समीक्षा: इस बहुरूपिया समय में (लेखक: निर्मल गुप्त)

समीर लाल 'समीर'

समीक्षक: समीर लाल ’समीर’

पुस्तक: इस बहुरूपिया समय में
लेखक: निर्मल गुप्त
प्रकाशक: अयन प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य: ₹ 260.00 रुपये

निर्मल गुप्त से परिचय फेसबुक के जरिये महज एक-दूसरे के पाठक होने का रहा विगत दो बरसों से। कभी मैसेन्जर पर नमस्ते हो जाती है। हाल चाल ले लिए जाते। नये लिखे छपे व्यंग्य पर भी टिप्पणीनुमा सलाह एवं तारीफ आदि हो लेती। बस, इतना सा परिचय मगर जैसे-जैसे इन दो सालों में उन्हें पढ़ता रहा वैसे-वैसे उन्हें और ज्यादा पढ़ने की इच्छा जागती चली जाती।

एक रोज इच्छा इतनी बलवती हो गई कि उनसे पूछ ही लिया उनकी किताब प्राप्त करने का साधन। पहले तो यह कोशिश रही कि कोई मेरठ या दिल्ली से यहाँ आने वाला मिल जाये तो लेता आयेगा। जल्द ही मिल भी गया और निर्मल बाबू ने बिना देर लगाये उन तक अपनी किताबें भिजवा दीं। एक कविता की, जो अभी अलमारी में रखी है, बिना पढ़े, और एक व्यंग्य की। हमें इन्तजार व्यंग्य का था, तो तुरंत ही पढ़ डाली। निर्मल जी एक के साथ एक टिकाओ में कविता पढ़वाने की कोशिश अभी कुछ समय के लिए इन्तजार करेगी।

कायल हो गये इनके नजर के पैनेपन के। जितनी तीखी नजर उतनी ही धारदार कलम। समाज को देखने का, जीवन जीने का, दर्द की अनुभूति का एक अलग ही नजरिया जो आपको भीतर तक कचोट जाता है मगर कलम की धार ऐसी कि आप मुस्करा उठते हैं शैली देखकर और अनमना जाते हैं उन विसंगतियों के बारे में सोच कर।

निर्मल गुप्त
व्यंग्य में पंच लाइनें ही व्यंग्य की जान होती है आमतौर पर मगर इनके तो आलेख ही अपने आप में पूरे के पूरे पंच बैंक हैं। किताब का नाम 'इस बहुरूपिया समय में' शायद इनकी नजर का ही कमाल है वरना एक आम आदमी तो समय का एक ही रुप ठीक से नहीं समझ पाता और जीवन गुजर जाता है। मगर समय के बहुरूपिया अंदाज़ को देख पाना और उस पर इतनी समझदारी और सजगता से टिप्पणी करना निर्मल गुप्त जैसे व्यंग्यकार के बस की बात है। उनके लेखन में कहीं कोई बनावट नहीं. सादी सादी बातें, सादी सादी भाषा में – एकदम सहज लेखन मगर प्रहार एकदम सीधा। शायद ऐसे लेखन को ही किसी ने 'ग्रीन लेखन' कहा होगा, पूर्ण प्राकृतिक।

उनके इस किताब के कुछ आलेखों की चंद पंक्तियों से गुजरिये मेरे साथ:
'गांधी की उतनी ही उपादेयता है जितनी किसी खुदाई में मिली हड़प्पाकालीन मिट्टी के किसी अलंकृत पात्र की, जो हमें रोमांचित तो करता है, पर रहता है निष्प्रयोज्य ही। बापू का इतिहास हमें गौरवान्वित करता है पर उस गौरव का केवल सांकेतिक और भावनात्मक महत्व ही है।'

एक और बानगी...
'कहा तो यह भी जाता है कि हिन्दी साहित्य की पुस्तकें छापी इसलिए जाती हैं कि वे दीमकों और चूहों का आहार बन सकें। इस तरह साहित्यकारों को रचना प्रकाशन का सुख और दूसरों को भोजन कराने के परमार्थ का पुण्य लाभ मिल जाता है।'

एक अन्य आलेख में:
'रामखिलावन जब गूगल की शरण पर धूनी रमाने के बाद बाहर आया तो वह परम ज्ञान को प्राप्त कर चुका था। अब प्रज्ञावान बनना है तो गूगल की शरण में जाना ही होता है।'

यहाँ तक कि इस पुस्तक के हर आलेख का शीर्षक भी अपने आप में एक पंच है मसलन:
'उपहार में बंटी क्लीन चिट'
'खामोश! सरकार हँस रही है...'
'यह उत्तम प्रदेश है'

एक बार किताब हाथ में उठा लें तो निश्चित ही बिना खत्म किये चैन नहीं मिलेगा और खत्म होते ही लगने लगेगा कि इनकी अगली किताब कैसे पाई जाये मगर हमारी सजा यह है कि उसके पहले हमें इनकी कविता की किताब भी पढ़नी ही पड़ेगी। कौन जाने उसमें भी कमाल ही किया हो, मगर फिर भी हिम्मत तो कविता के नाम पर जुटाना ही पड़ती है।

वाकई इस बहुरूपिया समय में सही जिन्दगी जीना हो तो जीने का नजरिया इस पुस्तक को पढ़कर सीखना होगा।

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