कहानी: वापसी

मुरलीधर वैष्णव

मुरलीधर वैष्णव

सेमुअल के दिल पर गहरी ठेस लगी थी। उसके मन में भारी हलचल थी। उसे स्वयं नहीं मालूम था कि वह सोमला डामोर आदिवासी से सेमुअल कब बन गया था। उसे लगा कि उसके भीतर की गहराई में छुपा सरल, सहज, वनवासी-सोमला किसी बनावटी व्यक्तित्व की परतों में लुप्त हो चुका है। उसे अपना व्यक्तित्व कुछ शुष्क टुकड़ों में बिखरा-बिखरा लगता था और अपने व्यक्तित्व के हर टुकड़े के बीच उसे एक गहरी खाई लगती थी। वह प्रायः यह सोचकर छटपटाता था कि कहीं भीतर से उसका कोई अमूल्य अंश खो चुका है और उस अंश के अभाव में वह स्वयं को अपनी सहजता और मौलिकता से जोड़ नहीं पा रहा है।
कभी उसे यह सोचकर ग्लानि होती कि पाँच साल की उम्र में उसका पालन पोषण करने व पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाने वाले फादर के विरुद्ध मुकदमा करके उसने कृतघ्नता की है तो दूसरे ही पल फादर का चेहरा उसे ‘मर्चेट आफ वेनिस’के ‘शैलाक’से भी खतरनाक सूद-खोर का लगता। कोई सूदखोर रकम उधार देकर भारी ब्याज सहित रुपया ही तो वसूलता है। ‘शैलाक’ जैसा सूदखोर किसी की जान लेने के इरादे से अपना ‘पोंड आफ फ्लेश’माँगता है। लेकिन फादर ने सोमला आदिवासी को उस पर खर्च किए कोई दस-पन्द्रह हजार रुपयों के बदले उसका धर्म, संस्कृति, परिवेश, व्यक्तित्व, सब कुछ छीन लिया। सोमला आदिवासी के व्यक्तित्व की हत्या कर उसी के हाड़ माँस से उसने जिस सेमुअल को बनाया वह आज अपने वन देव काला बाबा के भजन व आदिवासी मस्ती के लोकगीतों से अनजान पश्चिमी धुनों पर गाई जाने वाली चर्च की कुछ प्रार्थनाओं को अटपटे अन्दाज में गाने पर मजबूर था। वह अपने आदिवासी लोक नृत्यों को कभी नहीं सीख सका। भौंडे रॉक एंड रोल से वह अपने आपको अपने आदिवासी समाज की दृष्टि में एक हास्यास्पद जीव के रूप में पाता था।

12 साल की उम्र में फादर ने पहली बार उसे बतलाया था कि जब वह पाँच साल का था तभी उसकी माँ एक दिन उसे टापरे (झोंपड़े) में अकेला रोता-बिलखता छोड़ कर एक आदिवासी युवक के साथ भाग गई थी। एक छोटी बेटी भी थी जिसे उसने अपने पीहर छोड़ दिया था। उसका पूर्व पति, वेस्ता, कोई 60 साल का बूढ़ा था। वह सोमला को पाल नहीं सकता था सो चर्च के अनाथ आश्रम में छोड़ गया। शायद वेस्ता की नीयत दूसरी औरत लाने की थी सो वह सोमला को सौतेली माँ के कोप से भी बचाना चाहता था।             

इस जगत में करीब पाँच वर्षों के लिए ही वह सोमला डामोर आदिवासी बनकर अपनी वनवासी संस्कृति और प्रकृति की गोद में खेला था और फिर एक दिन सेमुअल बन कर चर्च की चार दिवारी में कैद हो गया।

‘मैं जीसस क्राइस्ट की सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि जो कुछ कहूंगा, सच कहूंगा। सच के सिवाय कुछ नहीं कहूंगा।
नाम?
सेमुअल
पिता का नाम?
वेस्ता
जाति?
ईसाई
उम्र?
20 वर्ष
निवासी?
गाँव अरथुणा, तहसील कुशलगढ़ जिला बाँसवाड़ा राजस्थान

हाँ तो बतलाओ क्या हुआ

‘जी, चार साल पहले मैंने हायर सैकण्डरी पास की थी। जन्म से डामोर भील आदिवासी होते हुए भी बचपन में ही धर्म परिवर्तन कर लेने से मुझे सरकारी नौकरी में रिजर्वेशन का लाभ नहीं मिला। फादर ने ही पाल पोस कर पढ़ा लिखा कर बड़ा किया था सो उन्होंने मोकमपुरा चर्च स्कूल में चार सौ रुपये मासिक वेतन पर मुझे टीचर रख लिया। खाना रहना फ्री था। ढाई सौ रुपये ही नकद वेतन देते थे और डेढ़ सौ रुपये के लिए कहते थे कि तुम्हारे खाते में जमा कर रहे हैं। बाद में बड़ी रकम मिल जाएगी। चार महिने पहले मैंने अपनी छोटी बहन की शादी के लिए मेरी बकाया रकम फादर से माँगी तो वे बोले कि पहले दो और आदिवासियों को ईसाई बनाओ तो रकम दे देंगे। मैंने कहा यह मेरे बस की बात नहीं है। गाँव में हिन्दू परिषद् वाले मुझे पहले से ही आँखें दिखाते हैं। फिर भी जब मेरी रकम फादर ने नहीं दी तब मैंने नौकरी छोड़ दी और यह मुकदमा किया।’

फादर की ओर से वकील द्वारा की गई जिरह पूरी होने पर सेमुअल आगे की तारीख पेशी ले कर अदालत से बाहर निकला। बाहर फादर से उसकी आँखें चार हुईं, सेमुअल कुछ क्षणों के लिए ठिठका। उसने अपनी नजरें जमीन में गाढ़ दीं।

‘गाड ब्लेस्स यू माई सन’फादर ने अपनी मुस्कान को‘विश्व कल्याण’की भावना से ओतप्रोत करते हुए कहा।

एक समय था जब सेमुअल को फादर की मुस्कान उसके प्रति श्रद्धा से अभिभूत कर देती थी। लेकिन अब वह उस मुस्कान का भेद समझ चुका था। चर्च में रहकर वह जान चुका था कि विदेशों से अरबों रुपये प्रतिवर्ष ईसाई धर्म-प्रचार हेतु भारत में प्राप्त होते हैं। पैसा और सुविधाओं के प्रलोभन पर पचासों आदिवासीगण को ईसाई धर्म अपनाते वह देख चुका था। हजारों देशी विदेशी मिशनरीज दूर दराज इलाकों में निष्ठा पूर्वक इस कार्य में लगे हुए थे। लेकिन हायर सैकण्डरी तक की उसकी शिक्षा से उसमें उत्पन्न विवेक के फलस्वरूप धर्म-परिवर्तन में प्रलोभन या परोक्ष या अपरोक्ष रूप से किसी प्रकार की जबर्दस्ती से उसे घृणा होने लगी थी। दूसरी बात जो उसे विशेष रूप से खलती थी वह यह कि ईसाई करण और चर्च की तत्संबधी समस्त गतिविधियां आदमी को अपनी संस्कृति और जमीन से उखाड़ फेंक कर अपनी ही जमीन पर अपने ही लोगों के बीच उसे नितांत अजनबी बना देती थी - जैसे किसी किसान को किसी ने उसी के खेत में विदेशी वस्त्र पहना कर बीजूका बनाकर खड़ा कर दिया हो....। सेमुअल फादर की ओर देखे बिना ही उन्हें ‘थेंक यू सर’ कहते हुए तेजी से आगे बढ़ गया।

चर्च स्कूल की नौकरी छूटने के बाद कुशलगढ़ कस्बे में ही एक सेठ ने उसे तीन सौ रुपये मासिक वेतन पर मुनीम के रूप में रख लिया था। हर सप्ताह वह एक बार अपने गाँव जरूर जाने लगा था। उसके पिता वेस्ता ने टी.बी. के कारण खाट पकड़ रखी थी। अपनी सौतेली बहन मंगली को उसने आरंभ से ही स्कूल में भर्ती करा दिया था। लेकिन आठवीं कक्षा पास करके वह स्कूल छोड़ भेड़ें चराने व खेती में अपनी सौतेली माँ का हाथ बंटाने लग गई थी। फिर भी सेमुअल को विश्वास था कि अस्पताल में दाई की ट्रेनिंग दिलवा कर वह  उसे अपने पैरों पर खड़ी होने योग्य अवश्य बनाएगा। उसके लिए उसने एक आदिवासी युवक कमजी, जो पास के गाँव में ग्राम सेवक तैनात था, से मंगली के विवाह की बात पक्की कर ली थी। उसे केवल तीन हजार रुपयों की आवश्यकता थी जिससे वह दो माह बाद मंगली का विवाह धूमधाम से करना चाहता था। कमजी ने पिछले वेणेश्वर मेले में ही मंगली को झूला खाते देख कर पसंद कर लिया था। लेकिन वेस्ता लोभी था। मरणासन्न होते हुए भी उसने मंगली का हाथ कमजी को सौंपने के लिए कमजी से दो हजार रुपये और 500 ग्राम चांदी की माँग कर रखी थी। सेमुअल ने सोचा कि तीन हजार रुपये इकट्ठे होते ही वह अपने पिता को उक्त रकम यह कह कर दे देगा कि कमजी ने यह रकम मंगली के हाथ के लिए भिजवाई है।

सेमुअल ने स्टेशन से माल की बिल्टी छुड़ाकर माल सेठ के गोदाम में रखवा दिया। जैसे ही वह दुकान पर पहुँचा सेठ ने उसके इंतजार में पहले से वहाँ बैठे हिन्दू परिषद के दो कार्यकर्ताओं से उसे मिलाया।

‘वाह सोमला भाई, बधाई हो, एक कार्यकर्ता बोला।
‘सोमला नहीं सेमुअल’सेमुअल जेब से एक दूसरी बिल्टी निकाल कर सेठ को देते हुए बोला।
‘चलो सेमुअल ही सही, पर भाई, तुम्हारी हिम्मत मान गए।’
दूसरा कार्यकर्ता खिसियाई हंसी हंसते हुए बोला।
‘कौन सी हिम्मत और कैसी बधाई दे रहे हैं आप लोग’सेमुअल अब गंभीर हो गया।
‘वही चर्च-स्कूल छोड़ कर पादरी पर मुकदमा करने की। देखो तो सही, लालच के बाद अब जबर्दस्ती से भी धर्म परिवर्तन कराने लगे हैं ये लोग।’पहला कार्यकर्ता अंगुलिएँ नचाते और आँखें मटकाते हुए बोला।

सेमुअल को उनकी बधाई और बातें अच्छी नहीं लगी। वह जानता था कि धर्म का क ख ग भी न जानने वाले धर्म के ये ठेकेदार इंसान को सहज और महज इंसान के रूप में देखना पसंद नहीं करते। उनकी दृष्टि में किसी भी इंसान की हिन्दू-मुस्लिम, ईसाई या किसी न किसी धर्म का बनकर रहना उतना ही जरूरी है जितना कि जीवित रहने के लिए सांस लेना। उसे न तो पुनः हिन्दू बनने की आकांक्षा थी और न ईसाई बन जाने का दुख। दंश तो उसके दिल में इस बात का था कि वह अपनी वनवासी संस्कृति और प्राकृतिक सहजता से बहुत दूर जा चुका था और वहाँ से लौट आने की उसके मन में छटपटाहट थी। तुरन्त ही वह इन कार्यकर्ताओं को आड़े हाथों लेने के मूड में आ गया।

धर्म परिवर्तन पर चिंता करने से पहले आपने कभी सोचा है कि ये गरीब आदिवासी ईसाई बनने पर क्यों मजबूर होते हैं ? अपने ही हिन्दू समाज के सम्पन्न और सवर्ण लोग जब इन्हें अछूत मानकर प्रताड़ित करते हैं और उनके गहने गिरवी रखकर 20-20 रुपये प्रति सैकड़ा माहवारी ब्याज पर रुपये उधार देकर जब उनका खून चूसते हैं तब आप लोग कहाँ होते हैं ? इनके बेटे-बेटी मामूली रकम या 10-15 किलो मक्की के एवज में बंधुआ मजदूर बनकर पशु सा जीवन व्यतीत करते हैं तब आपकी परिषद क्या करती है? जब हमारा आदिवासी पुलिस, फोरेस्ट, रेवून्यू और पूरी नौकरशाही के शोषण से पिसता और लुटता है तब आपका हिन्दू धर्म कहाँ होता है? सरल, सौम्य, सेमुअल यह कहते हुए काफी उत्तेजित हो गया था। नाटा कद, गेंहुआ रंग, घुघराले काले बाल और पेंट शर्ट पहने सेमुअल के आक्रोशित रुप को देख कर  कार्यकर्ता लोग उसे ठगे से देखते रह गए।

लेकिन सेमुअल अभी भीतर से खाली नहीं हुआ था। अपनी बात पूरी करते हुए बोला, ‘पहले अपने ही लोगों को धर्म का मर्म समझाएं। और हमारे धर्म की तो चिंता छोड ही दीजिये। हमें धर्म की नहीं बल्कि अपार धन व साधनों वाले इन विदेशियों के हाथों विलुप्त हो रही हमारी सांस्कृतिक धरोहर और उस डोर के टूटने की चिंता है जो हमें हमारी जमीन और अपने देश से जोड़े रखती है। हो सके तो इसे टूटने से बचाइये।’

दुकान के बाहर कुछ लोग और भी इकट्ठे हो गए थे। सेमुअल का यह रूप देख कर कुछ क्षणों के लिए वहाँ सन्नाटा छा गया। धीरे-धीरे कार्यकर्तागण व अन्य लोग वहाँ से खिसक गए।

आज कमजी के साथ सेमुअल पहली बार गोटिया आम्बा मेले का आनन्द ले रहा था। चर्च की कैद से वह इन आदिवासी मेलों, त्यौहारों,लोक गीतों-नृत्यों - सभी से कट गया था। मेले में कमजी ने अपने बायें बाजू पर अपना नाम गुदवाया ‘कमजी कटारा’। फिर नाम गोदने वाले से मशीन खुद हाथ में लेकर कमजी ने सेमुअल के बायें बाजू पर नाम गोद दिया ‘सोमा डामोर’। सेमुअल यह देख चौंक उठा।

"यह क्या गोद दिया?’ सेमुअल बोला। एक बारगी उसकी चेहरे पर आश्चर्य व क्रोध की रेखाएँ जरूर उभरीं लेकिन फिर कुछ देर बाद उसके मन के किसी कोने से आवाज आई "क्या गलत हुआ। क्या तुझे सोमला की तलाश नहीं?"

आज सुबह ही सुबह अरथुना गाँव में सफेद जीप देखकर आदिवासी स्त्रियों में जबरन नसबंदी की आशंका से खलबली मच गई। कुछ ऐसा ही माहौल था उन दिनों। लेकिन जीप तो फादर की थी। सेमुअल ने देखा कि फादर जीप से उतर कर उसी के टापरे की ओर आ रहे हैं। सेमुअल ने उन्हें नमस्ते की और उनके लिए खाट बिछाई। फादर ने उसके पिता आदि की कुशल क्षेम पूछी। वेस्ता भी कराहता हुआ खाट पर बैठा हो गया था। फिर फादर सेमुअल को एक तरफ ले गए और अपने हैण्डी बैग से एक लिफाफा व कागज निकाला। लिफाफे में उसकी चार साल की बचत राशि छह हजार रुपया थी। एक कागज पर राजस्व टिकट लगा हुआ था व उसके ऊपर छह हजार रुपये की भरपाई के शब्द अंकित थे। सेमुअल सब समझ गया। वह तो उक्त रकम लेकर मुकदमा उठाने को तैयार था ही। उसने पैसे लिए और रसीदी टिकट पर हस्ताक्षर कर दिए।

सेमुअल, माई सन, कम बैक’फादर ने सेमुअल के सिर पर हाथ फेरते हुए निवेदन भाव से कहा।

सेमुअल की आँखें शून्य की ओर टिकी थी। ‘दो आदिवासियों को ईसाई बनाने पर ही तुम्हें अपनी रकम मिलेगी’फादर के ये शब्द उसके दिल में शूल की तरह कहीं गहरे चुभे हुए थे। फादर के लिए उसके मन में वर्षों से संजोई असीम श्रद्धा, उनके उन चार शब्दों से काँच के ग्लास की तरह टूट गई थी। वे शब्द-शूल उनका मुखौटा उतार चुके थे। अब वह धर्म के पिंजरे में बंद होकर निर्जीव बासी राग नहीं अलापना चाहता था। वह स्वच्छन्द पक्षी-सा, नदी किनारे, बांसुरी की धुन पर जीवन के गीत गाना चाहता था। अपने ही आदिवासी मित्रों के बीच मक्की के खेत में बैठकर, अपनी धरती माँ की धड़कन सुनना चाहता था।

लेकिन जिस फादर ने पाँच साल की उम्र से पालन-पोषण कर पढ़ा-लिखा कर उसे इस चेतना और आक्रोश के योग्य बनाया उनके प्रति कृतज्ञता भी उसके मन में स्वाभाविक थी। वह फादर के इस अहसान से उऋण भी होना चाहता था। वह भाव विहृल हो उठा।

सर, आई हैव आलरेडी कम बैक... टू माई ओन लैंड... माफ करें, अब चर्च स्कूल नहीं लौट सकूंगा। हाँ, सेमुअल तो नहीं, पर आपका यह सोमला आदिवासी आपके अहसानों का बदला एक दिन जरूर चुकाएगा।’ सेमुअल उर्फ सोमला ने अपनी बात विनम्रता किंतु दृढता से पूरी की।

फादर निराश, अन्यमनस्क से लौट गए।

आज मंगली की शादी है... बाराती और पूरा अरथुना गाँव महुए की शराब, लोक नृत्य व लोक गीतों की मस्ती में डूबा है... चंग और ढ़ोल की थाप पर झूम-झूम कर नाचते आदिवासी स्त्री-पुरुषों को देखकर सेमुअल के पैर भी थिरकने लगते हैं... लोक गीत के आधे-अधूरे बोल उसके अधर भी गुनगुनाने लगते हैं...

1 comment :

  1. एक कड़वे सच से साक्षात्कार कराती रचना हेतु बधाई !

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