लघुकथा: एक खोई हुई शख़्सियत

वागीशा शर्मा
 - वागीशा शर्मा

लगभग एक सप्ताह से गार्डेन में झड़े पत्तों, बिख़री टहनियों और सूखे गमलों को देख कर मन ही मन अपने माली दिनकर के बिना बताए गाँव चले जाने की आदत पर झुँझलाती हुई मैं उस रोज़ कॉलेज पहुँची थी। सोच रही थी कि कॉलेज कैंटीन में ही काम करने वाले दिनकर के साले अनुज से उसकी छुट्टी के विषय में पता करूँगी। मैंने कैंटीन की तरफ रुख़ किया ही था कि अनुज को सामने पाया।
“मैडमजी, वो तो ख़त्म हो गया”।
“वो कौन?”
“दिनकर, जो आपके यहाँ माली का काम करता था”।
“क्या! कैसे?”
“कोई टक्कर मार गया। तीन-चार दिन की खोज के बाद कल सब्जी-मण्डी पुलिस थाने से बॉडी मिली है”।
(यहाँ यह बताना आवश्यक है कि सब्ज़ी-मण्डी पुलिस थाना दिल्ली की लावारिस लाशों का ठिकाना है।)
“ये कब हुआ?”
“जी सण्डे।”
साथ-ही-साथ बिना किसी झिझक के उसने पूछ डाला, “मैडम, क्या वो अपने पैसे ले गया था?”
“नहीं तो, वो तो लगभग एक हफ़्ते से आया ही नहीं, सैलरी कैसे लेता!”
“तो मैडम, जितने भी बनते हों, मुझे दे देना।”
“वो तो मैं दे ही दूँगी, पर उसके तो बच्चे अभी छोटे ही हैं”।
“जी, मैडम।”
मैं हतप्रभ सी खड़ी कुछ और पूछ पाती इससे पहले ही वह अपने रोज़मर्रा के कार्य, चाय सर्व करने में व्यस्त हो
गया। ऐसा लगा मानो पैसों की चाहत ने ही अनुज को मुझे दिनकर की मौत का समाचार देने को बाध्य किया था।
उसकी बहन का असमय ही विधवा हो जाना तो मानो उसके लिए कोई मायने ही नहीं रखता हो या फ़िर कमजोर
कन्धों पर आया ज़िम्मेदारी का बोझ उसे संवेदनहीन बना गया था।

ख़ैर, क्योंकि परीक्षा शुरू ही होने वाली थी। अतः इस बेहद संवेदनशील चर्चा को वहीं विराम देने को बाध्य मैं भी
भारी मन से निर्दिष्ट कमरे में निरीक्षण-कार्य हेतु पहुँच गई पर मन तो विचलित था। मानव की क्षणिक सत्ता पर
केन्द्रित मेरी विचार-शृंखला बरबस ही मेरे नेत्रों को सजल बनाती रही। “पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात।
देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात॥” का प्रत्यक्ष प्रमाण आज मेरी आँखों के सामने उपस्थित था। पुस्तक में
किसी भाव को पढ़ना और उसी सत्य का प्रत्यक्ष दर्शन दोनों बहुत ही पृथक अनुभव लिए रहते हैं। दिनकर की
निरन्तर अनुपस्थिति से क्षुब्ध मेरा मन कब अत्यन्त द्रवित हो कर मुझे ही धिक्कारने लगा, एहसास ही नहीं हुआ।
दिनकर की शख़्सियत से जुड़ी अनेक घटनाएँ मेरे मन-मस्तिष्क में उबरने लगीं। कॉलेज से मिले आवास में पार्क
रूपी जङ्गल को एक व्यवस्थित बाग़ में बदलने की निष्ठा, गार्डेन के कोने-कोने को हर वक़्त साफ़ रखने का जुनून,
काम करते हुए घण्टों की गिनती से बेख़बर, बदले में मिलने वाले मेहनताने से बेअसर, उपहार-प्राप्ति पर कृतज्ञ
आँखें – ये सब दृश्य मेरे सामने चलचित्र की तरह चलने लगे। कहने को तो वह मेरे यहाँ काम करने वाला सिर्फ एक माली ही था परन्तु उसकी कर्मठता हमेशा प्रेरणीय और प्रशंसनीय रही है। ऐसा कोई और माली क्या मैं कभी ढूँढ पाऊँगी? शायद, कभी नहीं।

घर आने पर गार्डेन को देखकर ऐसा लगा मानों कोना-कोना दिनकर की मौत का शोक मना रहा है। सूखे पत्तों की सरसराहट के रूप में गार्डेन का हर पौधा धीरे-धीरे दिनकर को ही पुकार रहा हो कि आओ, इस गन्दगी से हमें मुक्ति दिलाओ। सोचने लगी कि नये माली के आने तक क्या दिनकर की मेहनत को व्यर्थ जाने दूँ? पूरे मनोयोग से जिस जङ्गल को उसने सुसज्जित गार्डेन का रूप दिया था क्या उसे फिर से जङ्गल में ही परिवर्तित होने दूँ?

नहीं, ऐसा हरगिज़ नहीं होना चाहिए। गार्डेन का काम अब मुझे ही देखना होगा। नए माली की भर्ती तक इसे मुझे
खुद ही व्यवस्थित करना चाहिए अन्यथा दिनकर के प्यार से पले-बढ़े ये पौधे, दिनकर की ही भाँति कब चुपके से
लुप्त हो जाएँगे, इल्म ही नहीं हो पाएगा और वह असामयिक दिवङ्गत आत्मा अशान्त होकर मुझे धिक्कारती रहेगी। शायद यही मेरी उसके प्रति सच्ची श्रद्धाञ्जलि हो सकेगी। अगले ही पल मेरे हाथ में झाड़ू और खुरपा था और मैं गार्डेन में व्यस्त थी।

2 comments :

  1. अच्छा लिख रही हैं वागीशा दी आप

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