वादों की परछाइयाँ - पूनम चन्द्रा मनु

किताब: ‘वादों की परछाइयाँ
लेखक: पूनम चन्द्रा मनु
मूल्य:  ₹ 150 रुपये
प्रकाशक: हिन्द युग्म, दिल्ली

समीक्षक: समीर लाल ’समीर’


पूनम चन्द्रा ’मनु’ से काफी बरसों से परिचय रहा है। वह हिन्दी राइटर्स गिल्ड, कनाडा की सक्रिय सदस्य हैं अत: संस्था के कार्यक्रमों के माध्यम से जान पहचान हुई। फिर फेसबुक पर उनकी सक्रियता और कविताओं की गहराई ने प्रभावित किया। मैं पूनम जी को उनकी अतुकांत कविताएँ, जिसकी अपनी गहराई होती है और उस गहराई में भी अनेकों अर्थ और ज़ज्बात छिपे होते हैं, के लिए जानता था और निश्चित ही उनके सौम्य और आत्मीय स्वभाव के कारण। मुझे बहुत अंदाज़ा नहीं था कि वह गद्य में भी उतनी ही जबरदस्त पकड़ रखती है।

समीर लाल 'समीर'
यदा-कदा किन्हीं पत्रिकाओं द्वारा प्रवासियों की रचनाओं की मांग पर मैने पूनम जी से रचनाओं की मांग भी की और सदा ही सहजता के साथ, बिना किसी प्रश्न के, वे उसे पूरा करती रहीं। इधर जब उन्होंने खबर दी कि उनकी उपन्यास ’वादों की परछाईयाँ’ प्रकाशित हो गई है और भारत में उसके लोकार्पण का कार्यक्रम है जिसे वह फेसबुक पर लाइव भी करेंगी। ऐसे में जिज्ञासावश और इतने समय के परिचय के चलते भारत से समय मिला कर सुबह सुबह जागा भी और उनका कार्यक्रम अटेंड भी किया।

बहुत प्रभावशाली कार्यक्रम हुआ और लोगों ने जिस तरह से तारीफ की तो लगा मुझे इस उपन्यास को जल्द ही पढ़ना चाहिये। मगर जिस वस्तु को जितना जल्दी चाहो, वह स्वभाविक रुप से देर से मिलती है या यूँ कहें कि इन्तजार का हर लम्हा सदियों का सा होता है, इसीलिए कहा गया होगा। फिर बात लगभग आई-गई हो गई आज के सूचना-प्रौद्योगिकी से भरपूर युग में।

बड़े दिन बाद मई 3 को हिन्दी राइटर्स गिल्ड के एक कार्यक्रम के माध्यम से कनाडा में लोकार्पण की रुपरेखा बनी। सूचना आई और साथ ही व्यक्तिगत आग्रह भी। बड़े समय बाद हिन्दी राइटर्स गिल्ड के कार्यक्रम में शिरकत की। किताब तो पढ़ी नहीं थी मगर वहाँ लोगों ने हमें देखा तो सम्मानीय सदस्यों द्वारा कुछ बोलने के आग्रह को टाल जाना भी संभव नहीं होता है, अतः बधाई और संदेश देकर किताब लेकर चले आये, पूनम जी ने कवर पर हस्ताक्षर करते हुए लिखा ’आदरणीय समीर जी के लिए दुआओं के साथ’... मनु। उन दुआओं को सर माथे लगाया। उन्हीं दुआओं का असर कहिये कि थके हुए घर लौटे मगर फिर भी एक ही बैठक पूरा उपन्यास पढ़ डाला। किताब है ही ऐसी कि कोई भी इसे उठायेगा तो बंधता चला जायेगा।

हमारे युग की कहानी है जब मोबाईल फोन, व्हाटसएप, फेसबुक आदि नहीं होते थे। मोहब्बत एक छत से दूसरी छत तक नज़रों से पहुँचती थी। इश्क में महक होती थी जो दोनों आशिकों को ऐसा महकाती थी कि शहर भर के लिए खबर बन जाती थी। किताबें और क्लास के नोट्स बदले जाते थे और वही कबूतर होते थे संदेश को इस पार से उस पार तक पहुँचाने के लिये। मोहब्बत ज़रूरत नहीं, अहसास हुआ करती थी और बॉयोलॉजी की कोई किताब न होकर, जज़्बात और अरमानों का पवित्र ग्रन्थ हुआ करती थी। काँपते हाथ, लरजते ओंठ, बिन कहे सब कह ले जाने की अभिलाषा और बिन सुने सब कुछ जान लेने का और शिद्दत से चाह लेने का हुनर भी, बस ’ये उन दिनों की बात है’ बन कर रह गये और अब देख रहा हूँ कि इस उपन्यास में दर्ज हो गये हैं इतिहास बनकर।

उन छोटी-छोटी बातों, उन छूटी-छूटी बातों में आप अपने आपको हर जगह महसूस करेंगे भले आपने वह युग न जिया हो तो भी क्योंकि इस उपन्यास में उस युग का सिर्फ जिक्र ही नहीं, चित्रण भी है और एक कुशल कारीगर के द्वारा गढ़ी मूर्ति का प्रदर्शन भी है। एक अति सुन्दर उपन्यास जो एक युग को पुनः जीवित कर देने की ताकत रखता है।

90 के दशक के पहले, भारत में जवान हो चुके लोग इसमें अपने दिन देख कर मुस्करायेंगे और उस कसक को महसूस करेंगे जिसे उन्होंने जिया है और 90 के दशक के बाद जवान हुये युवा उस युग को अहसास कर पायेंगे जो दिव्य था और आज जिसकी दुहाई उनके माँ बाप उनको देते हैं कि हमारे जमाने की बात कुछ और थी और यह तय कर पायेंगे कि माँ बाप किस जमाने की बात कर रहें हैं, जब वो कहते हैं कि ये उन दिनों की बात है।
उपन्यास का कोई भी भाग इस समीक्षा के माध्यम से उजागर करना यानी कि उपन्यास को जाहिर करना है। पूरा उपन्यास और उसका हर वाक्य ज़िन्दा है, धड़कता है और जिसके साथ जब तक आप स्वयं वक्त नहीं गुज़ारेंगे, उसकी गहराई को नहीं समझ पायेंगे और वह अहसास जो हर वाक्य छोड़ कर जाता है आपके पास अपनी खुशबू के अहसास के साथ!

एकदम आम बोलचाल की भाषा; कुछ बानगी देखिये:
"प्लेटफर्म पर सामान रखकर समीर और आकाश कुछ खाने के चीजें लेने चले गये। मानसी और नेहा सामान के पास ही बैठी रहीं। मानसी समीर को जाते देख रही थी। कुछ देर बाद वो दोनों वापस आये।
"क्या सोच रही हो?"
"यही, कि तुम जब भी जाओ, इतनी ही देर में वापस आ जाओ।"
"काश! हम एक शहर में होते तो शायद ये हो सकता था।"
"काश तो बहुत बड़े दायरे खोलता है समीर, काश का कोई आखिर नहीं होता है..."
और एक अन्य बानगी देखें, कितने अलग अंदाज में सादे लहजों में कही गई बात:
"तुम ठीक कह रही हो" समीर ने मानसी का हाथ अपने हाथों में रखते हुए कहा।
हाथों को छूते ही उन दोनों को ये अहसास हुआ कि उनके आस पास से काफी लोग गुजर रहे हैं। इसी चहल पहल ने उन्हें वक्त के चलने का अंदाजा दिलाया।
"अरे! साढ़े तीन बज गये।"
"याने तुमसे जुदा होने का वक्त हो गया।"

ऐसी ही हल्के फुल्के अंदाज में बातचीत... और उपन्यास कब खत्म हो जाता है कि आपको पता ही नहीं चलता।
समीर... ओह समीर... ये मैं हूँ मगर, यही तो नाम है उस उपन्यास के नायक का भी... अब भला बताओ... बिना मेरे साथ वक्त गुजारे और बिना मुझसे बात किये... कितना जान पायेंगे आप मुझे?

वही तो इस उपन्यास की भी मांग है। इस उपन्यास से गुजरने के बाद मेरी मनु जी से अपेक्षाएँ असीमित हो गई हैं... मैं उनमें एक शब्दों का कृतिकार देख रहा हूँ और भविष्य में अनेक कृतियों की उम्मीद की एक चमकीली किरण!

अनेक शुभकामनाएँ पूनम चन्द्रा ’मनु’ को, इस आशा के साथ कि मेरी उम्मीदें पूरी होंगी।

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