषय में कुछ कड़े कदम उठाए हैं और इसके अच्छे परिणाम भी सामने आने लगे हैं। माफ़ करना दोस्तो ! मेरी बात कड़वी हो सकती है मगर बीमारी के इलाज के लिए कड़वी दवा देना और उसकी घूँट भरना अनिवार्य होता है। लघुकथा के हित के लिए मैं अपने कुछ मित्रों की नाराजगी स्वीकार करने को भी तैयार हूँ। लघुकथा मेरी बपौती नहीं है, मैं इसका ठेकेदार भी नहीं हूँ और न ही मैं अपने को इस विधा का आधिकारिक विद्वान ही मानता हूँ मगर भाइयो ! मुझे आप सब की तरह इस विधा के प्रति जनून की हद तक इश्क अवश्य है और इसी इश्क का परिणाम लघुकथा शृंखला ‘पड़ाव और पड़ताल’ है।

मन में और बहुत-से विचार उमड़-घुमड़ रहे हैं लेकिन एक सीमा होती है जहाँ पर हमें अपनी बात को विराम देना ही पड़ता है। वह सीमा यहाँ मेरे समक्ष उपस्थित हो गई है इसलिए मैं यहाँ पर अपने विचारों को विराम देता हूँ। आशा है, मेरे विचार लघुकथा के विमर्श को आगे बढ़ायेंगे।

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