सुधा भार्गव की लघुकथाऐं

सुधा भार्गव

१- दुनियादारी

पिछले माह से ही मैंने एक खाना बनाने वाली रक्खी है। मुश्किल से होगी 22-23 साल की। सुबह साढ़े पाँच बजे  उठ कर 6 बजे काम को निकल पड़ती है और रात मेँ 9 बजे घर मेँ  घुसती है। करीब सात घरों में भोजन ही बनाती है। उसकी आँखें देखने से मुझे लगता है  मानों वे अशक्त व सूनी सूनी है।एक दिन मैंने पूछ लिया-आँखों से तू बड़ी कमजोर लगती है। बीमार है क्या?
 - हाँ दीदी मेरे नींद नहीं पूरी होती। सोते- सोते 12 बज जाते हैं। मुझे अकसर लो ब्लडप्रेशर हो जाता है।
- जल्दी सोयाकर। नींद पूरी न होने पर बहुत गड़बड़ी हो जाती है। तेरी तो शादी भी नहीं हुई है। फिर घर में काम ऐसा क्या काम!
- मेरी विधवा बीमार दीदी मेरे साथ है। हम सात भाई -बहन हैं। मैं सबसे छोटी पर बड़े होने की ज़िम्मेदारी मैं ही निबाहती हूँ।
- यह तो बड़ी अच्छी बात है पर अपने लिए भी कुछ पैसा बचाकर रखती हैं या नहीं।
- मेरी  सारी  कमाई मेरे परिवार के नाम! भाई को पढ़ाया, बहनों की शादी मेँ मदद की और आजकल अपना सपना पूरा करने मेँ लगी हुई हूँ।
- चल अपने लिए तूने कुछ तो सोचा। मैं तो इसी उधेड़बुन मेँ थी कि बुरे समय के लिए तूने कुछ नहीं बचाया तो न जाने कोई तेरी मदद भी करेगा। जरा मैं भी तो सुनूं तेरा सपना।
- मेरा एक सपना था कि माँ और बापू को घर  बनवाकर दूँगी।वह करीब करीब पूरा होने को आ रहा है। पिछले साल उसके लिए बैंक से कर्ज लिया। वह मैं ही चुकाऊंगी। कुछ साल की ही तो बात है। हठात उसकी बुझी -बुझी आँखें चमक उठीं जो उसकी अंतरंग खुशी का बयान कर रही थीं।
- पर उस मकान मेँ तूने अपना नाम पड़वाया है या नहीं!
- पड़वाया है पर मुझे इससे कोई लेना देना नहीं। वह पूरी तरह बापू का है। वे जो चाहे इसका करें। मेरे लिए मेरी  ज़िंदगी पड़ी है और घना कमा लूँगी। मेरे चारों तरफ उज्जवल सी रोशनी बिखेर मुस्कुराने लगी।
मैं पढ़ी लिखी उसे दुनियादारी ही सिखाती रही पर उस अनपढ़ ने तो मुझे वह दुनियादारी बताई जो बड़ी बड़ी पोथियों मेँ नहीं मिलती।

२- एक छुअन

उसे बुखार ने जकड़ लिया था और एक बार जकड़ा तो ऐसा जकड़ा कि वह उसकी गिरफ्त से छूट ही नहीं पाया। दूसरों के  चार काम करने वाला अब अपना एक काम भी नहीं कर पा रहा था। एकांत क्षणों में बस वह उदास आँखों से शून्य में निहारा करता।
एक दिन पत्नी उसका सिर सहला रही थी,साथ-साथ वर्षों बिताए दाम्पत्य जीवन के अनगिनत  अनुराग भरे स्वरों की खनखनाहट दोनों ही सुन रहे थे। उसने आँखें खोलीं और नजरें पत्नी पर जमा दीं जो हटने का नाम ही नहीं लेती थीं। पत्नी कुछ देर तो देखती रही पर जल्दी हड़बड़ा गई – इतनी देर से मुझे देखे जा रहे हैं ,कहीं ऐसा तो नहीं कि अपनी याददाश्त खो बैठे हों और मुझे पहचानने की कोशिश कर रहे हों।
बेचैनी से उसे झँझोड़ बैठी - क्यों जी क्या बात है?
-तुमको ... बहुत काम ... ।अवसाद भरी धीमी सी आवाज उभर कर आई।
-अरे तो क्या हुआ। पहले आप भाग-भाग कर कितना काम करते थे! मुझे तो कुछ करने ही नहीं देते थे। अपनी सारी परेशानियाँ आपसे कहकर बादल की तरह हल्की हो जाती थी और आप मुसकरा कर कहते-ओह! चिंता न करो। खुश रहो। अब आपको खुश रखने की मेरी बारी है।  
उसकी आँखों से मजबूरी के दो आँसू ढुलक पड़े।
-अरे यह क्या! पत्नी ने अपने आँचल से ढेर सा प्यार उड़ेलते हुए आँसू पोंछ डाले।
उसने अपना अशक्त हाथ आहिस्ता से बढ़ाया। लपककर पत्नी ने उसे थाम लिया। उसे लगा, इस एक छुअन से उसके अंग-अंग में अनगिनत शक्ति पुंजों का स्फुटन होने लगा है जिनसे सशक्त होकर वह यमराज से भी टकरा सकता है।

३- छोटी बहू

बेटी की विदाइगी के समय आकाश की रुलाई फूट पड़ी और सुबकते हुए अपने समधी जी से बोला --भाई साहब, मेरी बेटी  को सब आता है पर खाना बनाना नहीं आता है।
समधी जी ने सहजता से कहा - कोई बात नहीं, आपने सब सिखा दिया, खाना बनाना हम सिखा देंगे।
सरस्वती के पुजारी समधी जी आज फूले नहीं समा रहे थे घर में पढी-लिखी बहू जो आ गई थी। जो भी मिलता कहते - भई, पाँच-पाँच बेटियाँ विदा करने के बाद घर में एक सुघड़ बेटी आई है।
 शाम का समय था कमरे मेँ बिछे कालीन पर एक चौकी रखी थी जिस पर चाय -नाश्ता सलीके से सजा था। नन्द, देवर अपनी भाभी को घेरे बैठे थे और इंतजार मेँ थे कि कब घर की बड़ी बहू आए औए चाय पीना शुरू हो।
कुछ मिनट बीते कि  जिठानी जी धम्म से कालीन पर आकर बैठ गईं और बोली -हे राम, मैं तो बुरी तरह थक गई, मुझसे कोई उठने को न कहना। और हाँ छोटी बहू! मुझे एक कप चाय बना दो और तुम लोग भी शुरू करो।
चाय के घूँट भरने शुरू भी नहीं हुये थे कि छोटे बेटे को ढूंढते हुये ससुर जी उस कमरे मेँ आ गए और बोले -रामकृष्ण तो यहाँ नहीं आया?
 बड़ी बहू ने जल्दी से सिर पर पल्ला डाल घूँघट काढ़ लिया। छोटी बहू तुरंत खड़ी हो गई और एक कुर्सी खींचते हुये बोली - बाबू जी आप जरा बैठिए  मैं आपके लिए चाय बनाती हूँ। भैया जी तो यहाँ नहीं आए।
-न बहू, मैं जरा जल्दी मेँ हूँ। चाय रहने दे।
फिर बड़ी बहू से बोले - मैं चाहता हूँ अब से तुम भी पर्दा न करो, नई बहू आजकल के जमाने की है। अब कोई पर्दा-सर्दा नहीं करता।
- पहले जब मैं पर्दा नहीं करना चाहती थी तब मुझसे पर्दा कराया गया, अब आदत पड़ गई तो कहा जा रहा है कि पर्दा न करो। अब तो मैं पर्दा करूंगी।
नई नवेली बहू आश्चर्य से जिठानी जी की तरफ देख रही थी - यह कैसा पर्दा! बड़ों के प्रति जरा भी शिष्टता या आदर भावना नहीं!
ससुर जी बड़ी बहू के रवैये से खिन्न हो उठे। उसने नई दुल्हन का भी लिहाज न किया। अपना सा मुँह लेकर चले गए।
उनके जाते ही एक वृद्धा ने कमरे मेँ प्रवेश किया।
- यहाँ कोई आया था? जासूस की तरह पूछा।
- हाँ! बाबू जी आए थे। जिठानी जी ने कहा।
- बात कर रहे थे?
- हाँ, बाबा जी मम्मी से कुछ कह रहे थे और चाची जी से भी बातें की थीं। चाची जी से तो बात करना सबको अच्छा लगता है। हमको भी अच्छा लगता है। वे हैं ही बहुत प्यारी-प्यारी। ऐसा कहकर बच्चे ने छोटी बहू का हाथ चूम लिया।
- छोटी बहू, अभी तुम नई-नई हो। ससुर से बात करना ठीक नहीं। भौं टेढ़ी करते हुये वृद्धा बोली।
- यदि  मुझसे कोई बात पूछे, उसका भी जबाव न दूँ? यह तो बड़ी अशिष्टता होगी!
दूसरे ही क्षण मेहमानों से भरे घर मेँ हर जुबान पर एक ही बात थी -
छोटी बहू बड़ी तेज और जबानदराज है।

४- जय महादुर्गा

पौ फटते ही बच्चे झुंड में नजर आने लगे। उम्र रही होगी चार वर्ष से बारह वर्ष के मध्य। ज़्यादातर वे थे जिन्हें न अपने जन्म का पता था, न ही यह मालूम कि कहाँ जाना है।
कुछ भी हो, सबके चेहरों पर उल्लास और खुशी के कमल खिल रहे थे। घर-घर जाकर पूरी-हलुआ खाना था। दुर्गा अष्टमी के दिन गृहिणियाँ बड़े चाव से कन्या-लांगूरे जिमाने की तैयारी में सुबह से ही नहा-धोकर जुट गई थीं। गली-गली पूड़ी-हलुए की खुशबू से महक रही थी। सड़कों पर घूमती बच्चों की टोली के मुंह से लार टपकने लगी। लगता था अगले 5-6 दिन के भोजन का जरूर जुगाड़ करके रखेंगे। भूखे मरने से तो अच्छा है बासी-कूसी खाकर सो जाएँ। अंदर जाकर वह जहर का काम करेगा या अमृत का, इससे सब बेखबर। फिर अमृत खा-पीकर करेंगे भी क्या! अभावों की ज़िंदगी में उन्हें कोई रास न था।
भूख से तड़पता दस साल का दुबला सा लड़का आलीशान बिल्डिंग के ‘ए’ब्लॉक में जाने लगा।
उसके साथी ने पूछा - कहाँ जा रहा है?
- ‘ए’ ब्लॉक में पहले पहुँचकर हलुआ-पूड़ी ले लूँगा। फिर यहाँ आऊँगा।
- अरे! तू मरगिल्ला तो बहुत चालाक है। खबरदार ‘ए ’ब्लॉक की तरफ कदम बढ़ाए। वह इलाका मेरा है।
- अगर जाऊंगा तो क्या कर लेगा?
- हड्डी-पसली एक कर दूंगा।
लंबे-चौड़े लड़के की धमकी से दुबला-पतला बच्चा सहम गया। सब साथी उसे छोडकर भाग गए। वह धीरे-धीरे जहां भी जाता, उसे देखते ही दरवाजा पट से बंद हो जाता और एक कर्कश आवाज अंदर से आती, ‘सुबह से इन बच्चों ने तंग कर रखा है। भाग जा, बहुत लोगों को दे दिया। तेरी झोली भी भारी होगी। थमा आया होगा अपनी माँ को।
डबडबाते आंसुओं को संभाले सड़क के एक कोने में खड़ा वह रोने लगा। दूर खड़े दरबान ने उसके रोने का कारण समझ लिया। लाठी बजाता बोला - चल, मैं दिलवाता हूँ तुझे हलुआ-पूरी।
लड़का अपने दयावान के पीछे-पीछे चल दिया। थके पैरों में गज़ब की ताकत आ गई।
- जा, इस बड़ी बिल्डिंग में घुस जा। दस फ्लेटों में बहुत माल मिलेगा। मैं किसी छोकरे को इसमें नहीं घुसने दूंगा। चल-चल, जल्दी कर।
लड़के ने अपने अन्नदाता को सिर झुकाया। फुर्ती से एक तल्ले की उसने घंटी बजाई। अधेड़ औरत ने एक लिफाफा उसे पकड़ा दिया। जल्दी-जल्दी हलुआ खाया, पूड़ियाँ जेब में घुसेड़ लीं। चवन्नी दूसरी जेब में छिपा ली। 10 घरों में पाए लिफाफे को नन्हें हाथ समेट नहीं पा रहे थे। सीढ़ियों से उतरते सोच रहा था, दरबान जी तो मेरे भगवान है। अपने भगवान का भी भोग लगाऊँगा।
एक लिफाफा दरबान की तरफ बढ़ाते हुए बोला - खाओ न।
-अरे मुझे क्या अपने जैसा समझ रखा है। सब मुझे थमा दे। इस वक्त का तो तूने खा ही लिया। शाम के लिए कुछ पूड़ियाँ ले ले और दफा हो जा वरना यह डंडा देखा है।
लड़का अपने भगवान का यह रूप देख टुकड़े-टुकड़े हो गया। अभी कुछ दूर ही जा पाया था कि कानों में किसी के चिल्लाने की आवाज आई, ए छोरे! तुझे दक्षिणा में क्या मिला? इधर आ,जरा तेरी पेंट टटोलूँ।
डर के मारे उसने 10 रुपए दरबान की हथेली पर रख दिए।
"हा-हा, सयाना बच्चा है। आधा-साजा कर। ले अपने 5 रुपए और 5 की मैं बीड़ी पीऊँगा। जय महादुर्गा।" एक पैशाचिक हंसी उसके चेहरे पर थी।
हथेली पर पाँच रुपए! लड़के ने कसकर मुट्ठी बंद कर ली और उसे लेकर भागा कि एक राक्षस से उसे छुटकारा मिला कही दूसरा न आ धमके। तभी एक टूटी-फूटी कार हिचकोले खाती उसके पास रुकी। दरवाजा खुला, एक खुरदुरे हाथ ने बाहर निकलकर उसे अंदर खींच लिया और दूसरा हाथ उसके सामने फैल गया। वह काँपा, मुट्ठी थरथराई, उसमें जो कुछ था वह भयंकर खंदक समान हथेली में समा गया।