‘प्रेम की पीर’ कवि जायसी की रचनाधर्मिता


- इमरान अंसारी

शोधार्थी, हिंदी विभाग, मानविकी, हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद (भारत)
चलभाष: +91 957 375 7203

 ‘प्रेम की पीर’ के रूप में विख्यात ‘मलिक मुहम्मद जायसी’ प्रेम काव्य परम्परा के अगुआ कवि हैं। जायसी भारत में जन्मे थे लेकिन उनके पूर्वज यहाँ के नहीं थे। अगर उनके नाम के आधार पर उनके पूर्वजों के मूल स्थान की पड़ताल की जाये तो जायसी मलिक वंश के थे। मिस्र में सेनापति या प्रधानमंत्री को ‘मलिक’ कहते हैं। दिल्ली सल्तनत में खिलजी वंश के राजकाल में अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा को मरवाने के लिए मलिकों को नियुक्त किया था, जिस कारण यह नाम उस काल में काफी प्रचलित हो गया। ईरान में ‘मलिक’ ज़मींदार को कहा जाता था, इनके पूर्वज वहाँ के निगलाम प्रान्त से आये थे और वहीं से उनके पूर्वजों की  पदवी ‘मलिक’ थी। मलिक मुहम्मद जायसी के वंशज अशरफी खानदान के चेले थे और मलिक कहलाते थे।”1
कहने का तात्पर्य यह है कि मलिक मुहम्मद के पूर्वज यहाँ के नहीं थे। लेकिन उनके यहाँ बसने के बाद मलिक मुहम्मद का जन्म हुआ था। चूँकि ये अमेठी के निकट ‘जायस’ के थे इसलिए उनके नाम में ‘जायसी’ जुड़ गया। जायसी के पिता किसान थे और कृषिकार्य में जायसी स्वयं कुशल थे जैसा कि उने पदों से ज्ञात होता है।
         तात्पर्य यह है कि जायसी मूलतः मुसलमान थे, जिनकी भाषा, संस्कृति, धर्म, आचार-व्यवहार सबकुछ अलग होने के बाद भी भारतीय लोक की कथा जो मूलतः हिन्दू घरानों में प्रचलित, हिन्दू रीति-नीति से कही जाने वाली कथा थी, ऐसी कथा को जनभाषा ‘अवधी’ के माध्यम से गढ़ने का प्रयास करते हैं। ऐसा भी नहीं था कि उस समाज में कथाओं की  कोई कमी थी। फारसी में ‘लैला-मजनू की कथा’, पद्मावत की कथा से कहीं ज्यादा प्रचलित और लोकप्रिय रही। लेकिन जायसी का मन तो पद्मावत में ही रमता है।
     ‘पद्मावत’ की कथा गुजरात में भी प्रचलित रही है। लेकिन इस कथा को लोक से उठाकर साहित्य के शीर्ष पर बिठाने का काम तो जायसी ही करते हैं। जायसी इस कथा को लोक मान्यताओं के आधार पर शुरू करते हैं, लेकिन परम्परा का अनुसरण करते हुए। पद्मावती के जन्मोत्सव से लेकर सिंहलद्वीप के सौन्दर्य वर्णन तक में कहीं कोई त्रुटि नहीं दिखती। सब कुछ लोक-विधान और हिन्दू रीति-नीति के अनुसार करते हैं वे लिखते हैं – 
जायस नगर धरम अस्थानू। तहाँ आइ कवि कीन्ह बखानू।
औ बिनती पंडितन सन भजा। टूट सँवारहु, मेरवहु सजा।2 
जायसी ‘जायस’ को धर्मस्थान बताते हैं साथ ही प्रेमपूर्वक आग्रह करते हैं कि यदि कोई त्रुटि हो गयी हो तो उसे सुधारकर रचना की शोभा बढ़ाई जाए। जायसी का सम्पूर्ण विधान प्रेम का आग्रह है। यह प्रेम ही है जो धर्म, भाषा, जाति की संकीर्णता को तोड़कर मनुष्य को मनुष्य बनता है। जायसी भारतीय संस्कृति की गहन समझ रखते हैं। तीज-त्योहार, धर्म, लोक प्रचलित विधि-विधान, फल-फूल, पाककला, ज्योतिष आदि के साथ ही विभिन्न ऋतुओं के आधार पर लोक प्रचलित मान्यताओं का भी पूर्ण ज्ञान जायसी को हैं। ‘सिंहलद्वीप वर्णन खण्ड’  में सिंहलद्वीप की शोभा बढ़ने वाले वृक्षों के सन्दर्भ में कहते हैं –
फूलै फरै छवौ ऋतु, जानहु सदा बसंत।3  
आमतौर पर वृक्षों के फलने-फूलने का अपना समय होता है, ऋतु होती है, लेकिन सिंहलद्वीप पर ऐसा नहीं है। वहाँ तो सभी ऋतुएँ वसंत ही है। जायसी का ज्ञान, लोक का ज्ञान है इसीलिए उनके यहाँ लोक-प्रचलित वृक्षों के ही नाम आते हैं  जैसे – आम, कटहल, बड़हल, खिरनी, जामुन, महुआ आदि। जायसी इन वृक्षों का वर्णन उनके प्रकृत, स्वरूप के साथ-साथ लोक में व्याप्त उनकी मान्यताओं के साथ करते हैं। 
       भारतीय संस्कृति में ऋषि, मुनियों का सदा ही आदर रहा है। जायसी इनका वर्णन बड़े आदर के साथ करते हैं। साथ ही भारतीय संत-संस्कृति के सम्पूर्ण विविधताओं के बारे में लिखते हैं –
कोइ रिखेस्वर कोई सन्यासी। कोइ रामजन कोई मसवासी।
कोइ ब्रह्मचर्य पंथ लागे। कोइ दिगम्बर आछहिं नांगे।
कोइ सरसुती सिद्ध कोइ जोगी। कोइ निरास पंथ बैठ बियोगी।
कोइ  महेसुर जंगम जती। कोइ एक परखै देवी सती।4  
जायसी सन्यासियों की विविधता, आराध्य के साथ-साथ उपासना पद्धति और उपासना की  अवधि के आधार पर भी करते हैं। जैसे ‘मसवासी’ शब्द का प्रयोग माह भर की उपासना के लिए प्रयोग में लाना, जायसी के लोक ज्ञान का प्रत्यक्ष उदाहरण है। जायसी नाथपंथी साधुओं के श्रृंगार का भी वर्णन करते हैं, जब रतनसेन साधु वेश में पद्मावती की खोज में निकलता है। जायसी लिखते हैं – कानों में मुंदरी और कंठ में जयमाल, हाथ में कमंडल और कंधे पर बाघम्बर, पैरों में खडाऊ और सिर पर छत्र, साथ ही लाल वेश पहनकर खप्पर लिए-
मुंद्रा स्रवन कंठ जपमाला। कर उदपान कांध बघछाला।
पाँवरि पाँव लीन्ह सिर छाता। खप्पर लीन्ह भेस कै राता।5 
           भारतीय संस्कृति का हृदय तो ग्रामीण अंचल में ही बसता है और गँवई संस्कृति की थाती लोक में। प्रत्येक समाज का अपना लोक होता और हर लोक की अपनी अलग-अलग मान्यताएँ होती है। यह सत्य है कि इन मान्यताओं की कोई वैज्ञानिकता नहीं होती। लेकिन यह भी सत्य है कि संस्कृति हर जगह वैज्ञानिकता की माँग नहीं करती। अगर संस्कृति में वैज्ञानिकता ही तलाशी जाने लगे फिर तो संस्कृति की मृत्यु ही हो जाएगी।
  भारतीय संस्कृति का लोक, संसार के प्रत्येक पहलू पर अपना-अलग मत रखता है। ऋतुओं की अलग मान्यताएँ हैं, तो बरसात ऋतु में हर नक्षत्रों की अपनी अलग मान्यता। नागमती के वियोग में किस तरह नक्षत्र बरसते हैं, जायसी इसका खुबसूरत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इसी प्रकार पक्षियों के चहचहाने के आधार पर अलग–अलग मान्यताएँ लोक में है और जायसी इसका वर्णन करते हैं – गुडुरु – तुही-तुही कहकर खीझती है, तो पण्डुक – एकै-तुही, एकै-तुही का ध्यान लगता है, ग्वालिन – दही-दही पुकारती है, हरियल (हारिल) अपना दर्द सुनती है। इस प्रकार से जायसी इस तमाम पहलुओं को साहित्य में स्थान देते हैं। जो वास्तव में भारतीय संस्कृति का हिस्सा है।
        जायसी मुसलमान होकर भी हिन्दू संस्कृति का गहन ज्ञान रखते हैं। पद्मावती का जन्मोत्सव पूरी हिन्दू-रीति से मनाते हैं, छठी पूजन, जन्म फल, किस राशि में कन्या का जन्म हुआ है इसका भी वर्णन जायसी करते हैं। जायसी पद्मावती का नाम यूँ ही नहीं रख देते, बल्कि पूरे विधि-विधान के साथ पंडितों द्वारा बताया जाता है कि कन्या का जन्म ‘कन्या राशि’ में हुआ है, इसलिए इसका नाम ‘पद्मावती’ रखना सार्थक है। इसके साथ ही पद्मावती की आयु पाँच वर्ष होने पर धर्म–ज्ञान आदि कार्यों में भी दक्ष करते हैं। फिर बारह वर्ष की होने पर पद्मावती के लिए अच्छे ‘वर’ की चिंता से चिंतित पिता का भी जिक्र करते हैं, जो भारतीय समाज में हर पिता की मुख्य चिंता होती है।  
     जायसी जिस संस्कृति को पद्मावत में रचते है उसके मूल में प्रेम है। और प्रेम एक शाश्वत विषय है और अत्यंत व्यापक भी। पूरी दुनिया इस विषय पर लिखते पढ़ते चलते चली आयी है। मतलब ‘प्रेम’ सार्थक विषय भी है। किसी वस्तु की सार्थकता का मोल उसके मार्ग में आने वाली कठिनाई अच्छे तरीके से व्यक्त करती है। प्रेम-पथ की कठिनता पर जब रीतिकालीन कवि ‘बोधा’ कहते है –                     
                                          यह प्रेम को पंथ कराल महा
तरवारि की धार पै धावनो है।6 
         इतने सार्थक और शाश्वत विषय पर लिखने, पढ़ने और इस मार्ग पर चलने को ‘बोधा’ तलवार की धार पर चलने के समान बताते हैं। सवाल यह है कि प्रेम का मार्ग सम्पूर्ण मनुष्यता के लिए जरुरी होने के बावजूद भी इतना दुर्गम क्यों है? प्रेम तो हमेशा ही जोड़ने का कार्य करता है, तो क्या पूरी दुनिया में तोड़ने वालों की संख्या अधिक हो गई है, जो इस राह में तलवार बिछाये बैठे हैं? इस तरह के सवाल बार-बार हमारे मन में आते हैं और इसके जवाब के लिए बार-बार हम जायसी, सूर, तुलसी, कबीर और मीरा को पढ़ने, समझने की जरूरत महसूस करते हैं।
             प्रेम बंधन नहीं है, स्वतंत्रता और बराबरी का भाव तो उसके मूल में है। ‘कृष्ण’ हैं बहुत बड़े देव लेकिन ‘रसखान’ की अहीर की छोकरिया तो उनको छछिया भर छाछ पर नाच नचाती है। तो वहीं ‘मीरा’ कृष्ण को अपना पति मान बैठती हैं। इस प्रकार की अभिव्यंजना प्रेम मार्ग में ही सम्भव है और यही प्रेम भारतीय संस्कृति की आत्मा है।
        प्रेममार्गी काव्यधारा की सर्वोच्च रचना ‘पद्मावत’ हिंदी साहित्य में ऐसा हस्ताक्षर है, जो प्रेम और मनुषत्व को सर्वोपरि सिद्ध करता है। रचनाकार के भीतर अगर प्रेम है, मनुष्यता है, तभी वह ऐसे पहलुओं को सलीके से रच सकता है। जायसी ईश्वर की ओर उन्मुक्त हैं, लेकिन वहाँ तक पहुँचने का उनका मार्ग मानव-प्रेम से होकर गुजरता है। संसार की जीवन-चर्या से होकर, न की कहीं एकांत में गुहावास लेकर। जायसी के प्रसंग में शुक्ल जी लिखते हैं –“उनका नियम था कि जब वे अपने खेत में होते तब अपना खाना वहीं मंगा लिया करते थे। खाना वे अकेले कभी न खाते; जो आस–पास दिखाई पड़ता उसके साथ बैठकर खाते थे। एक दिन उन्हें इधर-उधर कोई न दिखाई पड़ा। बहुत देर तक आसरा देखते-देखते अंत में एक कोढ़ी दिखाई पड़ा। जायसी ने बड़े आग्रह से उसे अपने साथ खाने को बिठाया और एक ही बरतन में उसके साथ भोजन करने लगे। उसके शरीर से कोढ़ चू रहा था। कुछ थोड़ा सा मवाद भोजन में भी चू पड़ा। जायसी ने उस अंश को खाने के लिए उठाया पर उस कोढ़ी ने हाथ थाम लिया और कहा इसे मै खाऊंगा, आप साफ़ हिस्सा खाइए, पर जायसी झट से उसे खा गए।”7 
         ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो जायसी के मानुष-प्रेम का जीवंत उदाहरण हैं। जायसी की उत्कृष्टतम रचना ‘पद्मावत’ इसी प्रेम का आख्यान है। जो समाज, वर्ग, लिंग ऐसे किसी भी भेद को नहीं मानता। जायसी की नायिका ‘पद्मावती’ स्त्री है, लेकिन जायसी उसका जन्मोत्सव इतने धूम-धाम से मानते हैं कि ‘राजा रतनसेन’ का जन्मोत्सव फीका पड़ जाता है। जायसी इस प्रेम-आख्यान को कल्पना के सहारे ही पूर्ण पराकाष्ठा पर पहुंचाते हैं। ठीक है दूध, दही का समुद्र उनकी कल्पना थी, सिंहलद्वीप का सम्पूर्ण वातावरण, पद्मावती का महल जिसकी एक-एक ईंट बहुमूल्य हीरे-मोती की है, उसकी चुनाई कपूर आदि से हुई है, ‘पद्मावती’ जिसे जायसी इतना रूपवती बनाते हैं कि कोई पुरुष उसे देखते ही मूर्छित हो जाता है- सब कल्पना है, लेकिन मन में सवाल उठता है कि आखिर जायसी ऐसा करते क्यों है? कल्पना की ऐसी पराकाष्ठा कि वास्तविकता से दूर-दूर तक उसका कोई रिश्ता ही नज़र नहीं आता, लेकिन हम ठीक से देखें तो पता चलता है कि इन सब के मूल में प्रेम को सर्वोच्च सिद्ध करने की कोशिश मात्र है। उतना सुन्दर महल, दुनिया में सर्वोच्च स्थल वह सिंहलद्वीप, वहाँ का मनमोहक वातावरण, सब कुछ का त्यागने के पीछे ‘पद्मावती’ के पास आधार ही क्या है? तो हम जवाब पाते हैं , ‘रतनसेन का प्रेम’। राजा रतनसेन का नहीं, जोगी रतनसेन का।
         जायसी मुसलमान होते हुए भी ‘पद्मावत’ का खलनायक जिसे चुनते हैं वह भी एक मुसलमान (अलाउद्दीन) है। क्योंकि जायसी की नज़र में ‘मनुष्य’ पहले है, हिन्दू या मुसलमान बाद में। रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं – “मुसलमान होकर हिन्दू शौर्य की गाथा दिल्ली के सुल्तान के विरुद्ध एक नाजुक प्रसंग है। पर  जायसी पद्मावत के चित्रण में एकदम खरे उतारते हैं। यहाँ दोनों पक्षों का पूरे आदर और आत्मीयता से उल्लेख हुआ है – हिन्दू तुरक, दुवौ रन गाजे और अगर आत्मीयता कहीं कुछ अधिक है तो चितौड़ के साथ है न कि दिल्ली के।”8   
     जायसी सम्पूर्ण ‘पद्मावत’ के कथानक को रक्त की लेई और गाढ़ी-प्रीति के नयन जल से भिगोकर सराबोर करते हैं –
मुहमद कबि यह जोरि सुनावा। सुना सो पीर प्रेम कर पावा।
जोरी लाइ रकत कै लेई। गाढ़ी प्रीति नयनन्ह जल भेई।।9  
        यह जो प्रेम का पराभव है, यही ‘प्रेम’ आधार बनता हैं जायसी को रतनसेन का पक्ष लेने में। इस प्रेम की अभिव्यंजना जायसी के नज़र में इतना सर्वोपरि है कि, जायसी जिस ‘पद्मावती’ को सम्पूर्ण जगत में अनन्य सिद्ध करते हैं, उसे पाने का आधार ‘प्रेम’ मात्र रखते हैं। अलाउद्दीन दिल्ली का सुल्तान है, लेकिन सब कुछ के बावजूद ‘पद्मावती’ को प्राप्त नहीं कर पाता। क्योंकि उसका आधार ही गलत था। जिस चीज को पाने का आधार प्रेम है, उसे ‘बल’ से कोई कैसे पा सकता है? ‘बल’ से अलाउद्दीन को वही मिलता है, जो सम्पूर्ण संसार को आज तक मिलता आया है – चितौड़गढ़ की ईट-पत्थर की दीवारें –
जौहर भइ सब इस्तिरी, पुरुष भए संग्राम।
  बादसाह गढ़ चूरा, चितउर भा इसलाम।।10
         जायसी कहते हैं कि सब ख़त्म हो गया और चितौड़गढ़ इस्लाममय हो गया। लेकिन पाठक के मन में अकुलाहट अब शुरु होती है, कि अलाउद्दीन पूरे चितौड़गढ़ को प्राप्त करने के बाद भी उदास क्यों हैं? क्यों वह  जौहर हुई रानियों के राख़ उठाकर कहता हैं यह पृथ्वी झूठी है।
                          छार उठाइ लीन्हि एक मूठी। दीन्हि उड़ाइ पिरिथिमी झूठी।।11 
 सब कुछ जो जायसी गढ़ते हैं, सब इसी लोक में बचा रह जाता है। पूरे महाकाव्य से तीन पात्र (पद्मावती, नागमती, और रतनसेन) ही तो विदा लेते हैं, फिर क्यों इस महाकाव्य के अंत से पाठक का मन व्याकुल होने लगता है?
     इन प्रश्नों के जवाब में हमें प्राप्त होता है कि पूरे आख्यान का आधार प्रेम था। उसी प्रेम के सूत्र में बंधे थे नागमती, पद्मावती और रतनसेन। जिनके  न रहने से पूरा का पूरा आख्यान सूना पड़ जाता है और अलाउद्दीन सब कुछ पाकर भी ठगा सा रह जाता है। यही प्रेम की वास्तविक अभिव्यंजना है। यही मनुष्य से मनुष्य का वास्तविक रिश्ता है। इस रिश्ते का मूल आधार प्रेम है और इस प्रेम से बड़ा न कोई धर्म है और न कोई ईश्वर। बल्कि सब तक पहुँचने का प्रेम ही एक मात्र मार्ग है। यही सूफियों की इश्क़मजाजी से इश्क़हक़ीकी का रास्ता है। इसके रहते सब कुछ है और इसके जाते कुछ नहीं बचता -
मानुस प्रेम भयउ बैकुंठी। नाहित काह छार भई मूठी।।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची –
1. स्रोतविकिपीडिया (https://hi.m.wikipedia.org/wiki/मालिक_मोहम्मद_जायसी#)
2. सं० रामचंद्र शुक्ल, जायसी ग्रंथावली, विनय प्रकाशन कानपुर, पृ० 10, वर्ष 1992 
3. वही पृ० 13
4. वासुदेवशरण अग्रवाल, पद्मावत की संजीवनी व्याख्या, लोकभारती प्रकाशन पटना, पृ० 34  
5. वही, पृ० 142 
6. रीतिकालीन कवियों की प्रेम व्यंजना, बच्चन सिंह, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद वर्ष 2005 पृ० 327
7. सं० रामचंद्र शुक्ल, जायसी ग्रंथावली, विनय प्रकाशन कानपुर, पृ० 19, वर्ष 1992 
8. रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, लोक भारती प्रकाशन, पटना, पृ० 41  
9. सं० रामचंद्र शुक्ल, जायसी ग्रंथावली, विनय प्रकाशन कानपुर, पृ० 341, वर्ष 1992 
10. वही, पृ० 340 
11. वही, पृ० 340                                      
                                       

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