कहानी: मन का चौराहा

अमिता प्रकाश

अमिता प्रकाश

मन के चौराहे पर खयालों की भीड़ बेतहाशा बढ़ गई थी। आज ही नहीं कई दिनों से विचारों की आवाजाही धक्कमपेल तक पहुँचने लगी थी। मैं जितना कोशिश करता कि ध्यान का ट्रैफिक कंट्रोलर इस भीड़ को छाँटने की तीव्रतम कार्रवाई करे, वह उतना ही सुस्त अन्यमनस्क। हमेशा ही होता आया है ऐसा जिस चीज की जिस समय सबसे ज्यादा जरूरत होती है वह मिलती कहां है? किसी आले में रखी किसी पुरानी चवन्नी सी मेरी ध्यानशक्ति निष्प्रयोज्य पड़ी थी।

मैं इतना उद्वेलित क्यों था आप यही सोच रहे होंगे ना? तो पहले एक कहानी सुन लीजिए – चारों तरफ़ शोर उठा हुआ था, कि कोई मास्टर किसी की बीवी को भगाकर ले गया है।

“मास्टर नहीं प्रधानाचार्य है” किसी ने जोर देकर कहा। 

“औरत उम्र में उससे काफी बड़ी है और तीन बेटियों की माँ भी”, किसी और ने जोड़ा।

“अरे! तो इसमें मास्टर की क्या गलती? कोई छोटी बच्ची या अल्पवयस्क को तो नहीं भागा ले गया?” चौथे की राय थी।

“गलती क्यों नहीं है? अरे, शिक्षक होकर ऐसा आचरण करेगा तो समाज को क्या दिशा दिखाएगा?” कोई अन्य आवाज, आवाज ऐसी जिसके शब्दों से आत्म गायब थी।

“दिशा-विशा गई भाड़ में, जब दिल आ गया गधी पर तो…।” कोई निष्फिकरा मसखरी के मूड में था।

“गधी! तूने देखी है क्या? हूर भी तो हो सकती है,” अन्य के आवाज में पीछे छूटे किसी धावक की सी थकान थी।

“अमाँ, छोड़ो यार! तीन तीन बच्चों की माँ क्या हूर?” यह स्वयं को सांत्वना देता अलग ही स्वर था।

“क्या माँ बनने से सौंदर्य खत्म हो जाता है?” कोई नारी विमर्श का प्रबल समर्थक बोला।

“यह क्या बकवास है? क्या नारी सौंदर्यशास्त्र लेकर बैठ गए हो? बात मुद्दे पर होनी चाहिए।” कोई समाजशास्त्री उद्विग्न सा मालूम जान पड़ता था। मुद्दा क्या है दोनों वयस्क हैं, और हमारा संविधान दोनों को साथ रहने की अनुमति देता है।

“अरे, ऐसे कैसे दे सकता है अनुमति? मास्टर की पहली बीवी है, दो बच्चे हैं। बिना तलाक लिए किसी ने रपट लिखवा दी तो नौकरी चली जाएगी स्साले की”, पुलिसिया वर्दी में पास खड़े एक तोंदू ने अपना ज्ञान बघारा। 

यह सारा दृश्य आज का नहीं है। नहीं एक-दो साल पहले का भी नहीं। यह किस्सा है सत्तर के दशक का, जब मैं नये निकले अंकुर की तरह अपनी चौंधियाती मिचमिचाई आँखों से कभी सामने खड़े पहाड़ को देखता, कभी नीचे बहती नदी की धारा को तो कभी अपने से बड़े शहरों से आती जाती बसों को, जिनमें से उतरते कुछ जाने अनजाने चेहरे मुझे विस्मित कर देते। इन चेहरों के साथ आई शहरी हवा कभी मुझे हीनता बोध कराती तो कभी गर्व की मीठी सी अनुभूति भी कि चलो अभी भी सुकून की खोज में भटकते इन लोगों के लिए मेरे छोटे-छोटे  चाय पान के खोमचे ही शरणस्थली बने हैं। अपनी शहरियत दिखाने का मौका मैं उन्हें आज भी देता हूँ। आज भी मेरी हवा उन्हें आत्मीयता के झोंकों पर सवार कराकर दूरदराज के कोनों तक ले जाती है। अखबार भले ही बासी पढ़ते हों लोग लेकिन अपने आस पड़ोस के समाचार मिल जाते हैं उन्हें समय पर। कभी-कभी स्वयं को खुश करने के लिए यह खयाल भी अच्छा है गालिब लेकिन कुम्हला उठता हूँ तब, जब बहती नदी की धारा के विपरीत दिशा से खड़े पहाड़ की छाती पर एक ताला ठोंक कर, कोई अपना बड़े शहर की ओर प्रस्थान कर जाता है उसके जैसे छोटे शहर को ठेंगा दिखाकर। या बेच देता है किसी लक्ष्मीपति को अपनी अचल संपत्ति का पहाड़ और कुछ समय इधर उधर धक्के खाने के बाद लौट कर अपनी ही जमीन पर पराए व्यक्ति के बंगलों का ‘पेड’ चौकीदार बन जाता है। मैं कुनमुना उठाता हूँ, ‘मुझे भी बनना है बड़ा शहर’ ताकि मैं रोक लूँ इनको बहुत दूर जाने से। नदी से, पहाड़ से अलग होकर भी बची रहे इनमें नमी, तरलता के साथ  धैर्य स्थिरता ताकि पैरों तले बची रहे अपनी जमीं। और फिर मेरी कुनमुनाहट, स्पष्ट होती धीरे-धीरे गर्जना में, सच कहूँ तो हुंकार में तब्दील होती चली जाती है। 

धीरे-धीरे अपनी ही हुंकार से फैलता मैं बन गया वही शहर जिसमें अखबार तरोताजा पहुँचता था पर पास पड़ोस की खबरें सड़ गल चुकने के बाद। खैर मेरी ही सरहदों में उस जमाने में यह सब घटित हो गया था। शहर के चौराहे पर शुरू हुआ यह किस्सा कई समय तक लोगों की जबान पर चलता रहा। फुरसत से लोग बोलते बतियाते आँखों से हंसते रहे इस एक किस्से पर। “यह सब का क्या मतलब? मन की चोर दीवारों ने घेरा, “ऐसे बनेगा बड़ा?” और फिर लगाई एक जबरदस्त फटकार, “यह सब आज से होता आया है क्या?  आदम -हवा कहो या मनु-श्रद्धा से  जो कहानी शुरू हुई, उसका कहीं अंत नजर नहीं आता। रूप बदल बदलकर आती रही है सामने हमेशा यही कहानी। 
“अरे! उस प्रेम को तुम इस छिछोरे प्रेम से कैसे कम्पेयर कर सकते हो?”

“क्या मतलब? आँखें तरेर कर खड़ा हो गया मन सामने।

“प्रेम प्रेम होता है, उसमें छिछोरा या गरिमामय क्या? नर-मादा का आकर्षण मात्र। फालतू की बकवास मत किया करो,” मन ने धमकाया। 

मास्टर और तीन बच्चों की माँ उस भागी औरत के प्रेम की कथा मैं और मेरे लोग धीरे-धीरे पचा पाए। कई दिनों नहीं, महीनों बाद। कई महीनों तक चली उठापटक, हो- हल्ले के बाद भी जब कोई कुछ बिगाड़ न सका उन दोनों का, तो समाज ने हर बार की भांति एक निष्कर्ष निकाला कि ‘चूंकि दोनों ही दलित जाति के हैं और उनमें इस तरह की अनैतिकता कोई बड़ी बात नहीं, तो इससे मेरा क्या कोई लेना देना नहीं। और इस तरह मैं पराभव की ग्लानि से साफ बचा ले गया खुद को।

 कुछ समय, और गुजरा। समय की गणना मेरे यानी शहर के हिसाब से करिएगा। फिर एक शोर उठा। मेरे सबसे व्यस्त चौराहे पर सुबह से हंगामा बरपा हुआ था। गहमागहमी में इतना पता चला कि किसी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है।
 
“किसने?” बड़ी खबर थी। जानने की इच्छा में अपने कानों को ज़रा और पास ले गया गहमागहमी के बावजूद इस बार बातें फुसफुसाहट में थी।

“अरे! फाँसी लगाने वाला पड़ोसी था उसका।”

“अच्छा!!” आश्चर्य के साथ ही पुख्ता खबर सी जानकारी – “होना ही था यह सब। आग और पानी… वाले ने आगे बताया, “किचन एक ही शेयर करते थे दोनों।”

“ऐसा कैसे?” सुनने वाले के मन में अभी संदेह के बदल क्यों घुमड़ रहे थे पता नहीं।

“कमरे अलग-अलग थे, पर अंदर से आवाजाही के लिए गैलरी ही नहीं किचन भी संयुक्त थी।” किसी ने पुख्ता आवाज में बताया।

“लेकिन, वह तो प्रोफेसर है।” 

“तो क्या? प्रोफेसर को प्यार का हक नहीं?” दूसरे ने खींसे निपोर्टे हुए मजे लेने की चक वाली आंखों से सामने खड़ी महिला की आँखों में झाँका।

“अरे, बात हक की नहीं, मर्यादा की है, सुना उसी प्रोफेसर का छात्र था वह।”

लड़का होकर भी उसने क्यों फाँसी लगाई? एक जाहिल बोला। ऐसे जाहिल गंवारों की वजह से ही मेरी उन्नति नहीं हो रही है सोचकर मैं मन ही मन खिन्न हो उठा। साले अपने से मतलब रखो, कोई जिए मरे, तुम्हें क्या पर नहीं…। मेरी आवाज मेरे ही गले में घुट रही थी और मैं अपनी सीमाओं में।

“अरे, लड़का लड़की से क्या मतलब?” उनकी बातों का क्रम मेरी चिंताओं से बेखबर, जारी था।

“जिसकी आँखों में थोड़ा पानी बचा होगा, … एक धामड़ शुरू हो गया। अब यहाँ इतने भारी भरकम मुहरें की क्या जरूरत? मैं कुढ़ उठा।

“शादी करके आया था। नई नवेली दुल्हन साथ लेकर। सोचा होगा कि प्रौढ़ा प्रोफेसर अपने आप ही रास्ते से हट जाएगी?  वह भी तो हट जाता है उन दिनों उसके रास्ते से, जब उसके पति और बच्चे आते है।

बस यहीं तो गच्चा खा गया साला।” उसकी मुस्कुराहट थामने का नाम नहीं ले रही थी। कहीं यह भी लाइन में तो नहीं था? मैं प्रोफेसर साहिबा के किस्सों से खूब परिचित था। उफ्फ यह क्या मैं भी इन्हीं गँवारो की तरह…

“उसे तो आग बुझाने से मतलब था, बारिश काला बादल  करे या नया कपास सा सफेद बादल।”

“बरसात की तीखी मिर्च सी नई नवेली ने देख लिया दोनों को लिपटते चिपटते।”

“फिर क्या था? सीधे मायके का टिकट कटवाकर तब तक मूसलाधार बारिश सी बरसती रही जब तक वह ढह नहीं गया, किसी मिट्टी का ढय्या सा?”

मैं तो तब आत्मग्लानि से गढ़ गया जब कहने वाले ने यह कहना शुरू कर दिया कि नई नवेली दुल्हन, मेरे जैसे किसी छोटे शहर से नहीं थी। मुझसे कई गुना बड़े शहर में पली बढ़ी वह, जानती थी हक लेना और छीनना भी। जीवन जीना और जीवन को मजाक बना देने वाले का जीवन लेना भी।

 फिर कई दिनों तक मेरे गली मोहल्लों में एक फुसफुसाहट, एक आक्रोश ढका-छुपा सा तैरता रहा जाड़े की धुंध सा बस सूरज उगने, मात्र तक। जैसे ही सूरज उगा सब अपने कर्तव्य पथ पर, टूटे फूटे रथ की तरह की चर मर की आवाजों के साथ घिसटते चले गए। मैं खुश था कि अब शहरीपन आने लगा है मुझमें। मेरे निवासियों के पास नहीं है फुरसत अब फालतू मुद्दों के लिए, कई-कई महीनों तक। किंतु मेरा आश्वस्त होना अभी बाकी था। कुछ तो था जो मुझे बड़े शहरों की तुलना में। आज भी हीनताबोध कराता था, वह क्या था?  मैं सोच ही रहा था कि मेरी नज़र बस से उतरते और एक दूसरे को पहचान कर गले लगते लोगों पर पड़ी। यही वह कुछ था…मेरे मन में दर्द की एक लहर सी उठी। भीड़ बढ़ने के बावजूद लोग एक दूसरे को अभी भी नाम, गाँव, यहाँ तक कि गोत्र से भी जानते थे। छि! मैंने गहरा निश्वास भरा। मेरी इस निश्वास में फिर लोगों का रुदन सुनाई दिया पृष्ठभूमि में-
 एक ही गोत्र वाले लोगों का रुदन था यह। किसी उच्च गोत्रीय लड़की के परिजनों ने उस तथाकथित निम्न गोत्रीय लोगों में से एक के होनहार बेटे को मारकर फेंक दिया था मेरी सीमा से लगी ‘गाढ़’ में। मुझे बुरा जरूर लगा नहीं नहीं लड़के या उसके परिजनों के लिए नहीं, अपने बाशिंदों की मानसिकता ने मुझे बुरा महसूस कराया कि ये अभी भी उच्च – निम्न में उलझे हुए हैं पर फिर मेरे दिमाग ने दिल को समझाया, ‘ तू रहेगा हमेशा ही बेवकूफ ही । अरे आदमी मंगल भी चला जायेगा तब भी उच्चता – निम्न के जंजाल से मुक्त नहीं हो सकता। शहर-वहर की बात छोड़ तू तो ये देख कि माजरा क्या मोड़ ले रहा है? मैंने देखा इस समय गली मोहल्ला ही नहीं प्रशासन भी हो हल्ले में शामिल था। साथ ही शामिल थे कुछ गिद्ध भी, जिन्हें मृतक मांस को नोचकर अपना पेट भरने की जल्दबाजी हमेशा होती है। जातियों के आधार पर दो दलों के बीच शुरू हुए इस दंगल में युवक का कंकाल भी शेष नहीं रह सका। पता नहीं किन फाइलों में दफन कर दिया गया कि राख भी न मिली, किंतु दंगे भड़क उठे। मेरी तो खुशी का पारावार नहीं।

अरे आप क्यों चिंहुक उठे? मैं उसकी मौत पर थोड़े ही खुश था। मैं तो अपनी हवाओं में घुल आई शहरीयत के लिए फूला नहीं समा रहा था। आखिर दशकों हो गए थे मुझे गाँव से शहर बनने की राह में कदम बढ़ाये हुए।  भौतिक रूप से गाँव से कस्बा और कस्बे से शहर फिर नगर पंचायत, नगरपालिका से नगर निगम तक का सफर मैंने भले ही कुछ सालों में तय कर लिया था किंतु एक लिजलिजी भावुकता, अस्तित्वबोध और पहचानपन के कुछ रोड़े थे जो मुझे शहर नहीं बनने दे रहे थे सही अर्थों में। मैं जानता हूँ कि अभी भी पूरी तरह से नेस्तनाबूद नहीं कर पाई मेरी इच्छाओं की आंधी बारिश इन अवरोधी टीलों को, पर मैं तीव्र गति से अग्रसर हूँ इस बात का एहसास मुझे इस घटना से होने लगा था- घटना??? बताता हूँ,  एक दिन फिर मेरे किसी चौराहे पर उग आई सुगबुगाहट ने मेरे कान खड़े कर दिए। फिर वही कहानी? में झुंझला उठा। प्रेम प्रसंग! मैं हैरान, जीवन में प्रेम के अतिरिक्त भी तो कई गम है लेकिन इस आदम जात को इस एक से ही फुर्सत नहीं! मेरे रोम रोम में आग सुलग रही थी।

 लेकिन इस बार प्रेम के साथ बहुत कुछ और था। मैं जानकर गार्डन-गार्डन!  क्या हुआ  अगर मेरे जैसे बेतरतीब उग आए शहर में गार्डन नहीं भी होता, तो क्या? मन में तो फूल खिल ही सकते हैं? क्या फर्क पड़ता है कि फूल धतूरे के हों या भांग के? कम अज कम मेरे जैसे तरक्की पसंद पर तो बिलकुल भी नहीं इन चीजों से फरक पड़ता। शेक्सपियर तो कब के कह गए थे, “ नाम में क्या रखा है?”

अरे अरे मैं बहका नहीं हूँ जरा खुशी नहीं संभाल पा रहा था तो भटक गया था। अच्छा चलिए वापिस आता हूँ घटना पर। इस घटना में सब शामिल था – नशा, लव-जिहाद और समलैंगिकता। इस मसले की वजह से मैं अब चिंतित नहीं था, क्योंकि अभी तक नशा और लव-जिहाद का मसला भले ही और शहरों में उछला हो किंतु नशे के चक्कर में मिले दो अलग संप्रदायों के समलिंगी युवकों की कहानी मुझे अन्यों से अलग और बेहतर ना भी सिद्ध करती हो तो क्या उनकी बराबरी में तो ला खड़ा कर ही देती है ना? और परसे भी मजेदार बात यह कि यह मामला सिर्फ टी0 वी0 न्यूज चैनल्स की डिबेट और कुछ स्वघोषित समाजसेवी- समाजशास्त्री विद्वज्जनों की चर्चा का केंद्र बना, न कि मेरे गंवार नागरिकों के बीच। जितनी भी बातें हुईं, कि कैसे दोनों नशे की जरूरत के लिए पहले एक दूसरे से मिले, फिर नशे की जरूरत पूरी होने पर उनके तन मन का विस्तार इस कदर हुआ कि दोनों एक दूसरे में समाहित होकर एक ही परछाई में गड्डमड्ड हो गए... आदि आदि को मैं ही नहीं मेरे बाशिंदे भी न्यूज चैनल्स के माध्यम से जान रहे थे। किसी जागरूक पत्रकार ने एक प्रतिष्ठित अखबार में लिखा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद समलैंगिकता कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, किंतु यह लव-जिहाद का नया रूप है, जो नए नामकरण की ही मांग नहीं करता बल्कि आम जनता को जागृत करने के लिए वृहद स्तर पर जागरूकता अभियान की भी स्पष्ट मांग करता है। आगे लिखा था कि यह एक बड़ी साजिश है और हमारे हिंदू युवकों को आतंकवाद की राह पर ले जाने के लिए अपनाया गया एक नया हथकंडा है।

एक महिला समाजशास्त्री का विश्लेषण प्रकाशित हुआ था कि इस प्रकार उन युवाओं की पहचान को सरेआम कर उनकी अस्मिता को चोट नहीं पहुँचाई जानी चाहिए। उनका यह आलेख इतना भावुक था कि मेरा हृदय ही नहीं शहर के दरोगा का भी डंडा क्षणांश के लिए ही सही  कांप उठा। खैर अब यह राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मंचों का मुद्दा था, जिसमें राजनीति, समाजशास्त्र के पुरोधाओं को मत और सिद्धांत गढ़ने के लिए नया मुद्दा मिला था। राजनीतिज्ञों और पुलिस प्रशासन को नया काम । किंतु मेरे निवासी चाहे किसी भी गली मुहल्ले के हों, किसी भी चौक चौबारे के, किसी भी जाति -धर्म बिरादरी के, इस सबसे विदेह की भांति तटस्थ , बस अपनी दुनिया में मशगूल थे, बिल्कुल उसी कमलपत्र की तरह जो पानी में तैरता हुआ भी रहता है बिलकुल शुष्क, और मैं? कमल की भांति खिला खिला…।
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असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी), नैनीताला (उत्तराखंड)

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