पवित्रता - लघुकथा

दिसम्बर का महीना, कड़ाके की ठंड, धुंध ही धुंध। अल सवेरे गाँव का पुजारी पूजा-अर्चना करने के लिए पवित्र होने के लिये तालाब में डुबकी लगाने चला। जल्दी-जल्दी कपड़े उतार कर डुबकी लगा कर तुरन्त ही निकलने लगा तो सामने वाले घाट पर भीखू को देख कर फिर डुबकी लगाई। पुजारी ने सोचा "अगर में जल्दी नहा कर बाहर निकला तो यह गाँव वालों को बता देगा कि पुजारी ढंग से नहीं नहाता।"

उधर भीखू ने भी दुबारा डुबकी लगाई उसने भी यही सोचा कि "पुजारी बाबा गाँव में जाकर कहेगा कि ये गँवार ढंग से नहीं नहाते।"
  
दोनों की लगातार डुबकियों से तालाब के पानी पर जमी पाले की परतें टूटने लगी। धुंध छँटी तो तालाब का पानी खामोश था और दोनों की लाश एक दूसरे से आगे-पीछे होती पानी पर तैर रही थी।

अब गाँव में दो और मंदिर पनप आए हैं, लोग श्रद्धा से इन्हे सुच्चे (पवित्र) बाबाओं के मंदिर कहते हैं।