नारी: एक कविता

सस्मिता कर

- सस्मिता कर

शिक्षा विभाग, रमा देवी महिला विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर, ओडिशा


कोई मुझे कहता है जननी तो कोई भगिनी
कोई जाया तो कोई नंदिनी
परन्तु मैं जानती हूँ कि मैं बस एक नारी हूँ
जिसकी कोई सत्ता नहीं,
मैं बस एक नारी हूँ
पुरुष के बिना जिसे कोई जानता नहीं।

कभी मैं भूमिपुत्री सीता
जनक नंदिनी राजदुहिता
वन-वन में पति के साथ भटकती रही,
उठाया रावण ने, परन्तु अग्नि परीक्षा मैं देती रही,
क्या कभी किसी ने सोचा है -
राम से दूर सिया, सिया से दूर राम,
उतना तो हक़ मेरा भी बनता है
जितनी सिया से अग्नि परीक्षा राम को लेने की
उतनी अग्नि परीक्षा राम से सिया को लेने की,
क्या पुरुष के चरित्र पे
कभी कलंक लगता नहीं
या पुरुष का कोई चरित्र होता नहीं?

कभी मैं आग से उत्पन्न याज्ञसेनी
मातृ-आज्ञा निभाते-निभाते
कभी में बन जाती हूँ पाञ्चाली
और कभी कुरुसभा में
चीरहरण होते-होते
मैं बन जाती हूँ द्रौपदी
क्या नारी की इज्जत से बढ़कर
मातृ-आज्ञा होती है?
क्या किसी पुरुष के पास इसका उत्तर है?
क्या पत्नी को जुएँ में हारकर
कोई बंधक रखा जाता है?

नारी हूँ मैं
कभी जन्म लेती हूँ धरती से तो
कभी पैदा होती हूँ आग से
कभी मेरे सतीत्व को जाहिर करने के लिए
मुझे देनी होती है अग्निपरीक्षा तो
कभी मेरे सतीत्व को
लुंठित करने के लिए
खेला जाता है कपट पासा
क्योंकि सतीत्व केवल
नारी का ही होता है
क्योंकि इज्जत केवल नारी पर ही
राज करती है।

1 comment :

  1. Women have every right to question the disparity but this this Hindu India is also initiated Matrupujan since ancient times.Original Hindu philosophy treated women at par or even given higher strata but Manubadis to bring order in the society strangled freedom of woman.Times changed now a woman is fast gaining her prominense .

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