काव्य: हरिचरण अहरवाल 'निर्दोष'

प्रज्ञा, 50 B श्री कृष्णा एन्क्लेव, बख्शी स्कूल के पीछे, देवली अरब रोड़, बोरखेड़ा, कोटा - 324004 (राजस्थान)
1. हाळी
---------
अषाढ़ी शुरू होते ही
'सूंथळी'
की तरह बळ
खाने लगती है
'हाळी' की
ज़िन्दगी
आधी ट्रॉली भर
गृहस्थी को
ले जाया जाता है
लादकर
एक घर से
दूसरे घर
एक मोहल्ले से
दूसरे मोहल्ले
एक गाँव से
दूसरे गाँव
एक 'खेळी' से
दूसरी 'खेळी'
और एक परगणे से
दूसरे परगणे,
उसी तरह
जैसे लादकर
ले जाया गया था
पिछले वर्ष
बाड़े और 'खलाण' की
खपरेल या बरसाती की
एक टापरी में
फिर धर दिए जाते हैं
मटमेले
जरमन के बरतन
'बगड़' में
उठाऊ चूल्हा
डांडे के बांध
दिए जाते हैं
एक थेली में
बच्चों के स्कूल के
काळे कागज
आधार कार्ड
भामाशाह कार्ड
टी.सी.
मार्कशीट
दो दो फ़ोटो
और बची हुई
आधी भरी कॉपियाँ
अगले ही दिन
मांग ली जाएगी
सरकारी स्कूल में
दाखिले के लिए
पिछले साल यहाँ से
पचास कोस दूर भी तो
मांगी थी,
माड़साब कहेंगे वहीं पर
लगा आऊंगा अंगूठा
और
नहा लूंगा गंगाजी
एक काम से तो
सामानों से बंधी
गाँठो को खोलते समय
कुछ इसी तरह
बोलता रहता है
'हाळी'
इस साल तो
थोड़ा बहुत ही
बचेगा कर्ज भी,
निकल ही जाएगा
एक साल
जैसे-तैसे,
पर जिन्दगी
निकालने के लिए
हर साल
यहाँ वहाँ
ऐसे ही कहता है
जानती है पत्नी
अगले साल
फिर किसी के
बाड़े में उतार ली जाएगी
गृहस्थी की गाड़ी
बच्चों का क्या
अक्षर ज्ञान तो
हो ही जाएगा,
इतनी ही देर में
एक रोटी पर
गास भर रखकर
चटनी
रख दी जाती है
उसके हाथ पर
'हाळी'
कभी हथेली की
लकीरों को
देखता है
और कभी
सूखी रोटी को!
***
2. शेष दो पहर रात
---------

देखो आज
चांद भी हँस रहा है
तुम्हारी हँसी जैसा ही,
रात की उजली सी
चुनरी में से
जैसे
घूंघट से आधा
ढक लिया हो
तुमने चेहरा,
सच मानो
अभी भी उधार है
तुम्हारे हिस्से की
कतरा भर
चांदनी,
शेष दो पहर रात
बैठी है अभी भी
इंतजार में
भोर के तारे के
तेज चमकने तक
देखो!
सितारों का कारवाँ
तुम्हारे जैसे ही
बातों की फुलझडियों से
खेल रहा है,
सिर्फ रात ने
हाँ कहा है
उदासियों को विदा
करने को,
तुम ठहरना अभी वहीं
धीरे धीरे ढल रहा है
चांद तो
ढलती रात की तरहा,
और रात को रोके
तुम्हारी हँसी,
चांद के भ्रम में
ठहरी है
भोली रात
तुम्हारे ही जैसे,
और लोलुप चांद
पीकर तुम्हारी हँसी
बरसा रहा है
अमृत अब भी!
***

शब्दार्थ
------------
हाळी:हाली / बंधुआ श्रमिक
माड़साब: अध्यापक जी
बगड़: घर में आंगन के बाद
वाली जगह
बळ: बल
खेळी: क्षेत्र / निश्चित दायरा
सूंथळी: सुतली, पतली रस्सी
खलाण: खलिहान
अषाढ़ी: आषाढ़ माह /
खेती का नव वर्ष
***
3. स्मृतियाँ
---------

सुनो!
रात के अशेष
मधुर स्वप्न की
अप्रतिम
स्मृतियाँ
अब भी सिराहने
बैठी है
मैं जाग कर
फिर से
चाहता हूँ
सो जाना
पर अब भी
मीलों दूर है
नींद का आगोश
मैंने बुने थे
या तुमने
ये तो पता नहीं
तुम्हें भी
सुलाया है
स्वप्न ने
या फिर मुझे ही
सताया है
ये भी नहीं
पता तो
पर हाँ!
अब भी इंतजार है
फिर से उसी
उधेड़-बुन का
अब भी इंतजार है
रात के उसी
प्रहर का
जिस वक्त के
सपने,
हो जाते हैं
अक्सर सच
सच!
अब भी जागकर
फिर से
मूंद लेना
चाहता हूँ
आँखें,
देखो आज भी
फिर से
ढल रही है
रात
हो सके तो
आ जाना
फिर से
स्वप्नों के
सुनहरे
लोक में
जहाँ तो टूट
जाएगी ‌
तुम्हारी
चुप्पी
मेरी हर बात पर!
***
4. पहियों पर रेंगता शहर
----------

आहिस्ता आहिस्ता
पहियों पर रेंगता
शहर
अब कहाँ रुकता
किसी के रुकवाने पर
नहीं पसीजता
किसी की चीख पर
नहीं देता
खुल्ले दो रुपए
याचना करते हाथों में
हर पल,
पल पल बढ़ती रफ्तार
नहीं देखती
खून से सनी
सड़क पर,
लाल बत्तियों के
मुहानों पर
साँस लेने की
फुर्सत में
ऊंघता शहर
कहाँ जा रहा है
इतनी
हड़बड़ी से
संवेदना रहित
लक्ष्यों पर
हाँ!
नहीं रुकता
अब शहर
बुढ़ाते हाथों में
'बोहनी'
के दस रुपए
थमाने को
नहीं देखता
बीच सड़क पर पड़ी
लाशों को
लुटती अस्मिता को
खिंचती चैनों को
चींटियों के माफिक
सटीक
एक ही दिशा में
भागते अंधे पहिए
सच में
गूंगे बहरे इंसान
सिर्फ भागते हैं
तूल देते मुद्दों पर
आग की लपटों को
अंजाम देने के लिए
हाँ!
शेष संवेदनाओं पर मौन
पहियों पर
रेंगता शहर
उजालों के पीछे के
अंधेरे में
होता जा रहा है
कहीं गुम।
***

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।