वत्सला राधाकिसुन की दो कविताएँ

वैराग्य

अब न भाता मुझे
महल का सुख,
प्यार की हवाई कसमें,
टूट रहे हैं सारे बन्धन
जो खड़े थे स्वार्थ की बुलंदी पर।

अब महसूस करती हूँ सिर्फ
ब्रह्म का अनंत प्रकाश ,
बस गया है एकमात्र वही
मेरी वीणा की संगीत में,
मेरे काव्य के शब्दों में।

हे प्रभु !
बस यही है संकल्प,
मन रहे सदैव लीन तुम्हीं में,
बीत जाए यह जीवन
तुम्हारी ही दिव्य छत्रछाया में।
वत्सला राधाकिसुन

मन और सुसंस्कार

दलदली दुनिया ने कहा मन से
"समा जाओ मेरी बाँहों में,
रखा ही क्या है परंपराओं और सिद्धांतों में।"
विचलित हो गया अश्व-रूपी मन,
बहने लगा वो दिशाहीन भोगों के प्रवाह में।

बीत गये कुछ दिन,
कष्टों का सागर बन गया मन,
पर घोर अंधकार में दिखा
सुसंस्कारों का ज्योत ।

"अब सुधरना है" बोल उठा मन।

"जो सुसंस्कार दिये हैं मुझे बुजुर्गों ने,
उन पथों से न हटूंगा, न भटकूंगा मैं,
उन्हीं में है सुखी जीवन का ज्ञान,
उन्हीं में है पूरे समाज का कल्याण।"

"रहुँगा मैं इसी संसार में
पर अब अटल, अडोल रहुँगा
जैसे अस्वच्छ तालाब में
पवित्र, अकलंकित कमल।"