रथवान - कविता

पं. नरेन्द्र शर्मा

पं. नरेन्द्र शर्मा

हम रथवान, ब्याहली रथ में,
रोको मत पथ में,
हमें तुम, रोको मत पथ में।

माना, हम साथी जीवन के,
पर तुम तन के हो, हम मन के।
हरि समरथ में नहीं,
तुम्हारी गति हैं मन्मथ में।
हमें तुम, रोको मत पथ में।

हम हरि के धन के रथ-वाहक,
तुम तस्कर, पर-धन के वाहक
हम हैं, परमारथ-पथ-गामी,
तुम रत स्वारथ में।
हमें तुम, रोको मत पथ में।


दूर पिया, अति आतुर दुलहन,
हमसे मत उलझो तुम इस क्षण।
अरथ न कुछ भी हाथ लगेगा,
ऐसे अनरथ में।
हमें तुम, रोको मत पथ में।

अनधिकार कर जतन थके तुम,
छाया भी पर छू न सके तुम!
सदा-स्वरूपा एक सदृश
वह पथ के इति-अथ में!
हमें तुम, रोको मत पथ में।

शशिमुख पर घूँघट पट झीना
चितवन दिव्य-स्वप्न-लवलीना,
दरस-आस में बिंधा हुआ
मन-मोती है नथ में।
हमें तुम, रोको मत पथ में।

हम रथवान ब्याहली रथ में,
हमें तुम, रोको मत पथ में।


सुनिये, इस प्रेरक कविता का पाठ लावण्या शाह के स्वर में