इति‍हास - कहानी

अजय नावरि‍या                                        



"यातना ... हाँ यातना से ये क्या कम है ...  क्या कहूँ, जात छिपाएँ तो पहचान तो जाती ही है, साथ ही हर वक्त इस आशंका के दांतों तले भी दबे रहते हैं कि जाने कब पर्दा उठ जाए और बताएँ तो आगे बढ़ने के सारे अवसर हाथ से गए समझो।" नेत्रपाल सिंह की बुदबुदाहट पर जैसे सौ किलो का पत्थर रखा था।

इतवार अक्सर ही अलसाया सा आता है, और इस पर उस की सुबह तो बेतरह सुस्त। ऐसी गतिहीन कि लगे जैसे वह साँस लेना भूल गई है, या कि इतनी धीमी कि लगे चल भी रही है या नहीं। पर नेत्रपाल के यहाँ इतवार की इसी सुबह का चेहरा अजीब था। अचानक लगता कि वह हांफ रही है और एकाएक ही जैसे वह मरणासन्न हो जाती। दिन की शुरूआत का यह हिस्सा किसी आवारा किशोर की तरह अनिश्चित और अराजक था।


"बात सिर्फ इतनी सी नहीं है संघप्रकाश जी, एक शर्त भी उन्होंने रख दी है।" नेत्रपाल सिंह की डूबी सी आवाज़ आई। उन के दिल में जैसे कोई तूफान मचा था। मन में विरोध गहराता और वेदना पछाड़ खाती। उन की आवाज रह रहकर काँप काँप जाती।ढ़ाढ़स बंधाते हुए उन्होंने कंधे पर हाथ रखा, "हिम्मत रखो नेत्रपाल जी, आप तो लेखक हैं, कवि हैं, समझदारी से काम लो भाई।"

नेत्रपाल उसांस भर कर रह गए। उन की मजबूत छाती जैसे धनुष हो गयी। "लड़के ने कुल डुबो दिया, सारी तपस्या बेकार कर दी.....।"  पलभर को रूके, गला खखारकर साफ किया, "हमारे बाल्मीकि समाज में क्या कमी पड़ रही थी, एक से बढ़कर एक, सुंदर, सुघड़ और अब तो पढ़ी-लिखी भी ... दलित लेखक संगठन में क्या मुँह दिखाऊँगा।" पंखा ठीक उन के सिर पर फर्र-फर्र घूम रहा था। सामने दीवार पर घड़ी की सुई टिक-टिक कर के समय को आगे बढ़ा रही थी।

संघप्रकाश जरा सा कसमसाए और "हुम्म" करके चुप हो गए। दोनों के बीच चुप्पी चहलकदमी करने लगी। सामने आँगन में चमकती धूप गौरैया की तरह चहचहा रही थी। रात भर मेह बरसा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे तेज बारिश ने धूप को खूब धो कर कच्चे मक्के के दानों सी उजियारी बना कर बिखेर दिया है। आंगन की दीवार और फर्श पर वह सोने के मोतियों सी फैली थी। लेकिन वह आंगन नहीं लांघ पाई थी और इस तरफ दुख का घटाटोप अंधियारा था।

एकमंजिला मकानों की कतार दूर तक चली गई थी। सभी प्लॉट सौ गज के थे। मध्यवर्गीय लोगों की थ्री बेडरूम वाली यह नई कालोनी थी जो गॉंव की बाहरी जमीन पर कुछ दस साल पहले ही बसी थी। नाम था सुप्रीम एन्कलेव। इन दस सालों में ही बाहरी दिल्ली के ऐसे गॉंवों की बाहरी जमीन सोने के भाव से भी सौ गुनी तेजी से बढ़ी थी। यहाँ हर घर में कम से कम एक कार तो थी ही। हालांकि कॉलोनी की सड़क अभी छह महीने पहले तक भी कच्ची थी और सीवर की लाइन को पड़े तो साल भी नहीं बीता। यह तो शुक्र हुआ कि चुनाव आ गए और सीवर पड़ गए।इन सब परेशानियों के बावजूद लोग खुश थे, सिर्फ इसलिए कि छत उनकी अपनी थी, जहाँ सरदियों में वे धूप खा सकते थे, सावन की बारिश में नहा सकते थे। शहरों में बढ़ती आबादी और बिल्डर माफिया की बहुमंजिला इमारतों ने दिल्ली से ये मामूली सुख भी छीन लिए हैं। आसपास कई फार्महाउस भी उग आए थे और ढेर सारी झोंपडियॉं और कच्चे घर भी, जिनमें बिहार, बंगाल, झारखण्ड से आए नौकरों-कामगारों की फौज पलती थी।

संघप्रकाश ने उठकर पंखे की गति को तेज करने के लिए रेगुलेटर को घुमाया। आसपास घिर आए इस अटपटे अबोले को बुहारने की कोशिश में वे सधे स्वर में बोले , " अब जो हो गया, हो गया, डाक्टर साहब, संभालिए खुद को, ये दिल के मामले हैं, इन में अक्ल की कहाँ चलती है।"

उन की यह बात सुन जैसे एकदम बिफर गए नेत्रपाल, "टीवी फिल्म ने बिगाड़ कर रख दिया साहब ...  ऐसे दिल और बेटे का क्या करूँ जिस में बाप की इज्जत नहीं, बिरादरी का सम्मान नहीं।" उन्हें अपनी जवानी के दिन याद आए, जब उनकी जिन्दगी का सिर्फ एक ही मकसद था- इल्म की इबादत।
"काफी उमस है।" संघप्रकाश ने कुनमुनाते हुए कुर्ते की आस्तीन चढ़ाई। "कूलर ऑन कर देता हूँ।" नेत्रपाल  ने उठने का उपक्रम किया।
उन्होंने रोकते हुए हाथ हिलाया, "ना ना, कूलर से चिपचिपाहट बढ़ जाएगी, चौमासे में पंखा ही ठीक है।" उठ तो वे गए ही थे। उन्होंने बढ़कर कमरे का दरवाजा भिड़ाया और सामने दीवार पर एलसीडी स्क्रीन के दाएँ तरफ रखे रिमोट कंट्रोलर को उठा ए.सी. ऑन कर दिया।
एसी चलाते देख चहका सा स्वर उठा, "हाँ, यह ठीक रहेगा...कब खरीदा, अच्छा छोड़िए, ये तो बताइए आपके प्रमोशन का क्या हुआ।" बात बदलने और माहौल को हल्का करने का उन्होंने अच्छा मौका देखा।

नेत्रपाल कुछ पल तो एक लफ़्ज़ भी न बोले, जैसे उन्हें उस अंधे कुँए से निकलने में ही तकलीफ हो रही हो, कि कहीं जरा हिले-डुले तो जाने और किस से चोट लग जाए। "हो गया डिप्टी  सेक्रेटरी भी, परसों ही मिला लैटर।" उनकी आवाज में कोई पुलक न थी, महज़ एक रस्मी सूचना। इंसान का अगर मन बुझ जाए तो बड़ी से बड़ी खुशखबरी भी परवान नहीं चढ़ती। "इस लड़के से बड़ी उम्मीदें थी। सोचा था, पढ़ लिखकर, अच्छे पद पर जाएगा, अपनी बिरादरी की लड़की से ब्याह करेगा। एक परिवार और उठता बिरादरी का, ये सब नहीं सोचा गया इससे, ठाकुर बनने की ठसक है मन में।" कालकूट सी कडवाहट रूकी नहीं मन में।

संघप्रकाश की जिज्ञासा ने जैसे सौ सिर उठाए, "क्या राजपूत हैं?"
 
नेत्रपाल की मुँह से जवाब देने की इच्छा नहीं हुई सो जरा सी गर्दन हिला दी। पर ज्यादा देर चुप नहीं रह पाये। "काहे के राजपूत, राज गए कब के, जनता का राज है अब और पता नहीं राजपूत है भी कि नहीं, गोले ही हों, तभी शादी करने को राजी हो रहा हो।"

"लड़की क्या करती है... मतलब अपने चिराग से कहाँ कैसे मुलाकात हुई?" उनके पास सवाल पूछने का ही रास्ता छोड़ा नेत्रपाल ने। वे झक मार उसी पर बढ़े।नेत्रपाल की त्योरियॉं चढ़ गई। "किसी फर्म में रिसेप्शनिस्ट है, चिराग और वो एक ही चार्टर्ड बस में जाते थे, बस इसी बीच कर लिया अपने बस में, वरना कहाँ मिलता उसे एक चार्टर्ड अकाउंटेन्ट लड़का। बाप डी.टी.सी. में बस कंडक्टर था, नौकरी छूट चुकी उस की भी। मुफत में लड़का मिल गया उसे तो।"

"परेशानी क्या है?"

नेत्रपाल की आँखों में पीड़ा थी जो ऐसे फोड़े सी थी जिस का मुँह नहीं दिखता। वह अंदर वाले कमरे की ओर मुँह करके असहाय से देखने लगे। फिर कुछ तेज स्वर में आवाज लगाई, "सुमेधा बेटा चाय लाने में कितनी देर लगेगी?"

भीतर से एक आज्ञाकारी आवाज ने धीमे से प्रवेश किया, "ला रही हूँ पापा बस एक मिनट।"

नेत्रपाल जैसे खुद से बोलते हुए बुदबुदाए, "ये भी एक परेशानी हो गई है, ज्यादा देर की तो लड़की के लिए ...। अब अगर ये कुछ कर बैठी तो किस मुँह से रोक पाऊँगा।" उन की आँखों में बेबसी तैर रही थी, "कोई लड़का हो तो बताना।"

संघप्रकाश ने आत्मीयता से उन के कंधे पर हाथ रखा, "नहीं करेगी, चिन्ता मत करिए, सुमेधा आप की ही मर्जी से करेगी, चाहे उसे अपनी बिरादरी के किसी कमतर आदमी के साथ ही जिन्दगी बितानी पड़े।" उन्होंने खुद को भरसक रोकने की कोशिश की पर फिर भी हल्की चोट हो ही गई। नेत्रपाल का ध्यान अभी इस तरफ नही था, और गया भी हो तो उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया। वे जानते थे कि संघप्रकाश अन्तर्जातीय विवाहों के प्रबल पक्षधर हैं। उनके सभी लड़के लड़कियों की शादियॉं अपनी जाति के बाहर हुई है। आए दिन सामूहिक अन्तर्जातीय विवाह समारोह आयोजित करते रहते हैं वे।

"नहीं जी, जब ऐसी लड़की घर में बहू बनकर आएगी तो वो अपनी मेजोरिटी बनाने के लिए सुमेधा को जरूर बिगाड़ेगी।" आगे कुछ कहते कि नेत्रपाल सामने से सुमेधा को चाय लाते देख चुप हो गए। सुमेधा का कद भी चिराग की ही तरह अच्छा ऊँचा निकला। रंग भी सभी का भोर की उजास लिए था, हल्का सांवला। बच्चों की नाक अपनी मॉं पर पड़ी थी, इसलिए कुछ फूली थी और नथुने घुमावदार। नेत्रपाल जैसी तीखी नाक नहीं थी।

"बहुत होनहार है मेरी बेटी, पिचासी परसेंट मार्क्स लिए हैं फाइनल में, सी.ए. बनाऊँगा इसे भी।"

सुमेधा गंभीर मुद्रा में ही रही। न मुस्कुरायी न शरमायी, जैसा कि आमतौर पर बच्चे अपनी तारीफ सुनकर करते हैं। "पापा कुछ और ...।" उसने संक्षिप्त और शालीन सवाल किया।

संघप्रकाश की आँखों में लाड़ आ गया। शायद उन्हें अपनी बेटी की याद आई, जिस का विवाह अभी पिछले महीने ही हुआ था। वे बोले, "थैक्स बेटा, कुछ नहीं चाहिए।"

जुलाई का आखिरी हफ़्ता था, तारीख अटठाइस जुलाई। आसपास के राज्यों में बारिश ऐसी जोरदार हो रही थी कि बाढ़ की नौबत आ गई पर दिल्ली अब भी गीली लकडियों पर सीझ रही थी। खाली बैठो तो भी पसीने के केंचुए से चलते रहते।
"चिराग कहाँ है?" संघप्रकाश ने मुस्कुरा कर पूछा।

"भैया तो अभी सो रहे हैं अंकल।" सुमेधा की आंखों में अजीब सी निर्लिप्तता थी।

"देख रहे हो आप, ग्यारह बजने को हैं, साहब बहादुर ए.सी. ऑन किए आराम फरमा रहे हैं, कोई मरता हो तो मरे इनकी बला से।" एक लहुलुहान स्वर कंठ से बाहर आया।

पॉंच दिन पुरानी तकरार ने नेत्रपाल को अपनी आगोश में ले लिया। "आय डोन्ट केयर डैड... कास्ट मेरी, उसकी या किसी की च्वाइस नहीं है, एक डेस्टिनी है बस... मैं सिर्फ फयूचर की तरफ देखता हूँ ... पास्ट में हमारे लिए कुछ नहीं है, वहाँ बस अपमान अपमान अपमान है... आप खोदिये उसे, मैं उस इतिहास में अपनी कब्र नहीं बनवाना चाहता। आप की जिद थी कि हम इतिहास में बौद्ध थे और आप की ज़िद पर हम सब बौद्ध भी हो गये, पर हुआ क्या, आज भी आप, मैं, हम सब  वही हैं, उनकी नज़र में , हमें बदला है तो डिमोक्रेसी ने, टेक्नोलॉजी ने, एजूकेशन ने , पैसे ने ... जब धन के धनुष पर तालीम के तीर चलते हैं तब इज्जत आती है, धर्म से नहीं। बाबासाहब ने भी इसी के दम पर अपनी जगह बनाई।" नेत्रपाल ने मरने की धमकी तो चिराग भी आपे से बाहर होकर बोलता ही चला गया।

नेत्रपाल युवा लड़के की तेजी से दब तो गए पर मुँह में बात रोक नहीं पाए और धीमे स्वर में बोल ही पड़े , " ये धर्म ही है जो हम बिखरी कड़ियों को जोड़कर ज़ंजीर बनाएगा। याद रखना मेरे ये शब्द।" 

"अरे भार्इ डाक्टर साहब ये जवानी के दिन है, ऐसी नींद अभी आती है, बाद में तो बस करवटें बदल कर गुजरती हैं। आज संडे है, बाकी दिन तो नौकरी ही करनी है उसे। आप अपना ब्लड प्रेशर क्यों बेवजह बढ़ा रहे हो, ध्यान रखिए अब पचास पर लगने वाले हो।" संघप्रकाश ने कहने को मुँह तो खोला पर उन्हें विचारों में कहीं अटके देख, कहते कहते रूक गए।

सुमेधा लौटने को हुई ही थी कि दरवाजे पर किसी ने खटखटाहट की। वह दरवाजे की ओर बढ़ी कि तभी बाहर से आवाज आई, "अरे भाई बाल्मीकि जी घर पर हो क्या?" सुमेधा आवाज पहचान गई। ये पड़ोस में रहने वाले सुदर्शन शर्मा अंकल की आवाज थी। वे भी नेत्रपाल की तरह लिखने पढ़ने वाले इंसान हैं। वीर और हास्य रस के कवि। एक वही हैं जो उन्हें उनके लेखन वाले नाम "बाल्मीकि जी" से पुकारते हैं। किसी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं वे।

सुमेधा ने बढ़कर दरवाजा खोल दिया और उन्हे नमस्कार कर रसोईघर की तरफ चली गई।

"अरे वाह भाई याँ तो दलित लेखकों की गोस्ठी चल रही है...एक के बदले दो मिल गए..बहुत खूब रई... कैसे हो जाटव जी?" इससे पहले कि संघप्रकाश कुछ जवाब देते, वे फिर अपने ब्रज लहजे़ में बोल पड़े, "आप तो ठीक क्या मजे में होंएगे भैया, सारी जिम्मेदारी पूरी हो गई, अब तो पोंगा पण्डितों की किलास लेने में लगे हो।" कहकर सुदर्शन ने जोर का ठहाका लगाया। "बेड़ागर्क हो अंग्रेजों का, आप लोगन को बाबासाहेब दे गए और उन्होंने आप लोगों को समता सैनिक बना दिया ... करो भाई इस भारतमाता का उद्धार ... हाहाहा।" इतना कह वे फिर खिलखिला कर हँस पड़े।

संघप्रकाश भी हंस पड़े और नेत्रपाल भी कुछ मुस्कुरा गए। "आपके मनु के बनाए नरक के खात्मे के लिए आए बाबासाहेब तो ...।" नेत्रपाल ने भी मुस्कुराते हुए कहा। सुदर्शन शर्मा की सहजता, पारदर्शिता, उदारता और मजाकियापन को दोनों ही वर्षो से जानते थे। मदद को हरदम हाजिर, किसी मित्र के यहाँ जरा कोई परेशानी होने पर बढ़कर ऐसे मदद करते कि कोई सगा भाई भी क्या करे। रात देखते न दिन।
"अरे बाह चाह पहले ही मंगा के रक्खी है, कैसे पता कि मैं आ रा हूँ।" कप उठाया और चुस्कियॉं लेने लगे। " बहुते अच्छी चाह है जी।"

"बस पता चल गया, शैतान को याद करने भर की देर होती है।" नेत्रपाल ने चुटकी ली तो सुदर्शन ठठाकर हँस पड़े। "बेटा सुमेधा एक कप चाय और ले आ, तेरे पापा के लिए।" अधिकार से ऊंची आवाज में वे बोले।

"कहाँ को निकले हो महाराज?" संघप्रकाश ने पूछा।

"बस यहीं आया हूँ गुरूदेव। पण्डितानी ने बारिश का मौसम देख पकौड़े छान दिये, तो बोली कि बाल्मीकि भाईसाब को भी बुला लाओ, उन्हें बहुत अच्छे लगते हैं।" कहकर उन्होंने चाय की चुस्की ली। "अब भई उन्हें ये कोई पते थी कि जाटव साहब भी यहीं विराजे होंगे। अब आप भी साथ चले चलो। अभी प्रोमोशन भी तो हुआ है इनका, पार्टी भी लेनी है, हालांकि आचार्य हम सस्ते  मेहमान हैं, न मांस, न दारू ... बस सादा भोजन।"
संघप्रकाश मुस्कुराए और सोचने लगे कि काश ऐसा ही पड़ोस पूरे भारत देश का हो जाए। थोड़ी बहुत ऊंच नीच तो आखिर भाई बंद और मियाँ बीबी में भी चलती ही रहती है। हित तो सबके अपने अपने हैं,व्यवहार तो ठीक रख कर चला ही जा सकता है।

"शर्माजी से पूछिए कि कैसे लोग हैं, आप तो बाहर थे पर ये तो गए थे साथ, लड़की रोकने।" नेत्रपाल फिर शुरू हो गए।

सुदर्शन सारा माजरा तुरन्त समझ गए, "देखिए गुरूजी, आदमी तो गरीब है, लड़की भी अपने चिराग के सामने अटठारह ही समझो, थोड़ी भारी भी है और जस्ट बी.ए. है, वो भी रेगुलर से नहीं पढ़ी।"

नेत्रपाल झुंझला गए, "अब बताइए क्या गुण है लड़की में और उसके परिवार में... बस वो ठाकुर हैं इसलिए।"

सुदर्शन ने कप सामने की टेबल पर रख दिया, "बाल्मीकिजी जमाना बदल गया है, इसी के हिसाब से चलिए। उधर लड़की ने भी चिराग की तरह सुसाइड की धमकी दे रखी है। कुछ ऊंच-नीच हो गई तो कोर्ट-कचहरी हो जाएगी बेवजह।"

"बताइए शर्मा जी ऐसे बच्चे क्या गिरस्ती चलाएंगे।" नेत्रपाल हताशा में हाथ मलने लगे। "बात बात पर खुदकुशी की धमकी देते हैं।"

कुछ देर सन्नाटा उबलता रहा। संघप्रकाश ने फुसफुसा कर कहा, "चला लेंगे, अभी गुस्से में हैं।"

"जाटव जी लड़की का पिता भी बहुत मायूस था। कह रहा था शर्माजी नाक कट जाएगी बिरादरी में, एक ही लड़की है, बहुत लाड से पाला, सारी फरमाईशें पूरी की हमेशा, अब ये शादी की जिद कर बैठी है। बताइए क्या करूँ, कहाँ जाऊँ। उन्हें भी भाई हमने तो यही समझाया।"

"अब नाक कट रही है कमबख्त की , पहले लड़की के रंग-ढंग नहीं दिखते थे क्या, बेटी की कमाई खाते शरम नहीं आ रही थी ठाकुर साहब को, काहे के ठाकुर ... साला गोल्ला, झूठा बदमाश... क्या पता इसी लिए राजी हुआ हो, अब घड़ियाली आँसू बहा रहा है, भीतर से खुश हो रहा होगा कि जेब से धेले का खर्चा नहीं हुआ और लड़की के हाथ पीले हो गए। ... नुकसान तो हमारी बिरादरी का हुआ ना।" नेत्रपाल हाथ नचा कर बोले। उन्होंने आवेश में ज्यों ही हाथ पीछे किया कि चाय से भरा सतरंगी कप छनाक से नीचे जा गिरा। सब रंग फर्श पर बिखर गए।

आसपास कड़वाहट फैल गयी। एकाध पल बाद नेत्रपाल उठे और जमीन पर फैली चाय से पाँव बचाते हुए कुर्ता झाड़ते बाथरूम की तरफ चले गए। वापस लौटे तो देखा कि टेबल पर एक गिलास पानी और एक कप चाय रखी है। दिल भर आया। "देखिए, एक ये मेरी बेटी है दोस्तो।" इस से ज्यादा वे कुछ न कह पाए, गला भर आया। टूटा कप और नीचे गिरी चाय साफ की जा चुकी थी।

"वो भी किसी की बेटी है भाई।" संघप्रकाश ने धीमे परंतु दृढ़ शब्दों में कहा। "इंसान की जिन्दगी के बारे में भी सोचिए जरा, आखिर एक ही जीवन है, हम सबके पास ... जरा पलटकर देखिए नेत्रपालजी, ऐसा लगेगा कि अभी अभी तो मैंने शिक्षा पूरी की थी, अभी नौकरी हुई और बस अभी शादी, फिर बच्चे और ये बच्चे कब बड़े हो गए और आप बूढ़े भी हो गए। बस इतनी छोटी सी जिन्दगी। सोच कर देखिए कितना वक्त मिला है आप को। हम बच्चों को आजादी तो दें, ये दुनिया सुंदर अपने आप हो जाएगी। नियम और नैतिकता में फर्क होता है।"
इस बात ने उन्हें निरूत्तर कर दिया। "मानता हूँ जाटव जी, पर उनकी ये शर्त?" नेत्रपाल की आवाज में विवशता थी।यह बात उन्हें घुन की तरह खा रही थी।

"शर्त...कैसी शर्त?" दोनों दोस्त नेत्रपाल की तरफ देखने लगे।

नेत्रपाल बात का जवाब न देकर ऊंगलियॉं चटकाने लगे। फिर गर्दन दाएँ-बाएँ, आगे-पीछे मोड़ी और सिर झुका बैठ गए।

"क्या शर्त है?" इस बार सुदर्शन शर्मा उतावले होकर बोले। इतना धैर्य कोई कैसे रखे आखिर और क्यों रखे।

"कहते हैं कि शादी के कार्ड में तो हम आपका सरनेम शेखावत लिखेंगे और अगर आप से कोई मेहमान पूछे तो आप खुद को राजपूत ही बताना। बताओ हमें जात छिपाने को कहते हैं। हम क्या सड़क पर पड़े हैं।" गुस्से से तर-बतर उनकी आवाज आई।

संघप्रकाश ने आगे बढ़कर मोर्चा संभालने की कोशिश की –"बच्चों की खुशी के लिए थोड़ी देर को नाटक...।"

"नहीं बिल्कुल नहीं।"  नेत्रपाल ने आँखे तरेर कर देखा तो वे चुप रह गए।
"अरे भाई बाल्मीकिजी, बाबासाहेब ने भी तो कहा है जाति तोडने को, अन्तर्जातीय विवाह की पैरवी भी की थी उन्होंने ... खुद उन्होंने अन्तर्जातीय विवाह करके दिखाया उन कठिन वक्तों में भी।" सुदर्शन ने दॉंव फेंका।

"जात छिपाने से कैसे जात टूटेगी ...बताओ।" नेत्रपाल का चेहरा तन गया। "और जात भी हम छिपाएँ, समझौते भी हमे ही करने होंगे, वाह रे ठाकुर साहब, ठाकुर होंगे अपने घर के, मैं कुछ मजदूरी मॉंगने जा रहा हूँ क्या उनके पास। बिरादरी की ये रूसवाई नहीं होगी मुझसे।"

संघप्रकाश और सुदर्शन उन्हें काफी देर तक यह समझाने में लगे रहे कि शुरू में तो ऐसे ही शादियॉं होंगी, बाद में यही रिश्ते भविष्य के समाज की नींव बनेंगे। पर वे टस से मस न हुए। संघप्रकाश ने उठने का उपक्रम करते हुए कहा "जानवर और पंछी भी अपने बच्चों को बड़ा होने पर आजाद छोड़ देते हैं नेत्रपालजी।"

"हम जानवर नहीं हैं जाटवजी...हम समाज में रहते हैं। "

"बैठिए बैठिए जाटव जी कहाँ चले, हमारे तो पकौड़े बेकार हो गए, पण्डिताइन से भी दो बात सुननी पडेंगी।" सुदर्शन ने उनका हाथ पकड़ कर बैठा लिया।

"इतने व्यर्थ बोझ अच्छे नहीं..." संघप्रकाश ने अपनेपन से कहा, "समाज इंसानों से बनता है और इंसान विवेक से। आप उसी जात के गुण गा रहे हैं जिस की वजह से आप हमेशा अपमानित होते रहे हैं, क्या है इस जात में, बताइए ... आप अपनी जात से मुक्त भी होना चाहते हैं और उसे टूटने भी नहीं देते, मुझे तो दलित लेखकों की ये गांठ समझ नहीं आती कि वे चाहते क्या हैं, जात से मुक्ति या जात की मजबूती।"

नेत्रपाल के दिमाग में अनेक बातें साँपों की तरह लहरा रही थीं पर संघप्रकाश की इस बात ने वाकई उन्हें शान्ति दी। इंसान अपनी जवानी के दिन भुलाना भी चाहे तो ताजिन्दगी उन्हें नहीं भुला पाता। उन्हें भी अपने वो कुछ दिन याद आए जहाँ सिर्फ अच्छी तालीम के सपने ही नहीं थे बल्कि जैसे हर पंछी के मजबूत पंखो के नीचे कोमल पंखों की पाँत भी होती है, वैसे ही उन्हें भी कुछ ऐसा ही भूला बिसरा याद आया।

सुदर्शन ने उन्हें शांत पड़ते देख कहा, "आपकी चाय ठंडी हो गई और मंगाऊँ।"

नेत्रपाल ने ना मे सिर हिला दिया।

"समाज एक रात में नहीं बदलता बाल्मीकिजी, कि एक रात सोये और सुबह जागे तो नई दुनिया बन गयी। सैंकड़ों हजारों वर्ष की आदते हैं हम सब की, वक्त लगेगा।" कमर सीधी करने के बाद अपने घुटने दबाते हुए सुदर्शन बोले, "रही बात राजपूत होने-कहने की तो, तो कह दो कि हो, राजपूत तो आप हो ही, मुझे याद है आपने अपना गोत्र राठौट बताया था, तो शेखावत की जगह राठौड़ लिखवाओ, राठौट की खुदाई करने निकलोगे तो राठौड़ पर ही कहीं पहुँच जाओगे। कभी राठौड़ ही बिगड़कर राठौट हो गया होगा।" नेत्रपाल के चेहरे पर आते जाते भाव वे पढ़ने लगे, "चिराग आपके इस साम्राज्य का पुत्र है तो हुआ न राजपुत्र और ...।"  बहुत ही नाटकीय अंदाज में वे उठे और गम्भीर स्वर में बोले, "इस राजपुत्र का अभिषेक, यह माथुर ब्राहमण विवाह के दिन तिलक लगा कर करेगा।" यह कहते हुए उन्होंने अपनी छाती पर संकल्प भरा हाथ रखा।

संघप्रकाश और नेत्रपाल के चेहरे पर यह सुन कर मुस्कुराहट तैर गई। सुदर्शन शर्मा की इस बात ने नेत्रपाल के मन में एक सवाल जरूर सुलगा दिया, "परशुराम ने जब इक्कीस बार धरती को क्षत्रियों से विहीन कर दिया था तो बाद में क्या नए राजपुत्रों के वंश ऐसे ही तैयार किए गए या वह पूरी कथा ही मनगढन्त है।"

"इतिहास में जाने क्या है और क्या नहीं है पर वहाँ गहरा कुहासा जरूर है और पता नहीं हम जैसों के लिए सच में वहाँ कुछ है भी या नहीं।" नेत्रपाल के मन में यह विचार जाने किस दिशा से बहता हुआ आया और उन्होंने अंधी गुफा में देर तक चलने के बाद जैसे उसका रोशन सिरा पा लिया।

पुनश्च: यह कहानी जब एक पत्रिका में छपी तो जैसा कि होता है, अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएँ मिलीं। पर अचानक एक दिन एक पत्र ने मुझे यह कहकर झकझोर दिया कि यह कहानी हमारी जिन्दगी की है पर अन्त उस का यह नहीं है, जो आप ने लिखा है। यह पत्र किसी पच्चीस वर्षीया कल्पना नाम की युवती का था। उस ने कहानी को वहीं से आगे बढ़ाया, जहाँ मैंने उसे छोड़ा था।

नेत्रपाल अभी इस ऊहापोह में ही थे कि दूसरे कमरे से निकल कर चिराग सामने आ खड़ा हुआ, "क्या पापा आप सुबह सुबह ये क्या बखेड़ा फैलाये बैठे हैं।" चिराग ने सामने बैठे बुजुर्गों को अभिवादन करते हुए कहा।

नेत्रपाल ने उस की तरफ ऐसी आँख मिचमिचा कर देखा जैसे कोई तेज रोशनी के सामने पड़ने पर देखता है, "हम तो तुम्हारे फैलाए बखेड़े को समेटने की कोशिश कर रहे हैं।" उन के स्वर में उलाहना और व्यंग्य था।

"जी ..." इस जी कहने में उपेक्षा और अवमानना थी। "... वो सब सुना मैंने अभी ... आप उस बात से बेफिक्र रहिये।" वह सोफे पर आ कर बैठ गया। उस के चेहरे पर सुकून और सच्चाई थी। "हम दोनों यह पहले ही तय कर चुके हैं कि शादी में न बाजा बारात, न घोड़ी सेहरे की कार्टूनपंती ... बस एक सिम्पल सिविल मैरिज और कुछ लोगों के लिए एक डिनर।"  चिराग ने जैसे पूरी सामन्ती परम्परा को एक पल में ढहा दिया।

सब के मुँह पल भर को खुले रह गये। कुछ देर बाद जाटव साहब के चेहरे पर हल्की मुसकुराहट फैली और साथ ही सरदार ज़ाफरी का शेर,  "नया चश्मा है पत्थर के शिगाफो में उबलने को, ज़माना किस कदर बेताब है करवट बदलने को।"
यह कहते हुए जाटव साहब उठे और "चलता हूँ" कह कर बाहर निकल गये।