कहानी: ताई

संदीप तोमर

संदीप तोमर


गाँव से आयी ताई यहाँ ठहरने को तैयार नहीं थी, कतई नहीं। पोटलीनुमा झोला काख में दबाए वह चली आ रही थी। उनका बड़ा बेटा सुबह ही अपने काम पर जा चुका था। बड़ा बिज़नेसमेन होने के नाते वह पौ फटने से पहले ही घर से निकल जाता था। गोया ताई को रेलवे स्टेशन छोड़ने कौन जाता?

भाभी जी मुझे बुलाने आयी थीं। मिन्नतें करने लगीं, "भाई साहब समझाओ न माँजी को, कल वे अपनी गाड़ी से गाँव छोड़ आएँगे। अकेले गॉंव कैसे जाएँगी? दो कदम तो चलना दूभर रहता है।"

मैं उनके पीछे पीछे अपना लम्बरेटा स्कूटर ले दौड़ा था। काफी समझाया, पर ताई नहीं मानीं। बोलीं, "मैं तो उस हरामजादी बड़ल्ले की बहू के साथ एक पल न रहूँ। रांड मुझे हेकड़ी दिखावै। कलमुँही मेरे सै बैर बांधै।"

मैंने बहुत कोशिश की कि ताई मेरे साथ वापस लौट चलें, लेकिन वे टस से मस नहीं हुईं। मरता क्या न करता, गोया मैं ताई को स्कूटर पर बैठा रेलवे स्टेशन छोड़ आया। ट्रेन में बैठाकर ताई को कुछ हिदायतें दे मैं वापिस घर लौटा।

मेरे पड़ोसी चाहते थे कि उनकी माता जी उनके साथ रहें। माता जी इतनी बूढ़ी तो नहीं हुई थी परंतु बीमारी ने उनकी उम्र को बढ़ा दिया है, न तो उनकी ऑंखें साथ देती हैं न ही हाथ-पाँव। अगर कुछ साथ देता है तो उनकी जुबान।

मेरे पड़ोसी के पिताजी का पुश्तैनी मकान गाँव में है। अपने पड़ोसी के पिताजी को मैं ताऊ जी और माताजी को ताई कहता हूँ। यह रिश्ता शायद उम्र के लिहाज से तय हुआ है।

ताऊजी एक पोस्ट ऑफिस में क्लर्क हैं। घर के काम काज से दूर, नौकरी से आकर हुक्का सुलगाते हैं। शाम के समय बैठक में महफ़िल जमती है। हुक्का और चाय का दौर लंबा चलता है। ताई शहर बेटों के पास आई तो ताऊजी के दोनों टेम की रोटियों के लाले पड़ जाते हैं। कभी चने चबाकर गुजारा करेंगे तो कभी दूध पीकर सो जायेंगे। कभी कभी तो बिना कुछ खाये पीये ही खाट पकड़ लेंगे।

यूँ तो ताऊ जी के चचेरे भाई का परिवार भी उसी गाँव में है। चचेरा भाई फ़ौज की नौकरी करके गाँव लौटा है। थोड़ी सी खेती बाड़ी है जिससे अपने परिवार को चला रहा है। एक छोटे से बगीचे में सब्जी की प्लेज (क्यारी) लगाकर खाली समय व्यतीत करता है। कभी-कभी चचेरे भाई की जोरू आकर घर की साफ सफाई भी कर जाती है।

ताऊजी यूँ तो काफी मसखरे मिजाज के व्यक्ति हैं लेकिन सिर्फ बाहर वालो के लिए। घर में कम ही बोलते हैं। तीन-तीन बेटोंं का भरा पूरा परिवार है, लेकिन साथ में एक भी बेटा नहीं है। ताऊजी को बेटोंं के साथ न होने का मलाल तो रहता है पर वे किसी से इस बात का जिक्र नहीं करते। लेकिन ताई पूरे गाँव में गाती फिरती है, "तीन बेटे हैं, छोड़ छाड़ कै जा बसे शहर मैं, एक भी नाशपीट्टा न है जो घास भी डालता हो बुड्ढे बुढ़िया कू। बड़ल्ले कू अपने बिज़नस सै फुर्सत ना, अर दूसरा नौकरी का रौना रोवै सौ अलग। अब छोट्टे कू के कहूँ वे तो वारा अपनी पढ़ाई लिखाई कूँ सब्तै उप्पर मानै। जैराये नै किताब्बो तै वियाह कर लिया।"

शहर में रहने वाले तीन बेटों में दो शादीशुदा हैं। छोटा बेटा अफसर बनने के लिए पढ़ाई कर रहा है। बड़े बेटे के दो बच्चे हैं। एक लड़का 12 साल का है और लड़की 7 साल की। दूसरे बेटे की एक लड़की है डेढ़ साल की।

बूढी ताई शहर में रह रही बहुओं को गरियाती रहती है। बहुएँ भी बूढी को एक नजर पसंद नहीं करतीं। ताऊजी ने बेटे को चिट्ठी लिख भेजी है कि अब तेरी माँ से कामकाज नहीं होता, हाड़-गोड़ तुड़वा बैठी है, चलना फिरना बस का न रहा, आकै साथ ले जा। बड़ा बेटा गाड़ी लेकर गाँव आ पहुँचा था। ताई आने को बिलकुल तैयार नहीं थी, कहती रही, "मैं न जाने की तेरे घर मै, वे रांड बिरबानी मझै खानै कू दौडे, ना कोई बोलने का  ना चाल्ने का ... सब के सब अपनी मथन मै रहवै। दिन भर वे तेरी औरत मारनै खाने कू आवे वे अलग। तेरे और तेरे बालकु की रोट्टी तो बनावै ना, मेरी के टहल करैगी?" ताई बड़बड़ाती रही।

बेटा जबरदस्ती करके माँ को ले आया। दो-चार दिन ठीक ठाक चला। ताई फिर बुदबुदाने लगी। मैं अक्सर शाम को घर के बाहर वाली बैठक में ताई के साथ बैठ जाता। ताई अपनी टोन में बड़बड़ाती, बहुओं को गालियाँ निकालती। सारा दिन बैठक में कैसे गुज़रता, गोया चिड़चिड़ी हो गयी। छोटी बहू तो कभी पता-सता लेने आती नहीं है। कभी ज्यादा काम हुआ तो लड़की को बूढ़ी के पास छोड़ जाती। ताई थोड़ी बहुत देर बच्ची के साथ मन बहला लेती। बहू का काम निपटता तो लड़की को नहलाने के बहाने अपने हिस्से के मकान में चली जाती। लड़की दादी के साथ खेलने के लिए मिमियाती। बहू लड़की को कमरे में ले जाकर दो तीन हत्ती जड़ देती। छोटा बेटा नौकरी में इतना व्यस्त कि माँ का हाल चाल पूछने का वक़्त भी नहीं निकाल पाता।

एक बार फिर सबका रूटीन ऐसा बना कि ताई खुद को उपेक्षा का शिकार पाने लगी।

बड़ी बहू साफ सफाई का बिलकुल ध्यान न रखती। अपनी जवानी में काम पर जान लुटाने वाली ताई यह सब कैसे सहन करती। उसे अपने दिन याद आने लगे। पति घर से जल्दी नौकरी पर चला जाता था। घर का काम करना, तीन बच्चोंं को तैयार करके स्कूल भेजना और खेती बाड़ी संभालना। घर में दो-दो गाय भैंस बांध रखी थीं। उनका घास-पानी, गोबर-मूत सब काम उसे याद आते तो आँख में आँसू छलक आते। उसे लगता, "एक मैं थी भरी जवानी टाब्बर कू पालने मै फूंक दी और एक आज की रांड औरतें कुछ काम काज करने कू ना राज्जी।"

ताई दिन भर कुढ़ती रहती। शरीर इस काबिल नहीं रह गया कि इधर उधर अंदर-बाहर जा सके। ताई की आदत कुछ ऐसी हुई कि बात बात पर तुनकना शुरू।

उस रोज मैं ताई के पास आकर बैठा ही था कि भाभी आ गईं। बोलीं, "भाई साहब, अब आप ही बताओ, अगर दूध कम पड़ने पर माताजी को चाय दे दी तो कौन सी आफत आ गयी। ये बुढ़िया तो छोटी छोटी बात पर घर अधर उठा लेती है। बच्चा बीमार है उसे दूध की ज्यादा जरुरत है या इस बूढी माई को? अब अपने बाल-बच्चे पालें या इसे परोसे माल-पुए।

सुनकर ताई फिर बिफर पड़ी। उसे याद आया कि किस तरह वे अपने तीनों बेटोंं को नींद में भी दूध पिला दिया करती थी। बड़ा बेटा किताब पढ़ते हुए अक्सर सो जाया करता था, दूध का गिलास पास में रखा होता। ताई उस वक़्त रात बिरात अपनी नींद की फिकर न कर बच्चों को देखती, उनकी सुध लेती। सोते में ही उनके मुँह दूध का गिलास लगा उन्हें दूध पिला देती। चार-चार साल की उमर तक बोबा चुंखते रहे उसके बेटे, लेकिन सर आत्मिक सुख मिलता। आज बीमारी की हालत में उसे कोई एक गिलास दूध नहीं देता तो वह आहत हो जाती।

अभी उस रोज छोटी बहू की बच्ची गला फाड़कर रो रही थी। ताई जैसे-तैसे सरकते सरकाते दूसरे दालान पहुँचकर बोलीं, "का बात है बहू, छोरी क्यूँ चिल्लावै? अरै जम्फर उठा अर ठूंस दे मुँह में, क्यूँ रुलावै इतनी देर तक? देख छोरी का के हाल होगिया!"

बहू बिफर पड़ी थी, "माँजी आप मेरे मामले में दखल न दें। मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि मुझे क्या करना है क्या नहीं।"

"अरै छिनाल मेरे तै जुबान लड़ावै। छोरी रोन लागरी अर तू हमैं बतावै अक्क कुक्कर करैं अर कुक्कर न करैं?"

"देख बुढ़िया, तू हद से आगे जाने की कोशिश कर रही है,बड़ी है इसका मतलब ये नहीं कि तू अनाप शनाप कुछ भी बोलेगी।"

"अरै कुतिया मंनैं तुझै कौन सी फांसी दे दी जो तू गला फाड़री? अरै तेरी छोरी कु ही तो दूध पिलाने कू कहरी खुद तो न चुंखरी।"

"बुढ़िया चुप कर दिन रात दूध पिलाकर मुझे अपना फिगर ख़राब नहीं करना।"

"अरैं रांड, बकरी जितना बांक अर भैंस जितने थन लेरी अर बात करै फिगर की। शरम ना आत्ती, अपने बालको को दूध पिलाने में तेरी बॉडी ख़राब हो जायेगी। आन दे आज मेरे छोरे कू। तुझै लात मारकै निकलवा दूँगी। अर कल ही फेरे फेर लंग्गी अपने छोरे के।"

बस फिर क्या था? पूरा घर कुरुक्षेत्र की रणभूमि बन गया है। बड़ी बहू ने आकर मध्यस्थता की वर्ना पता नहीं लड़ाई क्या रूप लेती।

ताई का तेवर सबकी बर्दाश्त के बाहर हो गया। लेकिन किया क्या जाए? शाम को लड़के आये तो दोनों दुखी। छोटा लड़का बड़े भाई को बोल गया, "भैया, आप ही माँ को लाये हो, या तो गॉंव वापिस छोड़ आओ या फिर अपनी तरफ से मेरे दालान को मत लांघने दो।"

अगले दिन छोटे लड़के ने लड़ाई की जड़ ही ख़त्म कर दी। आनन-फानन में दालान में दीवार खड़ी कर दी। बड़े भाई साहब शाम को अपने बिज़नस से घर लौटे तो दीवार देख आहत हो गए। सीधे मेरे पास आकर कहने लगे, "अब क्या करूँ, भाई साहब मैं तो परेशान हो गया। छोटे भाई की हरकत पर ताज्जुब होता है। माँ तो बूढी हो चुकी, पता नहीं कब चल बसे लेकिन घर में जो दीवार खड़ी हुई वे घर में नहीं मेरे सीने में खड़ी हुई है। माँ की आदत है हर बात में टांग अड़ाएगी। पिताजी की अभी डेढ़ बरस की नौकरी है, माँ के हाथ-पैर टिक गए हैं। घर का कुछ काम होता नहीं । सविता भी इसकी आदतों से तंग है। न गाँव छोड़ सकता, न यहाँ रखते बनता। दिनेश अभी सिविल सर्विस की तैयारी कर रहा है। खुद कमरे में कम और कोचिंग क्लास में अधिक रहता है, वह क्या माँ को रख पायेगा अपने साथ।"

भाई साहब गॉंव में चाचा का घर परिवार तो है ही थोड़े दिन ताई की गॉंव छोड़ आओ। मैंने सलाह देने की चेष्टा की।

अरे भाई, पिताजी की आदत तो तुम जानते ही हो, ड्यूटी से आते ही हुक्का चाहिए और नहीं हुआ तो 501 पताका के तिनके पूरी बैठक में पड़े मिलेंगे। बार-बार चाय चाहिए। अब माता जी बीमार और ऊपर से उनके नखरे। समय पर काम नहीं हुआ तो मारने को दौड़ेंगे सो अलग। इतनी उमर मेरी भी हो गयी उन्हें देखते। अब इस उमर में हाथ डंडा चलाना शोभा देता है क्या? दवा दारू तो चाचा जी  कर देंगे लेकिन इन दोनों के आपस में झगडे। उफ़्फ़! और ऊपर से माताजी का माहौल पड़ोस की औरतों में। पिताजी और इन दोनों की कलह में घर की गॉंव बिरादरी में बदनामी कितनी होती है?

आखिरकार भाई साहब अपनी माताजी को गाँव छोड़ ही आये। गाँव भर में थू थू हो रही थी। बड़ा बिज़नसमैन माँ को बूढ़े बाप के पास पटक आया। ताई को जिंदगी जैसे वीरान लगने लगी। ताई ने अबकी खाट पकड़ी तो जैसे उठने की हिम्मत ही नहीं। चाचा जी का परिवार खाना दे जाता। कभी दो तीन दिन में सफाई भी हो जाती।

एक दिन मैं अपने नौकरी के काम से बाहर गया। वह शहर ताई के गाँव से पास ही में था। गोया अपना काम निपटा मैं ताई से मिलने चला गया। जाते-जाते शाम के पाँच बज गए। ताऊजी को पता चला कि सुदीप आया है तो झट अपना कामधाम समेट घर आ गए। ताई की तबियत तो ख़राब थी ही। पड़ोस के बच्चे चाची को बुला लाए, चाय पानी बनाने के वास्ते। चाय पीते समय ताऊजी थोड़ा रुआँसे होकर बोले, "एक बात बताओ बेटा, कैसे निर्दयी हैं मेरे बेटे, अपनी ही माँ का इलाज न करा सकते, घर में अंग्रेजी कुत्ते-कुतियों की आवभगत अपनी माँ से ज्यादा कर सकते हैं, लेकिन ये नहीं देख सकते कि माँ भूखी मरती है, कितनी भूख होती होगी एक मरीज इंसान की? एक दो कोर खाती है।"

मैं अवाक् था, बड़ी ही दर्दनाक बात कर रहे थे ताऊजी। क्या यह बात सही थी कि उनके बेटे उनका बिलकुल ख्याल नहीं रखते थे? मैं निरुत्तर बैठा चाय सुड़कता रहा। ताऊजी मेरी चुप्पी पर कुछ पल ही खामोश रह पाए। एकाएक बोले, "बेटा पूरी जिंदगी मैं यही समझता रहा कि तेरी ताई ज्यादा बोलती है, बात बात पर झगड़ती है, लेकिन आज जिंदगी के इस मोड़ पर आकर समझता हूँ कि ये बड़ी तार्किक औरत है, ये मुझे जीवन जीने के गुर सिखाती रही, आगे बढ़ने की जिद्द करती रही, बुढ़ापे के सहारे के लिए पैसा बचाने की योजनाएँ सिखाती रही, पर मैं अभागा इसे गलत समझता। सास बहू के झगड़ों में इसका दोष निकालता रहा, पर आज मुझे अब समझ में आता है, मेरी बुढ़िया निर्दोष है। बस मेरे ही कर्मो का दोष है कि बेटों में इतने संस्कार न भर पाया कि वे अपनी बीमार माँ को साथ रख इलाज करा सकें।" ताऊजी बड़े दर्द के साथ ये सब बोले जा रहे थे।

मैं सोचता रह गया। ताऊजी ताई के साथ साथ अपने आप को भी उपेक्षित महसूस कर रहे थे। काफी दुखी थे। मैं उन्हें कुछ सांत्वना दे पाता इससे पहले अंदर से चाची की आवाज सुनाई दी, "सुदीप बेटा, देख तेरी ताई को क्या हुआ?"

मैं आवाज सुन अंदर दौड़ा। ताई के शरीर में ऐंठन हो रही थी, हाथ पैर सुन्न। कुछ अजीब सी हालत थी। मैंने ताऊजी से कहा, "ताऊजी, ताई की हालत बहुत खराब है, उन्हें अभी शहर ले चलते हैं।" ताऊजी खासे परेशान थे। वे कुछ न बोले।

मैं ताई को गोद में उठा गाड़ी तक ले आया। चाची पीछे-पीछे चल पड़ी थी। गाड़ी का दरवाजा उन्होंने ही खोला। ताऊजी घर के दरवाज़े सोपट खुले छोड़ गाड़ी तक पहुँच गए थे। बोले, "सुदीप मैं भी साथ चलता हूँ। घर बाहर का तो पाले के बच्चे देख लेंगे।" सुखपाल चाचा जी को ताऊजी इसी नाम से बुलाते हैं।

ताऊजी पीछे की सीट पर ताई को सँभालते हुए बैठ गए। मैं गाड़ी स्टार्ट करके गाँव से बाहर निकल आया। ढाई-तीन घंटे में मैं ऐम्स में था। ताई के तीनों बच्चों को खबर मिल चुकी थी। वे इमरजेंसी डिपार्टमेंट के बाहर इन्तजार कर रहे थे। ताई को एडमिट करा दिया गया था। कुछ राजनीतिक व्यक्तियों के साथ जान पहचान निकालने के बाद भाई साहब ने पहले ही सारा इंतज़ाम कर लिया था। रात के समय ज्यादा डॉक्टर ड्यूटी पर नहीं होने से थोड़ी समस्या थी लेकिन इत्मीनान था कि अब इलाज शुरू हो रहा है। रात का समय था इसलिए मैंने और भाई साहब ने अस्पताल में रहने का निर्णय लिया और बाकी सबको घर भेज दिया।

भाई साहब दुखी थे। मैंने ताऊजी की कही बातें भाई साहब से कीं। वे आहत हो बोल उठे, "सुदीप, मैं भी सब देखता सुनता हूँ, महानगर की समस्याओं से तुम परिचित हो, मझले का व्यवहार भी तुम जानते हो, घर में दीवार करके उसने रिश्तों में दरार डाल दी। सविता का व्यवहार भी तुम देखते ही हो। माँ ने ही गरीब घर की लड़की देख मेरी शादी की थी। आज ये पैसे को पैसा नहीं समझती। अपने मायके का खर्च भी यहीं से चलाती है। दो-दो भाइयों की पढ़ाई का खर्च मुझसे छिपा भेजती रही। मैं इन बातों पर झगड़ता नहीं तो क्या समझता भी नहीं? भाई मेरे, मैं दो दो बच्चों का बाप हूँ, क्या नहीं जानता लेकिन जग हंसाई से डरता हूँ। चाहता तो पत्नी से तलाक ले जिंदगी जी सकता था। पिताजी समझते हैं मैं खुश हूँ। मेरे भाई, छोटे को आई ए एस बनाने का सपना मेरा ही था। पिताजी तो जैसे इन सब बातों से अंजान बने हैं। इतने रिजर्व रहते हैं कि मैं  तो अपना दर्द उन्हें बता भी नहीं सकता।"

भाई साहब ज्यादा ही भावुक हो गए थे। बड़ी मुश्किल से समझाया था उन्हें। धीरे धीरे सुबह हो गयी। दस बजे से ताई के चेकअप शुरू हुए। दो तीन दिन तक चेकअप का सिलसिला चलता रहा। इस बीच बड़े भैया अस्पताल से हिले तक नहीं। कुछ खाते पीते भी नहीं थे। मैंने उनसे कहा भी, "भाई इस तरह तो आप भी चारपाई पकड़ लेंगे।"

उन्होंने कहा, "सुदीप, एक बार माँ ठीक हो जाये बस, खूब सेवा करूँगा उनकी। उनका हर त्याग, हर बलिदान याद है मुझे, सेवा ही मेरा प्रायश्चित है।"

ताई की रिपोर्ट्स भी आ गयी थी। डॉक्टर ने बताया कि उन्हें कुष्ठ रोग है। सारे परिवार के पैरों तले की जमीन खिसक गयी। भाई साहब अवाक् खड़े अपनी अश्रु धारा रोकने की कोशिश करते रहे।

एक महीने बाद अस्पताल से छुट्टी मिली। इस बीच भाई साहब में एक अजीब सा परिवर्तन देखा था मैंने। ताई को भाई साहब घर ले आये थे। ताऊजी भी गाँव जा चुके थे। इनकी सरकारी नौकरी, इतनी छुट्टियाँ कैसे लेते।

एक साल तक दवाइयाँ चलती रही। लगातार ताई की हालत में सुधार आ रहा था। एक शाम मैं ताई का पता लेने भाई साहब का पता लेने भाई साहब के घर पहुँचा। ताई कुठरिया में चारपाई पर चित्त पड़ी थी। मैंने आवाज दी, खाँसते हुए उन्होंने आँखें खोल दी, हँसने लगीं। बड़ी भाभी चाय का कप लिए खड़ी थी। पोता स्टूल खिसका चारपाई के पास बैठ गया। ताई के चेहरे पर खुशी के भाव थे। बोलीं, "बेटा सुदीप देख मैं चार दिन खाट पै क्या पड़ी, सबकी अकल आ गी ठिकाने, तेरा ताऊ भी तंग हो गिया, कुक्कर डोल्लन लगे सारे के सारे।"

भाभी जी बोलीं, "माँ जी, लो चाय पी लो और दो चार पारले जी के बिस्किट चबा लो। कितनी कमजोर हो गयी हो आप।" ताई ने चाय का कप पकड़ लिया। भाभीजी अंदर जा चुकी थी। पोता भी अपनी किताबों में घुस गया था। मैं बैठा ताई के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रहा था। उनकी आँखों में अपने बड़े बेटे पर फख्र मैं साफ साफ देख रहा था।

ताई ने मुझसे कहा, "सुदीप, बड़ा लायक है मेरा बेट्टा। खूब सेवा करे है। रोज खान पीन का समान लावे अर अपने काम से आकै मेरे साथ बैटठे। मुझै जूस पिलावै।"

ताई इस वक़्त जैसे सारा स्नेह बड़े बेटे पर लुटा देना चाहती थी। मैं ताई का चेहरा देखता रहा। मुझे इस तरह से देख जैसे वह लजा गयी। बोलीं, "मुए, क्या हुआ, क्या देख रा इस तरह....?" मैं हँस दिया।

बातों बातों में समय बीत गया। बड़े भाई साहब घर आ गए। मैंने उनसे कहा, "भाई साहब आपने ताई की जो सेवा सुश्रूषा की है, ताई खुश है। शायद वे अपने ठीक होने पर कम आपके स्नेह पर ज्यादा खुश है। उसे शांति है कि आप हर बात में उसका पूरा पक्ष लेते हो, उसका ख्याल रखते हो।" वे बोले, "हाँ, सुदीप माँ बहुत खुश है। बस मैं चाहता हूँ माँ पूर्णतः ठीक होने पर कोई उलजलूल हरकत न करें। अभी पिताजी की रिटायरमेंट भी नजदीक है। सोच रहा हूँ कि उन्हें भी यहीं ले आऊँ। ऊपर दो कमरे डाल दूँ ताकि दिनों अलग शांति से रहें। पिताजी जैसे गाँव में बिलकुल अकेले रह गए हैं...। माँ के बिना उनका सारा समय कैसे कटता होगा? वे अपने आप को अकेला पा रहे होंगे।" कहते हुए उनकी आँखें छलछला गयी।

ताई की आँखों में भी आँसू बह रहे थे। मैं अनुभव कर रहा था कि ताई के ये आँसू दुःख के नहीं थे। अपनी परवरिश पर फख्र के आँसू, वे शायद पोंछना भी नहीं चाहती थीं।

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