कहानी: माफ करना

कृष्णलता सिंह
 सुमेर सिंह नहीं रहे। सजी अर्थी बता रही थी कि अभी थोड़ी देर बाद उनका पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो जायेगा। परिवार के सदस्य एवं निकट सम्बन्धी पुष्प अर्पित कर उन्हें अन्तिम विदाई दे रहे थे। अन्तिमयात्रा में शामिल होने वाले लोगों की भीड़ घर के बाहर प्रतीक्षारत थी। पूरा गाँव सुमेर सिंह को अन्तिम विदाई देने के लिये उमड़ा हुआ था, जिसमें बच्चे, बूढ़े, जवान और किशोर सभी शामिल थे। आस पास के गाँव के लोग भी खबर पाकर दौड़े चले आये थे। किसी नेता की रैली जैसी भीड़ का कोई ओर छोर नहीं था। भीड़ सिर्फ औपचारिकता निभाने नहीं आई थी। सबके मन में उनके लिये अपार श्रद्धाभाव था। लोगों की आँखों से किसी अपने को खोने का दर्द साफ छलक रहा था। वे अपनी नम आँखें कुर्ते की आस्तीन से सूखा रहे थे।

सच पूछो तो सुमेर सिंह का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था, उन्होंने किसी न किसी रूप में हर किसी को उपकृत अवश्य किया था। सबके मसीहा थे। वह किसी के भाई सरीखे थे, किसी के ताऊ, किसी के चाचा और किसी के बाबा। सबसे ऊपर वह अपने इलाके के पहले आर्मी अफसर थे, जिस पर गाँव को नाज़ था। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपने लोगों के बीच रहना पसंद किया। गाँव की मिट्टी में उनकी आत्मा बसती थी। 'राम नाम सत्य'के साथ अर्थी उठी, पीछे-पीछे 'राम नाम सत्य है 'दोहराते लोग चल पड़े। शव यात्रा अभी कुछ कदम आगे बढ़ी थी कि भीड़ में न जाने कहाँ से छोटे-छोटे दो बच्चे दौड़ते हुए आये और रोते-रोते बोले-'हमरे बाबा जी को कहन ले जात हो। 'उन्हें पुचकार कर एक किनारे कर शवयात्रा आगे बढ़ी। बच्चे सुमेर सिंह के खानदान के नहीं थे।

 काफी देर तक 'राम नाम सत्य है की गूंज गलियारों में गूंजती रही। मधु चुपचाप औरतों के झुण्ड से निकलकर छत पर आ खड़ी हुई। अश्रुपुरित नेत्रों से सुमेर सिंह की अन्तिम यात्रा को जाते हुए देखती रही। मन के अंदर दबा गुबार भभक पड़ा। उसने आँचल अपने मुँह में ठूँस लिया। उसे 'राम नाम सत्य है' की गूंज में सुमेर सिंह का तकिया कलाम-'माफ करना' की अनुगूंज सुनाई दी। वह कुछ भी बोलने से पहले'माफ करना' जरूर कहते थे। नीचे आँगन में रोने पीटने का कार्यक्रम यथावत् चालू था, जिसे छोटी बहू शन्नो गाँव की विशेष शैली में बड़ी शिद्दत के साथ अंजाम दे रही थी। अन्य औरतों की उसमें पूर्ण सहभागिता थी। मधु समझ नहीं पा रही थी कि ये औरतें रो रही हैं या गा रही हैं। उनके रिरियाने में उसे दुख का उद्वेग काम नाटकीयता अधिक नजर आ रही थी। वह छत से नीचे आकर औरतों के झुण्ड में बैठ गयी। शन्नो रिरियाते हुए लयबद्ध तरीके से कभी दायी ओर, कभी बाई ओर झुकती, फिर एकाएक सामने की तरफ झुककर पीछे पछाड़ मार कर लुढ़क जाती। औरतें उसे उठाकर धीरज धरने के लिये के लिये कहती, "अरे! बावली काहे भई जात? धीरज धरऊ। बड़े नसीब वाले रहे तुमरे ससुर। पोतो-परपोते, नाती-परनाती सब का मुँह देखकर गये हैय। सीधे सोने की सीढ़ी चढ़ी कर सरग जहियै।"

मधु का दिमाग चक्कर में पड़ गया, "क्या शन्नो वास्तव में पिताजी की मृत्यु से इतना दुखी है या...?" चेहरा घूँघट से ढका होने के कारण वह शन्नो के असली मनोभाव की देख नहीं पा रही थी। रिरियाते रिरियाते शन्नो का गला बैठ गया। वह दौड़कर पानी का गिलास ले आई, औरतों ने इशारे से मना कर दिया।

"शायद यह भी रीतिरिवाज का कोई हिस्सा होता होगा" यह सोचकर वह फिर अपनी जगह सिर झुकाकर बैठ गई। शन्नो फिर जोर जोर से रिरियाने लगी औरतों ने पूरा साथ दिया। शन्नो को इस तरह बेहाल छटपटाते देखकर मधु फिर सोचने को विवश हो गई, "अगर यह शोक असली है, तो फिर फोन पर पिताजी को कोसने वाली शन्नो कौन थी? क्या इतनी जल्दी व्यक्ति अपना मुखौटा बदल सकता है?" अभी चार दिन पहले शन्नो के साथ फोन पर हुए वार्तालाप का एक एक शब्द उसे याद है।

 दोपहर के समय गाँव से फोन आया था। शन्नो की आवाज सुनकर वह चौंक उठी थी, कारण शन्नो अपने आप कभी फोन नहीं करती थी। घबराकर उसने पूछा था, "सब ठीक तो है, पिताजी..। " "अरे! उसी बुड्ढे के लिये ही तो फोन कर रही हूँ।" दिल धक धक करने लगा था मधु का, "पिता जी की तबियत तो ठीक है?" उपहास के स्वर में जवाब मिला था, "उसकी तबियत को क्या हुआ? भला चंगा मस्त कलन्दर बना छुट्टा सांड की तरह गाँव में घूम रहा है। काले कौवा की उमर लेकर आया है, बीबी को खा गया, जवान दमाद को खा गया, पोते को खा गया, भाई को खा गया। पर उसकी सेहत पर कोई फरक नहीं पड़ा। अब मेरे परान लेकर जावेगा। मुझे जिन्दा देखना हो, तो पिताजी को अपने पास बुला लो या उसका कोई और इन्तजाम कर दो। भाई साहब तो हमारी सुनेंगे नहीं, आप औरत हो मेरा दर्द समझोगी। अब हमारे ऊपर दया करो। "सुमेर सिंह के लिये प्रयुक्त अभद्र भाषा से वह बहुत आहत हुई, लेकिन शन्नो को वस्तु स्थिति समझाने के लिये थोड़ा नरम होकर बोली, "पिता जी को अपने पास रखने में हमे कोई एतराज नहीं है, बल्कि हम तो चाहते हैं कि वह हमारे पास आकर रहें। कब से कह रहे है कि गाँव, घर और खेती की जिम्मेदारी इन्दर को सौंपो। सारी चिताएँ छोड़कर हमारे पास आकर अपने जीवन के शेष दिन शान्ति से बताओ लेकिन गाँव का मोह उनसे छुटता नहीं है। जोर जबरदस्ती उनके साथ कोई कर नहीं सकता। छोटे बच्चे तो हैं नहीं, जो जबरदस्ती कार में बिठाकर लेआयें। "शन्नो अड़ गई , " जीजी मैं कुछ नहीं जानती, कैसे भी, कुछ भी करो, मगर इस बुड्ढे से हमारी जान छुड़ाओ। इस पनौती को अब हम अपने पास नहीं रख सकते।"

शन्नो के गन्दे लहजे को विराम देने के इरादे से मधु ने कहा, "सबसे पहले तो तुम अपनी गन्दी जुबान को लगाम दो। ये क्या बुड्ढा बुड्ढा लगा रखा है?"

तुनक कर शन्नो बोली , "चौरानवे साल के आदमी को बुड्ढा नहीं कहूँ, तो और क्या कहूँ?"

मधु ने खीझकर कहा, "सीधे सीधे पिता जी कहो। फिर याद रखो पिता जी तुम्हारे साथ नहीं रहते हैं, बल्कि तुम लोग उनके साथ रहते हो। यह जमीन-जायदाद, घर-द्वार सब उनका है। अब तुम बताओ तुम्हारी असली पीड़ा क्या है?"

उबलकर शन्नो बोली, "एक हो तो बताऊँ। सारे दिन चूड़ा चमारों और धीवरों के टोले में डोलते फिरते हैं। उनके घरों में अड्डेबाजी करते हैं। उनके घरों की बहूबेटियों से भी हँस हँस कर बतियाते हैं। सारी शर्म लाज बेच खाई है।"

बेसिरपैर की बातें सुनकर मधु बरस पड़ी , "तुम होश में तो हो। चौरानवे साल की उम्र में पिता जी को औरतों की भूख नहीं है, बातों की भूख है। अकेले बोर हो जाते होंगे, तो गाँव में इधर उधर जाकर बातचीत कर अपना मन बहला लेते होंगे। इसमें बुराई क्या है? चलना फिरना उनके लिये अच्छा है।"

शन्नो झल्ला पड़ी, "आप तो मजे में शहर में बैठी हो। यहाँ गाँव का समाज है। बिरादरी वाले हम पर थू थू करते हैं। "मधु से रहा नहीं गया, "तो बिरादरी वालों से कहो, वही उनका दिल बहला दिया करें। बिरादरी वालों के आधे घरों में तो ताले झूल रहे हैं। उनकी उम्र का कोई रहा नहीं। नये लड़के तो घरों में घुसे टीवी या मोबाइल फोन पर चिपके रहते हैं। अब तो आदमियों का बैठक में बैठने का रिवाज ही खतम हो गया है। फिर इन्दर ही कौन सा बैठक में जाकर घड़ी दो घड़ी उनसे बात कर लेता है?" शन्नो के पास चलाने के लिये बहुत तीर थे, "अरे!वह तो उनके यहाँ खाना खाकर अपनी जात भी गँवा बैठे हैं। लोग हमें ताने मारते हैं कि हम बुड्ढे को खाना नहीं देते हैं, तभी वह इधर उधर मारा मारा फिर रहा है। "शन्नो की नासमझी पर मधु को हँसी भी आई थीऔर गुस्सा भी, "ऐसी बात नहीं है। प्यार से किसी ने कुछ खिला दिया, तो खा लिया होगा। इसे बतंगड़ बनाने की जरूरत नहीं है। फिर पिता जी तो फौजी हैं। फौज में जात-पात, छुआछूत और धर्म -मजहब की कोई दीवार नहीं होती है। सब एक आसमान के नीचे भारतीय बनकर साँस लेते हैं। लंगरकुक या मेसकुक की खाना बनाने की योग्यता देखी जाती है, जाति नहीं पूछी जाती है।

चिढ़कर शन्नो ने कहा, "जीजी!यह बड़ी बड़ी बातें अपने पास रखो। यहाँ आकर रहो, दो दिन में पता चल जायेगा कि पानी कितने हाथ गहरा है। उन लोगों ने पता नहीं इस बुड्ढे पर कौन सा जादूटोना कर दिया है कि वह तो उन लोगों के दीवाने हो गये हैं। उनकी पूरी पेंशन उन लोगों पर ही लुट रही है। किसी की लड़की का ब्याह करा रहे हैं। किसी का इलाज हो रहा है, किसी की टूटी छत और दीवार बनवाई जा रही है। किसी की लड़की और लड़के की फीस भर रहे हैं। उनकी लड़कियों को जबरदस्ती स्कूल भेज रहे हैं। सब दो चोटियों में रिबन लगाकर कलेक्टर बनने के लिये स्कूल जा रही हैं। अब घर के काम में हाथ बँटाने के लिये धीवरों की लड़कियाँ नहीं मिलती है, इस बुड्ढे के कारण। धरम-करम पर भी खुले हाथ से खर्च हो रहा है। लेकिन अगर आपके देवर किसी काम के लिये उनसे माँगे तो एक धेला नहीं निकालते। हाथ पीछे को सरक जाता है। धीवरों के मकान लकदक करा रहे है, लेकिन अपने घर की पुताई का ध्यान नहीं। अब तो दिवाली पर खुलेआम उनके बच्चों को। गिफ्ट बाँटते हैं। झोले भर भर कर सामान लालगंज से मंगवाते हैं और बाँटते हैं।"

मधु शन्नो की असली पीड़ा समझ गई। सुमेर सिंह अपनी पेंशन शन्नो या इन्दर के हाथ पर नहीं रखते हैं। इसका पति पत्नी दोनों को बड़ा मलाल था। शन्नो को समझाते हुए उसने कहा था , "देखो, पेंशन उनकी है। अपनी मेहनत की कमाई को जिस ढंग से खर्च करने में उन्हें आत्मसंतोष मिलता है, वह खर्च करते हैं। हम तुम उन्हें रोकने वाले कौन होते हैं?यह उनका हक है। "यह बात शन्नो को पसंद नहीं आई, पलटवार किया, "मालूम था, आप उनका ही पक्ष लेगी। " बात पक्ष लेने या न लेने की नहीं थी। काफी दिनों से इन्दर और शन्नो की नज़र सुमेर सिंह की पेंशन पर थी। उसकी मंशा को परिवार के सब लोग समझ रहें थे। दूसरे बेटों ने सुमेर सिंह को समझाया भी था , "पिता जी !पेंशन से थोड़ा पैसा इन्दर के हाथ पर रख दिया करो। घर में शांति रहेगी। "सुन कर सुमेर सिंह भड़क गए थे , "माफ करना, साठ साल के इन्दर को पैसे मैं दूँ?कैसी बातें करते हैं आप लोग। वह फेमिली में ब्लैकशीप है। उसे बैठे बिठाए सब कुछ चाहिये। सारे टाइम बीबी के तिगने में छिपा रहता है। वह लालची और आलसी दोनों है। वह चाहता है कि मैं पूरी खेती जीते जी उसके नाम कर दूँ और अपनी पेंशन भी उसके हाथ पर रख दूँ। फिर मैं फुटवाल की तरह इधर उधर मारा फिरूँ, कभी बड़े बेटे के पास, कभी छोटे के पास। माफ करना, मैं अपने आप अपने हाथ क्यों कटवाऊँ?उसे अपना हिस्सा चाहिये तो ले ले। पहले तो पढ़ाई लिखाई के टाइम मटरगश्ती करता रहा। सपने कलक्टर बनने के देखता रहा। अब तुम लोगों को देख कर कुढ़ता है। ""लेकिन पिताजी."....सुमेर सिंह ने राजेन्दर को बीच में ही टोक दिया था, "माफ करना, मैंने अपना फर्ज निभाया। इसकी नौकरी लगवाई, घर बनवा दिया। शहर जैसी सुविधाएँ जुटा दी। उसके लड़के लड़की का ब्याह कराकर सैटल करा दिया। अब क्या सारी जिन्दगी मैंने इसका ठेका उठा रखा है। माफ करना, अभी भी हर महीने कैन्टीन से सारा सामान लाकर देता हूँ। खेती के सारे खर्च मैं करता हूँ। ट्रैक्टर-ट्राॅली, बीच-खाद और गाय-भैंस सब का खर्च हमारे खाते में है। बस गुलछर्रे उड़ाने के लिये पेंशन से कैश नहीं देता हूँ। सो उसकी वाइफ चोरी-चोरी अनाज बेचकर हिसाब पूरा कर लेती है। मुझे सब मालूम है। माफ करना, अब मैं उन्हें खटकता हूँ। उसके सारे काम पूरे हो चुके है। अब मैं यूजलेस हो गया हूँ। जाकर पूछो उससे, पहले कभी क्यों नहीं उसने तुम लोगों के पास रहने के लिये कहा मुझे?क्योंकि तब उसे मेरी जरूरत थी। जानता हूँ, अब रोटी बनाकर देने में परेशानी हो रही है। अगर ऐसी बात है, तो मैं अपनी रोटी का इन्तजाम अलग कर लूंगा। लेकिन मैं अपना घर और गाँव किसी कीमत पर नहीं छोडूँगा। यह मेरे पूर्वजों की देहरी है। " सुमेर सिंह के निर्णय के आगे दोनों बेटे नतमस्तक थे। सुमेर सिंह और इन्दर के बीच सत्ता की लड़ाई अक्सर चलती रहती थी। गाँव में अचानक तूफान आ जाता। सब भागे भागे गाँव आते। सबको एक ही समाधान नजर आता कि सुमेर सिंह बड़े या छोटे बेटे के साथ शहर चले आये। लेकिन सुमेर सिंह इस बात के लिये तैयार नहीं होते। तब इन्दर के हाथ दस-बीस हजार थमाकर सुलह करा दी जाती। मामला चार-छह महीने के लिए शान्त हो जाता। मधु समझ गयी कि शन्नो के हाथों में रूपयों के लिये फिर खुजली हो रही है। उसको चुप देखकर शन्नो बोली, "सब लोग शहर मे रहकर मौज मार रहे हो और आफत हमारे सिर मढ दी। " इस आरोप से मधु चिढ़ गयी थी, "शहर में तो तुम लोग भी रहते थे। अपनी गरज से गाँव आये, हम तो नही गये थे बुलाने।"
"वह तो हमारी किस्मत खराब थी, कॉटन मिल बन्द हो गई, तो आना पड़ा।"
"तो फिर मुझे क्यों दोष दे रही हो। "शन्नो जरा नरम हुई, "जीजी, हम तो इनके कारनामों से तंग आ गये हैं। अब तो इन पर पागलपन के दौरे पड़ने लगे हैं। पूरा पगला गये हैं। ऐसी ऐसी हरकतें करते है कि पूछो ना। कल खाली कुर्ता पहनकर निकल पड़े। जगत के लड़के ने टोका - बाबा! तले पैजामा तो पहन लो।"

मधु ने समझाया था, "यह पागलपन नहीं, उम्र का तकाजा है। हम सब को इससे गुजरना होगा। इसे इशू बनाने की जगह थोड़ा ध्यान रखा लिया करो।"

"जीजी यह सब चोचले आपके यहाँ ठीक रहेंगे। यहाँ गाँव में गृहस्थी के सौ काम फालतू होते हैं। मेरे पास इतना टाइम कहाँ, जो इस बुड्ढे के पीछे भागती फिरूँ?""टिल्लू कहाँ गया?" जलभुन कर शन्नो ने कहा था, "टिल्लू यहीं मेरी छाती पर मूँग दल रहा है। जीन्स, टीशर्ट और काला चश्मा चढ़ाकर मोबाइल हाथ में लिये वह अपने आप को सलमान खान समझता है। मजाल है घर के किसी काम में हाथ लगा दे। कुछ कहो तो फट से जवाब देता है-हम तोहार नाहि बाबा जी के नौकर हैय। कामचोर इतना है कि अपनी जूठी थाली भी छोड़कर भाग जाता है। अब आप ही बताओ क्या मेरी औकात इस घर में यही है कि मैं नौकरों की जूठन मांजूँ?"

टिल्लू की अलग कहानी है, वह सुमेर सिंह की छोटी बेटी की ससुराल से आया था। एक बार सुमेर सिंह की बीमारी में उनकी देखभाल के लिये आया था, उसके बाद वापस गया ही नहीं। आया था, तब दस बारह साल का बच्चा था। अब बड़ा हो गया है लेकिन कद बढ़ा नहीं। बड़ा ही मस्तमौला खिलंदड स्वभाव का है। सुमेर सिंह के साथ खेतीबाड़ी में हाथ बटाया है। बाबा जी बाबाजी कहकर उनके आगे पीछे घूमता था। "बेटी की ससुराल का है और माँ-बाप से दूर रोजी रोटी कमाने आया है" - यह सोचकर सुमेर सिंह उसका विशेष ध्यान रखते थे, उसके छोटे मोटे शौक पूरे कर देते थे। इन्दर और शन्नो को यह बर्दाश्त नहीं था। उन्हें लगता अगर टिल्लू ना रहे, तो सुमेर सिंह का दिमाग दो दिन में ही ठिकाने आ जायेगा। वह इन्दर के इशारे पर नाचने लगेंगे। इसलिए वे टिल्लू को भगाने के लिये उसे डाँटते फटकारते रहते। टिल्लू को लेकर बाप बेटे में तनातनी चलती रहती थी। उसके जीन्स पहनने पर एतराज किया, तो सुमेर सिंह ने इन्दर की बोलती बन्द कर दी, "जीन्स या काले चश्मे से तुम्हारे पेट में दर्द क्यों हो रहा है। बच्चा है, जमाने को देखकर उसका भी मन करता है। नौकर को जूते की नोंक पर रखोगे तो वह चार दिन में रास्ता नाप लेगा। फिर टिल्लू नौकर नहीं मेरा फैमिली मेंबर है। खबरदार जो उस पर किसी ने हाथ उठाया या गाली गलौज की। " शन्नो के कर्कश स्वभाव को जानते हुये भी थोड़ा नरम बनते हुये मधु नेकहा था, "यह बात तो टिल्लू की गलत है। "प्रोत्साहन पाकरशन्नो बोली थी, "मैं साफ साफ बताये देती हूँ, टिल्लू एक दिन सब कुछ लूटकर बिहार रफ्फूचक्कर हो जायेगा। जब तब कहता रहता है-मोबाइल खो गया है, चोरी हो गया है। जबकि उल्टे वह खुद बस अड्डे जाकर बेच आता है। फिर पिताजी का उल्लू गांठकर दुवारा मोबाइल खरीदने के लिये पैसे ऐंठता है। वे तो अपना एटीएम कार्ड भी उसे पकड़ा देते है। पिछले महीने उनके दस हजार चोरी हो गये, इल्जाम आपके देवर पर आया। बेटे से ज्यादा नौकर पर विश्वास करते है। बस अब बहुत हो चुका, आप लोग दयाकर इन्हें किसी तरह से हमारे पास से हटा लो। मैं पक गयी हूँ। गुस्से में कोई अनर्थ न कर बैठूँ। " "ठीक है शन्नो, हम एक दो दिन में पिता जी को लेने आते हैं। भरसक कोशिश करेंगे कि अब वह हमारे पास ही रहें। तुम तसल्ली रखो।"

 शन्नो की ओछी और कटूक्तियों को सुनकर मधु व्यथित हो उठी थी। सुमेर सिंह ने एक जांबाज सैनिक के रूप में सन् उन्नीस सौ अड़तालीस, बासठ और एकहत्तर के युद्धों में सीमा पर दुश्मन की गोलियों का सामना किया था। यू.एन मिशन की शान्ति सेना में शामिल होकर विदेशी धरती पर भारत का मान बढ़ाया था। बंगला देश की लड़ाई में तो दुश्मन की गोली कन्धे को छूकर निकल गई थी। सियाचिन में तो एवलंच में फँसकर मौत को चकमा देकर बचा गये थे। और अब उसके अपने ही उसे स्वाभिमान पूर्वक अपने ही घर में रहने नहीं देना चाहते थे।

शाम को मधु ने राजेन्दर के साथ शन्नो के साथ हुई बातचीत को साझा किया। राजेन्दर की तेजिंदर के साथ बातचीत हुई। संयुक्त निर्णय लिया गया कि शनिवार को जाकर सुमेर सिंह जी को किसी भी कीमत पर गाँव से लेकर आयेंगे। तदर्थ इन्दर को फोन पर सूचना भी दे दी। शनिवार की शाम को दोनों भाई गाँव इस इरादे से पहुँचे कि अब पिताजी गाँव में नहीं रहेंगे। अपना शेष जीवन सुखशान्ति और आरामपूर्वक हमारे पास बतायेंगे, जो वह डिजर्व करते हैं। सुमेर सिंह दोनों बेटों और बहू मधु को देखकर बड़े खुश हुए, बोले, "माफ करना, तुम लोग बड़े अच्छे टाइम पर आये। दोनों भैसें दूध दे रही हैं। ताजा गुड़ बना है। लेते जाना। "राजेन्दर ने कहा, "पिताजी कल हम नाश्ते के बाद कानपुर के लिये निकल पड़ेंगे। आप हमारे साथ चलोगे। अब मैं यह नहीं सुनूँगा कि गन्ने की पर्चियाँ आ रही हैं, कोल्हू चल रहा है, गेहूँ की बुवाई चल रही है, अभी बहुत काम हैं, मई में गेहूँ की कटाई के बाद आऊँगा। बहुत हो गया यह सब। अब सब मायामय छोड़कर इन्दर को गाँव की जिम्मेदारी दीजिये और हमारे पास आराम से रहिये। "शन्नो के मन में बताशे फूट रहे थे। उन्होंने हाँ या ना कुछ नहीं कहा, बस शन्नो की तरफ देखकर मन्द मन्द मुस्कुराते रहे। रात में सबके साथ हँसी खुशी खाना खाया। बातों का सिलसिला चलता रहा। बाद में दूध के साथ गुड़ की डली ली और कहा, "माफ करना, मैं सोने जा रहा हूँ। कल लम्बी यात्रा करनी है।"

सुबह वह सच में कभी न लौटने वाली लम्बी यात्रा पर चले गये। जीते जी उन्हें कोई उनके घर से बेदखल नहीं कर पाया। माफ करना कहकर सबको माफ कर गये।

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