कोरोना काल और मैं


विनीता तिवारी
     30 मार्च 2020 को वर्जीनिया गवर्नर रॉल्फ नोर्थम ने कोविड १९ से बचाव हेतु जब  ‘स्टे एट होम’ के आदेश लागू किए तो जैसे एक पैनिक सा चारों तरफ़ फैल गया। अचानक से जनता में अफ़रातफ़री मच गई। जहाँ देखो, जिधर देखो लोग प्रतिदिन की आवश्यक चीजों को इकट्ठा करने में लग गए। देखते ही देखते ग्रोसरी स्टोर्स के शैल्व्स ख़ाली होने लगे। उधर जितना ज़्यादा सरकार मास्क लगाने और हैंड सैनेटाइज़र इस्तेमाल करने पर ज़ोर देने लगी इधर उतनी ही इन सब चीजों को ढूँढने में परेशानी होने लगी। लोगों ने जो जहाँ मिला उसे बहुतायत में ख़रीद कर भविष्य के लिए जमा करना शुरू कर दिया हाल ये हो गया कि अमेरिका जैसे देश में जहाँ पहले आप, पहले आप के शिष्टाचार का पालन हुआ करता था वहीं अब टॉयलेट पेपर और एंटिबैक्टिरियल वाइप्स के लिए कहीं कहीं लोग आपस में लड़ते झगड़ते हुए भी नज़र आने लगे। नतीजतन बहुत सी दुकानों को कई चीजों के लिए प्रति व्यक्ति संख्या निर्धारित करनी पड़ी। मतलब कि एक व्यक्ति एक बार में सिर्फ़ एक पेपर रोल का पैकेट या एक वाइप्स का बाक्स ही ख़रीद सकता था, जिससे सभी ग्राहकों की मौजूदा ज़रूरतें पूरी हो सके और लोग व्यर्थ में अपने घरों के गोदाम इन चीजों से ना भरें। हालाँकि यह स्थिति ज़्यादा दिनों तक नहीं रही मगर पूरी तरह से पूर्ववत भी नहीं हो पाई। अब सामान तो फिर से शेल्व्स पर नज़र आने लगा मगर दूसरे कई प्रतिबंधों ने ज़ोर पकड़ लिया। बहुत से ग्रोसरी स्टोर्स में मास्क लगाकर जाना ज़रूरी कर दिया गया तो कुछ दूसरी दुकानों में ग्राहकों की संख्या पर नियंत्रण शुरू हुआ। यानि एक समय में एक निश्चित संख्या से अधिक ग्राहकों के दुकानों में प्रवेश पर नियंत्रण लगने लगा। जब तक अंदर वाले बाहर न आ जाए बाहर वाले अंदर नहीं जा सकते थे। सड़कें, खेल के मैदान, पार्किंग लॉट्स सब ख़ाली ख़ाली नज़र आने लगे। बहुत से लोगों ने खाने पीने का सामान भी ऑनलाइन ही आर्डर करना शुरू कर दिया, कि आने जाने, मास्क लगाने और एक दूसरे से दूरी नापते रहने का झगड़ा ही ख़त्म। एक और जो नई व्यवस्था शुरू हुई वो थी ‘कर्बसाइड पिकअप’, मतलब आप सामान ऑनलाइन ख़रीदो और फिर गाड़ी ड्राइव करके स्टोर के बाहर चले जाओ तो स्टोर वाले आपका सामान आपकी गाड़ी में बाहर ही लाकर रख देंगे जिससे आपके अंदर जाने, ज़्यादा लोगों के सम्पर्क में आने एवं संक्रमित होने की संभावना ही नहीं रहेगी।

        खाने पीने की दुकानों को छोड़कर बाक़ी सभी दुकानें, कार्यालय, विद्यालय आदि बंद कर दिए गये थे। घर से काम करो, घर में बनाओ, घर में खाओ, और घर में ही रहो। क्या!! “घर में ही पकाओ! घर में ही रहो!” नहीं नहीं, मुझे लगता है मैंने कुछ ग़लत सुन लिया है। मगर नहीं जी, ये मेरे कान नही बज रहे थे। वाक़ई में सब को घर में ही पकाना, खाना, रहना था। जो भी हो शुरू शुरू के कुछ दिन तो बड़ा अटपटा सा लगा और क्यों न लगे घर के काम जो इतने बढ़ गये थे और मनोरंजन के नाम पर सब बंद हो रखा था। सारा दिन सबका घर में रहना मतलब पूरे दिन की रसोई, बर्तन, साफ़-सफ़ाई, और टी वी रिमोट को लेकर झगड़ा। कामवाली जो आकर पूरा घर एक साथ साफ़ कर जाती थी उसने भी आना बंद कर दिया। इतने वर्षों तक जो पाँच बेडरूम, चार बाथरूम वाला तीन मंज़िला घर छोटा लगा करता था वो सफ़ाई करने का नाम सुनते ही भीमकाय लगने लगा। शुक्र है कि जल्दी ही घर के सभी सदस्यों को ये समझ में आ गया कि ये सारा बढ़ा हुआ काम किसी एक इंसान के बस की बात नहीं है और सभी ने अपने अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी सम्भाल ली। चलो, जैसे तैसे काम चल निकला। धीरे-धीरे अन्य घरेलू कार्यों में भी पति-बच्चों की मदद मिलने लगी। दोस्तों और रिश्तेदारों से लॉकडाउन के चलते जो दूरियाँ बढ़ गईं थीं उसे ख़त्म करने के लिए टेक्नोलॉजी की मदद ली जाने लगी। बच्चे और नई पीढ़ी के लोग तो हमेशा से ही तकनीकी के इस्तेमाल में माहिर थे मगर इस लॉकडाउन ने बडे बूढ़ों और टेक्नोलॉजी से कोसों दूर भागने वालो को भी इसे इस्तेमाल करना सिखा दिया। कहते हैं न कि जिस चीज़ से डर के भागो वो उतना ही आपके क़रीब आने को लालायित रहती है। चलो जी, कोई नहीं! इस सीखने सीखाने से अब घर बैठे ही सबसे गपशप और विचारों का आदान-प्रदान होने लगा।
       
            कुछ समय पश्चात बहुत सी प्रतियोगिताएँ, कवि-गोष्ठीयाँ, संगीत समारोह भी ऑनलाइन आयोजित होने लगे। इस सबके चलते अब हर वक़्त का घर में रहना कुछ कम अखरने लगा। दोपहर में जो थोड़ा बहुत ख़ाली समय मिलता उसमें अपने पुराने शौक़ों पर हाथ आज़माना शुरू किया। कभी किसी दिन कुछ पेंट कर लिया तो कभी किसी दिन हारमोनियम को झाड़ फूंक कर बजाने की कोशिश कर ली। फिर किसी दोपहर कोई मनचाही किताब उठा ली तो किसी दोपहर बस यूँ ही सुस्ता लिया। अब ना कहीं पहुँचने की जल्दबाज़ी थी ना किसी के आगमन की तैयारी की चिंता। समय जैसे कुछ धीमे चलने लगा था और इस धीमी लय में ठुमकते हुए इस समय में ज़िंदगी की ज़रूरतें भी कुछ कम लगने लगी थीं। प्रकृति मे विचरना, उसके सौन्दर्य को निहारना और उसमे जीवन मूल्यों की सच्चाई को परखना एक अलग दृष्टिकोण को जन्म दे रहा था। फ़ालतू की विंडो शॉपिंग और बेवजह की पार्टियों का इस कोरोनावायरस की वजह से ना हो पाना अब सुकून भरा महसूस हो रहा था। कहते हैं कि थोड़ी बहुत बोरियत भी ज़िंदगी में अच्छी रहती है और रचनात्मकता को जन्म देने में सहायक हो सकती है। ऐसे ही ख़ाली समय भी कभी-कभी हमें अपने आप से जुड पाने में मददगार हो जाता है। कोरोना काल के इस लॉकडाउन की अवधि में अपने आप से ये जुड़ाव, रचनात्मकता और बच्चों के साथ समय बिताना मुझे अच्छा लगने के साथ साथ अब एक अलग सी संतुष्टि एवं जीवन दृष्टि प्रदान कर रहा था।


          दिल की पतंग 


क्यूँ आज घना बदली का रंग
क्यूँ  ढूँढ रहा मन उनका संग

लेकर उमंग लेकर तरंग
उड़ने चली दिल की पतंग

आकाश समुंदर सा गहरा
है प्यार मेरा सेहरा सेहरा
कैसे शब्दों में लिख दूँ मैं
अपने जज़्बातों का चेहरा

तेरे तन की ख़ुश्बू से दंग
निखरा मेरा हर अंग अंग

कहना जो चाहूँ कह दूँ क्या?
ख़्वाबों से दुनिया लह दूँ क्या?
सोलह शृंगार मेरे तन का
उनकी बाँहों में ढह दूँ क्या?

दिल की चाहत से पूछ रहा
मस्तिष्क मेरा होकर दबंग

आज़ाद परिंदे उड़ने दो
धड़कन से धड़कन जुड़ने दो
साँसों को साँस सुनाई दे
इतनी ख़ामोशी बढ़ने दो

है रात भरी अरमानों से
कट जाए ना बेबस अपंग

लेकर उमंग लेकर तरंग
उड़ने चली दिल की पतंग

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