सहज, सरल तरीके से ज्ञान का भण्डार प्रदान करती पुस्तक: लजीज पुलाव

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 941 272 7361; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

पुस्तक: लजीज पुलाव (बाल कहानी संग्रह) 
लेखक: राकेश चक्र
पृष्ठ: 74
मूल्य: ₹ 110.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: सितम्बर 2020
प्रकाशक: प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार
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पुराने समय में दादा-दादी या नाना-नानी सोने से पूर्व अपने नौनिहालों को चरित्र निर्माण करने वाली कहानियाँ सुनाया करते थे किन्तु आज के व्यस्ततम जीवन में उस कमी की पूर्ति कई बाल पत्रिकाएँ एवं कहानी-संग्रह कर रहे हैं। डॉ. राकेश चक्र का बाल कहानी-संग्रह ‘लजीज पुलाव’ भी उसी कड़ी का एक हिस्सा है। 

बाल साहित्य लेखन के लिए ही नहीं बल्कि हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में साढ़े तीन सौ से अधिक पुस्तकें देने वाले डॉ. राकेश चक्र का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। अनेक सरकारी और साहित्यिक संस्थाओं से पुरस्कृत डॉ. राकेश चक्र का संग्रह -‘लजीज पुलाव’ इनका ऐसा बाल कहानी संग्रह है जो नाम से तो किसी पाक-कला से सम्बन्धित पुस्तक सा लगता है किन्तु इसकी पहली कहानी पढ़ते ही सब कुछ स्पष्ट हो जाता है कि यह पाक कला की नहीं, कहानियों की पुस्तक है जिसमें उत्कृष्ट सोलह बाल-कहानियाँ समाहित की गई हैं। संग्रह की सभी कहानियाँ गाँव की चाौपाल पर बैठकर सुनाई जाने वाली सहज एवं सरल भाषा में लिखी गई कहानियाँ हैं जो बच्चों को पसन्द आयेंगी। 

संग्रह का यह दूसरा संस्करण है। प्रथम संस्करण का प्रकाशन एक वर्ष पहले यानि सन् 2018 में हुआ था। पुस्तक की गुणवत्ता इस बात से स्वयं सिद्ध है कि एक वर्ष बाद ही पुस्तक का दूसरा संस्करण प्रकाशित करने की आवश्यकता पड़ी।

डॉ. राकेश चक्र
 संग्रह की पहली कहानी ‘लजीज पुलाव’ में विद्वान लेखक डॉ. राकेश चक्र ने भारत और पाकिस्तान की सीमा चैकियों पर तैनात सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों के बीच आपसी प्रेम-सौहार्द का वर्णन करके लेखकीय दायित्व का निर्वहन करते हुए मानवता का पाठ पढ़ाने का प्रयास किया है। काश! सचमुच में ऐसा सम्भव होता-

‘सभी भावविभोर हो गये। सोचने लगे-काश! यदि ऐसा ही भाईचारा संपूर्ण धरा पर हो जाता तो हम सभी चैन की नींद सोते। सभी को पेट भरने को अन्न, तन ढकने को वस्त्र और रात गुजारने को छत मिल जाती। जगह-जगह नफरत की ज्वालाएँ काले नाग सा फन फैलाए खड़ी न होतीं और न ही भूख-प्यास से मौतें देखने-सुनने को मिलतीं। निर्दोषों के लहू से कभी धरती न रंगती और न ही अरबों-खरबों मूल्य के हथियार बनाने की आवश्यकता पड़ती।’ (पृष्ठ 6)

संग्रह की दूसरी कहानी का शीर्षक है ‘कुटवारिन दादी’। कहानी के पात्र केदारीलाल का हृदय परिवर्तन करके, ऊँच-नीच और जाति-पांति के भेदभाव को दूर करने के अपने उद्देश्य में यह कहानी सफल रही है-
‘लला एक बात कहूँ हम नीच जाति सबकी सेवा करती हैं और हमको ही कोई इज्जत नहीं देता। ये कहाँ का न्याय है? हमारे घर का पानी नहीं पीयेंगे और न भोजन करेंगे और वैसे दुनियाभर के गंदे-संदे होटलों में भी खा लेंगे, जिसमें सातों जात खाती हैं। तब सबका ईमान नहीं डिगता।’ (पृष्ठ 10)

कहानी ‘सच्ची लगन’ और ‘तिरपन’ दोनों ही स्वाध्याय और लगनशीलता का पाठ सहज ही सिखाने में पूर्ण सक्षम कहानियाँ हैं। तो ‘सब्जी वाले बुन्दा भाई’ कहानी, निरीह प्राणियों की रक्षा का, शाकाहार की महत्ता का और खुद खुश रहते हुए दूसरों को खुशी प्रदान करने की और अपने स्वास्थ्य को बरकरार रखने की कला का सहज ही पाठ पढ़ा देती है।

‘देखो भाई, जब तक शरीर चले, उसे चलाना चाहिए। जैसे लोहे से बनी चीजों में एक जगह रखने से जंग लग जाबैं है, वैसे ही शरीर कू जंक लग जावैगी। हँसते-खेलते अपना काम करने सै शरीर अच्छौ रैबै है।’ (पृष्ठ 23)
‘आजादी के दीवाने’ कहानी में डॉ.राकेश चक्र जी ने महाराष्ट्रª के ग्राम नुदुवार के शिरीष और शशिधर की अपने देश के लिए दिए गये बलिदान को कहानी के रूप में पिरोया है। जिसमें पाठक की संवेदना को जगाने में लेखक ने पूर्ण सफलता पाई है।

“एक सिपाही ने निशाना साधकर सबसे आगे चल रहे शिरीष पर गोली चला दी। गोली शिरीष के पेट में लगी। खून का फब्बारा फूट पड़ा। शिरीष ‘भारत माँँकी जय’ बोलता हुआ धरती माँ की गोद में गिर पड़ा। तिरंगा जब तक जमीन पर गिरता उसको शशिधर केतकर ने थाम लिया।” (पृष्ठ 31)

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दिनेश पाठक ‘शशि’
 कुसंगति के कारण बहुत से बच्चे दिग्भ्रमत होकर गलत साधनों से परीक्षा पास करना चाहते हैं। ऐसे ही बच्चों को केन्द्रित कर लिखी गई कहानी ‘क्षमाशीलता’ का अब्बलसिंह भी चाकू मेज पर रखकर नकल करने का प्रयास करने लगा तो विद्यालय के कर्मठ और ईमानदार शिक्षक जोशी जी ने उसे तीन वर्ष के लिए विद्यालय से निकाल दिया। अब्बलसिंह के मेजर पिता को वस्तुस्थिति पता चली तो उन्होंने जोशी जी से क्षमा याचना करते हुए अपने पुत्र के जीवन को नष्ट होने से बचाने की प्रार्थना की। माध्यमिक शिक्षा परिषद से जांच करने आये निरीक्षक को वास्तविकता से अवगत कराते हुए जोशी जी ने अब्बलसिंह को माफ करने के बदले स्वयं को कोई दण्ड दिए जाने की सलाह दी।

जोशी जी ने निरीक्षक से कहा- यह किया तो मैंने ही है, और सही किया था, लेकिन अब इस लड़के के भविष्य का सवाल है। जो भी मेरे बयान लिखने हों, जैसे भी लिखने हों, अब इस लड़के को बचाना है, चाहे मेरी चरित्र पंजिका में मेरे खिलाफ कुछ भी लिख दीजिए, मेरा प्रमोशन न हो, मुझे मंजूर है।” (पृष्ठ 37)

अंततः जोशी जी की क्षमाशीलता ने अब्बलसिंह के जीवन को ही बदल दिया। सकारात्मक सोच की इस कहानी को डॉ.राकेश चक्र जी ने बड़े ही मनोयोग से बुना है। 

संग्रह की अन्य कहानियों के नाम हैं-‘दो भाई’, कर्मयोगी’, ‘पके केले का छिलका’, ‘कूड़ा बीनने वाला’, ‘अपना भारत’, ‘चिलम और सुराही’, ‘अब नहीं करेंगे शिकार’, ‘छुट्टन और तोते’, ‘खुदा के घर देर है अंधेर नहीं’ आदि। 

कर्मयोग का सहज ही पाठ पढ़ाने वाली कहानियाँ-‘कर्मयोगी’ और ‘अपना भारत’ हैं तो निरीह जीवों पर दया करने की शिक्षा देती कहानियाँ ‘अब नहीं करेंगे शिकार’, ‘छुट्टन और तोते’ तथा ‘खुदा के घर देर है अंधेर नहीं’ भी अच्छी कहानियाँ हैं जो बच्चों के कोमल हृदय पर अपना प्रभाव छोड़ने वाली सफल कहानियाँ हैं। नषा आदि के दुष्परिणामों से अवगत कराते हुए जीवन का सही मार्ग दिखाती कहानी ‘चिलम और सुराही’ शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को ग्राम्य जीवन की भी झांकी प्रस्तुत करती है।

 कुल मिलाकर संग्रह की सभी कहानियाँ सरल बोल-चाल की भाषा और शैली में लिखी गई शिक्षाप्रद, उत्कृष्ट कहानियाँ हैं। पुस्तक का गेटअप बहुत ही लुभावना एवं प्रयुक्त कागज उच्च स्तरीय है। 

2 comments :

  1. वाह!अच्छी समीक्षा हेतु पुस्तक के लेखक आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी एवं प्रखर समीक्षक श्रद्धेय डॉ दिनेश पाठक 'शशि' जी को सादर बधाई।
    आचार्य नीरज शास्त्री

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    1. शानदार समीक्षा के लिए लिए हार्दिक आभार आदरणीय डॉ दिनेश पाठक जी

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