काव्य: गिरिजा कुलश्रेष्ठ (ग्वालियर)

गिरिजा कुलश्रेष्ठ
अनजान शहर से गुजरते हुए 

किसी अजनबी शहर से गुजरते हुए
मुझे अक्सर अहसास होता है
कि बहुत जरूरी  होती है,
सजगता, समझ, और जानकारी
उस शहर के--इतिहास--भूगोल की
पर्स में मीठी यादों की पर्याप्त पूँजी
डायरी में नोट बहुत खास
अपनों के नाम।

किसी अपने का पता, फोन नंबर
ताकि शहर की गलियों, चौराहों को
पार किया जासके यकीन के साथ।

अजनबी चेहरों की भागती सी भीड में
अनजान रास्तों के जटिल जाल में
अन्तहीन सी दूरियों को पार करते हुए भी
याद रखा जा सके अपना गन्तव्य
और उसे तलाशने में
खर्च होने से बचाया जा सके
जिन्दगी का एक बडा हिस्सा

जब भी गुजरती हूँ मैं
किसी अनजान शहर से
महसूस होती है तुम्हारी कमी
पहले से कहीं ज्यादा
किसी अनजान भाषा में
बतियाते लोगों को देखना
भर देता है मुझे
निरक्षर होने के अहसास से
तभी तो याद करती हूँ
तलाशती हूँ तुम्हें ही
हर चेहरे में।

तुम्हारा साथ होता है
सिरपर हाथ होता है
तब नही होता
कुछ भी अनजाना
जटिल या थकान वाला।


अनजान शहर से गुजरना
सिखाता है बहुत से तमीज-तहजीब
कि हर किसी से नही मिला जाता
उस तरह,
जिस तरह मिलते रहते थे हम
अपने गाँव में सबसे।
कि नही खोला जाता अपना बैग
या गिनी जाती अपनी जमाराशि,
प्लेटफॉर्म पर खुले में ही।

कि नही बताया जाता हर किसी को
अपना घर और गन्तव्य
और यह भी कि बहुत जरूरी होता है
साथ होना किसी अपने का
गुजरते हुए किसी अनजान शहर से

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 ऊँचाई पर - दो व्यंजनाएँ


एक विस्तार

एयर इण्डिया के विमान में
उडते हुए मैंने देखा कि
विशाल और शानदार दिल्ली शहर,
जो धीरे--धीरे सिमट कर
बदलता हुआ सा लग रहा था
पत्थरों के ढेर में,
अचानक अदृश्य हो गया था
मानो रिमोट का गलत बटन दबाने पर
टी .वी. पर चलता कोई दृश्य
कहीं खो गया था।
बहुत नीचे छूट गए थे
पहाड, जंगल, नदियाँ।

अब कहाँ !
वे मोहल्ले की छोटी--छोटी गलियाँ।
घर--आँगन कमरे दीवारें...
दीवारों में कैद
मान--मनुहार
नफरत या प्यार
संघर्ष और अधिकार
द्वेष या खेद का
रंग और भेद का
नही था कोई रूप या आकार
धरती से हजारों मीटर ऊपर
चारों और था एक शून्य
असीम,  अनन्त
दिक् दिगन्त।

अहसास था केवल
अपने अस्तित्व की लघुता का
अनन्त ब्रह्माण्ड के बीच।
शायद, ऊँचाई पर पहुँचने का अर्थ
मिट जाना ही है, सारे भेदों का।


मुहावरों का फर्क

एक अपार्टमेंट की
छठवीं मंजिल पर फ्लैट
सर्वसुविधा-युक्त
धूल, कीचड और दुर्गन्ध से मुक्त
देख सकती हूँ यहाँ से
चारों ओर ऊँची--ऊँची इमारतों की सूरत में
उग रहा शहर
सडकों पर रेंगते छोटे--छोटे आदमी
छोटी, खिलौने सी कारें
कारों की कतारें।
इतनी ऊँचाई पर खडी
सोचना चाहती हूँ कि
यह अच्छा है,
परे हूँ अब गर्द--गुबार से।

कीचड में खेलते बच्चों की
चीख-पुकार से।

सब्जी वाले की बेसुरी सी आवाज
या पडौसन के खरखरे व्यवहार से।

दूध लाने वाले बूढे की आह से भी
और किसी इमारत की छाँव में
दो पल को सुस्ताने बैठी
मजदूरिन की हसरत भरी निगाह से भी।

महसूस करना चाहती हूँ कि
शायद इसी को कहते हैँ
'पाँव जमीन पर न होना'
या कि...

'पाँव तले जमीन न होना?'
छठवीं मंजिल के सर्वसुविधा-युक्त फ्लैट में
टँगी हुई सी मैं !

अक्सर करती हूँ
दोनों मुहावरों का विश्लेषण।

और पाती हूँ कि,
भले ही "पाँव जमीन पर न हों" लेकिन,
बहुत जरूरी है "पाँवों तले जमीन होना"।
अपने के करीब रहने के लिये।

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