स्वतंत्रता आन्दोलन में संस्कृत कवियों का योगदान

अरुण कुमार निषाद

अरुण कुमार निषाद 

डॉ.अरुण कुमार निषाद
असिस्टेण्ट प्रोफेसर (संस्कृत विभाग) 
मदर टेरेसा महिला महाविद्यालय,
द्वारिकागंज, कटकाखानपुर, सुल्तानपुर, उ.प्र.।

इस पृथ्वी पर शायद ही कोई मनुष्य होगा जिसे अपने राष्ट्र, अपनी जन्मभूमि से प्रेम न हो। रामायण में भी श्रीराम ने कहा है-अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।  
अन्य भाषा के रचनाकारों की तरह संस्कृत के कवियों की लेखनी ने भी अपने राष्ट्र के नवजवानों को जागरुक करने का कार्य किया। इन्होंने अपने दृश्य-श्रव्य काव्य के माध्यम से जनमानस के हृदय में राष्ट्रीय भावनाएँ उत्पन्न की। परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़ी भारतमाता को स्वतन्त्र कराने के लिए इन कवियों ने अपनी रचनाओं द्वारा लोगों के मस्तिष्क को झकझोर दिया। इस राष्ट्र को स्वतन्त्र कराने में इन सभी भाषाभाषी लेखकों का महनीय योगदान रहा है। कुछ प्रमुख संस्कृत लेखक और उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं -

रामनाथ तर्करत्न – आपका जन्म 1840 ई. के लगभग बंगाल के शान्तिपुर नामक स्थान पर हुआ था। इन्होंने अपने काव्य में लिखा है कि- पराधीनता व्यक्ति की वीरता को नष्ट कर देती है। दासता व्यक्ति के लिए एक अभिशाप है।
हिनस्ति शौर्यं सुरुचिं रुणद्धि भिनत्ति चित्तं विवृणोति वित्तम्।
पिनष्टिं नीतिञ्च युनक्ति दास्यं हा पारतन्त्र्यं निरयं व्यनक्ति।।[1]

कवि पुन: लिखता है कि-पराधीनता से अच्छा है, मृत्यु हो जाए।
असुव्यपायेष्व पि नो जहीम: स्वतन्त्रतामन्त्रमतन्द्रिणोऽद्य।
उपागतायां परतन्त्रतायां यशोधनानां शरणं हि मृत्यु;।।[2]

पण्डिता क्षमारावइनका जन्म 1890ई. में पूना में हुआ। इनके पिता का नाम शंकर पाण्डुरङ्ग था। यह संस्कृत के अतिरिक्त मराठी और अंग्रेजी में भी रचनाएँ करती थीं। इनका देहान्त 1954 ई. में हुआ। इनकी की राष्ट्रभक्तिपरक 3 रचनाएँ हैं-सत्याग्रहगीता, उत्तरसत्याग्रहगीता और स्वराज्यविजय:।सत्याग्रह गीता (महाकाव्य) में  उन्होंने 1931-1944 ई.तक की घटनाओं का वर्णन किया है। यह तीन भागों में विभक्त है। इसमें अनुष्टुप छन्द का प्रयोग हुआ है। कवयित्री लिखती हैं कि-मैं भले ही मन्दबुद्धि की हूँ, लेकिन मैं अपने राष्ट्र से प्रेम करती हूँ और इसका यशोगान करती हूँ। 
तथापि देशभक्त्याऽहं जाताऽस्मि विवशीकृता।
अत एवास्मि तद्गातुमुद्यता मन्दधीरपि।।[3]

कवि या लेखक युगद्रष्टा होता है। पण्डिता क्षमाराव के इस काव्य को पढ़कर यह स्वयं सिद्ध हो जाता है। पण्डिता क्षमाराव ने उस समय स्पष्ट लिखा था कि-अगर हमारे देशभक्त इसी प्रकार निरन्तर लगे रहे तो हमारा देश एक दिन स्वतन्त्र हो जाएगा। उनकी यह बात सही भी हुई और आज हम आजाद भारत में साँस ले रहे हैं।
कुर्वन्तो नित्यमेवं हि स्वातन्त्र्यं प्राप्स्यथाचिरात्।
स्वातन्त्रयादपि भूतानां प्रियमन्यन्न विद्यते।।[4]

गंगा प्रसाद उपाध्याय-इनका जन्म उत्तर प्रदेश के एटा जिले के नदरई ग्राम में 1881 ई. को हुआ। इन्होंने अपने आर्योदय महाकाव्य के माध्यम से देशवासियों से कहा हैं कि- देश की लड़ाई में हमें आपसी भेदभाव, ईर्ष्या, द्वेष भूल कर एक हो जाना पड़ेगा तभी हम अंग्रेजों को यहाँ से भगा पायेंगे। अगर हम आपस में छोटी-छोटी बातों को लेकर लड़ते रहे तो हम कभी भी स्वतन्त्र नहीं हो पायेंगे।          
पश्येत् को वा स्वहितविषयान् स्वार्थभावान् विहाय।
रक्षेत् को वा रिपुणगणकराद् देशधान्यं धनं वा।
कुर्यात्  को  वा परवशहतां मातरं शल्यशून्यां
को वा भव्यां भरतधरणीं मोचयेच्छत्रुपाशात्।।[5]

कवि पुन: कहता है कि-अगर हम यह सोचते रहे कि- कोई अन्य इस कार्य को करेगा तो देश कभी भी आजाद नहीं होगा। हमें ही स्वयं आगे बढना होगा।
काङ्क्षामात्रमलं नृणां न हृदये साध्यस्य पुर्तौ क्वचित्
योग्यायैव ददाति वाञ्छितफलं विश्वम्भर: सर्वदा।
यावद् दुष्टगुणांस्त्यजेन्न जनता जातीयताघातकान्
तावच्छक्तिमुपैति नैव न च वा मुञ्चेत पराधीनताम्।।[6]

हरिप्रसाद द्विवेदी शास्त्री-इनका जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद के बाण ग्राम में 1892 ई. को हुआ। अपनी कविता में वे कहते हैं कि- यह जो गंगा की लहरें कल-कल से यह उपदेश देती हैं कि- मनुष्य को भी जाति, धर्म से ऊपर उठकर सोचना चाहिए। तभी राष्ट्र की उन्नति होगी।
त्रिधाराणां यस्मिन् पृथगगभुवां सङ्गमवर:
स्वरूपाद् भिन्नानां दिशति लहरीणां कलकलै:।
गुणैर्जात्या रूपैरिह जगति भिन्नैरपि जनै-
र्मिथ: सङ्गन्तव्यं सुमतिसुखसिद्ध्यै सहृदयै:।।[7]

अप्पा शास्त्री राशि वडेकर-इनका जन्म 1873 ई. को कोल्हापुर में हुआ था। इनके पिता का नाम सदाशिव शास्त्री था। इनका स्वर्गवास 25 अक्टूबर 1913 ई. को हुई। परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़े भारत को स्वतन्त्र करने के लिए कवि ने प्रतीतात्मक शैली का सहारा लिया। वे अपनी कविता (पञ्जरबद्ध: शुक:)में लिखते हैं कि- हे तोते तुम तो सोने के पिंजरे में बन्द हो, तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए। 
शुक सुवर्णमयस्तव पञ्जरो 
विविधरत्नचयप्रतिमण्डित:।
कलयते हृदयं न मुदान्वितं
समपसार्य मन: क्लममन्वहम्।।[8]

वे पुन: लिखते हैं कि –परतन्त्र मृत्यु के समान है।तोते का सहारा लेकर देशवासियों को समझते हुए कवि कहता है कि-हे शुक! इस सोने के पिंजरे को पिंजरा मत समझ, इस पिंजरे में जो सलाखें लगी हैं वह मृत्यु का मुख हैं।
शुक सुवर्णमयस्तव पञ्जरो 
न खलु पञ्जर एष विभाव्यताम्।
मुखमिदं ननु हेमशलाकिका-
रदनशालि मृतेरतिभीषणम्।।[9]

हरिदास सिद्धान्त वागीश –इनका जन्म बंगाल के फरीदपुर जिले में कोटालपाड़ा-अनशिया ग्राम में 1876 ई. में हुआ था। इनका देहान्त 1961 ई. में हुआ। अपने ‘मिवारप्रताप’ नाटक में यवन आक्रमणकारियों को समझते हुए कवि कहता है कि-तुम सब अपने देश लौट जाओ। तुम्हारी बस्ती हमारे हिन्दुस्तान में उसी प्रकार शोभा नहीं पा रही है, जैसे शरद ऋतु में बादल।      
हिन्दुस्थाने यवनवसतिर्नोचिता भारतेऽस्मिन्
नीहारौघस्थितिरिव शरद्व्योम्नि नक्षत्रदीप्ते।
तस्मादस्मान्निजनिजधिया यात यूयं स्वदेशान्
अस्रस्रोत: स्रवतु न खलु च्छिन्नभिन्नाच्छरीरात्।।[10]

इस प्रकार हम देखते हैं कि-देश के प्रत्येक व्यक्ति ने अपने-अपने स्तर से राष्ट्र को स्वतन्त्र कराने में अपना अवदान दिया। जिस देश को स्वतन्त्र कराने में देश के सहस्रों नवजवानों ने हँसते-हँसते मौत को गले से लगा लिया। आज मुट्ठी भर चन्द लोग उसी राष्ट्र को पुनः गुलाम कराने में लगे हुए हैं। वे राष्ट्र विरोधी नारे लगा रहे हैं। जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद, भाईभतीजावाद आदि पर लड़ रहे हैं। जिसकी कल्पना हमारे राष्ट्र नायकों ने स्वप्न में भी नहीं की होगी। क्या इसी दिन को देखने के लिए हजारों बहनों ने अपने मांग का सिन्दूर पोंछ लिया था ? हजारों माताओं ने अपनी गोद सूनी कर ली थी। हजारों बच्चों सर से पिता का साया क्या यही दिन देखने के लिए उठ गया था? आज राष्ट्र को फिर उसी राष्ट्रीय एकता की जरूरत है, जिस एकता का बीजारोपण हमारे पूर्वजों ने किया था।


संदर्भ



[1]आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास, सम्पादक डॉ. जगन्नाथ पाठक, उ.प्र. संस्कृत संस्थान प्रकाशन, लखनऊ, संस्करण 2000 ई., पृष्ठ संख्या 23
[2]आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास, सम्पादक डॉ. जगन्नाथ पाठक, उ.प्र. संस्कृत संस्थान प्रकाशन, लखनऊ, संस्करण 2000 ई., पृष्ठ संख्या 23
[3]वही, पृष्ठ संख्या 32
[4]वही, पृष्ठ संख्या 33
[5]वही, पृष्ठ संख्या 34
[6]वही, पृष्ठ संख्या 35
[7]वही, पृष्ठ संख्या 105
[8]वही, पृष्ठ संख्या 145
[9]वही, पृष्ठ संख्या 278
[10]वही, पृष्ठ संख्या 399 

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