गांधी दर्शन और आदर्श व्यक्तित्व-निर्माण

विनोद कुमार 

शोध-छात्र (पी-एच. डी.), शिक्षा विभाग, शिक्षा विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र। ईमेल: VINODPAL334@GMAIL.COM; चलभाष: +91 798 558 9494


सारांशिका:  
वर्तमान वैश्विक समाज का विहंगावलोकन किया जाये तो हर तरफ भ्रष्टाचार, झूठ, हिंसा, कालाबाजारी, बलात्कार जाति-धर्मवाद, माब-लिंचिंग और सांप्रदायिकता का बोलबाला नज़र आता है। इसका सबसे बड़ा कारण आत्म-नैतिक-बोध का अभाव है। चारों तरफ नैतिक-मूल्यों में गिरावट स्पष्टतः दिखलायी पड़ रहा है। व्यक्ति में नैतिकता का पतन होता जा रहा है। ऐसे में गांधी-दर्शन की महती आवश्यकता महसूस हो रही है। क्योंकि बिना गांधी दर्शन को स्वीकारे, नैतिक-मूल्यों का न तो सृजन होगा और न ही विकास। किसी भी व्यक्ति में जब तक नैतिक मूल्यों का विकास नहीं होगा, तब तक उसके आदर्श व्यक्तित्व निर्माण की कल्पना मात्र भी बेईमानी होगी। गांधी-दर्शन के माध्यम से हमें यह सिख मिलती है कि दूसरों को किसी भी प्रकार की शिक्षा देने से पहले हमें स्वयं उसका व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि जिस नैतिक आचार-विचार का पालन हम स्वयं नहीं कर सकते हैं, उसे दूसरों के व्यवहार में ढूँढने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। वास्तव में गांधी जी ज्ञान, कर्म और भक्ति में समवाय की बात करते हैं, जिसकी नैतिक-मूल्यों के विकास, एतदार्थ आदर्श व्यक्तित्व-निर्माण में महत्त्वपूर्ण उपयोगिता है। आज प्रत्येक समाज और राष्ट्र में आपसी प्रेम-सौहार्द बढ़ाने की ज़रूरत है। जिसे नागरिकों में नैतिक-मूल्यों, श्रेष्ठ-आचरण एवं आदर्श व्यक्तित्व-निर्माण द्वारा ही संभव बनाया जा सकता है। अतः यह लेख वर्तमान वैश्विक संदर्भ में प्रासंगिक अंतरराष्ट्रीय-सद्भाव, नैतिक-आचरण, उच्च कर्तव्यनिष्ठा, सत्य-अहिंसा, परोपकार इत्यादि से पुष्टित आदर्श व्यक्तित्व-निर्माण में गांधी दर्शन की उपयोगिता को उजागर करता है।   

बीज-शब्द:  गांधी-दर्शन, गांधी और आदर्श व्यक्तित्व-निर्माण तथा आदर्श व्यक्तित्व-निर्माण का साधन। 

परिचय:  
वर्तमान समाज में पिछले कुछ सालों से मॉब-लिंचिंग, उग्रता, धर्म-जातिवाद, विचारधाराओं से असहमति रखने वालों की हत्या, जाति-संप्रदाय के नाम पर हत्या, शासन-प्रशासन का दूषित मानसिकता से ग्रसित कार्यवाही रूपी अनैतिक एवं असंवैधानिक कुकृत्यों का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। लोगों को कुछ वर्ग-विशेष की विचारधारा की तरह ही सोचने और विचारने हेतु मजबूर किया जा रहा है। जिससे व्यक्ति की वैयक्तिक स्वतन्त्रता खतरे में है। व्यक्ति स्वयं अपने नैसर्गिक विचार-विमर्श को प्रस्तुत करने से डर रहा है। व्यक्ति स्वतंत्रतापूर्वक सोच-विचार करके अपनी अभिव्यक्ति भी नहीं कर पा रहा है। साथ ही हम सभी के मन में एक अजीब सा अनदेखा-डर घर करता जा रहा है। कहने के लिये तो हम स्वतंत्र हैं। देश लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकार और संविधान से चल रहा है। लेकिन आज भारत सहित वैश्विक समाज नफरत और हिंसा के एक ऐसे माहौल की ओर बढ़ रहा है, जिसमें इंसानियत और मनुष्यता के भाव दुर्लभ होते जा रहे हैं। आखिर सांप्रदायिकता और अराजकता का माहौल कैसे बनता जा रहा है, चूक कहाँ हो रही है, इसके पीछे कौन काम कर रहा है, क्या यह प्रायोजित है, यह सांप्रदायिकता-अराजकता हमें कहाँ ले जाएगी, इसका अंजाम क्या होगा इत्यादि सारगर्भित सवालों का भी विचार-विमर्श हमें अभी करना होगा। क्योंकि गांधी-दर्शन का मूलाधार यही है कि आज की समस्या का हल भी आज ही खोजा जाय; न कि भविष्य के लिये छोड़ दिया जाय। यदि हम भारत के विशेष संदर्भ में बात करें तो हमें ढिलापन दिखायी पड़ता है। हम भारतीय बहुत देर हो जाने के बाद ही चेतते हैं। जब तक समस्या हमें पूरी तरह से अपने आगोस में न ले ले। हमारी नींद ही नहीं खुलती है। शुरुआत में बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाने के बजाय हम उसे यूं ही मानकर छोड़ देने के आदि हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि हम सभी किसी भी अनैतिक आचरण-व्यवहार, जो समाज के खिलाफ हो, मनुष्यता के खिलाफ हो, आपसी प्रेम-सौहार्द को कम करता हो, का तत्काल विरोध करें। ताकि वह अंकुरित ही न हो सके, अपनी जड़ें ही न जमा सके। अब सवाल यह उठता है कि क्या आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण केवल वैचारिक धरातल पर होना चाहिए या व्यावहारिक धरातल पर भी?  निःसन्देह आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण व्यावहारिक धरातल पर ज्यादा जरूरी है। जिसके लिये हम सभी को, समाज के प्रत्येक नागरिक को, अपनी-अपनी जिम्मेदारी-जवाबदेही का पूर्ण निष्ठा के साथ नैतिक आचरण से पोषित आदर्श व्यक्तित्व -व्यवहार द्वारा निर्वहन करना होगा। विचारणीय है कि गांधी जी के विचारों-आदर्शों को अपने जीवन और कार्य-व्यवहार में उतारे बिना ना तो हम आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण ही कर सकते हैं और ना ही उसका निर्वहन। अतः वर्तमान सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में यह आवश्यक हो जाता है कि हम सभी गांधी जी के आदर्शों को अपने कार्य-व्यवहार और जीवन-आचरण में पूर्ण निष्ठा के साथ शामिल (प्रयुक्त) करें।  

गांधी-दर्शन:  एक अपरिहार्य आवश्यकता
गांधी जी का जीवन केवल जीवनमात्र नहीं बल्कि एक ऐसा दर्शन है, जो वैश्विक स्तर पर हर एक संकट, हर एक समस्या का एक प्रासंगिक, न्यायोचित एवं प्रजातांत्रिक हल प्रस्तुत करता है। ‘अज्ञानता एवं अंधविश्वास से मुक्त, विवेकशील और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मानवता को अपनाने वाले तथा अहिंसा परमो धर्म: की नींव डालने वाले महात्मा गाँधी का चिन्तन और दर्शन, शान्ति, बन्धुत्व, सहिष्णुता, विकास और एकता जैसे विचारों से अनुप्रमाणित था’1। वास्तव में गांधी जी ने अपने जीवन दर्शन के माध्यम से सत्य-अहिंसा का एक अनूठा मार्ग प्रसस्त किया है। जो मानवमात्र के लिये किसी वरदान से कम नहीं है। गांधी जी सत्य-अहिंसा को सबसे प्रबल एवं महत्त्वपूर्ण मानते हैं। गांधी जी अहिंसा के पुजारी थे। उनका बड़ा स्पष्ट मानना था की हिंसा किसी भी समस्या का पूर्ण एवं स्थायी समाधान कतई नहीं है। इसीलिए गांधी जी के जीवन में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। गांधी जी चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति सत्य-अहिंसा का पालन अपने जीवन में अवश्य करें। गांधी जी ने जीवन को अहिंसक बनाने के लिए एक सुझाव दिया है कि ‘जब कभी तुम्हारे मन में कोई शंका पैदा हो या तुम अपने से ही विचार करो तो यह कसौटी याद रखो: - जिस गरीब से गरीब और दुर्बल से दुर्बल मनुष्य को तुमने देखा है, उसका चेहरा याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम तुम उठाने जा रहे हो, वह उसके लिए किस प्रकार उपयोगी होगा’2 (तिवारी, 2009)। गांधी जी का यह सिद्धान्त हमें परोपकार के ऐसे मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है, जिस पर चल कर हम अपने व्यक्तित्व  में नैतिक-मूल्यों का विकास कर सकते हैं। साथ ही समाज में आदर्श व्यक्तित्व  के आधार पर एक मिसाल स्थापित कर सकते हैं, जो अन्य लोगों के लिए अनुकरणीय होगा। हमें यह समझना चाहिए कि ‘अहिंसा की संस्कृति का पुनर्निर्माण कोई बुद्ध या गांधी की भक्ति नहीं है। यह मानव अस्तित्व की रक्षा के लिए न्यूनतम अपरिहार्यता है’3 (सिंह, 2010)। अर्थात यदि हम वर्तमान समाज में व्याप्त मानव-विरोधी प्रवृत्तियों से समाज को छुटकारा दिलाना चाहते हैं तो गांधी के अहिंसा को अपने व्यवहार में शामिल करना ही एक मात्र रास्ता है। गांधी दर्शन के मूल में आपको सत्य, अहिंसा, सादगी अस्तेय, अपरिग्रह, श्रम और नैतिकता मिलेगी; जिससे स्थानीय स्वशासन, स्वावलम्बन, स्वदेशी-विकेन्द्रीकरण, ट्रस्टीशिप-परस्परावलम्बन, सह-अस्तित्व, शोषणमुक्त व्यवस्था और सहयोग, सहभाव एवं समानता पर आधारित सामाजिक ढांचे का अभ्युदय संभव है। इसके लिये गांधी के सत्याग्रह को समझने की जरूरत है। दरअसल गांधी जी के सत्याग्रह का व्यापक अर्थ है: - अन्याय, अत्याचार, उत्पीड़न, दमन करने वाली जनद्रोही, भ्रष्ट और शोषण व्यवस्थाओं से असहयोग तथा समाज में शुभ-चिंतन और कर्म करने वाले लोगों और संगठनों के बीच समन्वय एवं सहकार। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने ढंग से ईमानदारी के साथ सत्याग्रह का सम्यक प्रयोग करें। मूल बात यह है कि हम सत्य पर अडिग हों, साधन शुद्धि पर हमारा भरोसा हो और व्यापक लोकहित पर हमारा बराबर ध्यान लगा रहे। वास्तव में सत्याग्रह होना चाहिए: - समाज को बेहतर बनाने के लिए, निरंकुश राजसत्ता पर जनता के प्रभावी अंकुश के लिए, नया समाज गढ़ने के लिए, जड़ीभूत मूल्यों और ढांचे के ध्वंस के लिए और स्वयं अपने भीतर के कलुषों को भगाने के लिए। ‘आज गांधी हमारे बीच नहीं हैं किंतु एक प्रेरणा और प्रकाश के रूप में लगभग उन सभी मुद्दों पर उनके विचार और सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं, जिनका सामना किसी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र को करना पड़ता है। इस 21वीं सदी में गांधी की सार्थकता प्रत्येक क्षेत्र में है, इसीलिये इस अहिंसावादी सिद्धांत के महत्त्व को समझकर संयुक्त राष्ट्र 2 अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाता है’4। इसीलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि जब भी वैश्विक स्तर पर शांति और अहिंसा की बात की जाएगी तब गांधी प्रथमतः अवश्य याद आएंगे।

आदर्श व्यक्तित्व-निर्माण और गांधी
आज समाज में ऐसे नागरिकों की कमी सी होती जा रही है, जो समाज और राष्ट्रहित में बिना किसी अतिरिक्त लालसा के अपने कर्तव्यों का पालन करते हों। इसलिए समाज के पुनर्निर्माण हेतु, आदर्श व्यक्तित्व के निर्माण की संकल्पना में, गांधी सबसे सशक्त विकल्प के रूप में नज़र आते हैं। क्योंकि बिना गांधी जी को अपने व्यवहार में लाये न तो हम आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण ही कर सकते हैं और न ही अपने नागरिक-दायित्वों का निर्वहन ही कर सकते हैं। ‘बापू सत्य और अहिंसा के पुजारी थे। उनका विचार था, अहिंसा के बिना सत्य की खोज असंभव है। अहिंसा साधन है और सत्य साध्य’5। आदर्श व्यक्तित्व के निर्माण हेतु सत्य और अहिंसा दो मुख्य आधार जान पड़ते हैं। क्योंकि बिना सत्या-अहिंसा के पालन के गांधी जी एक आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण कर पाना संभव नहीं मानते हैं। अतः हमें ‘उन्नत चरित्र के व्यक्तियों के हाथों में सामाजिक संगठनों को सौंपने के प्रयास करते रहना चाहिए’6 (गर्ग, 2009)। ताकि उनके अनुकरण से समाज स्वतः आदर्श की ओर गतिमान हो सके। गांधी जी ने सत्य-अहिंसा सहित कुल एकादश व्रतों: - सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, अस्तेय, अपरिग्रह, अभय, अस्पृश्यता-निवारण, शारीरिक-श्रम, सर्वधर्म समभाव तथा स्वदेशी को एक आदर्श व्यक्तित्व  के निर्माण के लिए आवश्यक माना है। दरअसल नैतिक उत्थान तथा समाज को सही दिशा में ले जाने के लिए इन 11 व्रतों का यथोचित ज्ञान तथा अपने आचरण-व्यवहार में प्रत्येक आदर्श नागरिक को यथासंभव प्रयोग करना चाहिए। ताकि समाज में फैले हुये चोरी, हत्या, भय, हिंसा, आतंकवाद, रिश्वतखोरी, जमाखोरी, बेरोजगारी, वर्ग-संघर्ष, गरीबी, शोषण, कामचोरी, पद-लोलुपता, धार्मिक एवं जातिगत-विद्रोह, मॉब-लिंचिंग और असहिष्णुता इत्यादि को समाज से दूर करने में अपना सहयोग दे सकें और नैतिक मूल्यों के ह्रास को बचाया जा सके। इसके लिये जरूरी है कि हम सभी स्वयं गांधी के आदर्शों को स्वीकारें, साथ ही अपने पाल्यों (बच्चों) में शुरुआत से ही नैतिक-मूल्यों का विकास करें। जिससे हमारे आदर्श व्यक्तित्व का अनुसरण मात्र से ही आगे आने वाली पीढ़ी स्वतः ही सुधरती चली जायेगी। 


आदर्श व्यक्तित्व-निर्माण का साधन: गांधी का शिक्षा दर्शन 
शिक्षा, आदर्श व्यक्तित्व-निर्माण का मूल-आधार है। शिक्षा के माध्यम से ही हम अपने पाल्यों (अगली पीढ़ी) के सद-चरित्र का निर्माण कर सकते हैं। सद-चरित्र से ही नैतिकता का सृजन एवं विकास संभव है। वास्तव में शिक्षा का प्रथम उद्देश्य चरित्र का निर्माण-विकास करना होना चाहिए। लेकिन बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था केवल संज्ञानात्मक विकास का पर्याय बन चुकी है। इसी बात को डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने स्वीकारते हुये कहा है कि ‘भारत सहित सभी देशों के दुख और संत्रास का कारण यह है कि शिक्षा केवल मस्तिष्क के विकास तक ही सीमित होकर रह गयी है और उसमें नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का अभाव है’7। पंडित जवाहरलाल नेहरु जी ने भी माना है कि ‘शिक्षा का संपूर्ण प्रयोजन मूलतः चरित्र निर्माण है’8। ऐसी ही एक शिक्षा-व्यवस्था को गांधी जी अपने वर्धा शिक्षा-योजना के रूप में 1937 में प्रस्तुत करते हैं। जिसका मूल ध्येय विद्यार्थियों को नैतिक एवं चारित्रिक आचरण से सबल बनाना है। वास्तव में गांधी जी नैतिक-चारित्रिक विकास को शिक्षा का एक मुख्य उद्देश्य स्वीकारते हैं और उसी के अनुरूप पूरी शिक्षा व्यवस्था को आयोजित करना चाहते हैं। गांधी जी का मानना है कि विद्यालयों-शालाओं में हम ऐसे विद्यार्थियों को तैयार करें, जो अपने जीवन में उच्चतम नैतिक और चारित्रिक आचरण-व्यवहार करें; साथ ही सत्य और अहिंसा को नित्य प्रयोग में लाएँ भी। गांधी जी का मानना है कि ‘चरित्र के अभाव में शिक्षा कुछ भी नहीं है और प्राथमिक शुद्धता के अभाव में चरित्र भी कुछ नहीं है’9। गांधी जी ने तीन आर (रीडिंग, राइटिंग एंड एरिथमेटिक) के स्थान पर तीन एच (हैंड, हैड एवं हर्ट) की अवधारणा को प्रस्तुत किया है। गांधी जी का मानना है कि शिक्षा का कार्य मनुष्य को केवल पढ़ना-लिखना और गणित सिखाना ही नहीं है अपितु उसके हाथ, मस्तिष्क और हृदय का समुचित और सर्वोत्तम विकास भी उतना ही या यूं कहें कि उससे ज्यादा जरूरी है। गांधी जी ने स्पष्टतः कहा है कि ‘शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक और मनुष्य के शरीर मन और आत्मा के उच्चतम विकास से है’10। गांधी जी ने मनुष्य के जीवन में चरित्र-बल को सबसे ज्यादा महत्व दिया है। उनका मानना है कि चरित्र बल को शिक्षा के द्वारा ही विकसित किया जा सकता है। ‘एक उत्तम चरित्र में गांधी जी सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, अस्तेय, अपरिग्रह और निर्भयता जैसे गुणों का होना आवश्यक मानते हैं और कहते हैं कि विद्यालय चरित्र निर्माण के लिये उद्योगशाला है’11। गांधी जी आदर्श व्यक्तित्व के निर्माण हेतु विद्यालय को एक उद्योगशाला-प्रयोगशाला के रूप में प्रतिस्थापित करना चाहते हैं। उनका बड़ा स्पष्ट मानना है कि विद्यालय केवल भविष्य का निर्माण ही नहीं करता है बल्कि वह आज के समाज के लिये आवश्यक मूल्यों का सृजन भी करता है। जिससे समाज में आदर्श व्यक्तित्व  का निर्माण संभव हो पाता है। ‘गांधी जी कहते हैं कि यदि हम व्यक्ति का चरित्र निर्माण करने में सफल हो जाते हैं तो समाज स्वयं ही सुधर जाएगा’12। गांधी जी ने अपने वर्धा शिक्षा योजना में सबसे महत्वपूर्ण शिल्प और हस्त-कौशल को माना है। वास्तव में गांधी जी मातृभाषा के माध्यम से हस्त और शिल्प कौशलों की शिक्षा विद्यार्थियों को प्रदान करना चाहते हैं। जिसका सीधा अभिप्राय यह निकलता है कि गांधी जी चाहते हैं कि मातृभाषा के माध्यम से हम अपने पाल्यों को मुख्यतः शिल्प और हस्त कौशल की शिक्षा प्रदान करें; ताकि विद्यालय से निकलने के बाद अपनी जीवन-यात्रा में, अपने परिवार के पालन-पोषण में उन्हें किसी भी तरह की आर्थिक-समस्या न झेलनी पड़े। इसलिए गांधी जी का शिक्षा के केंद्र-बिंदु के रूप में हस्त-शिल्प को रखना मुझे प्रासंगिक लगता है। गांधी जी ने अनुकरण विधि को सबसे उपयुक्त माना है। मेरे खयाल से यह ठीक जान पड़ता है। क्योंकि यदि अध्यापक नैतिक आचरण और सद-चारित्रिक ढंग से व्यवहार करते हैं तो निश्चित तौर से उसका असर बालकों पर स्वतः ही पड़ता है। इसीलिये अध्यापक-वर्ग को अधिक सचेत रहने की आवश्यकता है। इसीलिये गांधी जी ने लिखा है कि ‘हर एक बालक को बहुत सी पुस्तकें दिलाने की मैंने जरूरत नहीं देखी। मेरा ख्याल है कि शिक्षक ही विद्यार्थियों की पाठ्यपुस्तक है’13। अतः यह कहना तर्कसंगत जान पड़ता है कि विद्यार्थियों के नैतिक और चारित्रिक विकास हेतु किसी पुस्तक और कार्यक्रम से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण शिक्षकों का नैतिक और उच्च चारित्रिक मूल्ययुक्त आदर्श व्यवहार है। जिसके आधार पर ही विद्यार्थियों का आदर्श व्यक्तित्व -निर्माण संभव है। क्योंकि हम सभी यह एक मत से स्वीकार करते हैं कि बच्चे अपने माता-पिता तथा विद्यार्थी अपने अध्यापक का अनुकरण करके सबसे ज्यादा सीखते हैं। इसीलिए यह आवश्यक हो जाता है कि जिन नैतिक और चारित्रिक मूल्यों को हम अपने पाल्यों के व्यक्तित्व  निर्माण हेतु आवश्यक समझते हैं, उन मूल्यों से युक्त आदर्श व्यवहार ही हमें अपने दैनिक जीवन में करना चाहिए। जिससे बच्चे हमारे कार्य-व्यवहार को अनुकरण के माध्यम से सीखकर समाज के लिए एक उपयोगी सदस्य बनकर अपने आदर्श व्यक्तित्व से एक मिसाल प्रस्तुत कर सकें। जिसकी वर्तमान समय में सबसे अधिक जरूरत है।  

निष्कर्ष:  
उपरोक्त समस्त विश्लेषण से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि यदि हम सभी गांधी-दर्शन को अपने दैनिक जीवन में, कार्य-व्यवहार में प्रयुक्त करें तो हम समाज और राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान देते हुये आदर्श व्यक्ति का फर्ज अदा कर सकते हैं। आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण मैत्री भाव और विश्व-बंधुत्व के द्वारा ही संभव है। वास्तव में वर्तमान वैश्विक जगत के लिये आदर्श व्यक्तित्व निर्माण में गांधी-दर्शन बहुत ही उपयोगी है। गांधी दर्शन आज एक जीवन पद्धति बन गया है, एक जीने का सलीका बन गया है। यह एक ऐसा दर्शन है, जो हम सभी को जीवन की समरसता के नए आयाम दिखाता-सिखाता है। गांधी द्वारा प्रतिपादित वर्धा शिक्षा-योजना को क्रियान्वित करके आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण रूपी मार्ग प्रसस्त किया जा सकता है। गांधी जी पूरी दुनिया में शांति, प्रेम, अहिंसा, सत्य, ईमानदारी, मौलिक-शुद्धता और करुणा-दया, परोपकार जैसे प्रयुक्त सिद्धांतों द्वारा आदर्श व्यक्तित्व निर्माण के पुरोधा के रूप में हमेशा याद किए जाते रहेंगे। 

संदर्भ:
1. अंशु गुप्ता, गांधी दर्शन मानव अधिकारों की आधारपीठिका, पुनः प्राप्त किया, 10 सितम्बर, 2019 from:  http://hi.vikaspedia.in/social-welfare 
2. तिवारी, वि. प्र. (2009), कर्म योगी महात्मा:  महात्मा गांधी सहस्राब्दी का महानायक, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ: 16 
3. सिंह, रामजी (2010), गांधी और भावी विश्व व्यवस्था, कामनवेल्थ पब्लिशर्स, नई दिल्ली, पृष्ठ:  6 
4. https://www.drishtiias.com/hindi/loksabha-rajyasabha-discussions/mahatma-gandhi      
5. दीक्षित, एम. (2012), गांधी दर्शन, पुनः प्राप्त किया, 30 अगस्त, 2019 from:  https://www.jagran.com/editorial/apnibaat-9716392.html 
6. गर्ग, डी. एल. (2009), युगवतार- महात्मा गांधी, अपोलो प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ:  91 
7. मालवीय, राजीव (2012). शिक्षा के मूल सिद्धांत, शारदा पुस्तक भवन, प्रयागराज. पृष्ठ:  318  
8. मालवीय, राजीव (2012). शिक्षा के मूल सिद्धांत, शारदा पुस्तक भवन, प्रयागराज. पृष्ठ:  317  
9. मालवीय, राजीव (2012). शिक्षा के मूल सिद्धांत, शारदा पुस्तक भवन, प्रयागराज. पृष्ठ:  318
10. लाल, आर. बी. (2011). शिक्षा के दार्शनिक एवं समाजशास्त्रीय सिद्धांत, रस्तोगी पब्लिकेशन, मेरठ. पृष्ठ:  321
11. लाल, आर. बी. (2011). शिक्षा के दार्शनिक एवं समाजशास्त्रीय सिद्धांत, रस्तोगी पब्लिकेशन, मेरठ. पृष्ठ:  322 
12. श्रीवास्तव, आर. पी. (2012). भारत के महान शिक्षाशास्त्री, प्रकाशन विभाग:  सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली. पृष्ठ:  40  
13. गांधी, एम. के., सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा (हिन्दी अनुवाद), नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद 

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