स्त्री के अस्तित्व को प्रमाणित करता उपन्यास 'अस्मि'

समीक्षक: आचार्य नीरज शास्त्री

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पुस्तक: अस्मि (उपन्यास)
रचनाकार: श्रीमती कमल कपूर
पृष्ठ: 340, मूल्य: ₹ 700.00 रुपये, प्रकाशन वर्ष: 2021
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'अस्मि' हिंदी की वरिष्ठ लेखिका श्रीमती कमल कपूर द्वारा रचित एवं सद्य प्रकाशित उपन्यास है। इस उपन्यास को अयन प्रकाशन -नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है। लेखिका ने इस उपन्यास को अपनी गुरु एवं हिंदी की लब्ध प्रतिष्ठित लेखिका यश सिद्धा चित्रा मुद्गल जी को समर्पित किया है।
           श्रीमती चित्रा मुद्गल जी ने इस उपन्यास को तार्किकता की कसौटी पर खरा बताते हुए रचनात्मक सर्जना के चिंतन बिंदुओं से युक्त भी कहा है। उपन्यास समालोचना के समीक्ष्य के बिंदुओं के आधार पर आइए! इस कृति की चर्चा करें-
             प्रस्तुत उपन्यास का शीर्षक स्त्री के होने और उसके अस्तित्व को प्रमाणित करने वाला शीर्षक है। स्त्री कोई बेजान खिलौना नहीं, वह भी सजीव सचेतन मनुष्य समाज का आधा हिस्सा है; यह सिद्ध करता है, इस उपन्यास का शीर्षक- 'अस्मि'। अर्थात इस उपन्यास का शीर्षक पूर्णरूपेण अनुकूल एवं औचित्य पूर्ण है।

             इस उपन्यास का कथानक शिप्रा के जीवन की कहानी है शिप्रा एक ऐसी स्त्री है जो आधुनिक समय की पढ़ी-लिखी स्त्री होने के साथ-साथ लेखिका भी है, और बड़े-बड़े लेखक- लेखिका सम्मेलनों में जाती है। उसका बचपन विमाता के कहर में बीता है। पिता ने स्वयं उसके शोषण को मौन देखा था। अंततः उसने आलोक सरीन नाम के व्यक्ति के साथ विवाह कर लिया। आरंभ में तो आलोक उससे बेइंतहा मोहब्बत करता है किंतु बाद में एक अन्य महिला के जाल में फंसकर अत्यंत क्रूर हो जाता है और शिप्रा का जीना हराम कर देता है। अप्पू शिप्रा का बेटा है जो अपने पिता के साथ ही शिप्रा के हृदय पर भावनात्मक नश्तर चलाता है। इस पूरे उपन्यास में अलका, शालिनी, देविका तथा अन्य कई महिलाओं का स्नेह शिप्रा के प्रति रहा है।श्रेया शिप्रा की पुत्री है। शिप्रा श्रेया और अप्पू से बहुत प्यार करती है। शिप्रा के अमेरिका जाने पर पहले तो  श्रेया अपने पिता की बातों में आकर अपने पास आई अपनी माँ का अपमान करती है किंतु बाद में सत्य का बोध होने पर वह उनसे क्षमा याचना भी करती है। इतना ही नहीं देविका के पति आशु दा, अमेरिका की यात्रा में मिला संजय, पाकिस्तानी यात्री साजिद तथा इसी प्रकार के अन्य पात्र शिप्रा के लिए शीतल हवा के झोंके बनते हैं। श्रेया का पति नमन शिप्रा को अपनी माँ मानकर उसे अगाध प्रेम करता है किंतु पूरे उपन्यास में शिप्रा के साथ छाया की तरह रहती है- 'मधु ' जो उसके हर दुख -सुख में सहभागी है। मधु के पति मयंक शिप्रा को बहुत मानते हैं और हर तरह से उसका सहयोग करने को तत्पर रहते हैं।
         इस कहानी इस कहानी में आलोक सरीन और अप्पू प्रतिपल शिप्रा के लिए यातना के प्रबंध में लगे रहते हैं। 
         यहाँ तक कि आलोक उन सब को भी अपमानित करता है जो शिप्रा से किसी भी रूप में जुड़े हैं।
          इस कहानी के अंत में शिप्रा आलोक से सदा- सदा के लिए अलग होने के लिए अपना मकान शांतिकुंज छोड़ देती है तथा एक मध्यम वर्गीय कॉलोनी के दो कमरे के मकान में रहने लगती है। उपन्यास का कथानक यहीं समाप्त हो जाता है। कथानक की दृष्टि से उपन्यास अत्यंत मर्मस्पर्शी है।
        कहानी के पात्रों में शिप्रा कथा की नायिका  है। मधु उसकी सहयोगी है और देविका शिप्रा की घनिष्ठ मित्र है। श्रेया शिप्रा की पुत्री है तथा मेधा और मानसी मधु की पुत्रियां हैं जो शिप्रा को बड़ी मौसी कहती हैं। 
        आशु दा, नमन और मयंक इस उपन्यास के सकारात्मक पात्र हैं, और ऐसा ही एक और पात्र है, अनिकेत; जबकि आलोक और अप्पू नकारात्मक पात्र हैं।
लेखिका ने कथानक को उत्कृष्ट बनाने के लिए उचित पात्रों की कल्पना करते हुए उनके चरित्र को बुना है। इतना ही नहीं इस उपन्यास के पात्र और कथानक उपन्यास को यथार्थ जीवन से जोड़ देते हैं। इस प्रकार 'अस्मि' स्त्री पीड़ा को व्यक्त करने वाली सशक्त  औपन्यासिक कृति है।
          उपन्यास की भाषा सामान्य खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें अंग्रेजी, पंजाबी और उर्दू के शब्दों का भी प्रयोग प्रसंगानुकूल हुआ है। 
          उपन्यास की शैली चित्रात्मक, वर्णनात्मक, गंभीर एवं रोचक होने के कारण  यह उपन्यास 'अस्मि' पाठकों के लिए अधिक उपयोगी  तथा अपने उद्देश्य में सफल सिद्ध हो गया है।
          विदुषी लेखिका ने देश -काल-परिस्थिति एवं प्राकृतिक छटाओं का ऐसा लुभावना चित्रण किया है कि यह सभी जीवंत हो उठे हैं। मधु के माध्यम से शिप्रा के बैक यार्ड का चित्रण देखें-
          "जाली का दरवाजा खोलते ही जहाँ मेरी नजर अटकी थी, वह था 'स्वस्ति' अंकित चौरेनुमा एक बड़े से कलात्मक लाल गमले में लहराता 'राम तुलसी' का समृद्ध बिरवा पास ही एक अपेक्षाकृत छोटे गमले में 'श्याम तुलसी' खिलखिला रही थी और उसके चारों और मौसम की प्रकृति के मिजाज वाले रंगारंग फूलों के गमले शोभायमान थे। कच्ची माटी की सोंधी गीली महक ने मन विभोर  किया तो हरियाली क्यारियों ने ध्यान खींचा, जिनमें पालक, पोदीना, हरा धनिया, हरी मिर्च की खेती पाँव जमाए खड़ी थी। 2-2 फुट की दूरी पर खड़े फलों से लदे अनार, अमरूद,चीकू, कच्चे आम और शहतूत के पेड़ों पर पंछी सुरीले स्वरों में चहचहा रहे थे और आकर्षण के सर्वाधिक चमकते बिंदु थे- एक गोलाकार व्रत में संग संग खड़े एक दूसरे की हरी पत्तियों वाली शाखाओं को चूमते अबीरी सुर्ख फूलों से भरे पूरे 2 गुलमोहर के पेड़, जिनकी सुहानी छाया में काठियावाड़ी शैली का सजा हुआ झूला था।"1

आचार्य नीरज शास्त्री
          इसी उपन्यास में लेखिका ने यह भी दिखाया है कि किस तरह एक औरत अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए दूसरी औरतों का घर बर्बाद कर देती है। यथा-
          "अब कुछ महत्वाकांक्षी और स्वार्थी गंदी मछलियाँ आलोक की थाली में 'परोसा' बनकर गिर गई थीं। कब? कैसे? मैं जान ही नहीं पाई। उन्हीं में से एक थी जोधपुर की त्रैमासिक पत्रिका की संपादक शैलजा राणावत, जिसे उसकी चरित्रहीनता के कारण पति त्याग चुके थे और जो पत्रिका के फायदे के लिए कुछ भी कर सकती थी.... कुछ भी। किसी भी हद तक गिरने को तैयार रहती थी वह, पैसे के लिए और साथ ही पुरुष संसर्ग के लिए भी।"2
             केवल पुरुष ही स्त्री शोषण के लिए जिम्मेदार नहीं होते। कई बार स्त्रियों के द्वारा भी पुरुषों का शोषण भयावह रूप में किया जाता है। पूरा समाज इस कटु सत्य से परिचित है। इसीलिए आलोक सरीन शिप्रा की गुरु कात्यायनी जी से शिप्रा के विषय में झूठी बातें करके स्वयं को पत्नी शोषित और पीड़ित दिखाने की कोशिश करता है। यथा -
             "आलोक डंका पीटने की तर्ज पर पत्रिका लेकर मेरी गुरु कात्यायनी जी के पास चल दिए और मगरमच्छी  आंसू बहाते हुए खुद को पत्नी पीड़ित और शोषित दिखाने की कोशिश की।"3
               आलोक सरीन अपना दोहरा चरित्र दिखाता रहा। वह ताउम्र शिप्रा के सामने अपने रंग बदलता रहा। देखिए-
                "बीच-बीच में एक निश्चित या अनिश्चित अंतराल से आलोक सुधरता या सुधारने का नाटक करता रहा- "पिछला सब भूल जाओ शिप्रा! हम नये सिरे से नई जिंदगी शुरु करते हैं। मैं तुम्हें इतना प्यार करूंगा कि मेरी वो बातें याद भी ना आएंगे तुम्हें। "
                   और मैं हर बार, बार- बार विश्वास कर लेती उस पर और बेवकूफ बनती जाती। फिर एक नया दौर शुरू होता.... पहले से ज्यादा भयानक।" 4
                    जहाँ आलोक के रूप में एक क्रूर पुरुष निरंतर शिप्रा का शोषण कर रहा था, वहीं अन्य कई पुरुष शिप्रा से आत्मीयता रखते थे। शिप्रा के शब्दों में आशु दादा का व्यवहार देखिए- ''खुशमिजाज आशु दादा अपनी मीठी बातों से रिझाते और मसखरियों से पूरी शाम हंसाते रहें और मैं हंसने का ढोंग करती रही पर देवी मेरी उस बनावटी हँसी के पीछे के दर्द को समझ रही थी और हंस नहीं पा रही थी।" 5
            यहाँ तक कि पाकिस्तानी नागरिक 'साजिद' भी  शिप्रा का सम्मान करता है और शिप्रा से कहता है- "मैं पाकिस्तान से हूँ, पर अब यूएस सिटीजन हूँ। साजिद..... साजिद हाशमी नाम है मेरा, यहाँ लंदन में अपनी आपा बी के पास आया था। आप बिल्कुल मेरी अम्मी जैसी दिख रही हैं। इसलिए बात किए बिना नहीं रह पाया।"6
              साजिद ने हवाई सफर में 12 घंटे तक शिप्रा का साथ दिया।
               शिप्रा को अपने मुँहबोले अनिकेत से अथाह प्रेम है क्योंकि अनिकेत एक सुलझा हुआ आदर्श पुरुष है, जो शिप्रा को अपनी बड़ी बहन मानता है। उसे याद करते हुए शिप्रा कहती हैं - "आज रक्षाबंधन का पर्व है भारत में। हर पर्व पहले भारत में मनाया जाता है फिर अगले दिन यहाँ आता है। मन उद्विग्न है.... 35 साल से मेरी राखी अनाथ थी... अब उसे अनि की कलाई मिली है पर वह मेरी राखी से बहुत दूर है। भारत में होती तो निर्भय होकर उसे राखी भेजी देती पर अब......?"7
              अनिकेत भी शिप्रा को संदेश भेजता रहता है। देखें- " शरद पूर्णिमा के सुबह देसी तिथि के अनुसार आज अनिकेत का जन्मदिन है। पिछले बरस उसने खुद बताया था, सुबह-सुबह एस. एम. एस. द्वारा-" दी! आज आपके भाई अनि का जन्मदिन है। आशीर्वाद का आकांक्षी हूँ।"    और मैंने छोटे-छोटे कई संदेश भेज आशीर्वचनों की झड़ी लगा दी।" 8
               शिप्रा के दामाद और श्रेया के पति 'नमन' का व्यवहार भी एक आदर्श पुरुष का व्यवहार है। शिप्रा के शब्दों में ही देखें-
                "बेटा जानती हो! तुम ने अब तक की जिंदगी में सबसे अच्छा काम क्या किया है?"
"क्या मम्मा ?"उसके स्वर में उत्सुकता थी।
"नमन जैसे प्यारे व्यक्ति को तुमने अपने जीवनसाथी के रूप में चुना है। हम लाख कोशिश करके भी ऐसा योग्य वर नहीं खोज सकते थे, तुम्हारे लिए।"
                "जी मम्मा! एकदम ठीक कह रही हैं आप, ही इज अंडरस्टैंडिंग पर्सन।"
                  "सच में श्रेयू! धन्य है यह बच्चा। इन 6 महीनों में राई भर भी मिसबिहेव नहीं किया उसने मेरे साथ और उसके चेहरे पर कभी जौ बराबर भी उकताहट नजर नहीं आई मुझे। अगले जन्म में अपनी कोख जाये बेटे के रूप में इसे पाना चाहूँगी मैं।"
                  इसी प्रकार मधु के पति मयंक के विषय में मधु के शब्दों में देखिए-
"दी! आप मयंक को भाई मान लें। बहुत अच्छे भाई सिद्ध होंगे वह, और मैं तो पहले ही आपकी हूँ।"
        ***                        ***              ***

"लेकिन क्यों दी? मैं विश्वास दिलाती हूँ आप मयंक को अनिकेत भैया से कई कदम आगे पाएंगी।"
                  इस तरह इस उपन्यास में जहाँ विकृत मानसिकता के स्त्री और पुरुष पात्र देखते हैं वही आदर्श स्त्री- पुरुष पात्र भी स्पष्ट दिखाई देते हैं जो स्त्री- पुरुष को जोड़कर रखते हैं।
                  'अस्मि' इस प्रकार स्त्री- पुरुष की सोच, व्यवहार एवं चरित्र को दर्शाने वाला उपन्यास है किंतु इस उपन्यास में स्त्री विमर्श के नाम पर गोस्वामी तुलसीदास, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त तथा जयशंकर प्रसाद जैसे महान स्त्री उद्धारक महानायकों पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया गया है जो कि पूर्णतः अनुचित है। 
                   महाकवि तुलसी ने 'अहिल्या उद्धार' जैसे प्रसंगों के माध्यम से स्त्री उद्धार का प्रयास किया है। वह ताड़ना की अधिकारी केवल शूर्पणखा और ताड़का जैसी पशुता से परिपूर्ण नारी को मानते हैं।
                    इसी प्रकार राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने "अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी। 
आंचल में है दूध और आंखों में पानी।।"
  कहकर शोषित- पीड़ित नारी के प्रति करुणा व्यक्त की है। 
         महान साहित्यकार जयशंकर प्रसाद तो नारी को श्रद्धा का केंद्र मानते हैं। 
          इस प्रकार उपरोक्त तीनों ही साहित्यकार नारी के प्रति श्रद्धा (सम्मान) और करुणा का भाव रखते हैं। वे कहीं भी नारी को नीचा नहीं दिखाते।
          सत्य तो यह है कि बिना स्त्री के पुरुष और बिना पुरुष के स्त्री अधूरी है। आदर्श समाज की कल्पना किसी एक के अभाव में संभव ही नहीं है।
          अंततः  सिद्ध होता है कि स्त्री विमर्श पर रचित यह उपन्यास 'अस्मि' स्त्री समस्याओं को चित्रित करने में तथा कुछ बीमार मनस्क स्त्री पुरुष चरित्रों के साथ ही आदर्श स्त्री- पुरुष पात्रों को चित्रित करने में सफल रहा है।
            आशा है यह उपन्यास लेखिका के यश में श्री वृद्धि करेगा। शुभमस्तु! 

2 comments :

  1. समीक्षा प्रकाशन हेतु संपादक मंडल एवं आदरणीय श्रीमती कमल कपूर जी को हार्दिक बधाई।
    आचार्य नीरज शास्त्री

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  2. priyaushasharma@gmail.comJune 2, 2021 at 5:24 AM

    वाह, अति उत्तम समीक्षा।
    बधाई आचार्य नीरज शास्त्री जी।
    उषा शर्मा

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