पर्वतराजो हिमालय: - बालमन की सशक्‍त अभिव्यक्ति


कृति- 'पर्वतराजो हिमालय:’ (बालकविता संग्रह)
प्रणेता- हेमचन्‍द्र बेलवाल ‘हिमांशु’
प्रथम संस्करण- 2022 ई.
मूल्य- ₹ 200 रुपये
पृष्ठ- 51
प्रकाशक- एजूकेशनल बुक सर्विस नई दिल्ली।


हेमचन्‍द्र बेलवाल ‘हिमांशु’
साहित्य अकादमी युवा साहित्यकार सम्मान (2017 ई.) से सम्मानित युवा कवि डॉ. हेमचन्‍द्र बेलवाल ‘हिमांशु’ वर्तमान में राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय घसाद पिथौरागढ उत्तराखण्ड में सहायकाचार्य पद पर सेवारत हैं।

‘पर्वतराजो हिमालय:’ कवि की सद्यः प्रकाशित कृति है, जिसे एजूकेशनल बुक सर्विस नई दिल्ली ने पूरे मनोयोग से प्रकाशित किया है। इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बाल कविताएँ किसी कल्पना लोक में जाकर नहीं लिखी गई हैं, बल्कि बच्चों के तमाम क्रियाकलापों, बाल सुलभ व्यवहारों भावों-अनुभवों का इसमें सांगोपांग वर्णन किया गया है। इसलिए इस कविता की भाषा भी सहजता, सरलता, बोधगम्यता और सादापन लिए हुए हैं, जो बाल कविता के लिए आवश्यक शर्तें भी है। बाल साहित्य के बारे में कहा गया है कि बाल साहित्य बच्चों को ध्यान में रखकर लिखा गया साहित्य है। ऐसे साहित्य में बच्चे खेल-खेल और मनोरंजन के साथ जीवन की सच्चाइयों से अवगत हो जाते हैं। साथ ही उनके भाषागत कौशल का विकास भी होता है। यह बाल कविताएँ और कहानियाँ बच्चों के जीवन पर अमिट छाप छोड़ती हैं इसलिए बचपन में पढ़ी गई उन्हें बहुत सारी कविताएँ याद होती हैं। चंदामामा से लेकर ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार, मछली जल की रानी है—जैसी कविताएँ इसके उदाहरण हैं। बाल साहित्य लिखना सहज काम नहीं है क्योंकि इसमें बच्चों की उम्र, उनकी फ़िक्र और उनके क्रियाकलाप का ध्यान रखना होता है। इस तरह की कविता में एक ऐसे मैसेज की जरूरत होती है जो बच्चों को सच्चा ज्ञान प्रदान कर सके। 

बालक के माँ ही सब कुछ होती है। माँ की महिमा का वर्णन करते हुए कविवर बेलवाल लिखते हैं –

अति सरला मम जननी 
बहुसुखदा मम जननी
प्रियवचना मम जननी 
हसतीमुखा मम जननी । ।   
×      ×        ×
जननी मम पाककला-निपुणा
पचते सततं रुचिरं रुचिरम् 
तनयं तनयामपि पाठयते 
जननी मम सर्वगुणान् धरते ॥  
×           ×        ×
पिपीलिके! हे पिपीलिके! 
यासि कथं मन्‍दम्मन्‍दम् ?
यासि किमर्थं नो शीघ्रं
यासि कथन्‍नो धावित्वा ॥ 

जो पशु पक्षी हमारे आसपास आसानी से दिख जाते हैं जैसे – गाय, पिपीलिका (चींटी), हाथी, बन्‍दर, कोयल आदि पर बेलवाल जी ने कविताएँ लिखी हैं। 

आयाता सा गोमाता
सुन्‍दररूपा गोमाता ।
×        ×        ×
निवसति सघने कानने
भ्रमति नित्यदा निर्भय:
कृष्णवर्णको महाबलो
विशालकायो गजराज: ॥
×         ×         ×
एकवानरो विशालपुच्छ:
समागता काननाद् आपणम् ।
×           ×        ×
वदति कोकिल: कु: कु: कु:
वदति विडाली म्याऊं म्याऊं म्याऊं
वदति कुक्कुर: भौं भौं भौं
हसति बालहौ हा हा हा ॥

हमारे जीवन में वृक्षों का बहुत महत्त्व है। बच्चों को इसकी महत्ता के बारे में बताते हुए डॉ. हेमचन्‍द्र बेलवाल लिखते हैं- 


डॉ. अरुण कुमार निषाद
फलं ददाति तरुदेव:
छाया ददाति तरुदेव:
काष्ठं ददाति तरुदेव:
सुपूजनीय: तरुदेव: ॥

बच्चों को जल संरक्षण के विषय में बताते हुए डॉ. बेलवाल लिखते हैं – 

पेयं स्वच्छं जलं सर्वदा
रक्षणीयं जलं सर्वदा
अस्माकं जीवनं जलं
जलरक्षा जीवनरक्षा ॥

स्वापगीतम् (लोरी) पद्मश्री प्रो. अभिराज राजेन्‍द्र मिश्र के गीत का स्मरण करा देता है ।   

सत्वरमागच्छतु निद्रे!
धावित्वाऽगच्छतु निद्रे!
आगच्छ्तु रे रजनीश!
पश्यतु शेते मम पुत्री ॥

भाषा की दृष्टि से बेलवाल जी की कविताएँ बहुत ही सरल एवं सुबोध में हैं -   

अस्ति सुन्‍दरो हिमालय:
विश्‍वसुन्‍दरो हिमालय:
दीव्यति नित्यं हिमालय:
पर्वतराजो हिमालय: ॥
×       ×         ×
आपणमधुना तातो यातो
माता याता सखीगृहम्
भ्राता पश्यति दूरदर्शनम्
अहं पठामि पुस्तकम् ॥
×            ×       ×
जननी कथयति पठ पठ पुत्र!
जनक: कथयति पठ पठ पुत्र!
भगिनी कथयति पठ पठ भ्रात:!
कोऽपि न कथयति खेलं खेल ॥
×        ×          ×
यानं गच्छति शनै: शनै:
यानं गच्छति शनै: शनै:
याने तिष्ठति बालगण:
यानं गच्छति शनै: शनै:  ॥
×             ×        ×
आम्रवृक्षके वसन्‍तकाले
गायति मधुरं कोकिल: ।

इसके अतिरिक्त त्वां नमाम: सादरम्, नमामि नित्यं भारतराष्ट्रम्, गंगा मम भारते, ज्ञानदायिनी सरस्वती, भारतभूमि: सुशोभते, मम माता, प्रणमामि गुरुम्, भगवति! नमो नमस्ते, मम जन्‍मभूमिरयं शुभा, वसति सैनिक: सीमायाम्,  तुभ्यं नम:, भारतमाता वसति ग्रामे, विभाति लोके भारतनारी,  प्रियो मदीय: पाठ्यक्रम:, मम परिवार: सदा सुखी, मातुलगेहं गच्छाम:, द्वादश मासा:, शैशवस्मरणगीतम्, प्रिया मदीया पाठशाला, वर्षाकाल: समागत:, विभाति कृषको भारतपुत्र:, कीदृशं क्रीडनकम्, मम दिनचर्या, बहु सुन्दरं मम पुस्तकम्, सूर्य:, क: कमलं बहुकोमलम्, वन्‍दनीयं भारतम्, देवभाषा संस्कृतम्, मम गुरव:, प्रियं मदीयं क्रीडनकम्, मैट्रोयानम्, वयं बालका:, वर्धापनम् वर्धापनम्, नमामि वीर सैनिकम्, आदि कविताएँ बालमनोविज्ञान की दृष्टि से अत्यन्‍त ही रोचक, पठनीय तथा संग्रहणीय हैं ।      
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि डॉ. बेलवाल की लिखी गई ‘पर्वतराजो हिमालय:’ बाल साहित्य की दुनिया में सराही और स्वीकारी जाएँगी, क्योंकि बच्चों की ज़रूरतों उसकी प्रवृत्तियों, बाल सुलभ चेष्टाओं, उनके क्रियाकलापों, अनुभवों, विचारों और व्यवहारों का बड़े ही मनोवैज्ञानिक ढंग से सजीव चित्रण किया गया है।

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