गुस्सा (कहानी)

मनमोहन भाटिया
- मनमोहन भाटिया


गुस्से में रिया ने सूटकेस में कपड़े ठूँसे और गहने अपने पर्स में रख कर घर से निकल पड़ी। रिया की सास ने रोकने की कोशिश की परंतु वह सफल नहीं हुई। गुस्से के कारण रिया ने अपनी सास की भी नहीं सुनी। रात के नौ बजे थे। सर्दियों के दिन धुंध ने चारों ओर अपनी चादर फैला रखी थी। चंद कदमों की दूरी पर भी कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। गली सुनसान। मेन रोड भी सुनसान। कोई रिक्शा भी नहीं था। दो पल के लिए रुकी। सड़क के बाई ओर बस अड्डा था और दाई ओर रेलवे स्टेशन। किधर जाए। बस अड्डा नजदीक था वह उसी ओर चल पड़ी। बस अड्डे पहुँच कर मालूम हुआ कि जबरदस्त धुंध के कारण लुधियाना के आगे हाईवे पर दो बस के बीच टक्कर से ट्रैफिक जाम है। बहुत लोग जख्मी है। पिछले दो घंटे से कोई बस नहीं आई। कोई उम्मीद नहीं कि अगली बस कब आएगी। बस अड्डे पर एक रिक्शा मिला जिस पर बैठ रिया रेलवे स्टेशन पहुँची। रेलगाड़ियाँ धुंध के कारण देरी से चल रही थी। उसने दिल्ली जाने का टिकट लिया और प्लेटफार्म पर एक बेंच पर बैठ कर दिल्ली जाने वाली रेलगाड़ी की प्रतीक्षा करने लगी।

मंडी गोबिंदगढ़ के स्टेशन पर गिनती की कुछ रेलगाड़ियाँ रुकती हैं। दिल्ली जाने वाली रेलगाड़ी का समय रात दस बज कर चालीस मिनट का था पर धुंध के कारण लगभग दो से तीन घंटे की देरी से चल रही थी। रिया बेंच पर बैठी सिर्फ प्रतीक्षा ही कर सकती थी। खुला प्लेटफार्म और ऊपर से जबरदस्त धुंध और ठंड। दो डिग्री तापमान में रिया ठंड से काँप रही थी लेकिन गुस्से की गर्मी से उसका सिर भन्ना रहा था। रोहन उसके सामने आ जाए तो शर्तिया उसका गला दबा देगी।

रोहन और रिया का विवाह छह महीने पहले हुआ था। दोनों दिल्ली के रहने वाले थे। रोहन एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत था। विवाह के तीन महीने दिल्ली में बड़े आराम से बीते। जैसा प्रेम विवाह से पहले था वैसा विवाह के बाद भी बरकरार रहा। तीन महीने पहले रोहन का तबादला मंडी गोबिंदगढ़ हो गया। महानगर दिल्ली के विपरीत मंडी गोबिंदगढ़ एक छोटा सा नगर है जहाँ सिर्फ स्टील रोलिंग मिलों के अलावा बैंक और सरकारी दफ्तर ही है। न कोई मॉल, न कोई घूमने की जगह। सिनेमा घर भी पुराने तरीके का जहाँ रिया का जाने का मन भी नहीं करता था। रोहन और रिया के साथ रोहन की माँ भी मंडी गोबिंदगढ़ रह रही थी। रिया घरेलू काम मे निपुण नहीं थी इसलिए रसोई उसकी सास संभालती थी। रिया सिर्फ टीवी देखती और फोन पर बातें करती थी। रोहन कंपनी के काम से लुधियाना, जालंधर और चंडीगढ़ आता जाता था। अकेली रिया थोड़े दिन में चिड़चिड़ी हो गई।

वैसे तो रोहन जब भी कंपनी के काम से लुधियाना, जालंधर या चंडीगढ़ जाता, वह शाम तक वापस घर आ जाता था। रोहन कंपनी के काम से दो दिन पहले चंडीगढ़ गया। उसने शाम तक वापस आना था लेकिन उस दिन काम पूरा नहीं हुआ और रात को चंडीगढ़ रुकना पड़ा।

"रिया आज काम पूरा नहीं हुआ। हेड क्वार्टर ने रुकने को कहा है। मैं कल आऊँगा।"
"रोहन तुम क्या कह रहे हो? रात अकेली कैसे रहूँगी?" तुम वापस आ जाओ। सिर्फ डेढ़ घंटे का तो सफर है।"
"रिया मम्मी हैं। तुम क्यों घबराती हो?"
"रोहन तुम कैसी बात करते हो? क्या मैं मम्मी के साथ चिपक कर सोऊँगी? पता नहीं तुमने यहाँ जंगल में पोस्टिंग ले ली। मेरा दम घुटता है। मैं कुछ नहीं जानती तुम अभी वापस आओ।" रिया ने गुस्से में कहा।
 मैं अभी भी मीटिंग में हूँ। डिनर के लिए ब्रेक लिया है। मैं नहीं आ सकता। कल जल्दी आ जाऊँगा। तुम चिंता न करो।"
"चिंता कैसे न करूँ? परसों मेरा बर्थडे है और तुम्हें याद नहीं।" कह कर रिया बिफर गई।
"रिया मुझे सब याद है तभी मैं काम समाप्त कर रहा हूँ ताकि परसों सिर्फ मैं और तुम सरहिंद नहर पर बने फ्लोटिंग रेस्टॉरेंट में कैंडल लाइट डिनर कर सकें। रिया तुम बेफिक्र हो कर आज मुझे ऑफिस का काम निबटाने दो। कल जल्दी आऊँगा और परसों छुट्टी लेकर तुम्हारे साथ।"

रिया के सामने मजबूरी थी। खीजे मन के साथ बिना रोहन के रात बिताई। अगले दिन रिया खिंची सी रही और सास से उलझ गई। रोहन की अनुपस्थिति में सास चुप रही पर अंदर ही अंदर आग में झुलस गई। काम-काज करना नहीं टीवी और फोन से चिपके रहना है और झगड़ा अलग से। आने दो रोहन कह दूंगी, संभालो अपनी गृहस्थी, मैं वापस दिल्ली चली।

रोहन अगले दिन भी काम में व्यस्त रहा। शाम को काम की समाप्ति पर घर मंडी गोबिंदगढ़ जाने के लिए कार स्टार्ट ही की थी उसी समय हैड क्वार्टर से फोन आया कि कल सुबह की फ्लाइट से मैनेजिंग डायरेक्टर चंडीगढ़ पहुँच रहे है। रोहन वही रुके। जरूरी मीटिंग में रोहन की जरूरत है। न चाह कर भी रोहन को मजबूरी में रुकना पड़ा। रोहन के रात चंडीगढ़ रुकने पर रिया ने रौद्र रूप धारण कर लिया। उसने रोहन की एक नहीं सुनी।

"तुम अभी के अभी आओ।"
"सुबह मैनेजिंग डायरेक्टर आ रहे हैं।"
"मैं कुछ नहीं जानती। रात मेरे साथ रहोगे। कल मेरा जन्मदिन है। तुमने छुट्टी करनी है। हमने फ्लोटिंग रेस्टॉरेंट में बर्थडे मनाना है। तुम्हें आना पड़ेगा नहीं तो मैं दिल्ली चली जाऊँगी।"
"सुबह  छ बजे की फ्लाइट से मैनेजिंग डायरेक्टर आ रहे हैं। अभी आऊँ तब सुबह तड़के चार बजे मुझे वापस आना होगा। बहुत मुश्किल है। रिया कुछ समझो।"
"क्या समझूँ? शादी के बाद मेरा पहला जन्मदिन है और तुम तीन दिन से घर पर नहीं हो और कल भी आओगे मालूम नहीं। अगर तुम घर नहीं आये तब मैं सुबह दिल्ली चली जाऊँगी।"
"मैनेजिंग डायरेक्टर की शाम चार बजे की वापसी फ्लाइट है। मैं उनको एयरपोर्ट छोड़ कर छह बजे तक घर आ जाऊँगा। मैंने दो दिन की छुट्टी ली है फिर शनिवार और इतवार। चार दिन शिमला चलेंगे। बर्थडे का पूरा आनंद लेंगे। तुम विश्वास करो।"

रोहन के लाख समझाने पर भी रिया संतुष्ट नहीं हुई। वह अपनी सास से उलझ गई, "कहाँ जंगल में लाकर मुझे पटक दिया है। छोटी गलियाँ। घर से बाहर निकलो तो सुअर, कुत्ते घूमते नजर आते हैं। मैं यहाँ पर एक पल नहीं रह सकती। मैं कल सुबह दिल्ली जा रही हूँ। तुम माँ-बेटा रहो यहाँ पर।"
क्रोध में सास को कटी जली सुना कर रिया अपने कमरे में गई और पटक कर दरवाजा बंद किया।

अगले दिन सुबह से रोहन काम में व्यस्त था। रिया थोड़ी-थोड़ी देर बाद फोन करती लेकिन काम की अहमियत देखते हुए रोहन ने फोन बंद कर दिया। इस बात पर रिया का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। सास ने उसे समझाने की कोशिश की, "देखो बेटा रोहन काम में व्यस्त है। मंडी गोबिंदगढ़ उसे तरक्की और वेतन वृद्धि के साथ भेजा है। शाम तक प्रतीक्षा करो। रोहन समय से आ जायेगा।"

बहुत बैचैनी से दिन कटा। शाम चार बजे की फ्लाइट से मैनेजिंग डायरेक्टर वापिस चले गए और रोहन काम समाप्त करके सवा चार बजे वापिस घर के लिए रवाना हुआ। डेढ़ घंटे का सफर था। ऑफिस से निकल कर रोहन ने रिया के जन्मदिन के उपहार लिए। पांच बजे थे। डेढ़ घंटा यानी साढ़े छ बजे तक घर पहुँच जाएगा और उसकी नाराजगी दूर कर देगा। यही सोच रोहन ने कार स्टार्ट की।

कार अभी चंडीगढ़ के भीतर ही थी कि धुंध चारों ओर फैलने लगी और थोड़ी देर में धुंध की मोटी चादर ने समस्त उत्तर भारत को लपेट लिया। रोहन ने कार की गति को धीमा किया। सामने कुछ नजर नहीं आ रहा था। रोहन को चिंता सताने लगी कि यदि समय से घर नहीं पहुँचा तो उग्र रूप धारण किये रिया को कैसे मनाया जाएगा। सरहिंद के फ्लोटिंग रेस्टॉरेंट भी कैसे जाया जाएगा। एफएम रेडियो से मौसम की जानकारी मिल रही थी। चंडीगढ़ से जम्मू तक घना कोहरा छाया हुआ था। अभी कुछ दूर का ही सफर तय किया था कि रोहन की कार धुंध की चपेट में आ गई।

ठक की आवाज हुई और झटके से रोहन स्टीयरिंग से टकरते बचा। सीट बेल्ट ने झटका बर्दास्त किया। रोहन समझ गया कि पीछे आ रही कार ने टक्कर मारी है। टक्कर लगने से रोहन का स्टीयरिंग से नियंत्रण हटा और उसकी कार ने आगे वाली कार को टक्कर मारी। टक्कर का सिलसिला आरंभ पहले हो चुका था। खट-खट की आवाजें होने लगी। कारें एक दूसरे में सामने लगी। रोहन ने कार से बाहर आ कर कार का निरीक्षण किया। कार की पिछला बम्पर टूट गया और डिक्की पिचक गई। आगे देखा। आगे का बम्पर लटक गया और बोनट टेढ़ा हो गया। चालीस-पचास गाड़ियाँ आपस में भिड़ गई थी। तभी जोर की आवाज हुई। रोडवेज की एक बस ने जो अंतिम भिड़ी कार को टक्कर दी तो उस कार के परखच्चे उड़ गए।

धुंध के साथ सर्दी चरम सीमा पर थी। स्वेटर के ऊपर कोट पहने रोहन को ठंड लग रही थी। रोहन ने देखा उसके आगे चार कार थीं और पीछे चालीस कार और रोडवेज की बस। कुछ लोग आपस मे लड़ने लगे और मुआवजे की माँग करने लगे और कुछ रोहन की तरह चुपचाप अपने वाहनों का निरीक्षण कर रहे थे। रोहन की कार भी अच्छी खासी क्षतिग्रस्त हो गई। रेडियेटर ठीक देख रोहन ने चैन की साँस ली। रोहन ने कंपनी में कार क्षतिग्रस्त होने की सूचना देने के पश्चात रिया को फोन किया। फोन पर रिया ने अपना पूरा गुस्सा और भड़ास निकाल दी। रोहन को अपना पक्ष रखने का मौका ही नहीं दिया। रोहन की बात को सफेद झूठ कह कर फोन काट दिया और दिल्ली जाने के लिए घर से निकल पड़ी।

कुछ देर बाद पुलिस की गाड़ियाँ आई और सब की कंप्लेंट दर्ज करके गाड़ियों को एक-एक करके रवाना किया। पुलिस ने एलान किया कि आपस में लड़ने का कोई फायदा नहीं है। इंश्योरंस क्लेम से गाड़ियाँ ठीक करवाएँ। पूरी क्षतिग्रस्त गाड़ियों को हटाने के लिए क्रेन बुलवाई गई।

रोहन कंप्लेंट दर्ज करवा कर घर की ओर रवाना हुआ। उसका दिल बैठा जा रहा था। रिया ने अपना फोन बंद कर दिया। माँ से मालूम हुआ कि रिया दिल्ली जाने के लिए घर से रवाना हो गई है। माँ को उसने तसल्ली दी लेकिन खुद वह परेशान था। कार खड़क रही थी। एक रिया के चंडी अवतार से परेशान था ऊपर से खड़कती कार की आवाज से सिर में दर्द शुरू हो गया।

रात के ग्यारह बजे रोहन मंडी गोबिंदगढ़ पहुँचा। कार की दशा देख कर माँ ने प्रभु का शुक्र अदा किया कि रोहन सही सलामत है। चोट कार पर आई है।
"माँ मैं रिया को देख कर आता हूँ।"
"कुछ खा लो बेटा। शाम से कुछ नहीं खाया है।"
"पहले रिया को खोजता हूँ।" कह कर रोहन ने स्कूटी स्टार्ट की और बस अड्डे देखा जहाँ रिया नहीं थी। बस अड्डे पर उसे मालूम हुआ कि कोहरे में एक्सीडेंट के कारण पिछले तीन घंटे से कोई बस नहीं आई। रोहन ने रेलवे स्टेशन की ओर स्कूटी घुमाई। रेलवे स्टेशन पर उसने स्टेशन मास्टर से रिया के बारे में पूछताछ की।

बुजुर्ग स्टेशन मास्टर ने बताया "पुत्तर एक लड़की पिछले तीन घंटे से प्लेटफार्म पर गाड़ी का इंतजार कर रही है। मैंने उसे घर जाने के लिए भी कहा कि गाड़ियों का कोई भरोसा नहीं। कुछ रद्द हो गई है और बाकी पाँच से बारह घंटे की देरी से चल रही हैं। बहुत घना कोहरा है।"
रोहन ने बुजुर्ग स्टेशन मास्टर की पूरी बात बताई और  प्लेटफार्म की ओर बढ़ा। बुजुर्ग स्टेशन मास्टर उसके साथ हो लिए। प्लेटफार्म पर दो-चार यात्री गाड़ी का इंतजार कर रहे थे। रिया एक बेंच पर अकेली बैठी थी।
रोहन ने रिया का हाथ थामा, "रिया घर चलें।"
रिया ने रोहन का हाथ झटक दिया। "मेरे से बात मत करो। सारा प्रोग्राम चौपट कर दिया। मैंने तुम्हारे साथ नहीं रहना। मैं माँ के पास जा रही हूँ।"
"रिया ऑफिस के काम से रुका था। पाँच बजे चंडीगढ़ से चला और अब पहुँचा हूँ। चारों ओर घना कोहरा है। पूरी कार डैमेज हो गई है। मेरी मजबूरी समझो रिया।"
"मैंने तुम्हारी कोई बहानेबाजी नहीं सुननी है।"

रोहन और रिया के झगडे को देख बुजुर्ग स्टेशन मास्टर ने रिया को समझाते हुए कहा, "पुत्तर बात मान जाओ। घर गृहस्थी में बहुत ऊँच-नीच देखनी पड़ती है। सुई की नोक पर चलना पड़ता है। भांडे हर घर में खड़कते हैं इसका यह मतलब नहीं कि घर छोड़ कर चले जाओ। मेरी उम्र देखो। अगले महीने रिटायर हो जाऊँगा। तुम्हारी उम्र के मेरे बच्चे हैं। मैं अपने अनुभव से तुमसे विनती करता हूँ  पुत्तर कि घर जाओ। कर्म ही पूजा है। भगवान श्रीकृष्ण कह गए कि निस्वार्थ कर्म करो। फल मैं दूंगा। तेरे मर्द के लिए ऑफिस का काम पहले है। बिना काम के गृहस्थी कैसे चलेगी। जब कम काम हो, छुट्टी लेकर अपने शौक पूरे करो। भूखे पेट न भजन गोपाला।"
रिया ने बुजुर्ग स्टेशन मास्टर की ओर देखा। उसकी आँखें नम थी और हाथ जोड़ कर खड़ा था। जिस रिया ने रोहन और अपनी सास की नहीं सुनी वह बुजुर्ग स्टेशन मास्टर की हाथ जोड़ मुद्रा देख पिघली और सूटकेस उठा कर बोली। "चलो रोहन।"

जब तक रोहन और रिया स्कूटी पर बैठ आँखों से ओझल नहीं हुए तब तक बुजुर्ग स्टेशन मास्टर उनको देखता रहा।
घर के दरवाजे पर क्षतिग्रस्त कार देख कर रिया हैरान हो गई।
"रोहन कार को क्या हुआ?"
"धुंध की मार है।"
"तुमको तो कुछ नहीं हुआ?"
"तुम घर आ गईं, मुझे क्या होना है।"
सारी नाराजगी छोड़ रिया रोने लगी और रोते-रोते रोहन से चिपक गई। रोते-रोते रिया बुदबुदा रही थी
"मैं खुद को कैसे माफ करूंगी?"
रूठ कर गई बहू पर माँ की आंखों में नींद कैसे आ सकती थी। बेटे-बहू की आवाज सुन घर के दरवाजे पर आईं। आलिंगन में बहू-बेटे को देख पल्लू से आँखे पोंछी। उदासी के आँसू अब खुशी के आँसू थे।

1 comment :

  1. नौकरी की जिम्मेदारिया,बिगड़ता मौसम और रिया का मिजाज।क्वालिटी टाइम बिताने के कार्यक्रम पर पानी फिरते देख रिया का चढ़ता पारा परिपक्वता का अभाव।विश्वसनीयता का अभाव।स्टेशन मास्टर की समझाइश।हकीकत जानने पर अपराधबोध।अंत सुखद।ठंड के समसामयिक हालातो पर और स्त्री के उग्र स्वभाव पर कटाक्ष करती रोचक कहानी।

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