सम्पादकीय अनुराग शर्मा

अनुराग शर्मा
मित्रों,

वर्तमान काल दुविधाओं का समय है। पिछले दिनों में हमने वैश्विक आतंकवाद के वीभत्स रूप को देखा है। और इसके साथ ही आया है एक और संकट - शरणार्थियों का संकट। यायावरी कोई नई घटना नहीं और न ही आव्रजन या आप्रवास। लेकिन जब हज़ारों लाखों की संख्या में लोग अपनी ज़मीन से विस्थापित होने लगते हैं तब यह विस्थापन एक समस्या बन जाता है। नई जगह पर पहले से रहते हुए लोग नये और अंजान लोगों से सामान्यतः सहानुभूति रखते हैं। लेकिन फिर भी कुछ लोग उनकी और अपनी संस्कृति, भाषा, धर्म आदि  के अंतर के कारण खतरा महसूस करते हैं। सांस्कृतिक वैविध्य की स्वीकृति आज की प्रमुख आवश्यकताओं में से एक है। हमें दीवारें गिरानी हैं, और सेतु बनाने हैं।

सेतु परिवार ने अपने आरम्भ से ही एक वैश्विक सेतु बनने का प्रयास किया है। न केवल संसार की दो सबसे बडी भाषाओं को जोडकर बल्कि विश्व भर के साहित्यकारों की रचनाओं को मौलिक या अनूदित रूप में सामने रखकर हम साहित्य और संस्कृति के विशाल वैश्विक परिवार के लिये सेतु बनने के लिये प्रयासरत हैं।  

वैविध्य संसार का सौंदर्य ही नहीं, एक अमिट वास्तविकता भी है। हम सब एक जैसे होते हुए भी भिन्न हैं। लेकिन इस अनेकता में भी एक एकता छिपी बैठी है। बात केवल दृष्टि की है। मेरे जैसे प्रवासी भारतीय भी अपने साथ, अपने हृदय में एक भारत लेकर चलते हैं:

मैं भारत से बाहर, भारत मुझ में रहता है
मेरी सब सीमाएँ, राष्ट्र असीमित सहता है

भारतीय संस्कृति ने सदा वसुधैव कुटुम्बकम की बात की है। हम भारतीय, माता पृथिवी पुत्रोहम पृथिव्या की संस्कृति के वाहक हैं। हमें विशेष रूप से यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि हम अपने भारत को अपने नगर, भाषा, मज़हब या जाति तक सीमित न करें। उदात्त बनें और वैविध्य के सौंदर्य को महसूस कर सकें।
  
शुभकामनाओं सहित,

अनुराग शर्मा
पिट्सबर्ग, संयुक्त राज्य अमेरिका