मृदारहित कृषि: निरापद सब्जियों के लिए उभरते समाधान

- अखिलेश कुमार एवं सत्येंदर यादव

आज दुनिया की आबादी 7.4 अरब हो चुकी है और 2020 तक इसके 9 अरब के आँकड़े पार कर जाने की संभावना है। ऐसे में किसान समुदाय के लिए सीमित प्राकृतिक संसाधनों से अपना उत्पाद बढ़ाना एक बड़ी चुनौती होता जा रहा है। भारतीय नगरीय समाज हर साल मानसून के दौरान खाद्य पदार्थों की कीमतों में स्फीति झेलता है, जिसका कि प्रमुख कारण ग्रीष्म ऋतु में फसलों की पैदावार में घोर कमी आ जाना है। अब यह तो सबको पता ही है कि भारतीय कृषितंत्र मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर है और जलवायु परिवर्तन के इस बदहाल समय में किसानी दिन बा दिन और भी मुश्किल भरी होती जा रही है। ऐसे हालात में निरापद कृषि (ग्रीन हाउस तकनीक) एक संभावित हल के रूप में तेज़ी से उभरकर सामने आई है; जहाँ हम खुले खेतों की तुलना में फसल (टमाटर के मामले में) की उपज छह गुना तक बढ़ा सकते हैं।
इसके अलावा भी साल भर अधिक लाभ कमाने के लिए हम कटाई का दायरा बढ़ा सकते हैं। इस तरह की निरापद या सुरक्षित कृषि में हम प्रमुख रूप से रिसाव युक्त या बूँद-बूँद सिंचाई का इस्तेमाल करते हैं जिसमें कि हम सत्तर प्रतिशत से अधिक पानी और खाद की बचत करते हुए घुलनशील खादों का प्रयोग सीधे-सीधे पौधे की जड़ों वाले क्षेत्र में करते हैं। इसको ऐसे भी समझ सकते हैं कि निरापद कृषि से कम से कम निवेश द्वारा अधिक से अधिक उत्पाद हासिल किया जा सकता है जो कि किसी भी प्रकार की तकनीक की सफलता के लिए सबसे अहम् नुस्ख़ा है और भारत में इसकी सख्त जरूरत है। हरित क्रान्ति की सफलता के बाद अब कृषि वैज्ञानिकों ने यह महसूस किया कि हमारा मृदा रसायन बुरी तरह प्रभावित हुआ है और साथ ही भूमिजल स्तर भी लगातार गिर रहा है।
इसके अतिरिक्त हमारे महानगरों के आसपास का इलाका बराबर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होता जा रहा है। आज खेतों का बड़ा हिस्सा लवणता, क्षारीयता और पानी उपलब्ध कराने की समस्या से इस क़दर जूझ रहा है कि इन परिस्थितियों में शाक-सब्ज़ियाँ नहीं उगाई जा सकतीं। ऐसे में विशेष रूप से नागरिक आबादी के लिए किफ़ायती तरीके से अपनी खुद की ताज़ा और स्वास्थ्यकर सब्ज़ियाँ उगाने के लिए मृदारहित कृषि एक अच्छा विकल्प है।
प्रश्न: मृदारहित कृषि क्या है?

मृदारहित कृषि वह विधि है जिसके द्वारा हम 'मिट्टी के प्रयोग बिना' ही हम पौधा उगा सकते हैं, इसमें पौधों की जड़ों की पकड़ बनाने के लिए मिट्टी के स्थान पर नारियल का बुरादा (कोको पीट पाउडर), दलदली कीचड़ या ज्वालामुखी की राख अवस्तर माध्यम की तरह प्रयोग में लाया जा सकता है। इसको अधिक बेहतर बनाने के लिए हम कोको पीट पाउडर में पर्लाइट और वर्मीकुलाईट भी मिला सकते हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य अवस्तर माध्यम को छिद्रयुक्त बनाने और पोषण संपन्न बनाने के साथ- साथ अवस्तर माध्यम में नमी बनाए रखना है।

प्रश्न: इसे कर कहाँ सकते हैं?
इस तरह खेती कहीं भी की जा सकती है, वहाँ भी जहाँ प्राकृतिक खेती संभव नहीं जैसे कि अपने ही घर की छत पर, बंजर ज़मीन में, खारी मिट्टी में या फिर गोलकृमि से संक्रमित मिट्टी में भी। अब चूँकि इसमें हम मिट्टी का उपयोग नहीं करते इसलिए मिट्टी की गुणवत्ता की परवाह करने की भी आवश्यकता नहीं। इसके सिर्फ उचित फर्टीगेशन तंत्र की जरूरत है और पौधों को सुरक्षा प्रदान कर सकने वाले ढाँचों की, जो कि पॉली हाउस  या नेट हाउस का बनाया जा सकता है।

प्रश्न: क्या-क्या उगा सकते हैं इसमें?
निरापद कृषि में स्वपरागण कर सकने वाली सब्ज़ियाँ आसानी से उगाई जा सकती हैं जैसे कि टमाटर और शिमला मिर्च मगर आजकल ककड़ी-खीरा, बैगन और कुम्हड़ा, कद्दू, पेठा इत्यादि के लिए पार्थेनोकार्पिक बीज भी बाजार में उपलब्ध हैं। पार्थेनोकार्पिक बीजों की विशेषता यह है कि इनके फल बीजरहित होते हैं जिन्हें कि सभी लोग खा सकते हैं यहाँ तक कि पथरी के मरीज़ भी।

प्रश्न: इसे करें कैसे?
कोको पीट पाउडर, पर्लाइट और वर्मीकुलाइट को 3:1:1 के अनुपात में मिश्रित कर लें, इसके बाद इसे डेढ़-डेढ़ किलो के प्लास्टिक थैलों या तले में छिद्रयुक्त डिब्बों में भर लेवें, छिद्रयुक्त इसलिए कि जिससे कि आवश्यकता से अधिक फर्टिगेशन घोल बाहर निकल सके। अब एक माह पुराना अंकुर इन  समायोजनों में प्रतिस्थापित करें। इसके पश्चात पौधे के तने के हिस्से को संबल देने के लिए किसी मजबूत सहारे इत्यादि का प्रयोग करें। इसमें पौधे की उचित वृद्धि और बेहतर फल व्यवस्था हेतु समय-समय पर छँटाई इत्यादि की आवश्यकता भी पड़ती है।

मृदारहित कृषि के लाभ: मृदारहित कृषि में हम कोको पीट, वर्मीकुलाइट और पर्लाइट के मिश्रण का प्रयोग करते हैं जो पौधे की वृद्धि के लिए उसके जीवनचक्र भर रोगमुक्त माध्यम उपलब्ध कराता है। निरापद कृषि में अन्य लाभ यह है कि इसमें रोग रोकने के लिए कीट कीटनाशकों के छिड़काव की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है इस तरह इसके उत्पाद खाने में भी सुरक्षित होते हैं। चूँकि इसमें प्रयुक्त अवस्तर माध्यम अत्यधिक छिद्रयुक्त होता है इसलिए मूल जैविकी के लिए भी यह अच्छा वातावरण बनाता है। इस कार्य में छोटी सी बाधा बस यही है कि सामान्य मिट्टी की तुलना में इसका अवस्तर माध्यम बार-बार पानी माँगता है, वह इसलिए कि इसकी पानी पकड़ कर रखने की क्षमता सामान्य मिट्टी से कम होती है।

भारत में इसके प्रदर्शन केंद्र:
मृदारहित कृषि का प्रदर्शन सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस फॉर वेजटेबल्स (सीईवी) में देखा जा सकता है, जो कि भारत और इस्राइल की एक सम्मिलित परियोजना है। यह केंद्र 2011 में करनाल के घरौंदा में माशव (इस्राइल की अंतरराष्ट्रीय विकास निगम संस्था) द्वारा स्थापित किया गया था। केंद्र के उद्देश्य फूलों और सब्ज़ियों की सुस्पष्ट कृषि को बढ़ावा देना है। वे निरापद कृषि के अन्तर्गत समय-समय पर नर्सरी उत्पाद, सिंचाई प्रबंधन, फ़ूलों और सब्ज़ियों की खेती के लिए पेशेवर लोगों, कॉर्पोरेट क्षेत्र के लोगों, विदेशी प्रतिनिधियों की, विद्यार्थियों, उद्यमियों और किसानों हेतु प्रशिक्षण शिविर आयोजित करते हैं। मृदारहित कृषि के अतिरिक्त यह केंद्र विभिन्न प्रकार की सिंचाई विधियों जैसे कि सिंचाई में पूर्ण स्वचालन, अर्द्ध स्वचालन एवं किफ़ायती बूँद व छिड़काव तंत्र इत्यादि का भी प्रदर्शन करता है। सीईवी विगत कई वर्षों से मृदारहित कृषि पर परीक्षण कर रहा है। उन्होंने नियमित रूप से टमाटर, पीले चेरी टमाटर, खीरे मृदारहित माध्यम पर उपजाए हैं। इनके फलों का उत्पाद क्रमशः 10 किलो टमाटर, 4 किलो चेरी टमाटर और 5 किलो खीरा प्रति पौधा प्रतिवर्ष रहा है। इस सफलता के बाद शिमला मिर्च पर इसी तरह के परीक्षण जारी हैं।