साक्षात्कार: प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय

रचनाकारों का वह वर्ग जिसे लिखने/छपने की ललक है और जो जल्दी छा जाना चाहता है वह सोशल मीडिया से जुड़ा रहना चाहता है। इससे साहित्य तो सार्वभौमिक और समृद्ध तो हो रहा है किन्तु ऐसे साहित्य की चिरन्तनता बने रहना मुश्किल है। संस्कृत के क्षेत्र में देखें तो ऐसे रचनाकारों का कुछ प्रतिशत ही भाषा की शुद्धता बनाये हुए है शेष अपने लेखन की भड़ास निकालने को उतावले हैं, ऐसा कहना ही उपयुक्त होगा। -प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय
साहित्य तो सार्वभौमिक एवं सर्वजन मङ्गलकारी होता है: प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय
  केन्द्रीय साहित्य अकादमी आदि दर्जनों पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित, समकालीन संस्कृत साहित्य के कवि, कहानीकार नाटककार प्रो.ताराशंकरशर्मा पाण्डेय से प्रस्तुत है डॉ.अरुण कुमार निषाद का एक वार्तालाप-

डॉ.अरुण कुमार निषाद-सर्वप्रथम आप अपने बारे में बतायेंबहुत सारे ऐसे तथ्य होंगे जो अभी तक आपके पाठकों को ज्ञात नहीं होंगे?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय - राजस्थान की राजधानी पाटलपत्तन के नाम से प्रसिद्ध जयपुर नगर में 5 अगस्त 1957 ई. को राष्ट्रपति-सम्मानित पं. मोहनलाल शर्मा पाण्डेय के पुत्ररूप में मेरा जन्म हुआ। मेरे पितृचरण जयपुर के गलता तीर्थ के महन्त परिवार के पुरोहित वंश में जन्मे, संस्कृत साहित्य को अनेक प्रौढ़ ग्रन्थ-रत्न से समृद्ध करने वाले, बाणभट्ट सदृश शैली में पद्मिनीरसकपूरम् जैसे उपन्यास एवं नतितति,पत्रदूतम् काव्यों के रचयिता पं. मोहनलाल शर्मा पाण्डेय को राष्ट्रपति-सम्मान, श्रीवाणी अलंकरणसंस्कृत साधना शिखर सम्मान,वाचस्पति-पुरस्कार जैसे अनेक सम्मान प्राप्त हुए।
     मैंने प्रारम्भिक शिक्षा के पश्चात् राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से सन् 1980 में स्वर्ण- पदक सहित संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर (आचार्य) परीक्षा तथा पीएच.डी. उपाधि प्राप्त की।मैंने राजस्थान सरकार के संस्कृत शिक्षा के विभिन्न महाविद्यालयों में प्रवक्ताप्रोफेसरप्राचार्य (स्नातकोत्तर महाविद्यालय) जैसे पदों पर कार्य करने के पश्चात् जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर में प्रोफेसर संस्कृत साहित्य, अधिष्ठाता संस्कृत साहित्य एवं संस्कृति संकाय, निदेशक अनुसंधान केन्द्र, निदेशक शैक्षणिक परिसर जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- क्या आपको  नहीं लगता कि आज विचार धाराओं के नाम पर हमारा साहित्यिक परिदृश्य खण्डित हो रहा है?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- यह बहुत कुछ साहित्यकार पर निर्भर करता है। यदि आज की विचारधारा से साहित्यिक-पटल खण्डित होता है तो वह वस्तुतः साहित्य की श्रेणी में समाहित ही नहीं किया जा सकता । साहित्य तो सार्वभौमिक एवं सर्वजन मङ्गलकारी होता है।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- इस दौर में कविता भले ही समाजोन्मुखी होती जा रही है, लेकिन हमारा समाज कविता से दूर होता जा रहा है |क्या कारण मानते हैं?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- भौतिकवाद के युग की मारा-मारी के कारण समयाभाव हो गया है और नेटवर्क के चलते हलका फुलका साहित्य चुटकुला के रूप में चल पड़ा है फिर भी साहित्य में रुचि रखने वाले लोग सुबह शाम देर सबेर जुड़ता ही है। ऐसे में अन्तर्जाल भी समाज को साहित्योन्मुखी बनाने में अहं भूमिका निभा रहा है। 

डॉ.अरुण कुमार निषाद- कविता की नई पीढ़ी के प्रति कितने आशावान् हैं ?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- साहित्य में रुचि रखने वाली आज की नई पीढ़ी चाहे वह पाठक-वर्ग से हो या रचना-धर्मिता वर्ग से वह लम्बे साहित्य की अपेक्षा कम समय में पढ़े जा सकने वाली लघुकथा , कविता आदि से जुड़ना चाहती है। यह नई पीढ़ी लघु साहित्य से समाज को नई दिशा देने को आतुर लगती है।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- आज नए  रचनाकारों को अनेक स्तरों पर प्रोत्साहन मिल रहा है? इस सुविधा को किस रूप में देखते  हैं?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- प्रोत्साहन किसी भी क्षेत्र या स्तर का हो वह निश्चित ही आगे बढ़ने के अवसर देता है और मङ्गलकारी भी होता है। प्रोत्साहन पाकर यदि कोई मुकाम छोड़ दे तो वह वस्तुतः रचनाकार की श्रेणी में आ ही नहीं सकता, वह तो विशुद्ध भौतिकवादी ही रह जायेगा।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- लेखन विरासत में मिला था या संयोग था कलम थामना?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- लेखन का विरासत में मिलना मेरा सौभाग्य है । क़लम थामना भी महज़ संयोग है। पितृचरण पं.मोहनलाल शर्मा पाण्डेय जिन्होंने लगभग 18 ग्रन्थों की रचना कीके आदेश/निर्देश पर मैंने जो कोष एवं व्याकरण के ग्रन्थों का पारायण बाल्यकाल में किया उसीका प्रतिफल है मेरा काव्य रचना-जगत् में प्रवेश। अध्ययन काल से ही संस्कृत के पद्यों की रचना में रुचि रही। एक समारोह में बोलने के लिए मैं ने हितोपदेश की कथा को अनुष्टुप् छन्द में नया रूप दिया। वैसे हमारे अध्ययन के दौरान शास्त्री-परीक्षा के अन्तिम वर्ष में छन्दोबद्ध रचना करना पाठ्यक्रम का हिस्सा रहा था सो  मैंने भी परीक्षा में काव्य रचना की।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- आपके अन्दर लिखने -पढ़ने के संस्कार कैसे पैदा हुए?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- गालवतीर्थ महन्तों के जोशी मेरे पितामह पं.दुर्गालाल जोशी कर्मकाण्ड एवं ज्योतिष के क्षेत्र में तथा पिता जी साहित्य एवं कर्मकाण्ड के क्षेत्र में  प्रसिद्ध विद्वान् रहे । ऐसे शिक्षित परिवार में लिखने पढ़ने के संस्कार मिलना स्वाभाविक ही है।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- अधिकांश रचनाकार सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं ? क्या इससे साहित्य समृद्ध हो रहा है?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- रचनाकारों का वह वर्ग जिसे लिखने/छपने की ललक है और जो जल्दी छा जाना चाहता है वह सोशल मीडिया से जुड़ा रहना चाहता है। इससे साहित्य तो सार्वभौमिक और समृद्ध तो हो रहा है किन्तु ऐसे साहित्य की चिरन्तनता बने रहना मुश्किल है। संस्कृत के क्षेत्र में देखें तो ऐसे रचनाकारों का कुछ प्रतिशत ही भाषा की शुद्धता बनाये हुए है शेष अपने लेखन की भड़ास निकालने को उतावले हैं, ऐसा कहना ही उपयुक्त होगा।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- आपके प्रिय रचनाकार कौन है?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- किसी एक रचनाकार की प्रियता को स्वीकारना न्यायोचित नहीं होगा। मेरा रुझान काव्य की सभी विधाओं में है लिहाजा संस्कृत के  बाणभट्ट,अम्बिकादत्त व्यास एवं कालिदास, भारवि,माघ, राधावल्लभ त्रिपाठी,अभिराज राजेन्द्र मिश्र तथा हिन्दी भाषा के साहित्यकादों में मुंशी प्रेमचंद,जयशंकर प्रसाद,हरिवंश राय बच्चन  का नाम लेना पसंद करता हूँ।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- व्यस्त शेड्यूल में रचना करने के लिए किस तरह समय निकालते हैं?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- जब भावों का प्रस्फुटन होने को हो और काव्यधारा बहने को हो तो अन्य सभी कार्य को गौण कर देना मेरी स्वाभाविक प्रवृत्ति है फिर चाहे दैनिकचर्या में जागरण से शयन तक की सभी क्रियाओं में विलम्ब ही क्यों न हो।     

डॉ.अरुण कुमार निषाद- आप कविता-गेयता को कविता का अनिवार्य अंग मानते  हैं या नहीं?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- कविता गेयता का ही दूसरा नाम है। जब दिल कुछ गुनगुना को हो तो काव्यधारा बहने लगती है,यही तो गेयता है जो अंगाङ्गी भाव से कविता में  नित्य रहती  है।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- आप अपने आप को कवि मानते   हैं या गद्यकार?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- ना मैं कवि हूँ ना गद्यकार। जन्म लेने वाले भाव जिस करवट चादर में लिपटना चाहे मैं वैसा ही जामा पहनाने की कोशिश करता हूँ। 

डॉ.अरुण कुमार निषाद- आप अपने शिष्यों से क्या आशा करते   हैं?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- ‘पुत्राद् शिष्याद् इच्छेत् पराजयम्। शिष्य गुरु के विद्या-वंश में गिना जाता है। मैं भी अपने शिष्यों को प्रत्येक उत्तम कार्यक्षेत्र में उन्नति के पथ पर अग्रसर होते देखना चाहता हूँ।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- अभी तक आपने कुल कितनी भाषाओं में रचनाएँ की हैं?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- भाषाओं का ज्ञान होना एक अलग बात है और रचनाधर्मिता होना अलग। संस्कृत भाषा में  मुख्य रूप से तथा हिन्दी और राजस्थानी भाषा में मेरी रचनाएँ होती हैं।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- आप संस्कृत के उत्थान के लिए युवावर्ग को क्या सन्देश देना चाहते  हैं ?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- संस्कृत से जुड़ा युवावर्ग जनमानस को  संस्कृत से जोड़ने का पुरजोर प्रयास करे किन्तु प्रचार-प्रसार के समय  भाषा- प्रयोग में व्याकरण की शुद्धता बनाये रखना बहुत  जरूरी है और भाषा के साथ न्याय करे।   

डॉ.अरुण कुमार निषाद- महिला लेखन से स्त्रियों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में कितना परिवर्तन आया है?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- आज महिलाओं के सन्दर्भ में जो कुछ लिखा जा रहा है उससे महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता आयी है। हाँ जो स्वयं लेखिका है तो कुछ अंशों में उनके आर्थिक सुधार की बात कर सकते हैं।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- लेखन क्षेत्र में शोर्ट-कट को किस नजरिये से देखते  हैं ?
 प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेयलेखन में शोर्टकट जल्द ऊँचाइयों की ओर ले जा सकता है किन्तु स्थायित्व नहीं दिला सकता । 

डॉ.अरुण कुमार निषाद- जिन राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों में आज हम जी रहे हैं। उसमें एक कथाकार या लेखक का क्या दायित्व बनता है ?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- अपनी लेखनी की धार पैनी रखे और जुड़े उन पहलुओं से जो सीधे से कोई नई दिशा दे सकें। चाहे वह नारी अस्मिता से जुड़े मुद्दे हों या फिर राजनीतिक शुद्धता का विषय, पुरज़ोर शब्दों में लिखना होगा।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- आज क्या कुछ नया लिख रहे  हैं?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- हाँ,एक लघुकाव्य जो कृष्ण-चरित्र से जुड़ा है इसमें वर्णों की क्रमता की चमत्कृति देखी जा सकेगी।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- आपके द्वारा लिखी गई अब तक की सबसे अच्छी रचना ?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- एक कथा जिसका शीर्षक नाराहै जिसमें निर्भया जैसे घटना-क्रम से मुक्ति के लिए प्रयास किया गया है। वैसे यह कथा साहित्य-अकादेमी की पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- आपको लगता है कि छन्द से मुक्ति पाकर कविता लिखना ज्यादा आसान हो गया है?क्योंकि आज सबसे ज्यादा इसी विधा में रचनाएँ की जा रही हैं?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- ठीक कह रहे हैं। इसमें लेखक अपने भावों को स्वतन्त्रता/स्वच्छन्दता से मुखरित करता है और अपनी पूरी बात स्वाभाविक रूप से रख सकता है। 

डॉ.अरुण कुमार निषाद- नई कविता और कविता पर आपकी क्या टिप्पणी है?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- कविता तो पुराणी युवती होते हुए भी चिर-यौवना है। हाँ बात करें नई कविता की तो वह विषयों,सन्दर्भों और उपमानों में स्वरूप बदलकर आ रही है,इसे ही हम नई कविता का जामा पहना रहे हैं।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- रचनाकार का अपनी जड़ों से जुड़े रहना जरूरी है ?आप क्या कहते  हैं?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- रचनाकार ही क्यों  ?  कोई  भी अपनी जड़ों से जुड़ा रहकर ही हरा भरा रहते हुऐ पल्लवित और पुष्पित हो सकता है अन्यथा भटकाव ही मिलना है।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- क्या आप अच्छी रचना के लिए मूड बनाकर लिखते हैं?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- मूड बनाकर लिखना रचना के साथ ज्यादती होने के बराबर है। रचना करना स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो रचना में आत्म-भाव भरती है और वही रचना श्रोता एवं पाठक को आत्मसात् करती है। 

डॉ.अरुण कुमार निषाद- साहित्य सृजन के अलावा आपकी अन्य रुचियाँ क्या हैं?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- टीवी पर ताज़ा घटनाक्रम या फिर केबीसी और धार्मिक सीरियल देखना। खाली समय में प्रकृति से साहचर्य, नदियों,उपवनों, खुले आसमान जैसे प्राकृतिक स्थान पर तन्मय होना, जो सर्जना के पास ले जाती है।     

डॉ.अरुण कुमार निषाद- वह रचना जिसने आपको एक रचनाकार के रूप में स्थापित किया ?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- अपनी रचना के बारे में क्या कहूँ। मैं एक अदना सा रचना करने वाला हूँ।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- साहित्य-जगत् की वह उपलब्धि जिससे आपको सबसे अधिक प्रसन्नता हुई हो?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- केन्द्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का वर्ष  2015 का संस्कृत अनुवाद पुरस्कार जो अहमेव राधा अहमेव कृष्णः’ पुस्तक पर इम्फाल में मिला।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- आपकी पहली रचना कब और कहाँ से प्रकाशित हुई ?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- मेरी पहली रचना जुलाई 1980 में प्रसिद्ध संस्कृत पत्रिका भारतीमें प्रकाशित हुई। 

डॉ.अरुण कुमार निषाद- संस्कृत एक मृत भाषा है प्रायः लोग कहते हैं , उनके लिए क्या सन्देश है?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- ये वो लोग हैं इनके बारे में क्या कहना, जिन्हें नींव का पत्थर दिखाई नहीं देता । संस्कृत चिरञ्जीविनी भाषा है जो न कभी मरी थी न मरेगी। यह तो आज कम्प्यूटर के क्षेत्र में ऐसी प्रविष्ट हुई है जिसे नासा के लिए भी उखाड़ फेंकना आसान नहीं है।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- आज संस्कृत के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां हैं? उनके समाधान के लिए क्या उपाय किये जा सकते हैं?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- संस्कृत के क्षेत्र में परस्पर बिखराव है, संस्कृत-वाङ्मय  में बिखरे भौतिक, रासायनिक एवं वैज्ञानिक तथ्यों पर शोध का अभाव है, आयुर्वेद को भले ही बढ़ावा मिल रहा है पर संस्कृत वहां भी ग़ायब है। इसके लिए हमें एक आन्दोलन के रूप में जुड़ना होगा और सरकार के सहयोग के साथ-साथ शोध कार्य करते हुए वैज्ञानिकी तथ्यों को प्रकाश में लाने के लिए सार्थक प्रयास करने होंगे।   

डॉ.अरुण कुमार निषाद- विदेशों में संस्कृत की क्या स्थति है ? कहाँ -कहाँ कार्य हो रहे हैं?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- अनेक विदेशी विश्वविद्यालयों में संस्कृत के अध्ययन की ओर रुझान है। नासा में संस्कृत के अध्ययन के लिए कक्षाएं लगती है। विश्व के शीर्षस्थ गायक संस्कृत के मन्त्रों,गीतों को संगीत के साथ प्रस्तुति दे रहे हैं। 

डॉ.अरुण कुमार निषाद- यदि आप संस्कृत नहीं पढ़ते तो क्या करते ?
प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- संस्कृत हमारी वंश-परम्परागत धरोहर रही है फलतः शैशवावस्था से ही संस्कृत पढ़े हैं। बाकी बात रही आजीविका की, तो भी संस्कृत-सेवा करते ही।

डॉ.अरुण कुमार निषाद- संस्कृत के पाठ्यक्रमों एवं  परीक्षा प्रणाली में क्या-क्या सुधार किये जायें ?

प्रो.ताराशंकर शर्मा पाण्डेय- संस्कृत के पाठ्यक्रमों को रोजगार परक एवं शोधपरक बनाना उपयुक्त होगा। परीक्षा प्रणाली में  वस्तुपरक प्रश्नों का अधिक समावेश हो तथा जाँच  प्रक्रिया कम्प्यूटराईज्ड हो तो बेहतर होगा।  

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