कुणाल शर्मा की लघुकथाएँ

कुणाल शर्मा

उपेक्षित

वह कक्षा में फर्श पर अकेला बैठा रहता था। कक्षा के लगभग सभी विद्यार्थी उसे अपने साथ बेंच पर बैठाने से कतराते थे। उसकी पैंट की दोनों जेबें उधड़ी रहती और ऊपर के दोनों बटन कमीज से नदारद। शरीर हड्डियों का ढांचा था और दाँत पीले पड़े हुए थे। उसके करीब खड़े होने पर तीखी बदबू नथुनों में उतर जाती। अपने पीरियड में तो मैं उसे दूसरे बच्चों के साथ बेंच पर बैठा देता, परंतु बाद में वह फिर से फर्श पर बैठा नजर आता। पिछले कई रोज से मैं उसे अपने विषय की पाठ्य-पुस्तक लाने के लिए टोक रहा था, परंतु वह रोज एक ही जवाब देता, “मास्टर जी,  कल ले आऊंगा।”

उस दिन मैंने कक्षा में पढ़ाने के लिए पुस्तक खोलते हुए सभी विद्यार्थियों पर एक नजर डाली। वह कक्षा में अकेला था जो फिर से किताब नहीं लाया था।

“क्यों बे, तू आज भी किताब नहीं लाया?” मैं उस पर गरजा।”

“मास्टर जी, कल ले आऊंगा।”

उसका जवाब सुनकर मैं गुस्से से भर गया और बालों से खींचते हुए उसके गाल पर चार-पाँच थप्पड़ जड़ते हुए बोला, “किताब क्यों नहीं लाता तू? क्या करता है तेरा बाप?”

“सर, इसके माँ-बाप नहीं हैं, अपने चाचा के पास रहता है।” उसकी बगल में बैठा लड़का बोला।

यह सुनकर मेरा गुस्सा थोडा हल्का पड़ गया मानों किसी ने गर्म तवे पर पानी के छींटे मार दिए हों। चेहरे पर बनावटी गुस्सा लिये मैंने फिर से उससे जवाब तलब किया,  ”अबे गधे, जब तेरे पास किताब ही नहीं है तो स्कूल में क्या करने आता है?”

“जी ... स्कूल में भरपेट खाना मिल जाता है।” उसने सुबकते हुए जवाब दिया।

उसका जवाब सुनकर मैं निरुत्तर-सा हाथ में पुस्तक थामे कुर्सी में धँस गया।
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अटूट बंधन 

बिस्तर के सिरहाने रखी अलार्म घड़ी घनघना उठी। दीनदयाल जी की नींद टूटी। उन्होंने हाथ बढ़ा अलार्म बंद किया। फिर बिस्तर छोड़कर कमरें से बाहर आ गए । सूने पड़े आँगन में हवा संग उड़कर आये सूखे पत्ते तितर-बितर पड़े थे। सुबह-सवेरे आँगन में झाड़ू लगाती पत्नी जानकी की आवाज रोज  उनके कानो में पड़ती थी :  “अब उठ भी जाओ,  दफ्तर जाना है … मैं आपके लिए खाना तैयार करती हूँ।” भूख हो या ना हो जानकी उन्हें कभी भूखे पेट घर से नहीं निकलने देती थी और साथ में दफ्तर के लिए भी टिफ़िन थमा देती थी।

पिछले तीन दिन से जानकी, मौहल्ले की औरतों के साथ तीर्थाटन पर गई हुई थी। दीनदयाल जी ने बाहर आकर बगल वाले कमरें की ओर देखा, अंदर बत्ती बन्द थी। वे समझ गए कि बेटा-बहू अभी जागे नहीं हैं। रसोई में चाय की पतीली चूल्हे पर चढ़ाकर उन्होंने एक कप चाय बनाई। चाय पीकर वे नहाने के लिए गुसलखाने में दाखिल हो गए। नहाकर तैयार हुए तो देखा कि बेटे-बहू के कमरें की ट्यूब लाइट अभी भी बन्द थी। वे रसोईघर में गए तो पिछले दो दिनों की तरह आज भी कटोरदान ओंधे मुँह पड़ा था। भूख से उनकी अंतड़ियां कुलबुला रही थी। दो दिन तो शनिवार, इतवार के कारण दफ्तर बंद था, सो चल गया। आज तो उन्हें दफ्तर जाना था।
काफी इंतजार के बाद भी बेटे-बहू के कमरे से किसी तरह की हलचल का कोई लक्षण दिखाई नहीं दिया तो वे दफ्तर के लिए निकल पड़े।

अभी वे घर के गेट तक ही पहुँचे थे कि तीर्थयात्रा से लौट रही पत्नी ने उन्हें रोक लिया : ”नाश्ता कर लिया क्या आपने? और टिफिन कहाँ है?”

“आज भूख नहीं है, सोचा दफ्तर में ही कुछ लेकर खा लूंगा।” उन्होंने अपने भीतर की उदासी पर मुस्कराहट चिपकाते हुए कहा।

“चलो, मैँ अभी नाश्ता बना देती हूँ, खाली पेट दफ्तर नहीं जाना।” पत्नी हाथ पकड़ उन्हें भीतर खींच ले गई।
वे भी भावुक हो उठे, “तुम कब तक?”

“जब तक मैं हूँ, तुम नाश्ता किये बिना नहीं जा सकते। मेरे जाने के बाद जो जी में आये करना।” वो आत्मीयता भरे गुस्से से बोली।

“जानकी, तुम कभी मत जाना, कभी मत … ” आँखों के कोरों में आई नमी पोंछते हुए उन्होंने मन ही मन कहा।
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प्रसाद

जेब से पाँच का सिक्का निकाल उसने चारपाई पर गुलदाना बेच रहे  लड़के की ओर बढ़ा दिया और गुलदाने का लिफाफा लेकर भक्तों की कतार में जुड़ गया ।

मंगलवार का दिन था। मन्दिर में अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा भीड़ थी। पंडित जी भक्तों से प्रसाद लेकर हनुमान जी की मूर्ति के मुख को छुआते। फिर थोडा प्रसाद पास में ही पड़ी परात में उँड़ेल देते और शेष भक्तों को वापिस कर देते। वह भी अपने बच्चे को गोद में लिए कतार में आगे बढ़ रहा था ।

मन्दिर के पाट पर पहुँचते ही बच्चे ने रोना शुरू कर दिया। उसने हनुमान जी की मूर्ति की तरफ इशारा कर बच्चे को बहलाना चाहा। परंतु बच्चे का ध्यान मूर्ति से ज्यादा परात में पड़े चमचमाते सेब पर था। बच्चा अपनी नन्ही उँगलियों से सेब की और इशारा कर रहा था और गोद से छुटा जा रहा था। पंडित जी की नजर भी कभी बच्चे पर, तो कभी सेब पर पड़ रही थी। उसने अपना प्रसाद का लिफाफा पंडित जी की ओर बढ़ा दिया। बच्चा  रिरियाते हुए बार-बार उँगली सेब की तरफ कर रहा था । पंडित जी का हाथ परात में पड़े सेब को उठाते-उठाते ठिठक गया और परात में पड़ा एक बताशा उन्होंने बच्चे के हाथ में थमा दिया।

साथ ही खड़े एक भक्त ने  मिठाई का डिब्बा और सौ रुपये पंडित जी की ओर बढ़ाए। इस बार पंडित जी का हाथ चमचमाते सेब पर पड़ गया था।
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