वाल्मीकि समुदाय के विकास में शिक्षा की भूमिका

- जय शंकर सिंह

शोध अध्येता, प्रौढ़ शिक्षा विभाग, शैक्षिक अध्ययनशाला
डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर मध्य प्रदेश
जय शंकर सिंह
समाज में सबसे निचले स्तर पर सफाई कर्मियों की जाति, जिसने संस्कृत के एक आदि-ग्रन्थ रामायण के प्रणेता वाल्मीकि के नाम पर अपने को जोड़कर देखती है। उनकी मान्यता है ऋषि वाल्मीकि भी उनकी जाति के महान आदि कवि थे। प्रचलित मान्यता के अनुसार यह एक प्राचीन जाति है जो आर्य-अनार्य संघर्ष में ब्रोकन मैन (पराजित दास, भंग पुरूष या भंगी) बने। पहले विभिन्न स्थानों पर यह जाति भंगी, मेहतर, लालबेगी जैसे नामों से भी जानी जाती थी अब सबका सम्मिलित नाम वाल्मीकि प्रचलन में है। पेशे से सफाई (कर्मी) कर्मचारी कहलाते हैं।यह जाति बहुलता से उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, चंढ़ीगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि स्थलों पर मिलती है तथा नगर गाँवों में बिखरी हुई हैं। इनके सफाई कर्मचारी के अलावा अन्य व्यवसाय जैसे ब्रेड-अण्डा, सुअर का मांस, सब्जी, फल बेचने, पशु-पालन, सुअर-पालन, मोटर मकैनिक, ड्राईविंग, शादी-विवाहों में बैण्ड बाजे बजाने जैसे काम शामिल है। पंजाब के वाल्मीकि कई बहिर्विवाह अपनाने वाले कुलों गोत्रों में बँटे हुए हैं- जिनमें गिल, मल्होत्रा, मट्टू, हंस, टांक, नाहर, सहोत्रा, भट्टी, सभरवाल, अटवाल, खोखला, बाली, चैहान, कल्याण, थापर, खंडयारे, तेजी, मूंग आदि प्रसिद्ध है। इनकी पुष्टि इब्टसन (इब्टसन:1961) ने भी अपने अध्ययन में की है। ये सब ऊँची पंजाबी जातियों के गोत्र हैं।

 मध्य प्रदेश में वाल्मीकि नगरीय क्षेत्रों में सफाई कर्मी हैं। कुछ लोग चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी-क्लर्क, वगैरह हैं। इनके कई बहिर्विवाही कुछ गोत्र (चंचरीक) हैं, जैसे पथरोल, बिल्वन, वान्यू भरूआ, मेना, कोरीसिया, लोहोट, चाओरिया, गौहर, चैहान, खरे, नरवारे, घेघट, घारू, झाझोंट, हारिया, परोची, राजाखेड़ी, कछवाहा, सिहोटे, बोहत, धौलपुरी, पिण्डपारोचे सौदे, पारोची, बागिया, चन्देलिया, नहारिया, महावते, चुटीले, बैद्य, मछन्दर, सनकट, कटारे, उरेले, मैनारे, खरारे, गोसाई, वर्मा, परोचे, सिहोता, नाहर, पथरोड़, सिहाते, मालवीय, उटमालिया, सिसोधिया, गोदिया, चन्डालिया, सेवते, सेठी, कल्छिया, सोदे, गोहरे, डागौर, कछुवा आदि। नगस्सेन (नाग पूजा) से संबंधित देवता हैं। यहां के वाल्मीकि, ऋषि वाल्मीकि को पूजते हैं। पूरे नगर में इनके द्वारा प्रति वर्ष जगह-जगह वाल्मीकि जयंती मनाई जाती है और नगर में विशाल शोभा-यात्रा निकलती है। इसके अलावा शिव, गणेश, पीरबाबा आदि को पूजते हैं।

 हिन्दुओं के सभी त्योहारों में इनकी भागीदारी रहती है क्योंकि इन्हें वहाँ उपहार मिलते हैं। वाल्मीकि पंचायतें सक्रिय हैं। चैधरी लोग इसका कार्यभार देखते है।

इनके सामाजिक जीवन को देखकर केवल किसी निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सकता। क्योंकि देश की आज़ादी के बाद से लेकर अब तक अनुसूचित जातियों के संदर्भ में हुई साक्षरता-प्रगति को उत्साहवर्धक नहीं माना जा सकता।

दलित समुदाय एवं शिक्षा के सवाल
वैसे, आधुनिक समाज शिक्षा को एक अहम सामाजिक संसाधन और समता के लक्ष्य को पाने का साधन मानता है। शिक्षा को किसी व्यक्ति की सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक स्थिति ऊपर उठाने का एक सशक्त साधन माना जाता है। इसे उस ज्ञान, कौषल, जीवन मूल्यों और दृष्टिकोण को पाने का उपाय समझा जाता है, जो किसी व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वातावरण में उसके मानवीय जीवन जीने के लिये आवश्यक है। दूसरे शब्दों में शिक्षा को एक ‘वांछित-कोटि’ के जीवन हेतु एक बुनियादी इंसानी जरूरत समझा जाता है।

            कुछ प्रसिद्ध दार्शनिकों व शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा की सार्थकता को दर्शाते हुए इसकी परिभाषा इस प्रकार दी। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार- “हमें उस षिक्षा की आवष्यकता है जिसके द्वारा चरित्र का निर्माण होता है, मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है, बुद्धि का विकास होता है, और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है।“ (गुप्ता:2006) प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री लाज़ ने कहा कि- “बच्चे अपने माता-पिता को और छात्र अपने शिक्षकों को शिक्षित करते हैं। प्रत्येक बात जो हम कहते, सोचते या करते हैं वह हमें किसी भी प्रकार से दूसरे व्यक्तियों द्वारा सोची या की गई बात से कम शिक्षित नहीं करती है। इस व्यापक अर्थ में जीवन षिक्षा है और षिक्षा जीवन है। “ इसी प्रकार प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री महात्मा गाँधी का शिक्षा के सम्बन्ध में विचार था कि- शिक्षा से मेरा अभिप्राय उस प्रक्रिया से है जो बालक एवं मनुष्य के शरीर, मन एवं आत्मा के सर्वांगींण एवं सर्वोत्कृष्ट विकास से है।“ अरस्तू के अनुसार- “शिक्षा स्वस्थ्य शरीर में स्वस्थ्य मस्तिष्क का निर्माण करती है।” प्लेटो  के शब्दों में- “शिक्षा का कार्य मनुष्य के शरीर और आत्मा को वह पूर्णता प्रदान करना है जिसके कि वे योग्य हैं।”

            शिक्षा की महत्ता को रेखांकित करते हुए कोठारी आयोग 1964-66 ने शिक्षा एवं राष्ट्रीय प्रगति प्रतिवेदन में स्पष्ट करते हुए कहा है कि- “शिक्षा राष्ट्रीय लक्ष्यों के प्राप्ति एवं सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम है। (सारस्वत: 2010) राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के अनुसार “मनुष्य एक बेशकीमती संपदा है अमूल्य संसाधन है। जरूरत इस बात की है कि उसकी परवरिश गतिशील एवं संवेदनशील हो। हर इंसान का अपना विशिष्ट व्यक्तित्व होता है, जन्म से मृत्युपर्यन्त जिन्दगी के हर मुकाम पर उसकी अपनी समस्याएँ और जरूरतें हैं। विकास की इस पेचीदा और गतिशील प्रक्रिया में शिक्षा अपना उत्प्रेरक योगदान दे सके इसके लिए बहुत सावधानी से योजना बनाने और उस पर पूरी लगन के साथ अमल करने की आवश्यकता है।” (राष्ट्रीय शिक्षा नीति: 1986)

            शिक्षा की भूमिका पर चर्चा करते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ही निम्न बातों को स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में 'सबके लिए शिक्षा' हमारे भौतिक और आध्यात्मिक विकास की बुनियादी आवश्यकता है। शिक्षा सुसंस्कृत बनाने का माध्यम है। जो हमारी संवेदनशीलता और दृष्टि को प्रखर करती है, जिससे राष्ट्रीय एकता पनपती है, वैज्ञानिक तरीके के अमल की संभावना बढ़ती है और चिन्तन से स्वतंत्रता आती है। शिक्षा के द्वारा ही आर्थिक व्यवस्था के विभिन्न स्तरों के लिये जरूरत के अनुसार जनशक्ति का विकास होता है। कुल मिलाकर यह कहना होगा कि शिक्षा वर्तमान तथा भविष्य के निर्माण का अनुपम साधन है। एक बुनियादी इंसानी जरूरत होने के अलावा शिक्षा और खासकर व्यावसायिक तकनीकी और वृत्तिक शिक्षा रोजगार पाने के लिये भी आवश्यक मानी जाती है।

संबंधित साहित्य और विद्वानों के अध्ययन
                  वाल्मीकि समुदाय को हमारा समाज जिस भी पृष्ठभूमि में देखे लेकिन इस वर्ग और इसकी जीवनशैली पर पर्याप्त अध्ययन हुए हैं। उनके आलोक में भी आज के वाल्मीकि समुदाय का अध्ययन किया जाय तो एक बार पूर्व में हुए अध्ययनों पर अपनी दृष्टि डालनी जरूरी हो जाता है। दिवाकर (2014) ने बतलाया कि भारत में अभी अनुसूचित जातियों में साक्षरता का प्रतिशत सामान्यजन की अपेक्षा उतना संतोषप्रद नहीं है। इन्होंने यह भी पाया कि भारत के जिन प्रान्तों में अनुसूचित जातियों की जनसंख्या 25 प्रतिशत के लगभग है वहाँ साक्षरता प्रतिशत काफी कम है जबकि कम जनसंख्या वाले प्रान्तों में यह प्रतिशत काफी ऊँचा है। उ.प्र. में जहाँ अनुसूचित जातियों की बहुलता है वहीं इनमें साक्षरता दर 26.9% है जबकि केरल राज्य में जनसंख्या कम है वहां 71.7% साक्षरता दर 2001 के अनुसार है। अनुसूचित जातियों में सबसे अधिक निरक्षरता वाले राज्य उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल, तथा मध्य प्रदेश प्रान्त हैं जहाँ इन जातियों के निरक्षर लोगों का 46.3% भाग निवास करता है। इन्होंने सुझाव दिया कि अखिल भारतीय स्तर से लेकर ग्रामीण स्तर तक ऐसे शैक्षिक कार्यक्रमों को चलाया जाय जिससे कि अनुसूचित जातियों में शिक्षा का अधिक से अधिक प्रसार हो सके। कुमारी (2014)  द्वारा पटना जिला भी दलित महिलाओं की सामाजिक आर्थिक स्थिति और पर्यावरणीय साफ-सफाई के ऊपर किये गये अध्ययन में बतलाया कि विकास के मानक शिक्षा, आय, घर, स्वास्थ्य और सफाई-व्यवस्था में महिलायें बहुत ही निम्न हैं तथा वे उन योजनाओं से भी अनभिज्ञ रहती हैं जो गरीबी दूर करने के लिये बनी है। उनके चहुँमुखी विकास के ऊपर ध्यान देने की जरूरत है। संजीव (2011)  ने बिहार के महादलित बालकों की शिक्षा एवं उनका समावेशी विकास का अध्ययन किया जो राज्य के 22 दलित समुदाय (अनुसूचित जातियों) में से 21  की पहचान महादलित के रूप में की गयी है, पर केन्द्रित है। महादलित समुदाय सर्वाधिक सुविधा से वंचित पाया गया, इस समुदाय में शिक्षा का स्तर काफी नीचे है। वे बहुत ही मुश्किल से प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की स्कूली शिक्षा हासिल कर पाते हैं। 3.6% लोगों को ही स्नातक उच्च शिक्षा मिल पाती है तथा 0.9% लोगों को तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा मिलती है। महादलितों के समावेषी विकास के लिये राज्य सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण योजनायें चलायी गयी हैं।

            यादव (2011) ने अनुसूचित जाति में सामाजिक गतिशीलता के अध्ययन के अन्तर्गत चर्मकार (चमार) जाति की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनैतिक स्थिति से संबंधित विभिन्न पक्षों पर किया। जिसमें इन्होंने पाया कि अधिकांश चर्मकार संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर जागरूक हुये हैं। इनमें शिक्षा प्राप्त करने के प्रति जागरूकता बढ़ी है। कुछ परिवार आर्थिक कमी के कारण बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते हैं। विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद ग्रामीण परिवेश में जाति-प्रथा की परंपरागत रूढ़िवादी विशेषताओं में परिवर्तन आया है। जाति पंचायत के प्रति आस्था पायी गयी तथा गरीबी, अशिक्षा एवं न्यूनतम जीवन स्तर के कारण इनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में काफी कम परिवर्तन आया है। गोस्वामी (2001)  द्वारा सौंर जनजाति की शिक्षा एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का समाजशास्त्रीय अध्ययन किया गया और पाया गया कि इन्हें आदिवासी कल्याण और विकास संबंधित योजनाओं से लाभ प्राप्ति में सड़क, पानी तथा स्वास्थ्य का आंशिक लाभ ही मिला है, शेष योजनायें कागज तक ही सीमित हैं। भविष्य योजना में घर बनाना प्रमुखता से शामिल है। सौंर जनजाति के लोगों में साक्षरता दर (16%) है और इनमें शिक्षा एवं जागरूकता की घोर कमी है जिसके कारण उनका विकास अवरूद्ध है। डुमार (2009) ने डुमार जाति की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का अध्ययन म.प्र. के सागर नगर में किया। इस अध्ययन में इन्होंने पाया कि डुमार जाति के अधिकतर लोग (12.5%) एकांकी परिवार में रहते हैं। आर्थिक संसाधन का स्रोत कम होने से वे स्वीपर का कार्य करके ही अपना जीविकोपार्जन करते हैं। शिक्षा के प्रति जागरूकता कम है। इनमें पर्दा प्रथा है। सरकार द्वारा दी जा रही सहायताओं और योजनाओं का उपयोग इस जाति के लोग अशिक्षा के कारण नहीं कर पाते हैं। ऋण के लिये साहूकार के पास जाने से आर्थिक स्थिति और भी कमजोर हो गयी है। शर्मा एवं शर्मा (2008) ने सामान्य एवं अनुसूचित जाति के छात्राओं की विषिष्ट सामाजिक अभिवृत्तियों का अध्ययन किया, जिसमें अनुसूचित जाति की छात्राओं में सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक दूरी, राष्ट्रीयता की भावना, सामाजिक क्रांति की अभिवृत्ति सामान्य छात्राओं से अधिक पायी गई तथा इन छात्राओं में उदारवादिता एवं अस्पृश्यता की भावना भी समान रूप से पायी गयी। रेड्डी (2008)  की पुस्तक ‘भारत का इतिहास’ में दिये गये वर्णन के अनुसार शूद्र खेती करने लगे थे तथा कुछ शिल्पकार भी बन रहे थे। इससे शूद्रों की आर्थिक स्थिति तो बेहतर हुई परन्तु सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। प्रिया (2006) ने अपने अध्ययन शिक्षा की सामाजिकता के अनुभव में शिक्षा और सामाजिकता के अन्तःसम्बन्धों के विषय में बताया कि शिक्षा ने दलित समाज के लिये एक ओर विकास का मार्ग खोला है, वहीं दूसरी ओर एक द्वंद को भी जन्म दिया है। शिक्षा के माध्यम से इनमें ज्ञान आया वहीं अपनों से दूरी भी बन गयी। शिक्षा प्राप्त करने के बाद इन्हें उन्हीं कामों से नफरत होने लगी जिसे करने में ये पहले गर्व महसूस करते थे। इनका शिक्षित वर्ग भी उच्च जाति के शिक्षित वर्ग की भांति हाथ से काम करने से कतराने व झिझकने लगा। ये अनुभव दिखलाते है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ी कमी है, जो शिक्षा प्राप्त व्यक्ति को न तो दूसरों के प्रति संवेदनषील बना पाती है और न ही उसे अपने समाज का हिस्सा बना रहने देती है। शिक्षित मनुष्य गलत परम्पराओं को तोड़ने या खत्म करने में पहल करने के बजाय उनसे दूर भागने लगता है। इससे इनके ही समाज के अशिक्षित/पिछड़े वर्ग में ये परम्परायें जस की तस बनी रहती हैं। साथ ही शिक्षित दलित समाज ज्यादा तनाव में नजर आता है। वह शिक्षा प्राप्त करने के बाद उच्च जातियों के समकक्ष होना चाहता है लेकिन उच्च जातियाँ उनसे दूरी बनाकर रखती है जिससे उन्हें दुःख होता है। इस प्रकार शिक्षा समाज को जोड़ पाने में नाकाम रही है।

            सिंह (2006) ने बताया कि अशिक्षित वर्ग की अपेक्षा शिक्षित वर्ग को नेतृत्व के अवसर अधिक प्राप्त हुये हैं। युवा वर्ग नेतृत्व की ओर बढ़ा हुआ है। नेतृत्व प्रकृति प्रदत्त न होकर अर्जित है। संवैधानिक विशेषाधिकारों तथा पंचायत राज के तहत प्रदत्त आरक्षण ने अनुसूचित जातियों तथा उनकी महिलाओं को नेतृत्व के अधिक अवसर प्रदान किये हैं। चौधरी (2006) ने अनुसूचित जाति के उत्थान मे आरक्षण की भूमिका विषय पर अध्ययन किया और बताया कि आरक्षण ने इस वर्ग के विकास का मार्ग तो खोल दिया, वहीं एक बहुत बड़ी संख्या में वंचित समूह के लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पाया जिसके कारण ये अपने बच्चों को शिक्षित नहीं कर पाये। बरूआ (2005) ने बताया कि 21वीं सदी में प्रौद्योगिकी शिक्षा एवं कम्प्यूटरीकृत शिक्षा में विकास हुआ है। शिक्षा में निजीकरण का विकास हुआ है, निजीकरण से समाज के कमजोर वर्ग, विषेष कर अनुसूचित जाति, जनजाति व पिछड़े वर्ग को इसका लाभ न के बराबर मिला। यह विद्यार्थी को केवल यान्त्रिक बना दिया है उनमें आत्मबोध एवं समाज समीक्षा का बोध नहीं करा पा रही है। सुझाव के रूप में शिक्षा के लक्ष्य को लेकर नये सिरे से विचार विमर्श की आवश्यकता है। क्योंकि प्रौद्योगिक शिक्षा ने भारतीय समाज को एक ओर नयी गतिशीलता प्रदान की है वहीं दूसरी ओर इसने विषमतावादी प्रवृत्तियों को भी जन्म दिया है। उपाध्याय (2004) ने ग्राम स्तर पर अनुसूचित जातियों की सत्ता संरचना में भागीदारी और विकास विषय पर अध्ययन किया और बतलाया कि अधिकांश अनुसूचित जाति के लोग राजनीति में स्वतंत्र भागीदारी करना चाहते थे लेकिन जाति के कारण वे सामाजिक आर्थिक कारणों से पीछे रह गये। अनुसूचित जाति के लोग अपने वोट के महत्व से अनभिज्ञ हैं, सिवाय पार्टियों की सदस्यता के वे अपनी जाति के उम्मीदवार को वोट देना अधिक पसन्द करते हैं। वे पंचायत का सदस्य तो बन जाते हैं लेकिन प्रधान नहीं बन पाते। यह भी पाया गया कि शिक्षा की कमी और कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि अनुसूचित जाति को मुखिया बनने से रोकती है और प्रायः इन्हें चुनाव में उच्च जातियों के लोगों द्वारा वोट देने से भी रोक दिया जाता है।

सिन्हा (2003) ने बताया कि दलितों को समुचित स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं। वे गरीबी, अस्पृश्यता, बेकारी तथा ठेकेदारों द्वारा शोषण के शिकार हैं। ये दलित, आदिवासी, नक्सलियों के ज्यादातर शिकार हो रहे हैं। पिछले 10 वर्षों के अन्दर नक्सलियों ने जिन लोगों को मार डाला है उनमें से 75% लोग दलित, आदिवासी थे। आज जो ‘दलित विमर्श’ अथवा ‘दलित साहित्य’ के रूप में उनकी उपेक्षा के कारणों को समझने का प्रयास किया जा रहा है उसमें कभी भी किसी भी तरह उन्हें आम आदमी से जोड़ने का प्रयास नहीं किया गया। पवार (1998) ने देखा कि शिक्षा शर्म करना सिखाती है, अपनों से ही छुपाना पड़ता है, स्वयं लेखक अपनी माँ से, छात्रावास के बाहर सब मित्रों के सामने खुलकर नहीं मिल पाते थे। शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् लेखक के मन में प्रतिष्ठा की बात आने लगी और अब वह कागज बीनने के काम को बुरा मानने लगा जिसकी समाज में कोई प्रतिष्ठा नहीं थी। लेखक का मानना है कि शिक्षा के बाद दलितों की कुछ पीढ़ियां भौतिक दृष्टि से आगे निकल चुकी है। अनुभवों के हिसाब से इन दोनों वर्गों के बीच काफी फासला है। नैमिशराय (1996)  ने बताया कि शिक्षा के कारण उनमें शोषण की समझ बनी जबकि खरात मानते हैं कि शिक्षा आत्मसम्मान आत्मग्लानि व शर्म करना सिखाती है। वे लिखते हैं कि डॉ. अम्बेडकर व शिक्षा के कारण जहाँ एक तरफ महारवाड़ी में एक नई विचारधारा फैल रही थी वहीं दूसरी ओर रूढ़-परम्पराओं से जकड़े हुये लोग थे। वे मानते हैं कि गाँव में तरक्की होने से गाँव में अब छुआछूत कम होने लगी थी, शिक्षा के कारण समाज में परिवर्तन तो हुआ है परन्तु दलित समाज आज भी पिछड़ेपन से बाहर नहीं निकल सका। जोशी (1996) ने विस्थापित आदिवासियों की समस्याओं को स्वर देने का प्रयास किया है। ये आदिवासी वे हैं जिन्हें औद्योगिकीकरण ने भूमि से विस्थापित कर भूमिहीन, श्रमिक सर्वहारा, प्रवासी बना दिया है। विस्थापन के कारण, आदिवासियों में बढ़ती अपराध प्रवृत्ति समस्या को गहरा देती है। जोशी अपने अध्ययन में पाते हैं कि अपरम्परागत तरीकों से दी जाने वाली ‘शिक्षा’ आदिवासियों की समस्याओं को हल कर सकती है साथ ही इनकी प्रस्थिति को भी सुधार सकती है। चानना (1993) ने अनुसूचित जाति व जनजाति, अल्पसंख्यकों तथा महिलाओं में उच्च शिक्षा की स्थिति के सम्बन्ध में किये गये अध्ययन तथा शिक्षा नीतियों के पुनः अवलोकन के दौरान उच्च शिक्षा के सम्बन्ध में पाया कि शैक्षिक कार्यक्रम, शिक्षा नीतियों और उनको व्यवहार में लाने के मध्य के अन्तराल को कम करने में असफल रहे हैं। चौधरी (1987) के द्वारा बताया गया कि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जन जाति के समुदायों में शिक्षा के स्तर में सुधार हुआ है और ये नये व्यवसायों को अपना रहे हैं, अवसरों का बेहतर उपयोग करके सरकारी क्षेत्रों में जा रहे हैं तथा राजनैतिक रूप से ज्यादा जागृत व सक्रिय हो रहे हैं। सिंह (1987) में अपने अध्ययन में अनुसूचित जाति में सामाजिक परिवर्तन के एक नये आयाम की बात की। अध्ययन का मुख्य झुकाव सामाजिक परिवर्तन की सामाजिक संरचना (जिसमें व्यावसायिक, आर्थिक स्थिति, राजनैतिक भागीदारी, स्वास्थ्य व शिक्षा शामिल है।) पर था। उनके अनुसार परिवर्तन का मुख्य कारण शिक्षा व बालकों को मिलने वाला वजीफा रहा।

निष्कर्ष-
            उक्त अध्ययन बताते हैं कि शिक्षा की पहुँच सभी वर्गो तक समान रूप से नहीं हुई है। शिक्षा भी सामाजिक संरचना से अछूती नहीं है। अनुसूचित जातियों में विकास का स्तर अभी भी निम्न हैं तथा ये अध्ययन शिक्षा के प्रभावों एवं परिणामों पर किये गये हैं। दूसरी ओर अनुसूचित जाति को एक समूह मानकर अध्ययन हुए हैं। अनुसूचित जाति में किसी विशेष जाति को लेकर अध्ययन नहीं के बराबर हुआ है। सामाजिक गतिशीलता और अनुसूचित जातियाँ शिक्षा व गतिशीलता, सत्ता के निर्माण में अनुसूचित जातियों की भागीदारी, अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों का शैक्षिक अनुभव, महादलित बालकों की शिक्षा एवं उनका समावेशी विकास यदि गहरे तरीके से हुआ होता तो यह कहना आज कठिन न होता कि वे अभी भी संकट में हैं। पर सच में अभी भी वाल्मीकि समाज की सामाजिक दशा सुधरी नहीं है और यदि सरकार और गैर-सरकारी संगठन मिलकर पहल करें तो उनके जीवन स्तर को सुधारा जा सकता है।

संदर्भ ग्रंथ सूची-
·         इब्ट्सन, डी. (1961) पंजाब कास्ट षिडयूल्ड कास्टस सेंसस।
·      चंचरीक, कन्हैयालाल और प्रसाद, सरोज. (2012), भारतीय दलित जाति कोष, भाग-2 (ब-ह) परिशिष्ट, युनिवर्सिटी पब्लिकेशन, नई दिल्ली. पृष्ठ- 227-228।
·         श्री निवास, एम. एन. (1981), आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली. पृष्ठ-22।
·         गुप्ता, लक्षता (2006), भारतीय समाज और शिक्षा, बंदना पब्लिकेशन, अतुल प्रिंटर्स, दिल्ली, पृष्ठ 21।
·         वही. पृष्ठ- 21
·         वही. पृष्ठ- 22
·         वही. पृष्ठ- 23
·         वही. पृष्ठ- 23
·    सारस्वत, डॉ. मालती एवं प्रो. एस.एल. गौतम (2010) भारतीय शिक्षा का विकास एवं सामयिक समस्यायें’, आलोक प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ- 97।
·         Govt. of India (1986), ‘National Policy on Education’, Ministry of HRD, GOI, New Delhi.
·        Kumari, Kumkum (2014), ‘Socio-Economic status and Environmental Sanitation among dalit women at Patna District in Bihar’, Journal of Community Guidance & Research, Vol. 31, No. 3, New Delhi, Page 367-372.
·     दिवाकर, डॉ. संगीता (2014), अनुसूचित जातियों में शिक्षा का प्रसार: एक मूल्यांकन’, सामाजिक सहयोग, वर्ष-14 अंक 54-55 शोध प्रबन्धन अभिषद, उज्जैन (म.प्र.), पृष्ठ 31-35।
·    संजीव, कुमार (2011) बिहार के महादलित बालकों की शिक्षा एवं उनका समावेशी विकास’, परिप्रेक्ष्य, वर्ष-18 अंक 3, न्यूपा, नई दिल्ली, पृष्ठ 35-46।
·      यादव, रश्मि (2010) अनुसूचित जाति में सामाजिक गतिशीलता’, (अप्रकाशित शोध प्रबंध) समाजशास्त्र विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.)।
·     डुमार, विश्वजीत (2009), डुमार जाति की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का मानवशास्त्रीय अध्ययन (अप्रकाशित शोध प्रबन्ध), मानवशास्त्र विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.)।
·      गोस्वामी, नीरज (2009), सौर जनजाति की षिक्षा एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का समाजशास्त्रीय अध्ययन’, (अप्रकाशित शोध प्रबंध) समाजशास्त्र विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.)।
·   चौधरी, राजेश कुमार (2006) अनुसूचित जाति के उत्थान में आरक्षण की भूमिका’, (अप्रकाशित शोध प्रबन्ध), समाजषास्त्र विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विष्वविद्यालय, सागर (म.प्र.)।
·    शर्मा, सुधीर कुमार एवं शर्मा नीतू (2008), सामान्य एवं अनुसूचित जाति की छात्राओं की विशिष्ट सामाजिक अभिवृत्तियाँ’, परिप्रेक्ष्य, वर्ष-15, अंक-2, न्यूपा, नई दिल्ली, पृष्ठ 47-59
·        रेड्डी के. कृष्ण (2007), भारत का इतिहास’, टाटा मैकग्राहिल पब्लिशिंग कम्पनी लिमिटेड, नई दिल्ली।
·    सिंह, नीति (2006), अनुसूचित जाति के क्षेत्र पंचायत अभिजन: भूमिकायें एवं जनसम्पर्क का अध्ययन’, सामाजिक सहयोग, वर्ष-14, अंक-57, शोध प्रबन्धन अभिशद, उज्जैन (म.प्र.), पृष्ठ 49-59।
·    प्रिया, नीरज (2006), ‘शिक्षा की सामाजिकता के अनुभव: दलित आत्मकथाओं के शैक्षिक अनुभवों का विश्लेष्णात्मक अध्ययन’, परिप्रेक्ष्य वर्ष-13, अंक-3, न्यूपा, नई दिल्ली, पृष्ठ 63-73।
·     बरूआ, डॉ. एस.एम. (2005), ’21वीं’ सदी में शिक्षा का बदलता स्वरूप और समाज का कमजोर वर्ग’, सामाजिक सहयोग, वर्ष-14, अंक 54-55, शोध प्रबन्धन अभिषद, उज्जैन (म.प्र.), पृष्ठ 12-19।
·     उपाध्याय, डॉ. ए.के. (2004), पार्टिसिपेशन इन पॉवर स्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट ऑफ़ सिड्यूल कास्ट्स एट विलेज लेवल, सामाजिक सहयोग, वर्ष-13, अंक-52-53, शोध-प्रबंध अभिषद, उज्जैन म.प्र. पृष्ठ 49-59।
·    सिन्हा, लोकेश्वर प्रसाद (2003), छत्तीसगढ़ में दलित आज भी उपेक्षित’, सामाजिक सहयोग, वर्ष-12, अंक-47, शोध प्रबन्धन अभिषद, उज्जैन (म.प्र.) पृष्ठ 33-35।
·       पवार, दया (1998), अछूत’ (अनुवादक-दामोदर खड्से) राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 24।
·    नैमिशराय, मोहनदास (1996), अपने-अपने पिंजरे’, (अनुवादक-दामोदर खड्से) प्रकाशन राधाकृष्ण, नई दिल्ली, पृष्ठ-14
·    जोशी, रामशरण (1996), आदिवासी समाज और शिक्षा (अनुवादक- अरूण प्रकाश) ग्रंथ शिल्पी नई दिल्ली.
·    Chanana, K. (1993), ‘Accessing Higher Education : The Dilemma of Schooling Women, Minorities SCs, STs in Contemporary India, Higher Education’, 26:1.  
·         Choudhary, k. (1987). ‘The Policy of Reservation: Need to continue and transcend’, Social action, April-June, New Delhi, pp. 17-24.
·      Singh, Soran (1987), ‘Schedule Castes in India : Dimension of Social Change’, Gain Publishing, New Delhi.

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।