वर्तमान समय में समावेशी शिक्षा की आवश्यकता एवं प्रमुख चुनौतियाँ

विरेंद्र कुमार

विरेंद्र कुमार


सारांश
प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय संदर्भ में समावेशी शिक्षा की वर्तमान समय में आवश्यकता एवं प्रमुख चुनौतियों की स्थिति का विश्लेषण करने की चेष्टा करता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी विकलांग बच्चे विकास की मुख्यधारा से अलग-थलग दिखाई पड़ते हैं। सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर पर उनके विकास के लिए किए जाने वाले अनेकानेक प्रयत्नों के बावजूद विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं आया है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की अधिकांश आबादी आज भी समाज की मुख्यधारा से जुड़ नहीं पायी है। विकास के एक मुख्य मापदंड के रूप में शिक्षा के महत्व को देखते हुए यह आवश्यक है कि विकलांग बालकों की शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान दिया जाए। प्रस्तुत शोध पत्र में समावेशी शिक्षा की आवश्यकता एवं उसकी चुनौतियों का तथ्यात्मक एवं संख्यात्मक वर्णन किया गया है। इसमें अशिक्षा से उत्पन्न होने वाली सामाजिक विकृतियों एवं असमानता से बचने की बात करते हुए समावेशी शिक्षा की बात कही गयी है। जिससे विकलांग बालक अपने आपको समाज का एक कटा हुआ भाग न समझ कर समाज का हिस्सा ही समझे, इसके साथ ही विद्यालय एवं समाज के लोग भी उनके साथ सामान्य व्यवहार करें। विभिन्न शोध अध्ययनों, सरकारी एवं गैर सरकारी योजनाओं का उल्लेख करते हुए प्रस्तुत शोध पत्र के द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया है कि यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक उत्तरदायित्व है कि हाशिये पर पड़े हुए विशिष्ट बालकों की शिक्षा के संबंध में जानकारी एकत्रित की जाए जिससे उन्हें समावेशी शिक्षा में शामिल करते हुए उनको देश तथा समाज में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए तैयार किया जा सके।

प्रमुख प्रत्यय/शब्दावलीः समावेशी शिक्षा, साक्षरता दर, विकलांगता, समावेशी शिक्षा की आवश्यकता, चुनौतियाँ ।

प्रस्तावनाः
शिक्षा का संबंध मनुष्य की संज्ञानात्मक, भावनात्मक, एवं सामाजिकता के गुणों के उन्नयन से है। जीवन में शिक्षा की इतनी अधिक उपयोगिता है कि कहा गया है “बिना शिक्षा व ज्ञान के मनुष्य पशु के समान है। (निरुपमा, 2010). वर्तमान समय में सामान्य शिक्षा के साथ-साथ समावेशी शिक्षा पर अत्यधिक जोर दिया जा रहा है। समावेशी शिक्षा, शिक्षण की ऐसी प्रणाली है जिसमें विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ मुख्यधारा के स्कूलों में पठन-पाठन और आत्मनिर्भर बनने का मौका मिलता है जिससे वे समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकें। इसके तहत स्कूलों में पठन-पाठन के अलावा विकलांग बच्चों के लिए बाधारहित वातावरण का निर्माण कार्य भी शामिल है। शिक्षण की इस नवीन प्रणाली से हाशिये पर के वे बच्चे लाभान्वित होते हैं जिन्हें अपनी दिनचर्या से लेकर पढ़ाई पूरी करने तक विशेष देखभाल की आवश्यकता पड़ती है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चे सामान्यतः दृष्टि, श्रवण एवं अधिगम अक्षमता के साथ-साथ मानसिक मंदता और बाधिरंधता से ग्रस्त होते हैं। इन्हें सामान्य बच्चों के साथ समायोजित होने में काफी कठिनाई होती है। माता-पिता या अभिभावकों की सोच भी इन बच्चों के प्रति सकारात्मक नहीं होती है, जिसके कारण वे अपने आपको समाज से कटा महसूस करते हैं। परिणामस्वरुप वे स्कूली शिक्षा से बाहर ही रह जाते हैं। समाज में ऐसे बच्चों की आबादी 5 से 10 फीसदी है। इसलिए ऐसे बच्चों का शिक्षा में समावेशन किया जाना अति आवश्यक है। (संजीव, 2008).
समावेशी शिक्षा में उन सभी तथ्यों को सम्मिलित किया जाता है जो विशिष्ट बालकों पर लागू होते हैं अर्थात समावेशी शिक्षा शारीरिक, मानसिक, प्रतिभाशाली तथा विशिष्ट गुणों से युक्त विभिन्न बालकों पर अपनायी जाती है। यह एक ऐसी शिक्षा पद्धति है जो यह तय करती है कि प्रत्येक छात्र को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और इसमें उनकी योग्यता, शारीरिक-अक्षमता, भाषा-संस्कृति, पारिवारिक पृष्ठभूमि तथा उम्र किसी प्रकार का अवरोध पैदा न कर सके। (भार्गव, 2016). आज ब्रिटेन तथा अमेरिका जैसे कुछ विकसित देशों में इस प्रकार की शिक्षण संस्थाएँ आवासीय विद्यालयों के रूप में कार्यरत हैं, लेकिन हमारा देश भारत विकासशील होते हुए भी इस प्रकार की संस्थाओं से अभावग्रस्त है।
अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य- समावेशी शब्द का प्रचलन 1990 के दशक के मध्य से बढ़ा जब 1994 में सलामांका (स्पेन) में यूनेस्को द्वारा विशेष शैक्षिक आवश्यकताओं पर विशेष विश्व सम्मेलन सुलभता और समता (स्पेशल नीड्स एजुकेशन एसेस एँड क्वालिटी) का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन में 92 सरकारों और 25 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन का समापन इस उद्घोषणा के साथ हुआ कि प्रत्येक बच्चे की चरित्रगत विशिष्टताएँ, रुचियाँ, योग्यता और सीखने की आवश्यकतायें अनोखी होती हैं। इसलिए शिक्षा प्रणाली में इन विशिष्टताओं और आवश्यकताओं की व्यापक विविधता का ध्यान रखा जाना चाहिए। सलामांका वक्तव्य में इस बात पर बल दिया गया कि ‘हर शिशु को शिक्षा का बुनियादी अधिकार है और उसे अधिगम का एक स्वीकार्य स्तर प्राप्त करने और बनाए रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। डाकर सेनेगाल (2000) में आयोजित विश्व शिक्षा मंच (वर्ल्ड एजुकेशन फोरम) पर भी शिक्षा में समावेश की बात दोहराई गई। डाकर सम्मेलन में स्पष्ट किया गया कि ‘किसी व्यक्ति या बच्चों को उच्च कोटि की प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करने के अवसर से केवल इसलिए वंचित नहीं किया जाना चाहिए कि वह सामर्थ्य से परे है।विशेष आवश्यकता वाले अभावग्रस्त उपजाति अल्पसंख्यकों के दूर-दराज और अलग-अलग समुदायों के तथा शिक्षा से वंचित नगरीय व दूसरे लोगों का समावेश वर्ष 2015 तक सार्वभौम प्राथमिक शिक्षा की प्राप्ति की रणनीतियों का अभिन्न अंग होना चाहिए (यूनेस्को 2000). अंतर्राष्ट्रीय स्तर के इन विकास कार्यक्रमों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि कोई भी देश समावेशी शिक्षाको कार्य रूप दिए बगैर अपनी तरक्की कर ही नहीं सकता है। (संजीव, 2008).
समावेशी शिक्षा, शिक्षा के संबंध में नीति और अभ्यास दोनों स्तरों पर एक वास्तविक परिवर्तन को दर्शाती है। शिक्षार्थियों को इस प्रणाली के केंद्र में रखा जाता है, जिससे उसकी सीखने की विविधता को पहचानने, स्वीकार करने और जवाब देने में सफलता हासिल की जाए । समावेशी शिक्षा की आवश्यकता न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी है इसलिए इस शिक्षा को नीति स्तर पर समर्थित करने, लक्ष्य रखने एवं कार्यान्वित करने की आवश्यकता है। समावेशी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मुख्यधारा परिस्थिति में सभी शिक्षार्थियों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करना तथा पूरे विद्यालयी दृष्टिकोण को सुनिश्चित करने, स्कूलों को अधिक समावेशी बनाने के लिए आवश्यक उपायों को प्रदान करना है। समस्त शिक्षार्थियों की शिक्षा के लिए विद्यालयों को आवंटित सामान्य वित्तपोषण को समावेशी शिक्षा का हिस्सा होना चाहिए, इसमें शिक्षार्थियों की विफलता की स्थिति में विद्यालयों के लिए अतिरिक्त धन की सहायता भी शामिल है। इसके अलावा इसमें अधिक गहन समर्थन की आवश्यकता वाले विद्यार्थियों पर अधिक धन की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। समावेशी शिक्षा प्रणाली के लिए अंतिम दृष्टि यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी उम्र के सभी शिक्षार्थियों को उनके स्थानीय समुदाय में अपने दोस्तों एवं सहपाठियों के साथ सार्थक उच्च गुणवत्ता वाले अवसर प्रदान किए जाएँ।
संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में कई अंतर्राष्टीय निकाय और एजेंसिया विकलांग छात्रों के लिए शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने एवं उसमें सुधार करने के लिए विभिन्न तरीकों से काम कर रहे हैं। इसमें आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग, विश्व बैंक, विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन, यूनिसेफ इत्यादि शामिल हैं। इन सभी निकायों का काम विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मानक उपकरणों, कार्यक्रमों एवं क्रिया योजनाओं के साथ चल रहा है। शिक्षा के संबंध में इन सभी निकायों का कार्य सतत् विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना है। इसके अलावा सभी के लिए आजीवन सीखने के अवसरों को बढ़ावा देना, समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्ता की शिक्षा को सुनिश्चित करना है (यू. एन. 2015). ये समस्त निकाय समावेश का एक व्यापक दृष्टिकोण लेते हैं अर्थात विकलांग पुरुष एवं महिलाओं, अल्पसंख्यक, स्वदेशी और ग्रामीण समुदाय के सदस्यों के लिए असमानताओं को कम करने पर बल देते हैं (मिजर, 2001). इस बात की पुष्टि समावेशी शिक्षा के क्षेत्र में किये गये विभिन्न शोध कार्यों से भी होती है। यूरोपियन एजेंसी ऑफ डेवलपमेंट इन स्पेशल नीड्स एजुकेशन (2001) ने इंक्लूसिव एजुकेशन एँड इफेक्टिव क्लासरूम प्रैक्टिसेस नामक शोधकार्य प्रकाशित किया, इसमें विभिन्न देशों के समावेशी शिक्षा से संबंधित शोधों को शामिल किया गया। मार्टसन एण्ड मैगनूसन (1991) ने को-आपरेटिव टीचिंग प्रोजेक्ट’ (सी.टी.पी.) पर कार्य करके यह निष्कर्ष प्राप्त किया कि विद्यालयी रूप से असफल छात्रों को समान कक्षा के साथ ही सप्ताह में कुछ समय विशेष अनुदेशन देने से उनकी उपलब्धि पर सामान्य बच्चों की तरह ही सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। काम्प्स, बारबेट, लियोनार्ड एवं डेलक्वाद्री (1994) ने ‘क्लास वाइज पीयर ट्यूटोरिंग’ (सी.डब्ल्यू.पी.टी.) विषय पर ‘आत्मकेन्द्रित एवं गैर-आत्मकेन्द्रित’ छात्रों को लेकर अध्ययन कार्य करके यह निष्कर्ष प्राप्त किया किया कि- आत्मकेन्द्रित वाले वे छात्र जो पहले कम सामाजिक थे, सी.डब्ल्यू.पी.टी. के उपयोग बाद अत्यधिक सामाजिक हो गए। फुस, माथेस एवं साइमन्स (1997) ने ‘पीयर असिस्टेड लर्निंग स्ट्रैटजी’ (पी.ए.एल.एस.) की प्रभावशीलता को अधिगम अक्षमता (लर्निंग डिसेबिलिटी), गैर-अधिगम अक्षम लेकिन कम उपलब्धि (नॉन- लर्निंग डिसेबिलिटी बट लो परफॉरमेंस), और सामान्य उपलब्धि (एवरेज एचीवर) पर देखा, जिसमें इन समस्त छात्रों को हर रोज सामान्य बच्चों के साथ जोड़ी बनाकर ऊँची आवाज में अध्ययन करना पड़ता था, निष्कर्ष से पता चला कि अधिगम अक्षमता, गैर-अधिगम अक्षम लेकिन कम उपलब्धि और सामान्य उपलब्धि वाले छात्रों की उपलब्धि ‘पीयर असिस्टेड लर्निंग स्ट्रैटजी’ की वजह से सार्थक रूप से बढ़ गया।
स्टीवेन एण्ड स्लेवीन (1994) ने को-आपरेटिव लर्निंग एप्रोच’ का उपयोग विकलांग एवं गैर-विकलांग विद्यार्थियों पर किया जिसमें उनको दूसरे सहपाठियों के साथ कहानी को मौन रूप से और फिर बोलकर पढ़ने को दिया गया, साथ ही उनमें प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता भी करायी गयी। निष्कर्ष में यह पाया गया कि सह-अधिगम उपागम  विकलांग एवं गैर-विकलांग दोनों विद्यार्थियों को पढ़ने, समझने में बेहतर सहायता करता है। इवांस एवं स्लेविन (1997) ने न्यूयार्क में विकलांग एवं गैर-विकलांग विद्यार्थियों के सामाजिक व्यवहार पर ‘कोलाबोरेटिव प्रॉब्लम सॉल्विंग’ (सी.पी.एस.) का प्रभाव देखा और बताया कि सी.पी.एस. शारीरिक, सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से विकलांग छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीति है जिससे उनका व्यवहार अत्यधिक सामाजिक हो जाता है। एरेना मोजर एवं उनकी टीम ने ऑस्ट्रेलिया में 10 वर्ष के शोध के बाद यह पाया कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ रखकर सहयोगी अधिगम (को-आपरेटिव लर्निंग) कराने से समावेशी शिक्षा के लिए बेहतर सहयोग का कार्य करती है। दोनोंह्यू, एवं बोमन (2014) ने द चैलेंजेज ऑफ़ रीयलाइजिंग इंक्लूसिव एजुकेशन इन साउथ अफ्रीका में अपने शोध अध्ययन के बाद वहाँ की शिक्षा समावेशी शिक्षा स्थिति का वर्णन करते हुए बताया कि सभी के लिए शिक्षा (एजुकेशन फॉर ऑल) के काफी समय बीत जाने के बाद भी विकलांग छात्रों को सामान्य छात्रों के साथ शिक्षण की संभावना कम है। साउथ अफ्रीका में विकलांग बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं समावेशी शिक्षा में कई बाधाएँ हैं। अतः विकलांग छात्रों को जितनी जल्दी समावेशी शिक्षा में शामिल किया जाएगा उतनी जल्दी वे समाज के लिए उत्पादक बन सकते हैं। मिल्स, एवं निधि (2008) ने द एजुकेशन फॉर ऑल एँड इंक्लूसिव एजुकेशन डिबेटः कानफ्लिक्ट कॉण्ट्राडीक्सन ऑफ आपर्च्यूनिटी नामक शोध विषय की सहायता से यह बताया कि समावेशी शिक्षा का उद्देश्य लोकतांत्रिक सिद्धांतों, समानता और सामाजिक न्याय से संबंधित मूल्यों और विश्वासों को प्राप्त करना है, जिससे समस्त बालक शिक्षा में भाग ले सके। समावेशी शिक्षा समाज के लिए अपने सामाजिक संस्थानों और संरचनाओं को गंभीर रुप से जानने का एक अवसर प्रदान करती है।

समावेशी शिक्षा से संबंधित विभिन्न शिक्षा आयोगों की रिपोर्ट:
सार्जेंट रिपोर्ट (1944)- जहां तक संभव हो निःशक्त बच्चों को सामान्य बच्चों से अलग नहीं किया जाना चाहिए, अंततः निःशक्त बच्चों के साथ सामान्य विद्यालयों में विशिष्ट व्यवहार किया जाना चाहिए। कोठारी आयोग (भारत का प्रथम शिक्षा आयोग) के मुताबिक एक विकलांग बच्चे के लिए शिक्षा का पहला कार्य यह है कि सामान्य बच्चों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाए गए सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण में समंजन के लिए उसे तैयार करें। इसलिए आवश्यक है कि विकलांग बच्चों की शिक्षा सामान्य शिक्षा प्रणाली का ही एक अविछिन्न अंग हो, अंतर केवल बच्चे को पढ़ाने की विधि और बच्चे द्वारा ज्ञान प्राप्ति के लिए अपनाए गए साधनों में होगा।इस क्षेत्र में ऐसा बहुत कुछ है जिसे हम शिक्षा में उन्नत देशों से सीख सकते हैं (कोठारी आयोग 1964-66: 123)
1974 में भारत सरकार ने निशक्त बच्चों के लिए समेकित शिक्षा योजना का प्रारंभ किया। केंद्र प्रायोजित इस योजना के तहत विकलांग बच्चों को मुख्यधारा के विद्यालयों में, उनके गैर-विकलांग मित्रों के साथ शिक्षा दी जाने लगी। निःशक्त व्यक्ति अधिनियम(1995) के अध्याय 5 की धारा 26 के अंतर्गत निःशक्त बालकों के लिए निःशुल्क शिक्षा सुनिश्चित की जाने की बात कही गयी है। इस अधिनियम के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं- सरकार और स्थानीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि प्रत्येक निःशक्त बालक को 18 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक उचित वातावरण में निःशुल्क शिक्षा प्राप्त हो सके। सरकार द्वारा निःशक्त विद्यार्थियों का सामान्य विद्यालयों में एकीकरण, संवर्धन एवं  विशेष विद्यालयों को व्यावसायिक प्रशिक्षण सुविधाओं से सज्जित करने का प्रयास किया जायेगा । मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने वर्ष 2020 तक देश के सभी स्कूल विकलांग-मित्रवत बना दिए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। (संजीव, 2008).
विशेष आवश्यकता वाले बालकों की जनसंख्या एवं शैक्षिक आंकड़ेः
                                                             तालिका संख्या-1
                                  समस्त जनसंख्या एवं विकलांग जनसंख्या की तुलनाः              ( करोड़ में )
समस्त जनसंख्या, भारत- 2011
विकलांग जनसंख्या, भारत- 2011

व्यक्ति
पुरुष
महिला
व्यक्ति
पुरुष
महिला
121.08
62.32
58.76
2.68
1.5
1.18
स्रोत: सेंसस ऑफ इंडिया, 2011. (मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एँड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन, गवर्नमेंट. इंडिया)

तलिका संख्या-1 के 2011 की जनगणना के आंकड़ों से यह पता चलता है कि कुल 121.08 करोड़ जनसंख्या में से विकलांगों  की जनसंख्या 2.68 करोड (2.21 प्रतिशत) है। जिसमें पुरुष विकलांगों की संख्या 1.5 करोड़ तथा महिला विकलांगों की संख्या 1.18 करोड़ है। अतः इससे यह पता चलता है कि भारत में विकलांगों की एक बहुत बड़ी जनसंख्या निवास कर रही है। 

तलिका संख्या-2  
शिक्षित एवं अशिक्षित विकलांगों की संख्या

कुल विकलांग जनसंख्या
शिक्षित
अशिक्षित
विकलांग जनसंख्या का साक्षरता  प्रतिशत
समस्त जनसंख्या की साक्षरता प्रतिशत
भारत
26814994
14618353
12196641
54.52
74.04
स्रोत: सेंसस ऑफ इंडिया, 2011. (मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एँड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन, गवर्नमेंट. इंडिया)

तालिका संख्या- 2 के आकड़ों से यह पता चलता है कि भारत में जहाँ कुल शिक्षित विकलांग विद्यार्थियों की संख्या 14618353 है वही अशिक्षित विकलांगों की संख्या 12196641 है, अर्थात केवल 54.52 प्रतिशत ही विकलांग विद्यार्थी शिक्षित हैं, जबकि आज भी अशिक्षित विकलांगों की संख्या 45 प्रतिशत से अधिक हैं। अतः अशिक्षित विकलांगों को समावेशी शिक्षा में सम्मिलित करके विशेष ध्यान देने की आश्यकता है।

तलिका संख्या- 3
विकलांगता की प्रकृति के आधार पर विकलांग जनसंख्या प्रतिशत (2015-16)  
विकलांगता की प्रकृति
अंधे
कम दृष्टि
श्रवण बाधित
वाक बाधित
चलन बाधित
मानसिक बाधित
अधिगम अक्षमता
मस्तिष्क पक्षाघात
आत्मकेंद्रित
बहुविकलांगता

प्रतिशत

2.78

16.84

10.54

9.97

17.10

22.01

11.44

2.55

0.93

5.85
स्रोत: यू-डाइस 2015-16: ग्राफिक प्रेजेंटेशन.

वर्ष 2015-16 के नवीनतम आंकड़ों से यह पता चलता है कि विभिन्न प्रकार के विकलांग विद्यार्थियों में सबसे अधिक मानसिक रूप से विकलांग विद्यार्थी पाए जाते हैं, जिनका प्रतिशत 22.01 है और सबसे कम आत्म-केन्द्रीत प्रकार के विकलांग छात्र पाए जाते हैं जिनका प्रतिशत 1 से भी कम है। इससे यह पता चलता है कि विभिन्न प्रकार के विकलांग छात्रों में अत्यधिक अंतर है, और उन पर उनकी विकलांगता प्रकार के अनुसार ही ध्यान देने की आवश्यकता है।
                        

तलिका संख्या- 4
                               विकलांगों की साक्षरता स्थितिः लिंग एवं क्षेत्र के आधार पर             (आकड़े, 2011)

शिक्षित
अशिक्षित
ग्रामीण
शहरी
ग्रामीण
शहरी
व्यक्ति
48
67
52
33
पुरुष
58
72
42
28
महिला
37
61
63
39
स्रोत: सेंसस ऑफ इंडिया, 2011. (मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एँड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन, गवर्नमेंट. इंडिया)

तालिका संख्या-4 के 2011 के जनसंख्या आंकड़ों से यह पता चलता है जहाँ शहरी विकलांग पुरुष 72 प्रतिशत शिक्षित हैं वही ग्रामीण विकलांगों की साक्षरता केवल 58 प्रतिशत है। यदि विकलांग लड़कियों की साक्षरता की बात की जाए तो जहां शहरी विकलांग महिलायें 61 प्रतिशत शिक्षित हैं वहीं ग्रामीण विकलांग महिलायें 37 प्रतिशत ही शिक्षित हैं। यदि अशिक्षित विकलांग पुरुषों की तुलना की जाए तो 42 प्रतिशत ग्रामीण  विकलांग पुरुष अशिक्षित हैं जबकि 28 प्रतिशत शहरी पुरुष अशिक्षित हैं। यदि विकलांग अशिक्षित महिलाओं की तुलना की जाये तो 39 प्रतिशत शहरी एवं 63 प्रतिशत ग्रामीण विकलांग महिलायें अशिक्षित है। अतः उपरोक्त आकड़ों से यह पता चलता है कि ग्रामीण अशिक्षित विकलांग पुरुषों एवं महिलाओं की समावेशी शिक्षा पर अत्यधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। 

तलिका संख्या- 5
विकलांग व्यक्तियों का शैक्षिक स्तर








भारत


कुल विकलांग जनसंख्या
शैक्षिक स्तर
कुल

पुरुष

महिला
कुल

26814994
14988593
11826401
अशिक्षित

12196641
5640240
6556401
शिक्षित

14618353
9348353
5270000
साक्षर लेकिन प्राथमिक से कम

2840345
1706441
1133904
प्राथमिक लेकिन माध्यमिक से कम
3554858
2195933
1358925
माध्यमिक लेकिन मैट्रिक से कम
2448070
1616539
831531
मैट्रिक लेकिन स्नातक से कम
344865
2330080
1118570
स्नातक एवं उससे अधिक
1246857
839702
407155
स्रोत: सेंसस ऑफ इंडिया, 2011. (मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एँड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन, गवर्नमेंट. इंडिया)

तालिका संख्या-5 के आंकड़ो से यह पता चलता है कि कुल 26814994 विकलांग विद्यार्थियों में से 146118353 शिक्षित हैं जबकि 12196641 अशिक्षित हैं। यदि विकलांग लड़कों की बात की जाये तो 9348353 शिक्षित हैं जबकि 5640240 अशिक्षित है। विकलांग लड़कियों की साक्षरता की बात की जाये तो 5270000 शिक्षित हैं तथा 6556401 अशिक्षित हैं । इसके अलावा विभिन्न स्तर पर भी विकलांग लड़के एवं लड़कियों की साक्षरता स्तर को दर्शाया गया है।

समावेशी शिक्षा की आवश्यकताः
विकलांग बालक अपने आपको दूसरे बालकों की अपेक्षा कमजोर तथा हीन समझते हैं, जिसके कारण उनके साथ पृथकता से व्यवहार किया जाता है। समावेशी शिक्षा व्यवस्था में विकलांगो को सामान्य बालकों के साथ मानसिक रुप से प्रगति करने के अवसर प्रदान किए जाते हैं जिससे प्रत्येक बालक यह सोचता है कि वह किसी भी प्रकार से किसी अन्य बच्चे से कमजोर नही है। इस प्रकार समावेशी शिक्षा पद्धति बालकों की सामान्य मानसिक प्रगति को अग्रसर करती है।
विकलांग बालकों में कुछ सामाजिक गुण बहुत संगत होते हैं। जब वे सामान्य बालकों के साथ शिक्षा प्राप्त करते हैं तो वे सामाजिक गुणों को अन्य बालकों के साथ ग्रहण करते हैं। उनमें सामाजिक, नैतिक गुणों, प्रेम, सहानुभूति, आपसी सहयोग, आदि गुणों का विकास होता है। निःसंदेह विशिष्ट शिक्षा अधिक महंगी एवं खर्चीली है, इसके अलावा विशिष्ट अध्यापक एवं शिक्षाविदों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी अधिक समय लेते हैं जबकि दूसरी तरफ समावेशी शिक्षा कम खर्चीली तथा लाभदायक है। विशिष्ट शिक्षा संस्था को बनाने तथा शिक्षण कार्य को प्रारंभ करने के लिए अन्य बड़े स्रोतों से भी सहायता लेनी पड़ती है जैसे- प्रशिक्षित अध्यापक, विशेषज्ञ, चिकित्सक आदि। विकलांग बालक की सामान्य कक्षा में शिक्षा पर कम खर्च आता है।
विशिष्ट शिक्षा व्यवस्था की अपेक्षा समावेशी शिक्षा व्यवस्था में सामाजिक विचार विमर्श अधिक किए जाते हैं। विकलांग तथा सामान्य बालक में सामान्य शिक्षा के अंतर्गत एक प्राकृतिक वातावरण बनाया जाता है। इस वातावरण में अपने सहपाठियों से सीखना, स्वीकार करना तथा स्वयं को दूसरों द्वारा स्वीकार कराया जाना समावेशी शिक्षा द्वारा ही संभव है। सामान्य वातावरण में छात्र उपयुक्तता की भावना तथा भावनात्मक समायोजन का विकास होता है। शैक्षिक योग्यता सामान्यतया समावेशी शिक्षा के वातावरण द्वारा संभव है। एक प्रकार से कहा जा सकता है कि लचीले वातावरण तथा आधुनिक पाठ्यक्रम के साथ समावेशी शिक्षा शैक्षिक एकीकरण लाती है। भारत में सामान्य शिक्षा के व्यापक रूप से विस्तार की संवैधानिक व्यवस्था की गई है और साथ ही साथ शारीरिक रूप से बाधित बालकों के लिए शिक्षा को व्यापक रूप देना भी संविधान के अंतर्गत दिया गया है। समावेशी शिक्षा के वातावरण के माध्यम से समानता के उद्देश्य की प्राप्ति की जानी चाहिए जिससे कोई भी छात्र अपने आप को दूसरों की अपेक्षा हीन ना समझे। उपरोक्त तथ्यों से यह बात उभरकर सामने आता है कि वर्तमान समय में समावेशी शिक्षा समस्त बालको के लिए अत्यंत आवश्यक है।

समावेशी शिक्षा की प्रमुख चुनौतियाँ :
किसी बालक को शिक्षा प्रदान करने से पहले उसके व्यक्तित्व को समझना आवश्यक है, समावेशी शिक्षा में बालकों के लिए तो यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है क्योंकि विशिष्ट बालक की विशेषताएँ, साधारण बालकों की तुलना में अधिक तीव्र व विचित्र होती है। कुछ देशों में कक्षा का बड़ा आकार एवं छात्र-शिक्षक अनुपात का कम होना सभी छात्रों एवं शिक्षकों के लिए समस्या है, और एक कक्षा में अत्यधिक विविधता भी शिक्षकों के उत्साह को कम कर देता है। यह उस स्थिति में अत्यधिक सत्य प्रतीत होता है जब कक्षा में 100 या उससे अधिक छात्र हो जाते हैं। कुछ नकारात्मक प्रवृत्ति के शिक्षक जब हताशा में अप्रासंगिक शिक्षण विधियों का उपयोग करते हैं तो यह समावेशी शिक्षा के लिए एक चुनौती बन जाती है। कुछ मामलों में छात्रों को उनकी क्षमता के अनुसार सीखने के लिए प्रोत्साहित न करना उन्हें ‘मंद अधिगमकी ओर ले जाता है। सबसे बुरी स्थिति तब हो जाती है जब शिक्षकों द्वारा छात्रों को दण्डित किया जाता है। इस तरह के व्यवहार से विकलांग बच्चे हाशिये पर जा सकते हैं। देश में शिक्षा व्यवस्था के लिए शिक्षा मंत्रालय भी जिम्मेदार है जो शिक्षकों की भर्ती, वित्तपोषण एवं संरचना में सुधार के अभियान में महती भूमिका निभाता है।
कई बच्चे स्कूल जाने के लिए लंबी दूरी तय करते हैं, पर्याप्त परिवहन की कमी, मुश्किल इलाके, खराब सड़के और परिवारों के लिए संबद्ध लागत विकलांग लड़के और लड़कियों की शिक्षा के लिए समस्या उत्पन्न करते हैं। लड़कियों के लिए स्कूल की यात्रा करते समय उनकी सुरक्षा के डर के कारण यदि उनके माता-पिता उन्हें घर पर बैठा देते हैं तो वे शिक्षा से बहिष्कृत हो जाती हैं। माता-पिता एवं छोटे भाई-बहनों की देखभाल के लिए भी कुछ छात्रों की पढ़ाई नहीं हो पाती है। स्कूल में शौचालय तक विकलांग बच्चों के पहूंच का अभाव भी एक प्रमुख बाधा है। यदि कोई बालक स्कूल में सभी दिन शौचालय का उपयोग नहीं कर सकता है तो उसके उपस्थित होने की संभावना कम ही है। यहां तक कि अगर शौचालयों को उनके लिए शुलभ बनाने के लिए अनुकूलित किया गया हो तो उसे बनाए रखा जाना चाहिए। कुछ ऐसे मामलों में जहां स्कूलों में शौचालय को विकलांगों के लिए अनुकूलित नहीं किया जाता है वे स्कूल विकलांग लड़के व लडकियों को न रखने के बहाने के रूप में इसका इस्तेमाल करते हैं। वे यह भी कहते हैं कि कोई भी सहायक स्टॉफ नहीं है जो बच्चों को वाशरूम तक ले जा सकते हैं। इसके अलावा समावेशी शिक्षा में पानी व स्वच्छता संबंधी समस्याओं को भी शामिल किया जा सकता है।

सुझावः
1. इन बालकों के माता-पिता व शिक्षक उनकी समस्याओं को इस रूप में समझे कि वे भी ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें सभी के समान आदर, सम्मान, विश्वास, स्नेह और सुरक्षा की आवश्यकता है।
2. समावेशी बालकों के व्यक्तित्व के विषय में पूर्ण जानकारी एवं समझ, शिक्षकों के लिए समावेशी बालकों के शिक्षण प्रशिक्षण की प्रक्रिया को सरल बना देगी।
3. समावेशी बालकों को भी सामान्य बालकों के समान औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता होती है। उनके लिए ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि उन्हें कम से कम पढ़ने, लिखने और साधारण गणित का ज्ञान हो जाए।
4. आधुनिक शैक्षिक तकनीकों ने ऐसी विधियों, तकनीकों एवं उपकरणों का आविष्कार किया है जिनकी सहायता से विकलांग बच्चों को औपचारिक शिक्षा दी जा सकती है। अतः विकलांग बालकों के लिए उचित शैक्षिक तकनीकों की व्यवस्था की जानी चाहिए।
5. समावेशी बालकों के शिक्षा का स्तर उनके शारीरिक एवं मानसिक स्तर के अनुरूप होना चाहिए।
6. स्कूल में अति समावेशी वातावरण की नहीं बल्कि समावेशी प्रशिक्षित शिक्षक की नितांत आवश्यकता है। अतः इस कमी को पूरा किया जाना चाहिए।
7. समावेशी बालकों के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण भी आवश्यक है किंतु यह समावेशी शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य नहीं होना चाहिए। विकलांग बालकों को रोजगारपरक काम-धंधों में प्रशिक्षित करने की व्यवस्था होनी चाहिए ।
8. समावेशी शिक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिये वर्तमान समय में ऐसी व्यवस्था हो जिससे घर से स्कूलों तक आसानी से पहुँचा जा सके।
9. कक्षा का बड़ा आकार एवं छात्र-शिक्षक अनुपात का कम होना एक बड़ी समस्या है, अतः हमें विद्यालयों में शिक्षकों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है।
10. विद्यालय में शौचालयों तक पहुंच समस्त विद्यार्थियों के लिये आसानी से शुलभ होना चाहिए।

निष्कर्षः
वर्तमान समय में विश्व के समस्त देश अपनी भावी पीढ़ी के सर्वांगीण विकास के लिए अनेकानेक प्रयत्न कर रहे हैं। समाज के विभिन्न तबके के समुचित विकास के लिए विभिन्न शैक्षिक आर्थिक योजनाओं के साथ बहुलतायुक्त समाज की विशिष्टताओं को ध्यान में रखते हुए वर्तमान समय में समावेशी शिक्षा की तरफ गंभीरता से ध्यान दिया जा रहा है। ऐसे में यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक उत्तरदायित्व भी है कि हाशिए पर पड़े हुए उन बच्चों की शिक्षा की तरफ ध्यान दिया जाए जो किन्हीं कारणों से शिक्षा से वंचित हैं। इसमें विकलांग बालकों की संख्या अत्यधिक है। अतः वर्तमान समय में उनके लिए समावेशी शिक्षा की बात विश्व समुदाय कर रहा है, जो विकलांग एवं सामान्य दोनों ही बालकों के लिए अत्यधिक उपयोगी है। जरुरत है तो बस उनकी शिक्षा के संबंध में तथ्यपरक जानकारी एकत्रित की जाए, उनकी परिस्थितियों के यथार्थ का व्यावहारिक आकलन करते हुए उचित नीतियाँ बनायी जाए, जिससे कि उनके जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाला जा सके और शिक्षा से दूर उन समस्त बच्चों को उचित शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करते हुए उन्हें नई दिशा दी जाए। जब हम कहते हैं कि सभी बच्चे हमारे देश के भविष्य हैं तो हमारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि हम इन बच्चों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराएँ और उन्हें देश तथा समाज में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए तैयार करे। आज भी विशेष आवश्यकता वाले  बालकों की शैक्षिक उपलब्धि संबंधी स्थिति चिंताजनक है। आँकड़े बताते हैं कि आज भी विकलांग लोगों की आधी आबादी शिक्षा से दूर है। समाज के सभी हितधारकों के लिए आवश्यक है कि समाज के इस वर्ग के अस्तित्व की महत्ता को उचित स्थान दें। उनके शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास के लिए अपेक्षित कदम उठाये जाने चाहिए और उनके इस कार्य में समावेशी शिक्षा ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। 

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