मार्टिन जॉन की लघुकथाएँ

मार्टिन जॉन
१- सबसे बड़ी ख़ुशी 
                                                   
बारह सालों की कठोर तपस्या रंग लाई। इस दरम्यान घर से दूर रहकर हास्टल में वह सिर्फ़ क़िताबों की दुनिया में खोया रहा। पिचानबे प्रतिशत अंकों के साथ बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण होने और राज्य स्तर पर प्रथम आने की खबर पर उसे लगा जैसे  जीवन की समस्त खुशियां सिमट कर उसके क़दमों तले आ गई हैं। इससे बड़ी कोई ख़ुशी हो ही नहीं सकती।

आई.आई.टी की संयुक्त प्रवेश परीक्षा में तृतीय रैंक पाकर उसने महसूस किया कि यह तो उससे बड़ी ख़ुशी है। देश के नामचीन आई.आई.टी में दाखिला मिला। सौ प्रतिशत जॉब गारंटी वाली स्ट्रीम एरोस्पेस साइंस लेकर पढ़ाई शुरू की। पुनः हास्टल में रहकर वैमानिकी की मोटी-मोटी किताबों में खो गया। पाँच साल की कठिन तपस्या का संकल्प लेकर अपने करियर को संवारने में लग गया। ख़ुशकिस्मती देखिये कि प्रशिक्षण के पाँच साल पूरा होने के पहले ही उसे कैम्पस सिलेक्शन द्वारा एक मेजर प्राइवेट एयरलाइन ने चुन लिया। मोटी तनख्वाह पर एयरलाइन का ऐरोनॉटिक्स इंजीनियर बनने के बाद उसे लगा इस ख़ुशी के आगे तमाम खुशियाँ बौनी हैं।

अभी नौकरी के एक साल पूरे हुए कि नहीं एक इन्टरनेशनल सिविल एयर लाइन से ऑफर मिला। उसने मौका हाथ से नहीं गंवाया। फ़ौरन ऑफर स्वीकार कर विदेश चला गया। एक से बढ़कर एक खुशियाँ। खुशियों का अंत नहीं। विदेश में नौकरी करने के दौरान तमाम तरह की अकल्पनीय सुख- सुविधाओं का उपभोग करते, खुशहाल जीवन जीते साल गुज़र गए।

मम्मी-डैडी  के बार बार आग्रह पर वह कुछ दिनों की छुट्टियां लेकर अपना घर वापस आया। सफ़र की थकान मिटाने के बाद जाड़े की गुनगुनी धूप का आनंद लेने की ख़ातिर वह अपने मकान की छत पर जा पहुंचा। ईजीचेयर पर लेटे-लेटे इस छोटी सी ज़िन्दगी में मिली ढेर सारी खुशियों के बारे में सोचते-सोचते सहसा उसकी नज़र खुले आकाश के प्रांगण में नाचती, डोलती, गुलाटियाँ खाती रंग-बिरंगी पतंगों पर पड़ी। नीचे मैदान में ढेर सारे बच्चों को पतंग उड़ाते देख उसके कदम स्वतःसीढियों को नापते नीचे उतर आये। थोड़ी देर बाद उसने अपने को बच्चों की टोली के बीच पाया। एक बच्चे से लटाई लेकर डोर से बंधी पतंग हवा में नचाने लगा। नाचती पतंग ने उसके जिस्म की शिराओं में एक अज़ीब सी झुर-झुरी पैदा कर दी। अरे! यह कैसा विचित्र अहसास है ! इस अदभुत किस्म की फीलिंग तो उसे कभी नहीं हुई। अठखेलियां करती पतंगों ने उसके पोर- पोर को रोमांच से भर दिया।

 सामने ही बच्चों की एक टोली गिल्ली-डंडा के खेल में मस्त थी। उसके कदम वहीँ बढ़ गए। बहुत देर तक खेल को निहारने के बाद बच्चों से अनुरोध कर डंडा हाथ में लिया। गिल्ली को उछाल कर डंडे से उस पर वार किया। वार निशाने पर था। गिल्ली हवा से बातें करती हुई दूर जा गिरी। वार की कामयाबी से आह्लाद्कारी शोर के साथ तमाम बच्चे उछल- उछल कर तालियाँ बजाने लगे। वह भी शोर में शामिल हो गया। उछल- उछल कर तालियाँ बजाने लगा। उफ ! ये कैसी ख़ुशी है ... इसका स्वाद तो कभी चखा ही नहीं!

रात को सोने से पहले उसने अपने विदेशी सहकर्मी को एसएमएस किया, “सबसे बड़ी और असली ख़ुशी आज ही मिली।”

२- निपटारा 

बचपन में जब हम तीनो भाई किसी बात पर लड़ते झगड़ते तो माँ कुछ इस तरीके से हमारी लड़ाई का निपटारा करती कि हमें एक दूसरे से कोई शिकायत नहीं रह जाती। एकदम सर्वमान्य और संतोषप्रद निपटारा। वैसे भी, जब कभी घर-परिवार से जुड़ी कोई समस्या मुँह बाए खड़ी होती, उस वक्त पापा चिंतित नहीं होते। हमसे यही कहते , “....अरे , तेरी माँ है न !”

कालांतर में हम बड़े हुए। नौकरियां लगीं। शादीशुदा हुए। अपने-अपने परिवार के साथ अलग-अलग शहरों में जा बसे। पैतृक मकान में इकट्ठे रहना संभव नहीं था। नौकरी की मजबूरी थी। घर में माँ एक पुरानी और विश्वस्त नौकरानी के साथ रहने लगी।

ऊम्र की ढलान पर माँ गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। खबर मिलते ही हम सब घर पहुंचे। बीमारी  की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए माँ को फ़ौरन अस्पताल में भर्ती कर दिया गया। कुछ दिनों के इलाज के बाद डॉक्टर ने सलाह दी , "देखिये , माँ को अब अपने लोगों की सेवा की जरूरत है। आख़िरी समय में अपने लोगों के बीच खुद को पाकर उन्हें मानसिक शांति मिलेगी"।

डॉक्टर की सलाह अच्छी थी और उनका संकेत भी स्पष्ट था। लेकिन हमारे सामने एक समस्या मुँह बाए खड़ी हो गई।

बड़का ने शुरू किया , “सिक मेमो देकर आया हूँ ... जल्दी रिज्यूम करना है ... अगले सप्ताह ऑफिस का ऑडिट इंस्पेक्शन भी है। ... ऐसे में कैसे रह सकता हूँ।”

बड़ी भाभी ने साथ दिया, “माँ को अपने साथ ले जा भी तो नहीं सकते.... सरकारी क्वार्टर है दो छोटे-छोटे कमरे वाला। घर में तो तिल रखने की भी  जगह नहीं है।”

“मैं सरकारी दौरे पर रहता हूँ। ... सप्ताह दो सप्ताह बाद घर लौटता हूँ। मुश्किल से तीन दिनों की छुट्टी मिली है।” मझलका ने अपनी विवशता जताई।”

“स्कूल के  एग्जाम चल रहे हैं। ... ड्यूटी कुछ ज्यादा ही टाईट हो गई है। होल डे स्कूल में बीत जाता है। इस हालत में यह कैसे पॉसिबिल होगा कि हम यहाँ रहें।” मझली भाभी ने अपना राग अलापा।
“आप सब तो जानते ही हैं कि मेरी नई नौकरी है। ... छुट्टी लेकर यहाँ रहूँ तो मेरा इनिशियल रेकॉर्ड खराब हो जाएगा........ ऊपर से शीला प्रेग्नेंट है। ....मेरा तो एक कमरे वाला छोटा सा किराए का घर है।”  हमने भी अपनी मजबूरी का बखान किया।

घर में रखकर माँ की सेवा टहल करने के मामले को लेकर हमारे बीच जुबानी जंग छिड़ गई। माहौल बेहद कडुवा और कसैला हो गया। लेकिन समस्या अभी भी मुँह बाए हमारे सामने खड़ी थी। अंततः माँ ने ही इस बार भी अत्यंत सहज ढंग से हमारे झगड़े का निपटारा कर दिया। दूसरे दिन उन्होंने सदा के लिए अपनी आँखें मूंद लीं।