‘सुख’ कहानी - एक आलोचनात्मक अध्ययन

अनीता

अनीता

एम.फिल (हिंदी), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली

काशीनाथ सिंह साठोत्तरी पीढ़ी के ऐसे सशक्त एवं महत्त्वपूर्ण कथाकार है, जिन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से आधुनिक जीवन की विडम्बनाओं में जूझ रहे मनुष्य के यथार्थ को अभिव्यक्त किया है। इन्होंनें अपने रचनाकाल की शुरूआत ‘अपना मोर्चा’ जैसे चर्चित उपन्यास से की, लेकिन उनका मूल लेखक रूप कहानीकार का ही बना रहा और उनके इस रूप को सबसे अधिक प्रसिद्धि भी मिली।
‘सुख’ कहानी काशीनाथ के पहले कहानी संग्रह ‘लोग बिस्तरों पर’ की एक महत्त्वपूर्ण कहानी है। जिसमें कहानीकार मनुष्य के अपने परिवेश और प्रकृति से उसके विच्छेद होते हुए संबंधों को प्रकट करता है। कहानीकार स्वयं प्रकाश उनकी कहानी विधा के विषय में लिखते हैं-
“यह आदमी सारी ऊर्जा रचना के लिए बचाकर रखता है। सो भी निबंध, समीक्षा, टिप्पणी, व्यंग्य, कविता या सब कुछ के लिए नहीं सिर्फ कहानी के लिए। यही वजह है कि चाहे ‘लोग बिस्तरों पर’ हो, चाहे ‘सुख’, चाहे ‘माननीय होम मिनिस्टर के नाम’ हो चाहे ‘सदी-का सबसे बड़ा आदमी’, काशी की कोई भी कहानी नामुकम्मिल या अधूरी नहीं है। एक भी कहानी उन्होंनें ऐसी नहीं लिखी है जिसे पढ़कर आपको लगे इसमें कुछ छूट गया है या इसमें कुछ और होता तो ज़्यादा अच्छा होता।”1
स्वयं काशीनाथ सिंह अपनी कहानी ‘सुख’ का उल्लेख करते हुए लिखते है -
“सुख प्रकृति से विच्छिन्न होते जा रहे मनुष्य की कहानी है। मनुष्य से मनुष्य के, पिता से पुत्र के, पत्नी से पति के, माँ से बेटे के संबंध के टूटने या बिखरने की कहानियाँ तो लिखने वाले और भी थे लेकिन ‘सुख’ की थीम अलग थी - उनसे कहीं व्यापक और सामाजिक। अपने ही परिवार और समाज में अकेले पड़ते जा रहे मनुष्य की कहानी। ... स्वाधीनता ने ‘नई कहानी’ में जो आशाएँ, आकांक्षाएँ और सपने जगाए थे, उन्हें भारत-चीन युद्ध ने ध्वस्त कर दिया। विकास की सारी योजनाएँ भ्रष्टाचार की शिकार साबित हो गई थी। देश असहाय हो गया था और हमारा राष्ट्रनायक खुद को अकेला और निरीह महसूस करने लगा था। हमारी कहानियाँ इसी अकेलेपन और ध्वस्त होते जा रहे पुरानें मूल्यों की प्रतिछवियाँ थी।”2
काशीनाथ सिंह का कहानीकार रूप कोई एक स्थान पर ठहरे हुए कथाकार का रूप नहीं है। उनकी कथायात्रा को ठीक तरह से समझने के लिए उनकी कथा यात्रा के विभिन्न चरणों को समझना आवश्यक है। इनकी कहानियों में इनके समय का यथार्थ पूर्ण रूप से झलकता है। जिसका एक सशक्त उदाहरण इनकी कहानी ‘सुख’ है।
काशीनाथ सिंह की कहानी ‘सुख’ एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसे अपने जीवन में  दुख मिला, लेकिन कहानी का नाम ‘सुख’ पड़ा। क्योंकि इस कहानी का मुख्य पात्र भोला बाबू है जो कहानी के शुरू में तो सुखी होते है किंतु कहानी के अंत तक जाते-जाते वह पूर्ण रूप से दुखी दिखाई देते है।
‘सुख’ कहानी के प्रारंभ में ही लेखक ने एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन किया है जो कुछ दिनों पहले ही रिटायर होकर अपने घर लौटता है और शाम के समय अपने घर की खिड़की से सूरज को देखकर रोमांचित हो उठता है -
“वे कमरे में पड़े अखबार पढ़ रहे थे। एक शाम खिड़की से कोई किरण आई और उनके गंजे सिर पर पड़ रही। जैसे वह किसी नन्हे बच्चे की हथेली हो।”3
अस्त होते हुए सूरज की गोलाई उसका कम्पन आदि उन्हें सुख की अनुभूति कराता है और अपनी इसी अनुभूति को बाँटने के लिए वह अपनी पत्नी, बिट्टी की अम्मा को बुलाते है और ताड़ के पेड़ के पार देखने के लिए कहते है, लेकिन जब भोला बाबू को पता चलता है कि बिट्टी की अम्मा सूरज को नहीं बल्कि ईंटों से लदे खच्चरों की पांत के पीछे चलते हुए आदमी को देख रही है तो वह झल्लाते हुए कहते है -
“औरत की जात। खच्चर और गधे के सिवा देख ही क्या सकती हो।”4
भोला बाबू के इन शब्दों से स्पष्ट होता है कि कहानी के प्रारंभ में ही जो सुख उनके इर्द-गिर्द घूमता है। वह बिट्टी की माँ के इस वाक्य से दुख व खीझ में परिवर्तित हो जाता है और उनका यह दुख अपने चरम पर तब पहुँचता है, जब बिट्टी की माँ सूरज को देखने के बाद कहती है -
“उसे क्या देखना? आप आज देखते है। मैं जिन्दगी-भर से देख रही हूँ।”5
बिट्टी की माँ की तरह ही भोला बाबू कहानी में अन्य लोगो जैसे - नीलू, जिलेदार साहब, ऊँट-वाला व सोहन आदि सभी के मुँह से सूरज की सौंदर्य आभा को सुनने के लिए आतुर दिखाई देते है, परन्तु ऐसा होता नहीं और जिस कारण यह सभी लोग भोला बाबू के दुखों का कारण बन जाते है।
हैरानी की बात तो यह है कि भोला बाबू के अंदर जितने भी द्वंद्व चल रहे थे उसमें वह ऐसे उलझे हुए थे कि उनका एक भी बार ध्यान इस ओर नहीं गया कि यदि सभी लोग उनके विपरीत लगभग एक जैसी ही प्रतिक्रिया दे रहे है तो उसका कोई जायज़ कारण भी हो सकता है। खास तौर पर तब जब वे जानते है कि सूरज उन्हीं की जिंदगी से ओझल हो रहा है, सबकी नहीं। लेकिन भोला बाबू है कि वे औरो के मुकाबले अपने अनुभवों को ही तवज्जो देते रहते है। उनका रवैया बाबूशाही के ऐसे पुरजे की तरह जिसे पता है कि फाइल में जो नोटिंग उसने कर दी है वह पत्थर की लकीर है। बड़े से बड़ा अधिकारी उसे मिटा नहीं सकता, फिर चाहे वह कितना ही सही क्यों न हो।
यह प्रश्न अपनी टटपूंजिया सत्ता और अधिकार से वंचित हो गए व्यक्ति का है। अगर उन्हें सच में कोई नया बोध अनुभव हुआ होता तो वे कुछ समय तक उसका आनंद अवश्य उठाते और अपने नीरस जीवन में नई ताजगी का अनुभव करते, किंतु बजाय इसके वे तो लग जाते है अपने इस अनुभव का दूसरों को भी आभास कराने के अभियान में। यही नहीं बल्कि यदि प्रकृति के प्रति अगर उनमें ज़रा भी जागरूकता पैदा हुई होती तो वे मछलियों के चढ़ने के समय को सूर्यास्त से उलझने और दूसरे गाँव के सूरज को अप्रामाणिक मानने की भूल कदापि न करते। कहानी में भोला बाबू पर भोलेपन से ज्यादा उनका बाबूपन ही हावी रहा है। इस ओर बहुत कम लोगों का ही ध्यान गया है।
काशीनाथ सिंह की भाषा शैली ताज़गीपूर्ण तथा सजीव है। इनकी कथा भाषा जन-भाषा के अत्यंत निकट पड़ती है, जिसमें लेखक सजगता से अर्थ समृद्धि लाने के लिए प्रयत्नशील रहा है। बच्चन सिंह के शब्दों में - “काशीनाथ सिंह की भाषा ऊपर से सपाट पर भीतर से अर्थवान है। अपने विनोदपूर्ण व्यंग्य के कारण वह कहानी के माहौल को जिंदादिल और संकेतों को धारदार बना देती है। वे कहानी को अस्वीकार की ओर ले जाने की दिशा में प्रयत्नशील है।”6
काशीनाथ सिंह की कहानी ‘सुख’ में भी इस संवाद शैली का अनूठापन दिखाई देता है -
                              “सूरज देखते हो या नहीं
                                                    सूरज?” सोहन ने विस्मय से पूछा।
                                                          तुमने आज सूरज देखा था?”
                                                             कौन सूरज? सूरज तेली?”
                                            ‘नहीं, कोल्हू। बेवकूफ” भोला बाबू। खीझ उठे।”7
उपरोक्त विवेचन के आधार पर हम यह देख सकते है कि काशीनाथ सिंह की कहानी ‘सुख’ में जहाँ एक ओर मनुष्य के अन्य संबंधों के साथ-साथ प्रकृति संबंध भी विच्छेद हो रहे है, तो वहीं इस संबंध विच्छेद के कारण प्रकृति और मनुष्य दोनों अलग-थलग पड़ गए है। इस अकेलेपन के कारण जहाँ भोला का जीवन खीझ और दुखों से भर गया है तो वहीं अन्य लोग जिन्हें यह अकेलापन महसूस नहीं होता, उनका जीवन सुखमय है। शायद यही कारण है कि कहानीकार ने कहानी का नाम ही ‘सुख’ रख दिया है। दरअसल बात यह है कि भोला बाबू अकेले ऐसे व्यक्ति है जो अत्यंत व्यस्तता के बाद रिटायर हो जाने के कारण खाली हो गए है। अब उनके पास समय ही समय है, जबकि अन्य लोग अभी भी व्यस्त है, जिस कारण उन्हें जो अनुभूति होती है, वह अन्यों को नहीं और यही कारण है कि उनका सुखमय जीवन अचानक दुखमय हो जाता है, जो कि भोला की समझ से बाहर है। 


                                                                            संदर्भ ग्रंथ
1. काशीनाथ सिंह, ‘आलोचना भी रचाना है’ किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, संशोधित संस्करण 1996, पृष्ठ संख्या – 139
2. वही, पृष्ठ संख्या - 108-109
3. मेरी प्रिय कहानियाँ (काशीनाथ सिंह), राजपाल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 40
4. वही, पृष्ठ संख्या – 41
5. वहीं, पृष्ठ संख्या – 41
6. बच्चन सिंह ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास‘, लोकभारती प्रकाशन, संशोधित संस्करण 2007, पृष्ठ संख्या – 431
7. काशीनाथ सिंह, ‘कविता की नई तारीख, काशीनाथ सिंहः संकलित कहानियाँ, नेशनल बुक ट्रस्ट, प्रथम संस्करण 2008, पृष्ठ संख्या - 175


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