स्वरांगी साने की कविताएँ

स्वरांगी साने
1- परिवर्तन 

मैं विश्वास करूँ
ठोकर खाऊँ
हार जाऊँ

इससे बेहतर है
मैं करूँ संदेह।
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2- बारिश

बाहर तेज़ बारिश थी
वह रोशनदान में आ बैठी
केवल थोड़े- से आसरे की उम्मीद से
बहुत थोड़ी जगह चाहती थी
तुम्हारे पूरे घर में
तुम्हें लगा
वह ‘चिहूक चिहूक’ करेगी नाहक

वह केवल
उन तीखी बौछारों से बचने के लिए
आ बैठी थी
उसे केवल थोड़ी ऊष्मा चाहिए थी
गीले पँखों से उड़ नहीं सकती थी
गिर सकती थी, मर भी सकती थी

वह मरे तो मर जाए
तुम्हारी तकलीफ़ें ज़्यादा जायज़ थीं
तुम्हारा साफ़-सुधरा घर था
अपना एक जीवन था
तुम्हारा क़ीमती समय
वह बर्बाद कर रही थी
तुम ‘हुड़ हुड़’ कर रहे थे
वह ‘फर्र फर्र’ फड़फड़ा रही थी
कसमसा रही थी
उसे भी उड़ना था वहाँ से
पर उड़ नहीं पा रही थी
बाहर तेज़ बारिश थी।
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3- पोथी-पुराण

शिशुपाल के थे
सौ अपराध माफ़
उसने कितने किए अपराध
इसका हिसाब दे सकते हैं चित्रगुप्त ही
पर यक़ीनन
उसने हज़ारों-हज़ार बार मांगी है माफ़ी

बंद दरवाज़े को बजाया है
कभी धीरे, कभी ज़ोर से
कभी रोकर, कभी हुलस कर

जाने उसका अपराध क्या है
जो शिशुपाल के अपराधों से भी भारी पड़ रहा है
नहीं हो रहा उसका सिर, धड़ से अलग
सिर के होने से ही सारे बवाल हैं
धड़ में रहने वाले मन के ही सारे सवाल है

द्वार के पार
शायद
कृष्ण और उनके सुदर्शन की
प्रतीक्षा समाप्त हो जाए

ज़रा-सी चिटकनी है भीतर लगी
पर उसका लोहा
हारता जा रहा है
आँखों के पानी से गलता जा रहा है
सारा जीवन ढुलकता जा रहा है…