तुलनात्मक शोध और उसकी विशेषता

बृजेश प्रसाद

बृजेश प्रसाद (शोधार्थी)

मास्टर्स – जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी नई दिल्ली
एम.फिल – गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय
पीएचडी- प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी कोलकता
चलभाष: +91 898 114 9833
ईमेल: prasadb045@gmail.com

तुलना मनुष्य की जन्मजात प्रवृत्ति रही है। अपनी इसी प्रवृत्ति के द्वारा मनुष्य वस्तुओं में अंतर्निहित अंतर को तथा उनकी श्रेष्ठता को जानने की कोशिश करता है। अर्थात ज्ञान की परिपुष्टि एवं समृद्धि वस्तुतः तुलना के बिना संभव नहीं है। तुलनात्मक शोध विज्ञान, कला, साहित्य आदि विभिन्न क्षेत्रों का अनुवेक्षण एवं मूल्यांकन करता है। यह मानव के सीमित ज्ञान क्षेत्र को विस्तृत करता है और उसके भाषागत, साहित्यिक एवं प्रादेशिक बंधनों को ज्ञानार्जन में बाधा नहीं डालने देता, बल्कि ज्ञान की सीमाओं को विस्तृत करता है। 
 भारत बहुभाषिक देश है, अतः भारतीय साहित्य के इतिहास की अवधारणा के निर्माण के लिए तुलनात्मक शोध आवश्यक है। तुलनात्मक शोध का मूल उद्देश्य एक विस्तृत परिपेक्ष्य में विभिन्न भाषाओं, साहित्यों, कलाओं, विज्ञानों आदि का अध्ययन मनन है जिससे कि उसका उचित अभिज्ञान या रसास्वादन हो सके तथा उन भाषाओं, साहित्यों, कलाओं, विज्ञानों आदि के बारे में एक समुचित विचारधारा का विकास हो सके।

तुलनात्मक शोध: अर्थ, परिभाषा और स्वरूप 

ज्ञान की किसी भी शाखा में नवीन तथ्यों, विचारों, अवधारणा या सिद्धांतो की खोज के लिए अपनाई गयी क्रमबद्धता प्रक्रिया ‘शोध’ कहलाता है। शोध के तमाम पद्धतियों में ‘तुलनात्मक शोध’ एक महत्वपूर्ण पद्धति है। अंग्रेजी में इसे ‘कम्परेटिव रिसर्च’ कहा जाता है। जब हम किसी दो वस्तुओं या व्यक्तियों में साम्य अथवा वैषम्य को ढूंढने की कोशिश करते हैं तो यह प्रक्रिया तुलना या तुलनात्मक कहलाती है, लेकिन जब हम तुलनात्मक शोध की बात करते हैं तो यह दोनों शब्द मिलकर एक विशिष्ट अर्थ का निर्माण करते है। तुलनात्मक शोध कहने से ही पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि यह किन्हीं दो रचनाओं, लेखकों, काव्यांदोलनों, या किन्हीं अन्य साहित्यिक पक्षों को लेकर एक ही भाषा या किन्हीं दो भाषा के स्तर पर किया जाने वाला शोध है। अर्थात जब दो कृतियों, दो भाषाओं, दो लेखकों, दो कालों, परिवेशों आदि को स्वतंत्र आधार प्रदान कर उनका सामानांतर अध्ययन-विश्लेषण किया जाता है तो वह ‘तुलनात्मक शोध’ कहलाता है।
तुलनात्मक शोध के संदर्भ में विभिन्न विद्वानों के मत –
बैजनाथ सिंघल के अनुसार –“इस प्रकार के शोध में ‘विषमता’ बताने के लिए ‘साम्य’ और ‘साम्य’ बताने के लिए ‘विषमता’ जरूरी है।’’

सुन्दर रेड्डी के अनुसार – “तुलनात्मक शोध मानव के सीमित ज्ञान क्षेत्र का विस्तार करता है। देश की एकता एवं राष्ट्रीय जीवन की एकता के लिए विभिन्न भारतीय भाषाओ एवं साहित्यों का अध्ययन आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।’’

मेक्समूलर के अनुसार – “All higher knowledge is gained by comparison and rests on comparison.”
हेनरी एच. एच रेमाक के अनुसार –“तुलनात्मक अध्ययन एक राष्ट्र के साहित्य की परिधि के परे दूसरे राष्ट्रों के साहित्य के साथ तुलनात्मक अध्ययन है। यह अध्ययन कला, इतिहास, समाज, विज्ञान, धर्मशास्त्र आदि ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों के आपसी संबंधों का भी अध्ययन है।’’
 उपयुक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कह सकते हैं कि विभिन्न भाषाओं तथा साहित्यों की विशेषताओं में से साहित्यगत एकरूपता या समानता का निरूपण करना तुलनात्मक शोध का मुख्य उद्देश्य है। इससे अध्ययन को व्यापक परिप्रेक्ष्य मिलता है। तुलनात्मक शोध द्वारा विभिन्न साहित्यों की समानताओं एवं विभिन्नताओं का विवेचन करके इनके कारणों का अन्वेषण किया जाता है, और विश्व मानव एवं विश्व मानवतावाद का पुनः सुदर्शन किया जाता है। अतः इस तरह की तुलनात्मकता के जरिये हम नवोन्मेषक ज्ञान-परम्परा से परिचित होकर आंतरिक भव्यता और वैश्विक ज्ञान-सम्पदा से अवगत हो सकते है।

तुलनात्मक शोध को मुख्यतः हम चार कोटियों में बाँटकर देख सकते है –

एक ही साहित्य के अंतर्गत तुलनात्मक शोध 
एक साहित्य का अन्य साहित्यों पर प्रभाव 
दो या दो से अधिक साहित्यों का तुलनात्मक अध्ययन
सामान युग की साहित्यिक धारा का अध्ययन

उदाहरण के लिए ‘निराला और पन्त के काव्य की तुलना’ विषयक शोध को एक ही साहित्य के अंतर्गत तुलनात्मक शोध कहेंगे। ‘हिंदी कथा-साहित्य और विश्व कथा-साहित्य’ विषयक शोध को एक साहित्य का अन्य साहित्य पर प्रभावपरक शोध कहेंगे। ‘हिंदी और तमिल में रेडिओ नाटक’ विषयक शोध को दो या दो से अधिक साहित्यों का तुलनात्मक शोध कहेंगे। ‘हिंदी और बंगला के वैष्णवभक्ति साहित्य का अध्ययन’ विषयक शोध को समान युग की साहित्यिक धारा का अध्ययनपरक शोध कहेंगे। 
तुलनात्मक शोध के अंतर्गत विषय के अध्ययन तथा निरीक्षण एवं परीक्षण के सन्दर्भ में अनुसंधानकर्ता को निम्नलिखित तत्वों के प्रति ध्यान देना नितांत आवश्यक है ताकि प्रस्तुत विषय और तुलनीय विषय के सम्बन्ध में पूर्ण ज्ञान की उपलब्धि हो सके, अतः वे तत्व है –
समता 
अभेद
पार्थक्य 
विषमता आदि 

अर्थात यह तत्व तुलनात्मक शोध अध्येता की योग्यता के विकास का अवसर प्रदान करता है और वह दो साहित्यों से जुड़ी हुई समस्याओं का विश्लेषण कर पाता है। 

तुलनात्मक शोध के विविध आयाम 

तुलनात्मक शोध के लिए विषय का चयन कई प्रकार से किया जा सकता है-
एक ही भाषा के साहित्य के अंतर्गत दो कवियों, लेखकों, व्यक्तित्व व कृतित्व, काव्यों, प्रवृत्तियों एवं युगों आदि की तुलना। जैसे कबीर व रैदास की तुलना या देव व बिहारी की तुलना। इसके अतिरिक्त प्रवृत्तियों एवं युगों के आधार पर ‘प्रगतिवाद एवं प्रयोगवाद की साहित्यिक, सांस्कृतिक चेतना का तुलनात्मक अध्ययन’ जैसे विषय को तुलनात्मक शोध का विषय बनाया जा सकता है।
एक भाषा के साहित्य का दूसरे भाषा के साहित्य का प्रभाव जैसे विषयों को भी तुलनात्मक शोध के विषय के अंतर्गत रखा जा सकता है। जैसे ‘हिंदी साहित्य पर संस्कृत साहित्य का प्रभाव’।
एक साहित्य का दूसरे साहित्य के कृतियों पर प्रभाव (जैसे –हिंदी रामकाव्यों पर वाल्मीकि रामायण का प्रभाव) जैसे क्षेत्रों को भी तुलनात्मक शोध का विषय बनाया जा सकता है।
एक ही भाषा के साहित्य में दो या दो से अधिक कृतियों की तुलना, हम तुलनात्मक शोध का विषय बना सकते है।
दो लेखकों, कवियों, रचनाओं, प्रवृत्तियों एवं युगों आदि की तुलना भी हम तुलनात्मक शोध के अंतर्गत कर सकते हैं। 
एक ही कवि की दो कृतियों की तुलना, जैसे –‘सूरदास के सूरसागर और सुरसरावली की तुलना’।
इस तरह के शोध में बोलियों, लोकगीतों के अलावा एक साहित्य पर अन्य साहित्य की प्रवृत्तियों का प्रभाव जैसे विषयों को भी तुलनात्मक शोध के विषय के रूप में चुना जा सकता है। जैसे –‘बुन्देली और कन्नौजी लोकगीतों की तुलना’ एवं ‘हिंदी स्वच्छंदतावादी काव्य पर अंग्रेजी रोमंटीसिज्म का प्रभाव’ आदि। 

तुलनात्मक शोधार्थी के गुण 

साहित्य के शोधार्थी के लिए आवश्यक सभी गुणों के साथ-साथ तुलनात्मक शोधार्थी में कुछ विशेष गुणों की आवश्यकता होती है, यथा-
स्वाभाविक अभिरुचि और उत्सुकता 
अनिवार्य तटस्थता एवं ईमानदारी
बौद्धिक प्रामाणिकता 
तुलनीय भाषाओं तथा साहित्यों का पूर्ण ज्ञान 
तुलनात्मक अध्ययन की प्रविधि का ज्ञान
विषय कि मौलिकता, उपयुक्तता एवं संभाव्यता का ज्ञान 
तुलनीय भाषा समुदायों के इतिहास एवं संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में सामग्री की व्याख्या एवं विश्लेषण करने की क्षमता 
तथ्यों और उपलब्धियों की उच्चतर आलोचना एवं मूल्यांकन की योग्यता 
शोधार्थी पूर्वाग्रह से मुक्त हो
तुलनात्मक शोध करने वालों की दृष्टि तटस्थ और वस्तुनिष्ठ होनी चाहिए... आदि 

तुलनात्मक शोध की विशेषताएँ

भारत विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों का देश है। राज्यों की संस्कृति वहाँ की भाषा के साहित्य में निहित रहती है। इस संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर एकता की अनुभूति से तभी जोड़ा जा सकता है जब अधिक से अधिक लोग उससे परिचित हों। अर्थात तुलनात्मक शोध की यही विशेषता है जो किसी भी देश के साहित्य, कला, संस्कृति, धर्म, ज्ञान-विज्ञान से हमें परिचित करता है।
इस प्रकार तुलनात्मक शोध के दौरान उसकी निम्नलिखित विशेषताएँ सामने उभर कर आती है-
तुलनात्मक शोध द्वारा कृति या कृतिकार में सत्यान्वेषण करके निष्कर्षों का नवीन सन्दर्भ और नवीन रूप निकाला जाता है, अतः तुलनात्मक शोध मनुष्य के विचारों, भावों और सामाजिक चेतना का दर्पण है। 
भारतीय भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन का अपना विशिष्ट महत्व है क्योंकि भारत की सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विविधता की अनुभूति हमें तुलनात्मक शोध के द्वारा ही प्राप्त हटा है।
तुलनात्मक अनुसंधान पूर्वाग्रहों से मुक्ति दिलाता है।
एक भाषा के साहित्य से दूसरी भाषा के साहित्य में एकरूपता, साम्यता एवं वैषम्य का निरूपण करना तुलनात्मक शोध का मुख्य उद्देश्य है।
इसके माध्यम से एक ही देश की विविध इकाइयों को परस्पर निकट आने को प्रोत्साहन मिलता है।
तुलनात्मक शोध व्यक्तित्व, मानसिक प्रक्रिया, सामाजिक, राजनैतिक, एवं सांस्कृतिक स्थिति पर सारगर्भित ज्ञानोन्मेषक प्रकाश डालता है।
समस्यामूलक शोध में भी तुलनात्मक शोध की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। किसी भी समस्या पर एक ही समय में अलग-अलग रचनाकार क्या सोचते हैं, यह तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से ही जाना जा सकता है।
तुलनात्मक शोध के जरिये ही हमें किसी राष्ट्र अथवा विश्व के साहित्यिक-सांस्कृतिक उत्कर्ष या फिर मानवता की भावना को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं।
इसका उद्देश्य दो भिन्न आयामों के बीच साम्य-वैषम्य का पता लगाना होता है।
तुलनात्मक शोध के लिए प्राचीन या आधुनिक का कोई अर्थ नहीं, वस्तुतः वहाँ जो भी तुलनीय है वही तुलनात्मक शोध का विषय बन जाता है।
तुलनात्मक शोध मनुष्य के विचारों, भावों और सामाजिक चेतना का दर्पण होता है।
भाषा और साहित्य का गहन संबंध स्थापित होता है। 
हिंदी और हिंदीतर भाषाओं में तुलनात्मक शोध इसकी सार्थकता को लक्षित करता है  आदि।

तुलनात्मक शोध की समस्याएँ 

तुलनात्मक शोध के सन्दर्भ में अनेक सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक समस्याएँ आती हैं, जो निम्नलिखित है...
पहली समस्या शोधार्थी सम्बन्धी होती है, यदि तुलनात्मक शोध दो या दो से अधिक भाषाओं से संबद्ध हो तो शोधार्थी से यह अपेक्षा की जाती है कि उस भाषा एवं साहित्य के साथ-साथ शोध विषय से संबंधित क्षेत्रों पर भी उसका पूरा अधिकार हो।
तुलनात्मक शोध से संबंधित भाषाओं में यदि एक भाषा शोधार्थी की मातृभाषा हो तो तुलनात्मक शोध के समय दूसरी भाषा के साहित्य पर भी उसका सामान अधिकार होना नितांत आवश्यक है।
तुलनात्मक शोध के दौरान शोध का क्षेत्र का कार्य किसी एक पक्ष के छोटे या बड़े होने पर केन्द्रित नहीं होना चाहिए।
तुलनात्मक शोध का कार्य इस प्रकार से प्रस्तुत किया जाना चाहिए कि उसमें बिखराव सा न रहे। 
शोध करते समय शोधार्थी को किसी एक साहित्य के प्रति पूर्वग्रह या पक्षपात नहीं करना चाहिए, ऐसी स्थिति होने पर तुलनात्मक अध्ययन एवं मूल्यांकन में बढ़ा उत्पन्न होती है 
तुलनात्मक शोध में शोध-निर्देशकों को भी यह आवश्यक है कि वह विषय से संबंधित दोनों भाषा की साहित्य पर सामान अधिकार रखे। अर्थात दोनों भाषाओं अथवा एक ही भाषा के विभिन्न तुलनात्मक प्रकारों के लिए निर्देशक का ज्ञान शोधार्थी से अधिक होना चाहिए।
शोध-प्रबंध का मूल्यांकन करने वाले परीक्षक के लिए भी आवश्यक है कि उसे तुलनात्मक शोध से संबंधित भाषा एवं साहित्य पर पूर्ण अधिकार हो, तभी इस तरह के मूल्यांकन के साथ न्याय संभव है।
सामान्य दृष्टि से ‘तुलनात्मक शोध’ सहज प्रतीत हो सकता है, किन्तु सामान्य शोधकार्य की अपेक्षा तुलनात्मक शोध अधिक कठिन होता है। इसलिए शोधार्थी और निर्देशक दोनों को तटस्थ और निरपेक्ष भाव से शोध में जुटना चाहिए।
अर्थात इस प्रकार इन व्यावहारिक समस्याओं से निदान पाकर ही ‘तुलनात्मक शोध’ वास्तविक शोध बन पायेगा अन्यथा वह केवल दो कृतियों, प्रवृत्तियों, भाषाओं के साहित्य का मात्र अध्ययन होगा, शोध नहीं।

निष्कर्ष 
इस प्रकार देखा जा सकता है कि भारतीय अवधारणा को विकसित करने में तुलनात्मक शोध का महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि तुलनात्मक शोध के सहारे ही हमें किसी राष्ट्र अथवा विश्व के साहित्यिक-सांस्कृतिक उत्कर्ष या फिर मानवता की भावना को बेहतर समझ सकते हैं। मसलन तुलनात्मक शोध मनुष्य के विचारों, भावों और सामाजिक चेतना का दर्शन कराता है। जिससे भाषा और साहित्य में गहन अध्ययन व संबंध स्थापित कर उसकी क्षितिज को विस्तृत किया जा सकता है।
अतः हमें तुलनात्मक साहित्य एवं शोध को स्तरीय बनाने हेतु इसमें आ रही समस्याओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है, तभी तुलनात्मक अध्ययन एवं तुलनात्मक शोध का विकास स्वस्थ एवं संतोषप्रद संभव हो सकता है।

संदर्भ

1. शोध स्वरूप एवं मानक व्यावहारिक कार्य विधि :- बैजनाथ सिंघल
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 
2. तुलनात्मक साहित्य भारतीय परिप्रेक्ष्य :- इंद्रनाथ चौधरी 
 वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 
3. तुलनात्मक अनुसंधान एवं उसकी समस्याएँ :- एस. गुलाम 
हिंदी साहित्य भंडार, लखनऊ 
4. तुलनात्मक अध्ययन स्वरूप और समस्याएँ :- डॉ राजमल बोरा और डॉ भ.ह. राजुकर 
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली  
5. शोध और सिद्धांत :- डॉ नगेन्द्र, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली 
6. हिंदी अनुसंधान :- विजयपाल सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद 
7. हिंदी अनुसंधान (सिद्धांत और व्यवहार):- डॉ सुरेश ‘निर्मल’, अमित प्रकाशन, गाजियाबाद (उ.प्र.)
 8. कक्षा व्याख्यान: प्रो आलोक गुप्ता, केन्द्रीय विश्वविद्यालय गुजरात 


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