'माधवी': एक मिथक, दो आख्यान

डाॅ. लेखा. एम
भीष्म साहनी के नाटक माधवी तथा अनुपमा निरंजन के उपन्यास माधवी के पात्र माधवी का एक तुलनात्मक अध्ययन
    माधवी की कथा पौराणिक काल में स्त्री के अमानवीकरण का एक वीभत्स उदाहरण है।  माधवी की कथा महाभारत के उद्योगपर्व से लिया गया है।  जिस पर आधारित अनेक साहित्य कृतियों की रचना हुई हैं।  माधवी की पौराणिक कथा के आधार पर रची गई दो विशिष्ट साहित्य रचनाएँ हैं, भीष्म साहनी के सुप्रसिद्ध हिंदी नाटक 'माधवी' एवं अनुपमा निरंजना के साहित्य अकादमी पुरस्कृत बहुचर्चित कन्नड़ उपन्यास 'माधवी'।  दोनों साहित्य कृतियों का आख्यान की दृष्टि से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इन दोनों के मध्य कई समानताएँ हैं तथा भिन्नताएँ भी।

माधवी का मिथकीय पक्ष

    महाभारत की कथा का एक पात्र है, माधवी।  महाभारत के उद्योगपर्व के 106वें अध्याय से 123वें अध्याय तक माधवी के आख्यान का वर्णन है।  माधवी नहुष कुल में उत्पन्न चंद्रवंश के पाँचवें राजा ययाति की पुत्री थी।  ऋषि विश्वामित्र का शिष्य गालव अपनी शिक्षा समाप्ति के बाद गुरु-दक्षिणा देने का हठ करता है।  विश्वामित्र उसके हठी स्वभाव से क्रुद्ध होकर आठ सौ अश्वमेधी घोड़े माँग लेते हैं।  अश्वमेधी घोड़ों की खोज में भटकता हुआ गालव अंत में दानवीर राजा ययाति के आश्रम में पहूँच जाता है।  राज-पाट से निवृत्त राजा ययाति गालव की प्रतिज्ञा के संबंध में सुनकर असमंजस में पड़ जाते हैं।  अंत में दैवी गुणों से युक्त अपनी एकमात्र पुत्री माधवी को यह कहकर उसे सौंप देते हैं कि जहाँ कहीं भी किसी राजा के पास आठ सौ अश्वमेधी घोड़े मिलें, उनके बदले माधवी को उस राजा के पास छोड़ दें।  माधवी को दो वरदान प्राप्त था, एक उससे उत्पन्न पुत्र चक्रवर्ती राजा बनेगा।  दूसरा, वह पुनः अपना कौमार्य धारण कर सकती है।

    यहीं से माधवी की दारुण कथा आरंभ होती है।  ऋषि गालव ने माधवी को पहले अयोध्यापति हर्यश्च को सौंप दिया जिन्होंने माधवी से एक पुत्र उत्पन्न करके दो सौ अश्वमेधी घोड़े दिये।  काशीराज दिवोदास और भोजराज उशीनर ने भी इसी प्रकार पुत्र उत्पन्न कर गालव को दो-दो सौ घोडे प्रदान किए।  अंत में छह सौ अश्वमेधी घोड़ों को तथा माधवी को गालव गुरु विश्वामित्र को समर्पित करता है।  माधवी के गर्भ से विश्वामित्र को अष्टक नामक पुत्र की प्राप्ति हुई।  माधवी तब राजा ययाति को लौटा दी गई।  अर्थात् महाभारत काल तक स्त्री अपनी मानवी स्वरूप से वंचित होकर वस्तु में परिवर्तित हो गई थी।  अब उसे बंधक रखा जा सकता था, उसकी इच्छाओं का कोई मूल्य न रहा।

भीष्म साहनी का नाटक 'माधवी' और अनुपमा निरंजना का उपन्यास 'माधवी'

    भीष्म साहनी हिंदी के वरिष्ठ कथाकार एवं नाटककार हैं।  प्रगतिशील चेतना से संपन्न, समाजाभिमुख साहित्य का सृजन करने वाले साठोत्तरी हिंदी साहित्यकारों में वे अपना एक अलग स्थान रखते थे।  उनके 12 कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।  इसके अलावा तमस, झरोखे, कड़ियाँ, बसन्ती जैसे उपन्यास तथा कबिरा खड़ा बाज़ार में, हानूश, माधवी जैसे नाटक भी अत्यंत ख्याति प्राप्त हैं।  साहनी जी ने नाटक 'माधवी' के माध्यम से पाठकों को मिथक के द्वारा यथार्थ के ठोस धरातल की ओर दृष्टिपात करने के लिए प्रेरित किया है।  उन्होंने प्रस्तुत नाटक में स्त्री-पुरुष संघर्ष, स्त्री का पुरुष के द्वारा उपकरण के रूप में उपयोग करना, दमन करना आदि तथ्यों की ओर इशारा किया है।

    अनुपमा निरंजना कन्नड़ की प्रमुख उपन्यासकार हैं।  उन्होंने 22 उपन्यासों 9 कहानी संग्रहों तथा 12 बाल साहित्य रचनाओं का सृजन किया है।  स्नेहपल्लवी, आकाशगंगा, माधवी, आड़ा, दिनक्कोरुकथै आदि उनके प्रमुख उपन्यास हैं।  हाशिएकृत स्त्रियों का उत्कर्ष ही उनके उपन्यासों का प्रमुख विषय रहा है।  सन् 1960 में और 1970 में साहित्य अकादमी पुरस्कारों से पुरस्कृत हैं।  'माधवी' उपन्यास के माध्यम से उन्होंने एक राजकुमारी के रूप में जन्म लेने पर भी अपने पिता की प्रतिज्ञापूर्ति के लिए जीवन को दुरितपूर्ण बनानेवाली माधवी के त्याग एवं कर्तव्यपालन की महागाथा का वर्णन किया है।  प्रस्तुत उपन्यास में अपमानित स्त्रीत्व का तथा जागृत स्त्रीत्व का प्रतीक है माधवी।

    पुरुष द्वारा स्त्री का हाशिएकृत होना या उसका दमन करने की स्थिति उस समय से प्रकट होने लगी जब व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा प्रकट हुई।  पुरुष के मन में यह परिकल्पना जागी कि उसकी अर्जित की हुई संपत्ति, उसकी गायें, उसकी भूमि, उसके पुत्र को उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हो।  इस परिकल्पना ने मातृसत्ता को उलट दिया।  यह परिवर्तन मानव जाति द्वारा किया गया सबसे निर्णायक परिवर्तनों में से एक था।

    एंगेल्स का कथन है, ''मातृसत्ता का विनाश स्त्री जाति का विश्व ऐतिहासिक पराजय था।  अब घर के अन्दर भी पुरुष ने अपना आधिपत्य जमा लिया।  स्त्री अपने पद से वंचित कर दी गई, जकड़ दी गई, पुरुष की वासना की दासी, संतान उत्पन्न करने का यंत्र मात्र बन कर रह गई।''  (फ्रेडरिक एंगेल्स: परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति, पृ. 64)  वैयक्तिक संपत्ति के उत्तराधिकार ने ही विवाह नामक संस्था को जन्म दिया।  एकल विवाहवादी परिवार सर्वसत्तावादी पितृसत्तात्मक समाज में परिवर्तित हो गया।  पत्नी को सार्वजनिक उत्पादन के क्षेत्र से निकाल दिया गया, वह घर की मुख्य दासी बन गई।  संपत्ति केवल वैध उत्तराधिकारी को प्राप्त हो, इसके लिए सतीत्व और पतिव्रता जैसे सिद्धांत गढ़े गए।  एकल विवाह की प्रथा केवल स्त्रियों के लिए लागू था, पुरुष ने कभी इस मर्यादा के बंधन में स्वयं को सीमित नहीं किया था।

    तात्पर्य यह है कि परवर्ती युग में स्त्री मात्र भोग की वस्तु थी, मात्र एक रमणीय मंत्र।  पुरुष के लिए कोई भी बंधन, धर्म, नैतिकता  सब उसकी इच्छापूर्ति में बाधक नहीं बनी।  पौराणिक कथाओं में राजा-महाराजाओं, ऋषियों तथा देवों की कामांधता के कई प्रसंग प्राप्त होते हैं।  सामंतकाल में स्त्री का घुटन अपनी चरम सीमा पर  पहूँचा।  सामंती समाज की झूठी मर्यादा अपने विकृत रूप में कन्या शिशु हत्या के रूप में प्रकट हुई।

    आधुनिक समाज में भी स्त्रियों की स्थिति भिन्न नहीं है।  भले ही उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाओं ने अपनी स्थिति सुधार ली हो तथा समाज के निम्न तबके की स्त्रियों ने भी अपनी एक अलग पहचान कायम करने का प्रयास किया हो, समाज का स्त्रियों के प्रति व्यवहार में भारी परिवर्तन लक्षित नहीं हुआ है।  आज भी कन्या शिशुओं की हत्या तथा भ्रूणहत्याएँ जारी है, आज भी स्त्रियों पर अत्याचार होते हैं।  इसी परिप्रेक्ष्य में 'माधवी' जैसी मिथकीय पात्र के माध्यम से समाज में स्त्रियों की दुःस्थिति का अंकन करने का भीष्म साहनी तथा अनुपमा निरंजना का प्रयास महत्वपूर्ण बन पड़ता है।

    मूलकथा से साहनी जी ने नाटक में कुछ अंतर किए हैं।  नाटक में गालव और माधवी एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं, हालाँकि अंत में यह प्रेम असफल हो जाता है।  गालव बूढ़ी माधवी को अपनाने के लिए हिचकिचाता है।  मूलकथा में माधवी तपोवन में जाकर साधना करने लगती है।  जबकि नाटक में उसका लोकाचार से मोहभंग हो जाता है और अंत में माधवी आश्रम छोड़कर चली जाती है।  प्रस्तुत नाटक में साहनी ने व्यंग्यात्मकता का भी सहारा लिया है।  माधवी का मूल मिथकीय वृत्तांत माधवी, गालव और ययाति जैसे चरित्रों का महिमामंडन करता है।  जबकि साहनी के नाटक में कथा का एक भिन्न 'पाठ' प्रस्तुत किया गया है जो एक स्त्री के रूप में माधवी की यातना का मार्मिक चित्रण है।  प्रस्तुत नाटक ययाति की दानवीरता गालव की गुरुभक्ति और विश्वामित्र के नैतिक द्वैत, प्रतिष्ठा लोलुपता तथा खोखलेपन को व्यक्त करता है।

    भीष्म साहनी के समान कन्नड़ भाषा में 'माधवी' उपन्यास के माध्यम से अनुपमा निरंजना ने माधवी की मिथक का एक नया 'पाठ' रचा है।  यहाँ एक स्त्री एक अन्य स्त्री की यातना पर्वों को सशक्त रूप से शब्दबद्ध करती है।  यह सभी दृष्टि से एक स्त्री पक्ष रचना है।  प्रस्तुत उपन्यास में माधवी के वन गमन के माध्यम से अनुपमा निरंजना ने स्त्रीमुक्ति का एक नया भाष्य रचा है।  यहाँ लेखिका ने मूल कथा से भिन्न होकर एक स्त्री की संवेदनशील दृष्टि से माधवी के जीवन के हर एक भावों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।  माधवी के जीवन चक्र का पुत्री, प्रेयसी, पत्नी, माँ जैसी विभिन्न अवस्थाओं का अंकन उन्होंने सूक्ष्म रूप से  किया है।

    प्रस्तुत उपन्यास के अंत तक आते-आते एक नई माधवी पाठकों के सम्मुख उपस्थित होती है।  जो सर्वथा स्वतंत्र है।  गालव द्वारा माधवी को ययाति को लौटा देने के पश्चात् वह कर्तव्य के बंधन से मुक्त हो गई।  वह एक पुत्री के रूप में अपने पिता की आज्ञा का पालन सफल रूप से कर चुकी है।  गालव अपना लक्ष्य प्राप्त कर चुका है।  अब राजा ययाति माधवी का स्वयंवर कराना चाहते हैं तो वह उसी शुभ अवसर पर अपनी सच्चाई अर्थात् सबके सामने स्वयं को तीन राजाओं तथा एक ऋषि द्वारा भोगी गई स्त्री के रूप में घोषित करती है।  पर पितृसत्तात्मक समाज इस घोषणा को भी अपनी नीति तथा नियमों के अंदर छिपा लेती है।  क्योंकि माधवी जैसी राजकन्या को प्राप्त करना सबका अभीष्ट था।  यही नहीं, माधवी का विद्रोहिणी रूप तथा उसका प्रतिशोध और भी पराकाष्ठा तक पहूँचती है जब वह वरमाला लिये राजाओं के बीच से चलती है।  वह उस मण्डप से वन की ओर प्रस्थान करती है।  ययाति रोकने का प्रयास करते हैं तो वह स्वयंवर को ही उसकी मुक्ति का मार्ग मानते हुए विवाह न करने के निर्णय का ही वरण करती है।

    सिमोन द बुआ ने अपनी पुस्तक 'द सेकेंड सेक्स' में स्त्री को 'अन्य' की संज्ञा दी थी।  उनका मानना था कि वह मात्र ओब्जक्ट यानी कर्म है, कर्ता नहीं।  कर्ता, सब्जेक्ट पुरुष है।  वे पूछती हैं कि स्त्री क्या है, केवल गर्भ?  किंतु उपभोक्तावादी पूँजी ने तो आज उसे गर्भ भी नहीं रहने दिया, केवल त्वचा या माँस में परिवर्तित किया है।  पूँजीवादी समाज ने सामंती समाज की अंधेरे में घुटती असूर्यपश्याओं को थोड़ी-सी आज़ादी तो दी है किंतु वे अब भी रमणीय वस्तु ही हैं, जो रंगीन पैकिंग में सजी हुई, जिनकी रमणीयता का उपयोग ब्लेड से लेकर कार तक बेचने के लिए किया जाता है।

    साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत स्थिति का अंकन ही भीष्म साहनी तथा अनुपमा निरंजना का ध्येय रहा है।  दोनों रचनाओं में माधवी एक कोख के समान उपस्थित होती है।  गालव एक व्यापारी बन जाता है।  वह अश्वमेधी घोड़ों को प्राप्त करने के लिए माधवी को हरएक राजा को सौंप देता है।  अंत में प्रतिज्ञा पूर्ति के लिए अपने वृद्ध गुरु को भी।  वह दोनों रचनाओं में स्वार्थी पुरुष का प्रतीक बनकर उपस्थित होता है।  माधवी केवल चार पुरुषों की कामांधता का शिकार ही नहीं होती, बल्कि उनके चक्रवर्ती बनने के लोभ का भी पात्र बनती है।  रोकर दुहाई देने पर भी एक भी पुरुष उसके पुत्र को उसके साथ भेजने के लिए तैयार नहीं होता।  क्रोध और अपमान से पीड़ित माधवी को भीष्म साहनी ने भी अंत में विद्रोही के रूप में चित्रित किया है।  वह गालव से प्रतिशोध लेने के लिए वन की ओर प्रस्थान करती है।

    माधवी हर जगह हर एक के लिए भोग्या थी।  उसकी सुन्दरता भी इसका एक निमित्त था।  नाटक माधवी में गालव के प्रति अपने पवित्र प्रेम के कारण वह सब कुछ सहती रही।  अन्य पुरुषों के साथ रहने पर भी मन में गालव को ही याद करती रही।  गालव के लिए उसने अपने यौवन को भी तिलांजली दी।  पर अंत में गालव भी उसकी रमणीयता की कामना करने लगा तो माधवी तिलमिला उठती है।  वह आगे भोग्या बनने से इनकार करती है।  वह पुनः अपने कौमार्य को प्राप्त नहीं करती।

    इस प्रकार दोनों रचनाओं का अध्ययन करने पर हमें पता चलता है कि भारतीय साहित्य में कई ऐसी अंतर्धाराएँ हैं, जो एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं।  हिंदी के भीष्म साहनी तथा कन्नड़ की अनुपमा निरंजना भी इस प्रकार समान विचारधाराएँ रखनेवाले व्यक्ति हैं।  दोनों ने अपनी कल्पनाशीलता के अनुसार चरित्रों का निर्माण किया तथा उनमें जीवंतता भर दी।  महाभारत की 'माधवी' नामक चरित्र के यातनापर्वों को उजागर करने के बाद दोनों ने उसको अपनी स्थिति के प्रति प्रतिशोध करनेवाली एक विद्रोहिणी नारी के रूप में चित्रित किया है, जो आज की स्त्री के लिए आदर्श हो सकती है।  माधवी को इस प्रकार विद्रोहिणी दिखाकर इन दोनों रचनाकारों ने स्पष्ट किया कि नारी केवल पुरुष पर निर्भर नहीं है।