सुरेन्द्र वर्मा के नाटकों में संघर्ष

मंजुला चव्हान

मंजुला चव्हान

हिन्दी विभागाध्यक्ष, अक्कमहादेवी महिला कला, विज्ञान एवं वाणिज्य महाविद्यालय, बागलकोट, कर्नाटक


हिन्दी साहित्य में नाटकों का वास्तविक आरंभ भारतेंदु काल से ही हुआ है। नाटक के अर्थ में ‘नट्’ तथा ‘नृत्’ धातु को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान नाटक की व्युत्पत्ति ‘नट्’ धातु से मानते हैं तो कुछ ‘नृत्’ धातु से। पाणिनि का मत है कि ‘नाटक’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘नट्’ धातु से हुई है। नाटक के संबंध में पाश्चात्य ‘विद्वानों’ की धारणा भारतीय विद्वानों की धारणा से किंचित भिन्न है। अंग्रेजी में ‘नाटक’ का पर्यायवाची शब्द ‘ड्रामा’ है। ड्रामा शब्द का अर्थ ग्रीक में सक्रियता होता है।

वस्तुत: नाटक शब्द की व्युत्पत्ति ‘नट्’ धातु से हुई है जिसका अर्थ है, सात्विक भावों का विभिन्न अवस्थाओं में प्रदर्शन। भारतीय आचार्यों ने नाटक को निश्चयात्मक रूप से अनुकरण मूलक माना है। भरतमुनि ने नाट्य शब्द को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि ‘संपूर्ण संसार के भावों का अनुकीर्तन ही नाट्य है।’

नाटक की परिभाषा:
साहित्य की विधाओं में नाटक सर्वाधिक प्राचीन एवं सर्वोत्तम विधा है। आचार्य भरतमुनि के अनुसार ‘जिस साहित्य अभिनेय विधा से स्वभाव से ही लोक जीवन का सुख-दु:ख समन्वित रहता है और जिसका अंगों से अभिनय किया जाता है उसे नाटक कहते हैं।’

आधुनिक हिन्दी नाटक के प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र नाटक का संबंध नट या अभिनेता से मानते हुए नाटक की परिभाषा इस प्रकार करते हैं – “नाटक शब्द का अर्थ है नट लोगों की क्रिया। नट कहते हैं विद्या के प्रभाव से अपने व किसी वस्तु के फेर कर देने वाले को, व स्वयं दृष्टि रोचन के फिरने को नाटक में पात्रगण अपना स्वरूप परिवर्तित करके राजादि का स्वरूप धारण करते हैं व वेशविन्यास के पश्चात् रंगभूमि में स्वीकार्य कार्य साधन हेतु करते है।”

नाटक के तत्व:
भारतीय तथा पाश्चात्य नाटककारों और नाट्य समीक्षकों ने नाटक के सात तत्व निर्धारित किये हैं- कथावस्तु, पात्र तथा चरित्र-चित्रण, संवाद, वातावरण, भाषा शैली, रंग मंचीयता, उद्देश्य।

नाटककार सुरेन्द्र वर्मा:
सुरेन्द्र वर्मा आधुनिक हिन्दी के प्रतिनिधि नाटककारों में से एक हैं। इनके नाटकों में एक विशेष परिवर्तनशीलता मिलती है। स्त्री-पुरूष के बीच के शारीरिक और मानसिक संबंधों के बारे में जब वे कुछ कहने लगते हैं, तब एक सुन्दर दृश्य काव्य बन जाता है। इसे पढते समय या देखते समय हम उस नाटक की कथावस्तु और पात्र योजना में तल्लीन हो जाते हैं। सुरेन्द्र वर्मा के नाटक इस प्रकार हैं - ‘सूर्य की अंतिम किरण से, सूर्य की पहली किरण तक ‘आठवाँ सर्ग’ कैद ए हयात, छोटे सैयद बड़े सैयद, शकुंतला की अंगूठी, सेतुबंध, नायक खलनायक विदूषक, द्रौपदी।

भारतीय इतिहास और संस्कृति को लेकर सुरेन्द्र वर्मा की दिलस्चपी उनके नाटकों में झलकती है। इनके अधिकांश नाटक स्त्री-पुरूष संबंधों को केंद्र में रखकर रचे गए  हैं। स्त्री-पुरूष के बिगडते संबंध, छटपटाहट, विडंबना, बेचैनी उलझन, पीडा इनका प्रिय विषय रहा है। लेखक ने नये संबंधों के साथ, नये संदर्भों की नयी व्याख्या को जन्म देते हुए नये युग का निर्माण किया है।

सूर्य की अन्तिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक:
सुरेन्द्र वर्मा के ‘सूर्य की अन्तिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’ नाटक ऐतिहासिक धरातल पर स्त्री-पुरूष के प्रेम और यौन संबंधों के मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर प्रस्तुत कलात्मक प्रस्तुतिकरण है। इस नाटक का मूल कथ्य ही दाम्पत्य संबंधों पर प्रश्न है, नपुंसक राजा, असंतुष्ट रानी है, राजधर्म इन सब का मिला-जुला सार है।

मल्लराज्य की रानी शीलवती जो विवाह से पूर्व प्रतोष से प्रेम करती थी। घर-परिवार से दरिद्र होने के कारण मल्लराज्य के राजा ओक्काक से विवाह कर लेती है। राजा नपुंसक होने के कारण रानी को एक संतान न दे सका। संतान तो क्या वह रानी को शारीरिक सुख भी नहीं दे सकता था। दैहिक सुख से वंचित रानी राजघराने की मर्यादा को सबसे ऊँचा मानते हुए ब्रह्मचारिणी का जीवन जीती रहती है। विवाह के इतने वर्षों बाद भी राज्य को उत्तराधिकारी न मिलने के कारण पडोसी राज्य षड़यंत्र पर उतर आते हैं।

इस षड़यंत्र के कुचक्रो को भेदने के लिए अमात्य परिषद इस नतीजे पर पहुँचती है कि राज्य के लिए उत्तराधिकारी प्राप्त करने की दृष्टि से रानी को ‘नियोग विधि’ के लिए तैयार किया जाता है। इसका अर्थ है रानी को एक रात के लिए उपपति चुनने का अधिकार प्रदान करने की इच्छा के विरुद्ध रानी को अमात्य परिषद की आज्ञा माननी पड़ती है, राजा ओक्काक बेबस रह जाता है। उसे अपनी सहमति देनी पड़ती है। शारीरिक सुख के अभाव में जीवन की सरसता एवं सम्पूर्णता के लिए तरसती रानी शीलवती अपने आप को ढूंढने निकल पड़ती है।

राज्य के अमात्य-परिषद का यह विश्वास है कि उत्तराधिकारी के अभाव में प्रजा के असन्तुष्ट हो जाने का आदेश है। रज्य के लिए उत्तराधिकारी प्राप्त करने की दृष्टि से रानी को नियोग विधि के लिए तैयार किया जाता है। तत्कालीन सामाजिक परम्परा के अनुसार सन्तानहीनता की समस्या का समाधान नियोग द्वारा पाया जा सकता था। 

इच्छा के विरुद्ध रानी को अमात्य परिषद की आज्ञा माननी पड़ती है। राजा ओक्काक बेबस होकर रह जाता है।
नपुंसक लेकिन स्वाभिमानी राजा अपनी पत्नी को उपपति चुनने के लिए सहमति तो देता है पर वह रात आत्मपीड़ा और बौखलाहट से काटता है। उधर रानी अपने पुराने प्रेमी को उपपति के रूप में चुनती है। आर्य प्रतोषा के स्पर्श एवं संभोग से उसे एक नवीन भाव, नया एहसास मिलता है। इस रात के बाद शीलवती का जीवन सम्पूर्ण बदल जाता है। नाटक शीलवती पर केंद्रित है। उसके माध्यम से कामसुख और नर-नारी संबंधों पर नये दृष्टिकोण से विचार किया है।

आठवाँ सर्ग: बहुचर्चित नाटक है। महाकवि कालिदास के ‘कुमारसम्भव’ महाकाव्य के आठवें सर्ग को आधार बनाकर लिखा गया है। आठवें सर्ग पर तत्कालीन व्यवस्था द्वारा श्लीलता-अश्लीलता पर उठे विवाद के संदर्भ में महाकवि कालिदास सत्ता के आगे सर झुकाने से इनकार कर देता है और यह निर्णय लेते हैं कि वे ‘कुमारसंभव’ को आठवें सर्ग पर ही अधूरा छोड देंगे। इस प्रकार सत्ता के प्रति अपना आक्रोश अपनी भड़ास निकालते हैं। वास्तव में रचनाकार की अभिव्यक्ति की हत्या को दर्शाया गया है।

शकुंतला की अंगूठी: यह नाटक भी सुरेन्द्र वर्मा के अन्य नाटकों के समान रोचक है। इसमें पारिवारिक विघटन, सामाजिक विघटन, मानवीय संबंधों में संघर्ष इन सभी के बीच लेखक का संघर्ष। यह नाटक नियति यानी डेस्टिनी पर आधारित है। 

यह संसार दु:ख और सुख से भरा है। समय कैसा भी हो हम उसे संघर्ष करते हुए बिताते हैं यही तो जीवन है। 
इस नाटक में ‘अभिज्ञान शकुंतला’ को आज के परिवेश, व्यक्ति और संदर्भ में जांचने-परखने का दिलचस्प प्रयास दिखाई देता है। नाटक में कुमार थियेटर में अपने सहयोगियों के साथ मिल कर ‘अभिज्ञान शकुंतला’ नाटक का पूर्वाभ्यास करता है। शकुंतला का पात्र निभानेवाली कनक कुमार से आकर्षित होती है। यही आकर्षण प्रेम में  बदलता है। इस दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी पनपपते हैं।

कनक को पता चलता है कि वह गर्भवती है। पर कुमार जिम्मेदारियाँ उठाने से मना करता है। वह अपने आप को किसी भी जिम्मेदारी में उलझाना नहीं चाहता था। जिम्मेदारियों में बंधकर कोल्हू के बैल की तरह अपना जीवन जीना नहीं चाहता था। कुमार से धोखा खाने पर कनक गर्भपात करवा लेती है। झूठे संबंधों को ठुकराकर, कनक निर्भय होकर आगे बढती है।

साठोत्तरी नाटककारों में नवीन जीवन दृष्टि के आधार पर रंगमंचीय उपलब्धियों के कारण हिन्दी नाटक और रंगमंच के इतिहास में इन्हें गरिमापूर्ण स्थान मिला है। सामयिक युग की विसंगतियों के संघर्ष में टूटते बिखरते मन के मानसिक विघटन को ऐतिहासिक पौराणिक संदर्भों के माध्यम से मुखरित किया गया है।

परामर्शित ग्रंथ:
1. सुरेन्द्र वर्मा के साहित्य में संघर्ष चेतना – डॉ. मंजुला चव्हान
2. सुरेन्द्र वर्मा के नाटकों का अनुशीलन – डॉ. जयश्री सिंह


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