लघुकथाएँ: मिन्नी मिश्रा


- मिन्नी मिश्रा

पटना


* रील बनाम रीयल *

तालियों की गड़गड़ाहट के साथ हॉल की सारी बत्तियाँ एक साथ जल उठी थीं।
“कमाल का रोमांस, बिल्कुल अमिताभ और रेखा की जोड़ी।” एक साथ कई आवाजें दर्शक-दीर्घा से आयीं।

“अरे... चल रहा होगा दोनों में रोमांस। थियेटर-सिनेमा में काम करने वाले लोगों के लिए प्यार की परिभाषाएँ कुछ अलग होती है! जहाँ कहीं, जिससे भी मिले, दोस्ती ... प्यार में बदल जाती है। पति-पत्नी कहने भर के लिए होते हैं। यूज़ एँड थ्रो वाला हिसाब-किताब, हा, हा, हाँ!”

फिर से कुछ तेज आवाजें ... मेरे कानों में... गर्म सलाखों की तरह चुभने लगीं। लोग अपना टेंशन दूर करने रंगमंच का खूब रसास्वादन करते हैं। पर, जैसे ही पटाक्षेप होता है, इनके रंग बदलते देर नहीं लगती। भिड़ जाते हैं, नायक-नायिका की बखिया उधेड़ने में। जैसे खुद कितने दूध के धुले हों!

मैं, साथी कलाकार रोहित के साथ, भीड़ से बचते हुए हॉल से बाहर निकल आयी। सीधे पार्किंग में लगी गाड़ी की तरफ आगे बढ़ ही रही थी, कि रोहित ने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा, “रुको, मुझे अभी तुमसे कुछ जरूरी बातें करनी हैं।”

“अभी नहीं रोहित, जल्दी घर पहुँचना है।” मैं अपना हाथ खींचते हुए बोली।

“प्लीज, मेरे लिए दो मिनट रुक जाओ।”

“अच्छा... जल्दी से बताओ। “

“मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ।”

“तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया है? रोहित, रील लाइफ और रीयल लाइफ में बहुत का अंतर होता है। पता है न, शादी में दोनों परिवारों को भी जुड़ना पड़ता है?”

“हाँ, पता है। मेरे परिवार में सिर्फ मैं हूँ और मेरी माँ। माँ से तुम पहले ही फंक्शन में मिल चुकी हो।” रोहित एक ही साँस में सारी बातें कह गया।

“और, मेरे परिवार में... बताओ? मैं विधवा हूँ... सिर्फ इतना ही तुम्हें बताया था... और... कुछ भी तो नहीं!"

“अरे मैडम जी, मुझे सब पता है। तुम्हारे ड्राइवर से तुम्हारे बारे में मैंने सब कुछ पता कर लिया है। तभी से तो मैं तुमसे बेहद प्यार करने लगा हूँ। तुम्हारी एक बेटी भी है... उसी के इलाज के लिए... तुम ये सब कर रही हो।” रोहित मुस्कुराते हुए बोला।

मैं, ठगी सी रोहित को देखती रही। वह अपलक मुझे निहारता रहा।

“जाने से पहले एक बात तुम्हें बताना चाहता हूँ। मुझे अपनी संतान की इच्छा नहीं है। हाँ, तुम्हारी बेटी का पिता कहलाना मुझे अच्छा लगेगा। आगे ... निर्णय तुम्हारे हाथों में है।"
मैं एकटक रोहित को जाते हुए देख रही थी। वह मुझे मनुष्य कम, देवता... अधिक नजर आ रहा था।


* स्टेटस *

“मीरा! फिर... किधर?”

“मम्मी... मोहन के घर, कैरम खेलने।”

“ओफ्फ, कितनी बार समझाया है, मोहन से दोस्ती मत कर। वह तुम्हारे पापा के ड्राइवर का बेटा है… तुम्हारे पापा शहर के नामी डॉक्टर। बेटी, अपने पापा के स्टेटस का जरा ख्याल कर।

समय के साथ मैं भी पापा के स्टेटस को अच्छी तरह समझने लगी। फिर भी, बचपन के दोस्त और उसके साथ बीते सुनहरे पल को चाहकर भी, मैं, भूल नहीं पा रही थी... पानी में कागज की नाव चलाना, लुका-छिपी खेलना, घर के बने पकवान सबसे छिपाकर एक-दूसरे को खिलाना।

रोज ड्राईवर अंकल के साथ, वह जैसे ही मेरे घर आता, मैं झट उसके साथ खेलने बाहर निकल जाती।
लेकिन, जब बड़ी होने लगी, मिलने पर सख्त पहरा लग गया। अब सभी से नजरें बचाकर, हम दोनों मिल लेते।
पर, पापा के स्टेटस के चलते मैं चाहकर भी उसे दिल की बात बता नहीं पायी।

समय किसी का इंतजार नहीं करता। बड़ी धूम-धाम से आज मेरी शादी हो गई। विदाई की तैयारियाँ भी शुरू होने लगीं। पर, मेरी नजरें इस सबसे दूर मोहन को ढूंढ रही थी। सुबह से उसे देखा नहीं था। नहीं जानती थी कि किससे पूछूँ?

तभी, मोहन को अंदर आते देखकर न चाहकर भी मेरे हाथ ऊपर उठ गये। वह मेरे समीप आकर खड़ा हो गया। लोगों से नजरें बचाकर, एक छोटा-सा कागज मुझे थमाते हुए, वापस लौट गया।

मैं बेताब, बाथरूम में घुस गई। कागज खोलकर देखा, लिखा था, “मीरा, जीवन में स्टेटस को कभी बीच में मत आने देना, दिल की दूरी बढ़ जाती है।”

कागज को सीने से लगाकर फूट-फूट कर, मैं रो पड़ी, “काश! तुम मुझसे ये बात पहले कहा होता... तो... ये महावर, ये मेहँदी... ये गजरे... सब के सब, आज तुम्हारे नाम के होते!”


*दो पाटन के बीच *

अक्सर, रात को सोते समय हम दोनों के बीच चाँद की गंध आ जाती और मैं बैचेन हो जाती। आज भी यही हुआ... सारी रात चाँद की गंध से मैं बेचैन रही। अब अधिक धोखा बर्दाश्त नहीं कर सकती मैं! क्यों अपनी जिंदगी को तबाह होने दूँ? अम्मा की कही बात मुझे याद आ गई, “मर्द की जात अधूरी औरत नहीं अपनाती।”
मैं भी माँ बनना चाहती हूँ। मैं पति का पूर्ण समर्पण चाहती हूँ। किसी कीमत पर अपनी मुहब्बत के दरख्त को सूखने देना नहीं चाहती। आखिर कब तक चुपचाप सहती रहूंगी? अन्याय सहना भी अन्याय को बढ़ावा देना ही होता है।

खुद दूसरे के साथ ऐयाशी करता और मुझे टीचर की नौकरी छुड़वा दी। आज नौकरी रहती तो मैं शहर की नामी साइंस टीचर कहलाती। खुद नौकरी करता है और मुझे ... जब भी दुबारा नौकरी की चर्चा करती हूँ, उबलते पानी की तरह बौखलाने लगता है,  कहता है.. “चुपचाप घर संभाल... नौकरी का ख़्वाब छोड़ दे।”

नौकरी जाए भाड़ में... चांद को तो हरगिज बीच में नहीं रहने दूंगी। बगल में सोये पति को धक्का देकर मैं चिल्लाई, “आपके शरीर से चाँद की गंध आ रही है।”

पति ने उठते ही मुझे एक थप्पड़ खींचकर मारा,  “बदतमीजी की भी हद होती है। रात को चैन से सोने भी नहीं देती। क्या चाँद-चाँद की रट लगा रखी है?”
मैं अंगद की पाँव की तरह अडिग रही, “आज सोने नहीं दूंगी आपको। सच सच बताओ, चाँद से शारीरिक संबंध रखते हो या नहीं?” मैं पागल की तरह उसके बदन को झकझोरते हुए बोली।

“हाँ! हैं मेरे संबंध चाँद के साथ। मैं, उससे बेपनाह मुहब्बत करता हूँ। उसके साथ जल्दी निकाह भी करने वाला हूँ।”

सुनते ही सरहाने की दीवार से सर पटककर मैं चिल्लाई, “तो क्या मुझे भी साथ रखोगे और चांद को भी?”

“हाँ, तुम्हें भी, क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”

“प्यार... या समझौता? मैं चाँद के साथ? आपको? घृणा होने लगी है आपसे? मुझे तलाक चाहिए।”

“मैं तलाक नहीं दूंगा।”

“क्यों नहीं? बताओ मुझे।” निरीह सी मैं कांपने लगी।

“क्योंकि मैं नहीं चाहता कि इस वजह से मेरी बहन और तुम्हारी दो छोटी बहनें कुँवारी रह जायें।"

"जो पत्नी के साथ विश्वासघात कर सकता है वह उसकी बहन के सुहाग के बारे में क्या खाक चिंता करेगा? मेरा दम घुट रहा है।" किसी अर्धविक्षिप्त की तरह चिल्लाते हुए, मैं अपना सामान बांधने लगी।

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