यादों के झरोखे में दुष्यंत कुमार

खुशबू कुमारी

शोधार्थी, राँची विश्विद्यालय, राँची
दूरभाष: 7903143753
k.k01031988@gmail.com

अपने शोध के क्रम में जब मुझे प्रोफेसर धनंजय वर्मा के बारे में पता चला, जो कि दुष्यंत कुमार के अनन्य मित्र हैं, तो उनसे संपर्क किया। बताते चलें कि प्रोफेसर धनंजय वर्मा मध्य प्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत विभिन्न महाविद्यालयों में पैंतीस वर्षों तक अध्यापन के पश्चात मध्य प्रदेश आदिवासी लोक कला पारिषद के प्रथम सचिव तथा डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति भी रह चुके हैं। यद्यपि उन्होंने मुझे मिलने का समय तो नहीं दिया, पर जिस तत्परता व आत्मीयता से उन्होंने मेरे द्वारा तैयार साक्षात्कार की प्रश्नावली का प्रत्युत्तर अपने हाथों से लिखा ;शायद ही कोई अन्य दे सके। अस्सी वर्ष की अवस्था में अनेक व्याधियों के रहते हुए अपने हाथों से उन्होंने मेरे प्रश्नों के उत्तर जिस ईमानदारी से दिए हैं उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि इस सच्चे साहित्य सेवी की जिजीविषा अद्वितीय है। ऐसे कर्मठ साहित्यकारों के कारण ही हमारा साहित्य निरंतर नए कीर्तिमान गढ़ते जा रहा है। दुष्यंत कुमार के जीवन और साहित्य पर इनके द्वारा डाले गए प्रकाश ने मुझे एक नई दृष्टि प्रदान की है दुष्यंत को समग्रता के साथ समझने में। (खुशबू कुमारी)

प्रस्तुत है धनंजय वर्मा का साक्षात्कार –

खुशबू:
आप दुष्यंत कुमार को कब से और किस रूप में जानते हैं?
धनंजय वर्मा: दुष्यंत कुमार त्यागी से मेरा परिचय अपने कथाकार दोस्त शानी के माध्यम से हुआ था। मैं शासकीय महाविद्यालय, जगदलपुर (बस्तर) तत्कालीन मध्यप्रदेश अब छत्तीसगढ़, में हिंदी का व्याख्याता था। 1960 में मैं मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग, इन्दौर में हिंदी व्याख्याता के पद पर संपुष्टि के लिए इन्टरव्यू देने गया था। वहाँ से लौटते हुए भोपाल के आकाशवाणी केंद्र में, शानी के पत्र के साथ, दुष्यंत से मिलने चला गया था। वह संक्षिप्त मुलाकात थी। 1961 में मेरा तबादला शासकीय हमीदिया स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल में हो गया। भोपाल के सरकारी क्वार्टर्स में दुष्यंत और मेरा अस्थायी निवास लगभग आमने – सामने था। 1962 में शानी (भाया भोपाल) दिल्ली गया था – मुझे साथ लेकर। उसके संक्षिप्त भोपाल – प्रवास में दुष्यंत से अंतरंग मुलाक़ातों का सिलसिला शुरू हुआ।
आकाशवाणी, भोपाल केंद्र में दुष्यंत कार्यक्रम अधिकारी था। उसका पहला काव्य – संग्रह ‘सूर्य का स्वागत’, 1957 में आ चुका था और नए कवियों में उसका नाम चर्चित था।

खुशबू: साहित्य जगत में इंसान के दो रूप होते हैं – एक वैयक्तिक तथा दूसरा कवि रूप! आप उनके किस रूप को बड़ा या प्रभावित करने वाला मानते हैं और क्यों?
धनंजय वर्मा: मैं समझता हूँ कि मनुष्य की व्यक्तिगत और रचनागत अलग – अलग कोटियाँ या श्रेणियाँ नहीं होती।
‘रचना प्रक्रिया में व्यक्तित्व की भूमिका’के प्रसंग में मैं कह चुका हूँ कि “रचनाकार का व्यक्तित्व ही उसकी रचना की प्रासंगिकता और कलात्मक श्रेष्ठता भी तय करता है। दुष्यंत व्यक्तिगत स्तर पर भी खासा सुन्दर, प्रभावशाली और प्यारा इंसान था और कदाचित इसलिए उसका कवि रूप भी उतना ही महत्वपूर्ण और सार्थक है।
खुशबू: एक ग़ज़लकार के रूप में दुष्यंत का यश जगत प्रसिद्ध है, पर नयी कविता के कवि के रूप में आप उन्हें कितना सफल पाते हैं?
धनंजय वर्मा: ग़ज़ल के क्षेत्र में ( विशेष कर हिन्दी ग़ज़ल के सन्दर्भ में) दुष्यंत को खूब लोकप्रियता मिली है लेकिन मेरी दृष्टि में नयी कविता के श्रेष्ठ कवियों में उसकी सार्थकता अधिक महत्त्वपूर्ण है। ग़ज़ल के शायराना प्रतिमानों पर वह मुझे उतना महत्वपूर्ण शायर नहीं लगता, जितना कि उर्दू का औसत शायर भी होता है। बहरहाल मैंने उसके कवि और काव्य -नाटककार के रूपों पर विस्तार से लिखा है। उसका काव्य- नाटक ‘एक कंठ विषपायी’ मेरी नजर में उसकी गौरवशाली रचना है। यह उसका magnum opus है।

खुशबू: क्या आपने उन्हें हारा हुआ या पलायन करता हुआ देखा है? अक्सर उनकी कविताओं में निराशा और पलायन के भाव देखने को मिलते हैं।
धनंजय वर्मा: मैंने दुष्यंत को हमेशा एक दबंग, आक्रामकता की हद तक स्वत्वाग्रही और प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में देखा – पाया है। निराशा और पलायन न उसके व्यक्तित्व में थे और न उसकी कविता में हैं। हाँ, अपनी इकलौती बेटी अर्चना (जिसे वह बेहद प्यार करता था) की त्रासदी से उसे गहरा मानसिक आघात लगा था और कदाचित उसी मनोदशा में उसने कुछ ऐसी कविताएँ लिखी हो, जिनमें निराशा की झलक है। दुष्यंत के दो बेटे – आलोक और अपूर्व हैं। दुष्यंत अपनी बेटी अर्चना का विवाह जहाँ करना चाहता था वहाँ उसकी बेटी ने विवाह नहीं किया। उसके प्रेम-विवाह के लगभग साल भर में ही एक सड़क हादसे में बेटी-दामाद दोनों की असामयिक मृत्यु हो गयी। यही दुःख, मुझे लगता है कि दुष्यंत के हृदयाघात और अंत का कारण बना।

खुशबू: उनकी जो कविताएँ प्रेमपरक हैं, वे किन्हें समर्पित हैं? यद्यपि प्रेमपरक कविताओं का आवेग व बहुलता समय के साथ कम होता गया है। प्रारम्भ में जहाँ वे ‘वासना का ज्वार’, ‘गीत तेरा’, ‘एक पत्र का अंश’, आदि कविताएँ लिखते हैं तो आखिरी संग्रह में ‘तुझे कैसे भूल जाऊँ’, ‘मन नहीं भरा’ जैसी कविताएँ लिखते हैं। इन कविताओं के मध्य में कौन हैं?
धनंजय वर्मा: अपनी रूमानी और प्रेमपरक कविताओं में दुष्यंत ने बड़ी बेबाकी से अपनी मनोभावनाओं को सीधी, सहज और खुली अभिव्यक्ति दी है। उसका काव्य-संग्रह ‘सूर्य का स्वागत’ इलाहाबाद की उसकी प्रेमिका को और दूसरा संग्रह ‘आवाजों के घेरे’ भोपाल की उसकी प्रेमिका को समर्पित है। प्रेम का आवेग और आवेश स्वाभाविक रूप से उदात्त-अनुदात्त होता रहता है। मनुष्य के मनोवेगों की स्थिति हमेशा एक सी नहीं रहती। जीवन के घात- प्रतिघात के कारण उनमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। दुष्यंत की प्रेम कविताओं में उसके प्रेम के आलंबन कहीं भी अशरीरी या अमूर्त नहीं है। अपने अंतरंग क्षणों में वह अपने प्रेम और रागात्मक संबंधों के बारे में मुझसे खुलकर बातें करता था।

खुशबू: पूर्व की अपेक्षा आखिरी संग्रहों में अपेक्षाकृत प्रेमगीत कम होते गए पर निराशा और क्षोभ का स्वर सघन होता गया है। आखिर कौन सी ऐसी दशाएँ थीं जो उन्हें निराश किए जा रहीं थीं। एक जीवट और आस्था के कवि का यूँ निराश व हताश हो जाना क्या दर्शाता है? ये कितना उचित है?
धनंजय वर्मा: व्यक्ति अपनी जीवन- यात्रा के दौरान जैसे – जैसे मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से विविध अनुभव संपन्न, वयस्क और प्रौढ़ होता जाता है वैसे – वैसे रूमानी आवेग थमता – थिराता जाता है। निराला सरीखे दुर्धष जीवट और दुर्दांत आस्था के कवि ने भी अपने जीवन के उत्तर राग में निर्वेद और वैराग्य की कविताएँ लिखीं। ‘जुही की कली’, ‘अभी न होगा मेरा अन्त, अभी – अभी तो मेरे जीवन में आया है वसंत’ और ‘जागो फिर एक बार’ सरीखी कविताएँ लिखने वाले निराला ने ही ‘धिक् जीवन को, जो पाता ही आया विरोध’ या ‘स्नेह निर्झर बह गया है’, रेत ज्यों तन रह गया है’ सरीखी कविताएँ लिखीं हैं। यह जीवन की स्वाभाविक गति है।

खुशबू: दुष्यंत की कविताओं में प्रेमाभिव्यक्ति, देशप्रेम आत्माभिव्यक्ति, सजग व सचेत नागरिक, नवीनता के आग्रही व क्रांति के अग्रदूत के मिले – जुले स्वर सुनने को मिलते हैं। पर आपकी नजर में उनका प्रमुख स्वर क्या है?
धनंजय वर्मा: अपने अन्य अनेक समवयस्कों और समानधर्मा कवियों की ही तरह दुष्यंत की कविताओं में भी प्रेमाभिव्यक्ति, देशराग, आत्माभिव्यंजना, आत्मचेतस और विश्वचेतस, नागरिकता बोध, नवीनता का आग्रह और क्रांति के स्वर मिले – जुले हैं। यह सब उसकी अनुभव और अनुभूति की विविधता और व्यापकता का ही नतीजा है। दुष्यंत की रचनाशीलता में मुझे एक अंतर्निहित उत्कंठा (yearning) मिलती है। यही उसे नित नयी राहों का अन्वेषी और उत्तरोत्तर श्रेष्ठता अर्जित करने की आकांक्षा की रचनात्मकता देती है। वह आत्मतुष्ट, आत्ममुग्ध रचनाकार नहीं है। उसमें एक रचनात्मक बेचैनी और समग्रता और पूर्णता की तीव्र ललक है।

खुशबू: एक समृद्ध काव्य- संसार व लोकप्रियता के होते हुए भी दुष्यंत को न तो कोई सरकारी सहायता मिली, न ही पुरस्कार। आप उसके पीछे कौन सा कारण मानते हैं?
धनंजय वर्मा: इतने समृद्ध रचना संसार और लोकप्रिय गजलों का शायर होने के बावजूद दुष्यंत को कोई सरकारी सहायता या पुरस्कार नहीं मिला, इसका कारण यह है कि इन सब की उसने फिक्र-परवाह ही नहीं की। वह संपन्न और समृद्ध परिवार का उत्तराधिकारी था, अच्छी खासी नौकरी कर रहा था, उसकी पत्नी राजो भाभी, स्वयं शासकीय सेवा में थीं। वह किसी सरकारी सहायता का मोहताज नहीं था। किसी पुरस्कार के लिए न तो वह लालायित था और न उसके लिए उसने कोई कोशिश की।

खुशबू: गांधी जी की हत्या पर बिलखने वाले व कई कविताएँ लिखने वाले कवि दुष्यंत ‘युद्ध और विराम’के बीच (सन्दर्भ 1965 का युद्ध) में अहिंसा और शांति पर प्रश्न चिन्ह सिर्फ खड़े करते हैं – तो ये प्रश्न चिन्ह सिर्फ तत्कालीन व्यवस्था पर ही है या वास्तव में इन शाश्वत जीवन मूल्यों से उनका विश्वास उठ गया है?
धनंजय वर्मा: मैं नहीं जानता कि दुष्यंत ने अहिंसा और शांति पर कहाँ प्रश्नचिन्ह खड़े किए हैं? हाँ उसने युद्ध पर जरुर सवाल खड़े किए हैं। उसके काव्य नाटक ‘एक कंठ विषपायी’ की कथा- वस्तु और उसका पूरा रचना सरगम युद्ध की अनिवार्यता के प्रश्न पर केंद्रित है। धर्मवीर भारती के ‘अंधा युग’ की ही तरह वह ‘युद्ध’ और ‘महाभारत’ की आत्यंतिक निरर्थकता और अतार्किकता को भी रेखांकित करता है।

खुशबू: दुष्यंत का अचानक चला जाना कितना क्षतिपूर्ण रहा? साहित्य जगत के लिए और उनकी मित्र मंडली के लिए?
धनंजय वर्मा: दुष्यंत का अचानक यों चले जाना हिन्दी रचना संसार के लिए अत्यंत क्षतिकारक रहा। उसकी प्रतिभा जब अपने चरम उरुज पर थी तभी (महज बयालीस वर्ष की उम्र में) असमय उसका चला जाना हम सबके लिए दुखद था। उससे अनेक बड़ी और महत्वपूर्ण रचनाओं की वाजिब उम्मीद हम सबको थी।

खुशबू: वर्तमान साहित्यिक परिपेक्ष्य को आप दुष्यंत कुमार की जीवन – दृष्टि व कला-दृष्टि से किस प्रकार भिन्न या समान पाते हैं?
धनंजय वर्मा: वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में सम्भवतः दुष्यंत की जीवन - दृष्टि और कला – दृष्टि भी अनुपयुक्त सी लगती है। स्वयं को प्रायोजित और प्रक्षेपित करने वाले समकालीन माहौल में, अपनी रचनात्मकता के प्रति निष्ठावान रहकर ही अब न तो जीवन यापन किया जा सकता है न साहित्य – सृजन। विज्ञापन के इस युग में जब हर जीवन मूल्य बाजारवाद की भेंट चढ़ गया है, तब निष्ठावान रचनाकार खुद को अनुपयुक्त ही पाता है।

खुशबू: राजनीतिक को दुष्यंत ने हमेशा आड़े हाथों लिया, सम्भवतः इस लिए कि उसका संबंध देश के आमजन से था। लेकिन अगर उन्हें स्वयं राजनीति में आने का अवसर मिलता तो आपकी राय में वे कितना सफल या प्रभावकारी व्यवस्था दे पातें?
धनंजय वर्मा: एक कवि – लेखक और विचारक की हैसियत से समकालीन राजनीति और व्यवस्था की विसंगतियों – विषमताओं पर अपनी बेबाक राय देना एक बात है और स्वयं राजनीतिक में सक्रिय होकर व्यवस्था में परिवर्तन कर सकना एक बिल्कुल दूसरी बात है। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू सरीखी प्रतिभाएँ, मानव इतिहास में सचमुच दुर्लभ ही होती है। वो महान लेखक – विचारक और उतरने ही प्रभावशाली और क्रांतिकारी राजनेता भी थे। यहाँ तक कि कार्ल-मार्क्स भी क्रांतिकारी विचारक तो थे; लेकिन सक्रिय राजनेता नहीं। … दुष्यंत की रुचि भी सक्रिय राजनीति में जाने की नहीं थी। उसकी तरह का ‘ईमालसिव’ ‘सेंटीमेंटल’ व्यक्ति राजनीतिक में मिसफिट ही होता।

खुशबू: आप बस्तर के उस क्षेत्र से संबंध रखते हैं जहाँ के आदिवासियों के लिए दुष्यंत ने सरकार से रार मोल लिया था। ‘ईश्वर को सूली’ नमक कविता लिखकर। आप उस पूरे घटनाक्रम को कैसे देखते हैं? क्या कुछ और भी लोग हैं जिन्होंने इस घटनाक्रम को अपनी अभिव्यंजना का विषय बनाया है?
धनंजय वर्मा: जगदलपुर (बस्तर) में मेरे जीवन के आरंभिक बीस वर्ष बीते हैं। मैंने वहाँ के शासकीय महाविद्यालय में नौकरी की है। बस्तर राज्य के राजा प्रवीरचंद भंजदेव, आदिवासियों की देवी ‘दांतेईश्वरी’(दांतेवाड़ा में जिनका मूल मंदिर है) के राजपुरोहित भी थे और आदिवासी उन्हें ईश्वर की तरह पूजते भी थें। कहते हैं उनका लालन-पालन अंग्रेजों द्वारा अंग्रेजों की तरह हुआ था और उनका राज्य हड़पने के चक्कर में अँग्रेजों ने एक दुरभि संधि और साजिश में, उन्हें बचपन से ही ‘स्लो आर्सेनिक’ पर रखा गया था। इसके नतीजतन युवा अवस्था तक आते-आते उनमें कुछ मानसिक विकार आ गए थे – मसलन ‘यौन-परपीड़न’ के जाहिर है स्वतंत्र भारत में राज्यों के विलनीकरण के तहत उनका राज्य भी स्वतंत्र भारत का अंग बन गया।… लेकिन प्रवीरचंद भंजदेव की प्रतिष्ठा – मान-सम्मान आदिवासियों में ज्यों का त्यों बना रहा। वार्षिक रथयात्रा में वे उसी तरह विराजमान होते थें और आदिवासी उनका रथ खींचकर दूर ‘कुल्हाड़ाकोट’ तक ले जाते थें। कभी-कभी उनमें अपने ‘राजत्व’ और ‘प्रभुत्व’ का अहंकार भी जोर मारने लगता था जिससे कई प्रशासनिक समस्याएँ खड़ी हो जाती थी। उनके नेतृत्व में तथाकथित आदिवासी बगावत के अवसर पर मैं स्वयं भोपाल में ही था। अतः मेरी जानकारी अखबारों – रेडियो और मौखिक श्रोतों पर ही आधारित थी (है)। उस घटना में प्रवीरचंद भंजदेव की मृत्यु पर अनेक अन्तरविरोधी ख़बरें फैली के इस घटना से प्रेरित दुष्यंत की उपयुक्त कविता को लेकर भी कुछ वाद-विवाद हुए। कार्यालय में उसके कुछ विरोधियों और भोपाल के कुछ पत्रकारों ने उस विवाद और कविता को तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र तक भी पहुंचा दिया। मिश्र जी स्वयं कवि और ‘कृष्णायन’ महाकाव्य के रचनाकार थें। सामान्य प्रशासन विभाग और सूचना-प्रकाशन-संचालनालय सीधे उन्हीं के अधीन था। दुष्यंत की पेशी हो गई। उसने स्वीकार किया कि उन्हें घटनाक्रम और वस्तुस्थिति की व्यक्तिगत और आधिकारिक जानकारी नहीं थी। उन्होंने तो सुनी-सुनाई अखबारी जानकारी के आधार पर कविता लिख दी थी। शासकीय सेवा के आचरण संहिता के तहत उसने माफी मांग ली और मामला रफा-दफा हो गया। … हाँ, दुष्यंत के कुछ उत्साही प्रशंसकों ने उस कविता को, उसके बाद, खूब उछाला और दुष्यंत को विद्रोही कवि ही नहीं ;शहीद का दर्जा भी दे दिया।
खुशबू: आज दुष्यंत कुमार नहीं हैं, न उनकी कोई आत्मकथा है। तो आपकी नजर में ऐसे कौन से स्रोत हैं जिन्हें पढ़कर उस रचनाकार को ठीक से जाना जा सके?
धनंजय वर्मा: साहित्य जगत के हर कवि या लेखक ने अपनी आत्मकथा नहीं लिखी है इसलिए उनकी रचनाओं को पढ़कर ही उनके रचनाकार को ठीक से जाना जा सकता है। मैं साहित्य में आत्माभिव्यक्ति के प्रसंग में लिख चुका हूँ कि रचनाकार की रचना उसकी आत्म-अभिव्यंजना (se।f-expression) ही नहीं, उसका आत्म-उद्घाटन (Se।f exposition) भी होती है। टी. एस. एलियट ने ही तो कहा है कि – “कविता व्यक्तित्व का प्रकाशन (ही) नहीं व्यक्तित्व से मोक्ष भी होती है। (कोष्ठक मेरे) poetry is not the expression of persona।ity, but an escape from persona।ity”… लोगों ने escape का मतलब ‘पलायन’ कर लिया जब कि उसका अर्थ ‘मुक्ति – मोक्ष’ भी है।
खुशबू: क्या दुष्यंत कुमार की आत्मकथा लिखने या डायरी लिखने की कोई योजना थी?
धनंजय वर्मा: नहीं, उसकी ऐसी कोई योजना नहीं थी बल्कि कुछ कवियों की ‘आत्मकथा’ और ‘डायरियों’ का हम दोनों मज़ाक भी उड़ाते थे और उन्हें ‘हीनता ग्रंथी’ की ‘क्षतिपूर्ति’ कहते थे के आत्मकथा लिखने के लिए महात्मा गांधी सरीखी सत्यनिष्ठा और अपनी कमजोरियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने का साहस मुझे तो अब तक पढ़ी गई लगभग किसी भी ‘आत्मकथा’ में नहीं मिला।

खुशबू: अपने लंगोटिया यार का चला जाना बड़ा ही दारुण दृश्य रहा होगा! आपकी क्या प्रतिक्रिया थी अचानक यह खबर सुनकर?
धनंजय वर्मा: निश्चय ही वह बड़ा ही दारुण और हृदय विदारक था। मैं न केवल स्तब्ध बल्कि निस्सहाय भी हो गया था – उस खबर को सुनकर और उसके सुन्दर-आकर्षक चेहरे को निष्प्राण देखकर…।


*परिचय*

खुशबू कुमारी:
शोधार्थी (JRF),
कुछ पत्र – पत्रिकाओं में लेख और कविताएँ संकलित,
बिहार सरकार के शिक्षा विभाग के अंतर्गत उच्च विद्यालय में हिन्दी शिक्षिका के पद पर कार्यरत,
वर्तमान में राँची विश्विद्यालय, राँची, से डॉ. मृदुला प्रसाद के निर्देशन में ‘दुष्यंत कुमार के काव्य और उसकी भाषिक सम्वेदना’ विषय पर शोध कार्य (पीएच. डी)।

धनंजय वर्मा:
जगदलपुर, रायपुर, सागर 1959 में छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर से अध्यापन शुरू तथा विभिन्न स्थानों पर पैंतीस वर्षों तक अध्यापन, संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश शासन में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी, मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला पारिषद के प्रथम सचिव, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति। सम्प्रति स्वतंत्र लेखन।
साहित्यिक परिचय –
प्रकाशित पुस्तकें: निराला: काव्य और व्यक्तित्व, आस्वाद के धरातल, अंधेरा नगर, निराला _काव्य: पुनर्मूल्यांकन, हस्ताक्षेप, आलोचना की रचना यात्रा, अंधेरे के वर्तुल, आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय, आधुनिकता के प्रतिरूप, समावेशी आधुनिकता, हिन्दी कहानी का रचना शास्त्र, हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन, हिन्दी कहानी का सफरनामा, परिभाषित परसाई, हिन्दी उपन्यास का पुनरावतरण, लेखक की आजादी, आलोचना के सरोकार, परम अभिव्यक्ति की खोज, आलोचना की जरूरत, आलोचना का अंतरंग, एक आवाज: सबसे अलग।
संपादन: हिन्दी कहानी, कविता, आलोचना, भाषा और साहित्य की उन्नीस पुस्तकों के अलावा मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की मुख्य पत्रिका ‘वसुधा’ का 1985 से 1990 तक संपादन।

सेतु, अक्टूबर 2020

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