मुद्राराक्षस के नाटक : राजनैतिक चेतना के स्वर

रूपांजलि कामिल्या

शोधार्थी (हिंदी विभाग), अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद
चलभाष: +91 738 269 5721; ईमेल: kamilyarupanjali@gmail.com
समकालीन हिंदी नाट्य-साहित्य में राजनीतिक चित्रण को अभिव्यक्ति प्रदान करनेवाले दो पीढ़ियों के नाटककार हैं। एक पीढ़ी वह है जिसने देश-प्रेम, एकता की भावना, शरणार्थियों की समस्या, प्रजातान्त्रिक भाव आदि समस्याओं पर आधारित नाट्य-रचनाएँ दी हैं। दूसरी पीढ़ी ने राजनैतिक क्षेत्र में हुए परिवर्तित नवीन परिस्थितियों, राजनीतिक नेताओं के भ्रष्टाचार, पदलोलुपता, शोषण, दल-बदल की नीति आदि के चित्रण के साथ वर्तमान भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था के प्रति क्रांति को भी अपने नाटक का विषय बनाया है। मुद्राराक्षस इस दूसरे पीढ़ी के नाटककार हैं। उन्होंने अमानवीयता, यांत्रिकता, नौकरशाही, स्त्री-पुरुष संबंधों में घटती जा रही भावात्मकता एवं बढ़ती हुई यौन-विकृतियाँ जैसी मानवीय त्रासद स्थिति तथा सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में बढ़ती जा रही अराजकता, तानाशाही जैसी विसंगत स्थिति को नए तलाशे गए शिल्प, सीधी चोट करती हुई भाषा और नयी संवेदना के साथ अपने नाटकों में प्रस्तुत किया। मुद्राराक्षस के नाटकों में समसामयिक राजनीति संबंधित मुद्दों के विभिन्न विषयों, समस्याओं तथा उनसे संबंधित संघर्षों का प्रखर स्वर ध्वनित होता है।

 समसामयिक राजनीतिक चेतना का स्वर मुद्राराक्षस के नाटकों में तीन बिन्दुओं के माध्यम से स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आता है। पहला पुलिस व्यवस्था का चित्रण, दूसरा शासन व्यवस्था का चित्रण एवं तीसरा न्याय व्यवस्था का चित्रण। पुलिस राजनैतिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण घटक है। देश में शांति और सुरक्षा का माहौल कायम रखने के लिए पुलिस की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। पर आजकल हम देख सकते हैं कि किस प्रकार पुलिस राष्ट्र के सेवक न बनकर, अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए राजनेताओं के सेवक बनते जा रहे हैं। सामान्य जन-समूह की रक्षा करना, अपराधियों को पकड़ना और भ्रष्टाचार को रोकना पुलिस का कर्तव्य है, जबकि वर्तमान समय में सामान्य जन-समूह पर अत्याचार करना, भ्रष्टाचार को रोकने के वजाय खुद उसमें लिप्त रहने जैसी घटना पुलिस व्यवस्था में देखने को मिल रहा है। मुद्राराक्षस ने पुलिस व्यवस्था के इसी भ्रष्ट रूप को अपने नाटकों में चित्रित किया है। ‘मरजीवा’ नाटक में आदर्श की हत्या को आत्मदाह का रूप देने में पुलिस अफ़सर राजनेता शिवराज गंधे की मदद करता है। ‘तिलचट्टा’ नाटक में पुलिस हिरासत से किसी आतंकवादी व्यक्ति के भाग जाने की घटना वर्तमान पुलिस व्यवस्था की अकर्मण्यता पर करारा व्यंग्य है। ‘तेंदुआ’ नाटक में पुलिस कमिश्नर भूषणराय सही अपराधी को छोड़कर एक गरीब और निरीह माली को पकड़ता है। इतना ही नहीं उसे पुलिस हिरासत में रखने के बदले अपनी पत्नी को सौंप देता है। यह घटना वर्तमान पुलिस व्यवस्था की मनमानी वृत्ति को व्यंग्यात्मक रूप में उभारती है। ‘आला अफसर’ समकालीन राजनैतिक विसंगतियों को व्यक्त करनेवाला मुद्राराक्षस का सबसे चर्चित नाटक है | इस नाटक के माध्यम से मुद्राराक्षस ने अफसरशाही, समसामयिक राजनीतिक स्थिति पर व्यंग्य कसा है। इस नाटक के एक घटना प्रसंग में दिखाया गया है कि ताश की खेल (जुआ) में हार जाने पर इंस्पेक्टर अपनी वर्दी ही गिरवी रख देता है। पुलिस व्यवस्था में काम करनेवाले अधिकतर कर्मचारियाँ राजनेताओं के चापलूस बनते जा रहे हैं। इसकी एक झलक ‘डाकू’ नाटक में देखने को मिलता है। जहाँ जेलर साहब राजनेता के आदेशानुसार निरपराधी बचनराम का फाइल गायब कर देता है। इस तरह गद्दार शासक के साथ मिलकर गद्दारी करनेवाले खोखले पुलिस व्यवस्था का चित्रण यहाँ किया गया है।

वर्तमान के राजनैतिक नेता दोहरा व्यक्तित्व रखते हैं। वे कहते कुछ और करते कुछ और हैं। अक्सर उनके खाने के और दिखाने के दांत अलग-अलग होते हैं। ‘मरजीवा’ नाटक में शिवराज गंधे भी इसी प्रकार का नेता है जो भ्रष्टाचार की दलदल में रहकर भी गीता के कर्मफल की बात करता है। इस नाटक में शिवराज गंधे अवसरवादी लम्पट राजनैतिक नेता का प्रतीक है। जो सत्ता में अपना स्थान बनाने की लिए किसी भी हद तक गिर सकता है। विपक्षीय पार्टी को नीचा दिखने के लिए वह विपक्ष के नेता पारस को अधिकार से निष्कासित करना चाहता है, जिसके लिए वह आदर्श नामक एक युवक को आधार बनाकर राजनीतिक षड़यंत्र रचता है। पुलिस अफसर से मिलकर वे इस प्रकार का सलाह करते हैं- “मान लो कहा जाए पारस के नाजायज ताल्लुकात थे इस आदमी की बीवी से। इसलिए उत्तेजित होकर इसने बीवी का मर्डर कर दिया। बीवी को मरने के बाद यह पागल हो गया।”  इसप्रकार शिवराज गंधे जैसी न जाने कितने राजनेता अपने स्वार्थों की पूर्ति के किये आदर्श जैसे कितने बेकसूर लोगों का बलि दे देते हैं। लगभग इसी तरह की एक घटना मुद्राराक्षस के एक अन्य नाटक ‘डाकू’ में भी है। जिसमें एक नेता अपनी प्रसिद्धि के लिए ‘डाकू समर्पण’ की बात बोलता है। पर असली डाकू तो समर्पित होने से रहा इसलिए नकली डाकू बनाकर लोगों के मन में विश्वास जगाने की योजना बनाई जाती है। गाँव में नेता की सभा का आयोजन कर, बचनराम को झूठा डाकू बनाकर आत्मसमर्पण कराया जाता है। बचनराम को जेल से छुड़ाने का आश्वासन दिया जाता है। पर जेल जाने के बाद उसकी खबर भी नहीं ली जाती, जेल में सड़ने के लिए उसे छोड़ दिया जाता है। इसकी फाईल गायब कर आजीवन कारावास में सड़ने के लिए उसे छोड़ दिया जाता है। इसप्रकार समसामयिक युग के मेंचली राजनीति की खोखलेबाजी को मुद्राराक्षस ने ‘डाकू’ द्वारा उद्घाटित किया है। ‘योर्स फेथफुली’ नाटक के डिस्पैचर का निम्नलिखित कथन व्यवस्था की नीति को व्यंग्यात्मकता से उभारता है- “जब मैंने पहली बार सरकार में नौकरी की थी तो सरकार ने मुझे अपाइंटमेंट लैटर दिया था उस में मुझे ‘डियर सर’ लिखा गया था। ... अब सरकार अगर मुझे कुछ कहना चाहती है तो कहती है, ... उसे इत्तला दी जाती है।” आधुनिक राजनीतिक विसंगत परिवेश में सही दिशा में सोचना भी कभी कभी दंडित होने का कारण हो सकता है। ‘तिलचट्टा’ नाटक के पिंडारियों ने भी कभी सही दिशा में सोचा था, लेकिन बदले में उन्हें दंडित होना पड़ा था। इसी प्रकार देव द्वारा उठाई गई राजनीतिक पिंडारी की बात भी व्यंग्यात्मक रूप में वर्तमान के राजनेताओं के असली रूप को उभारती है। ‘आला अफ़सर’ राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करता है। कस्बे का चेयरमैन, हाकिम, हेडमास्टर, पोस्टमास्टर, इंस्पेक्टर जैसे लोग अपने अधिकार का दुरुपयोग कर के जनता को लूटने का काम करते हैं और खुले आम भ्रष्टाचार करते रहते हैं। भ्रष्ट राजनीति एवं भ्रष्ट नौकरशाही का यथार्थ नमूना यहाँ देखने को मिलता है।

वास्तव में पुलिस द्वारा पकड़े गये अपराधियों को उनके अपराधों के अनुसार सजा सुनाने का काम न्याय-व्यवस्था करती है। उपलब्ध प्रमाणों और गवाहियों के आधार पर ही न्याय-व्यवस्था न्यायदान का काम करती है। अगर न्याय व्यवस्था में ही गड़बड़ी हो तो सामान्य जनता का क्या हस्र होगा इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है। ‘डाकू’ नाटक में निरपराध बचनराम अपराधी न हो कर भी मजबूरन न किया हुआ अपराध को कबूलता है। लेकिन हमारी न्याय-व्यवस्था इसकी अच्छी तरह से जाँच-पड़ताल किये बिना ही सत्ताधारियों के खिलौना बन कर बचनराम को सजा सुना देती है। इस तरह के हमारे न्याय-व्यवस्था पर मुद्राराक्षस ने व्यंग्यात्मक रूप से प्रहारात्मक चित्रण किया है। मुद्राराक्षस लिखते हैं- “गरीब आदमी पर अत्याचार, पुलिस द्वारा आक्रांत समाज और डाकू राजनेता गठबंधन के साथ-साथ औरत की इज्जत पर डाके की अमानवीय घटनाएँ सामने लाने का प्रयास किया है।”

न्याय और सहानुभूति के नाम पर जनता का शोषण, सरकार बदल जाने पर भी शासक वर्ग का ज्यों का त्यों रहना, रिश्वतखोरी का धंधा चलाना आदि आज की राजनीति की कड़वी सच्चाई है। जनता चाहे भूखे-प्यासे मरे पर अपना स्वार्थ निकलना राजनेताएँ खूब अच्छे से जानते हैं। इन परिस्थितियों में यथार्थ यही है कि सामान्य आदमी राजनीति की चक्की में पिसता जा रहा है। वर्तमान की स्थिति ऐसी हो गयी है कि अपराधी को पकड़ने में पुलिस असमर्थ है, पुलिस की हिरासत से मुज़रिम भाग निकलता है, असली मुज़रिम को पकड़ने की वजह नीरिह लोगों को झूठा आस्वासन देकर ख्याति प्राप्ति के लिए उन्हें फँसाया जा रहा है। ऐसी स्थिति में मुद्राराक्षस के नाटकों में समसामयिक राजनीतिक चेतना का जो स्वर ध्वनित होता है, वह पाठक को इन सारी समस्यायों पर सोचने के लिए मज़बूर कर देता है। उन्होंने अपने नाटकों के माध्यम से समसामयिक भ्रष्ट राजनीति पर व्यंग्यात्मक प्रहार किया है।

संदर्भ-सूची

अ. आधार ग्रन्थ
1. मुद्राराक्षस, तिलचट्टा,संभावना प्रकाशन, रेवती कुंज हापुड़ (उ.प्र.), संस्करण-1981
2. मुद्राराक्षस, तेंदुआ, राजेश प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 1986
3. मुद्राराक्षस, मरजीवा, राजेश प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 1994
4. मुद्राराक्षस, योअर्स फैथफुली, राजेश प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 1980
5. मुद्राराक्षस, आला अफसर, राजेश प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 1981
6. मुद्राराक्षस, डाकू, पुस्तकायन, नई दिल्ली, संस्करण- 1990

आ. सहायक ग्रन्थ
1. मुद्राराक्षस, रंग भूमिकाएँ, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली, संस्करण- 2006
2. डॉ. गिरीश रस्तोगी, समकालीन हिंदी नाटककार, इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन, संस्करण- 1981

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