आधुनिक संस्कृत कविताओं में माँ

अरुण कुमार निषाद 
डॉ.अरुण कुमार निषाद
असिस्टेण्ट प्रोफेसर (संस्कृत विभाग)
मदर टेरेसा महिला महाविद्यालय,
कटकाखानपुर, द्वारिकागंज, सुल्तानपुर


‘माँ’ एक ऐसा शब्द है, एक ऐसी ध्वनि है, जिससे इस चराचर जगत में जन्म लेने वाला प्रत्येक प्राणी परिचित है। दुनिया का हर जीव जन्तु कहीं-ना-कहीं अपनी माता से जुड़ा होता है। माता को समाज में बहुत ही उच्च स्थान प्रदान किया गया है प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में माँ की अहम् भूमिका होती है। माँ ही व्यक्ति की प्रथम शिक्षक होती है। ऐसे में प्राचीन काल से लेकर आजतक हर भाषा के कवि ने माँ के ऊपर दो चार पंक्तियाँ जरूर लिखी हैं। ऐसे में भला संस्कृत का रचनाकार कैसे पीछे रहता। आधुनिक संस्कृत के रचनाकारों ने भी माँ के ऊपर बहुत सारी कविताएँ लिखीं हैं कुछ प्रमुख रचनाकार और उनकी कविताएँ  इस प्रकार हैं-
पद्मश्री रमाकान्त शुक्ल ‘मम जननी’ काव्य संग्रह में लिखते हैं कि - किस प्रकार से माँ अपने गर्भ में नव महीने बच्चे को लेकर सारे गृहकार्य करती रहती है।
मां धृत्वा गर्भे नवमासान्
गृहकर्मपरा नित्यं हृष्टा।
भगवन्तं ध्यायन्ती कुशलं
मे कांक्षन्त्यासीन्मम जननी।[1]

वात्सल्यमयी माता किस प्रकार से प्रसव पीड़ा को सहती है और अपने दूध से अपने बच्चे का पालन-पोषण करती है।            
मामजीजनद् वात्सल्यमयी
सोढया प्रसवस्य परां पीडाम्
 मामपाययत् स्वीयं स्तन्यं
             मम पुष्टयै तुष्टयै मम जननी।[2]                

माँ अपने बालक की हर छोटी-बड़ी गलती को क्षमा कर देती है। उसी का वर्णन कवि कर रहा है।
सा प्रियंवदा प्रियकर्मपरा
सा क्षमामयी सा दयामयी
छत्रं परिवारशिरस्यासीत्
सुखदा शुभदा सा मम जननी।[3]        

प्रो. बटुकनाथ शास्त्री खिस्ते ‘कल्लोलिनी’ काव्यसंग्रह में लिखते हैं-
विपुलं वचनं रचनं प्रमितं
हसितं लसितं भसितश्च सितम्
पुरत: पुरतोषकरी च कथां
     बुधनीतिरियं सुयशोजननी।[4]       

‘संस्कृत गीतमालिका’ काव्यसंग्रह में डॉ. मनोरमा तिवारी लिखती हैं। वे कहती कि- मेरे सुख-दुःख की साथी हे माता! तुम कहाँ हो। आओ मेरा हृदय आज तुम्हें पुकार रहा है।
मम जननि! प्रिय मात!
शोकसागरे निमज्जय त्वं माम्।
कुत्र गता मे माता:।
कथमर्चना करवाणि तव।
नास्ति वचो मे मात:!
चेतो रोदिति कण्ठ रोदिति।
हृदयं सीदति मात।
मम जननि! प्रिय मात![5]   

डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्रा ‘काव्यायनी’ काव्यसंग्रह में लिखती हैं-
जय जय जननि! जयतु ते ममता
माता त्वमसि त्वमसि मे धाता
सत्यं त्वमसि तु भाग्य विधाता
लालन-पालन-साधन हेतो
स्त्वमसि सदैव समर्था।
जय जय ...
भवति तथा पृथिवी रुपा त्वं
ज्ञाता ब्रम्हस्वरूपा हि त्वम्
पाठ्ययसि त्वं ज्ञानविधानं
बहुधा व्यापक सत्ता।
जय जय ... [6]          

डॉ. प्रवेश सक्सेना लिखती हैं कि - लोरी और भक्ति गीतों के द्वारा सुलाने वाली मेरी प्यारी माँ तुम्हारा ही सर्वप्रथम स्वर मेरे कर्ण विवरों में गूंजा था। हे माता तुम्हीं ने मुझे बोलना-चलना सिखाया है।
हे जननि
शैशवे त्वत्त:
श्रुतानां भक्तिगीतानाम्
स्वापगीतानाम् च गुञ्जनमेव
‘स्फोटरूपेण’
मम मानसाकाशे
प्रति ध्वनितम्
भवति
तवेद नवगीतरूपेण
मम अधराभ्याम्
अभिव्यक्तं भवति
एवं नवशब्दार्थयुतो
गीतञ्जलि:
संभवति।[7]         

इस प्रकार हम देखते हैं भिन्न-भिन्न कवियों-कवयित्रियों ने अपनी-अपनी रचनाओं में माँ के अलग-अलग रूपों का वर्णन अपनी कविता में किया है। प्रत्येक रचनाकार ने यह स्वीकार किया है कि - माँ के बिना उनका अपना स्वयं का कोई अस्तित्व नहीं है। वह माँ ही होती है जो व्यक्ति को जिस रूप में चाहे ढाल दे। किसी भी व्यक्ति के सफल होने में उसकी माँ की बहुत बड़ी भूमिका होती है। कितना भी भारी संकट हो माता स्वयं झेलने को तैयार होती है, परन्तु अपने बच्चे पर आँच नहीं आने देती।                      



[1] मम जननी (संस्कृत काव्य संग्रह) प्रो. रमाकान्त शुक्ल, देववाणी परिषद् दिल्ली, प्रथम संस्करण 2013 ई., पृष्ठ संख्या 1     
[2] मम जननी (संस्कृत काव्य संग्रह) प्रो. रमाकान्त शुक्ल, देववाणी परिषद् दिल्ली, प्रथम संस्करण 2013 ई., पृष्ठ संख्या 1     
[3] मम जननी (संस्कृत काव्य संग्रह) प्रो. रमाकान्त शुक्ल, देववाणी परिषद् दिल्ली, प्रथम संस्करण 2013 ई., पृष्ठ संख्या 3  
[4] ‘कल्लोलिनी’ काव्यसंग्रह, प्रो. बटुकनाथ शास्त्री खिस्ते, शारदा प्रकाशन संस्थान वाराणसी, प्रथम संस्करण 1987 ई., पृष्ठ संख्या 28
[5] ‘संस्कृत गीतमालिका’ काव्यसंग्रह, डॉ. मनोरमा तिवारी, भारतीय संस्कृति संस्थान महिला शाखा लखनऊ, प्रथम संस्करण 1981 ई., पृष्ठ संख्या 28  
[5] काव्यायनीकाव्यसंग्रह, डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्रा, वाणी वाटिका प्रकाशन पटना, प्रथम संस्करण 1998 ई., पृष्ठ संख्या 25  
[7] अनुभूति: (संस्कृत कविता संग्रह), डॉ. प्रवेश सक्सेना, परिमल पब्लिकेशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 1996 ई., पृष्ठ संख्या 6      

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