अनिता ललित की लघुकथाएँ

अनिता ललित

1- नीयत

"इतनी देर कर दी आज तुमने मीना। चलो जल्दी से ये सेब काटकर विकी बाबा को दे दो। आज से उनके इम्तिहान शुरू हो रहे हैं। मैं जब तक जूस निकालती हूँ। और हाँ! सेब का छिलका उतारकर देना।" कहते हुए मेम साहब ने तिरछी नज़रों से मीना को देखा, तो उसके साथ उसके छह वर्षीय बेटे को देखकर अनमनी सी होकर पूछ बैठीं, "क्या हुआ? इसे क्यों साथ ले आई?"

इसपर मीना बोली, "मेम साहब कल इसको बहुत तेज़ बुखार था। कल से कुछ खाया भी नहीं। आज साथ आने की ज़िद पकड़ ली तो लाना पड़ा। नहीं तो हम भी काम पर नहीं आ पाते।" कहते हुए उसने सेब की प्लेट और चाक़ू सम्भाल लिया और अपने बेटे से बोली, " ए मुन्नू! जा! बईठ जा हुआँ जाके ! और कौनो सितानी न करना, ठीक!"

सहमा-शरमाया हुआ सा मुन्नू वहीँ एक कोने में बैठ गया और माँ को सेब काटते हुए देखने लगा। सेब को देखते हुए धीरे-धीरे उसकी आँखों में एक लालसा सी उभरने लगी। खाली पेट अंदर से मचलने लगा और वह ललचाई निगाहों से माँ को देखते हुए अपने पपड़ी जमे होठों पर जीभ फिराने लगा। मीना ने उसके मन की बात भाँप ली और डर कर उसने सेब की प्लेट के सामने अपनी आड़ कर ली। कहीं उसका भूखा बच्चा उससे सेब माँग बैठा तो वह क्या करेगी ! वह जल्दी-जल्दी सेब पर चाक़ू चलाने लगी।

उधर मेम साहब विकी बाबा के पीछे जूस का गिलास लिए फिर रहीं थीं और उसकी मनुहार किये जा रही थीं।
"पी ले बेटा! देख तो कैसे सूखता चला जा रहा है! पी ले, इससे दिमाग़ और तेज़ चलेगा और इम्तिहान में अव्वल आएगा। तू देखना!"
मगर विकी बाबा अपनी 'ना' पर ही अड़े हुए थे, "कहा न मॉम ! मुझे नहीं पीना अभी। वैसे ही बहुत खा लिया है। अब जी मिचलाने लगा है मेरा। बस करो!"
तभी साहब गरज़ पड़े, "क्यों नखरे दिखा रहे हो? शुकर मनाओ ये सब नसीब हो रहा है वरना तो ..."
बात पूरी होने के पहले ही गुस्से में विकी बाबा ने जूस का गिलास लिया और गटागट एक साँस में पी गया। गिलास रखते ही उसे ज़ोर की हिचकी आई, वह बाथरूम की ओर भागा और अगले ही पल सारा जूस उलट दिया। मेम साहब भी उसके पीछे दौड़ीं।
"ओहो! ये क्या हो गया !" कहकर उसकी पीठ सहलाने लगीं। चिढ़कर विकी बाबा बाहर आया और अपना बैग उठाकर घर से बाहर निकल गया।

मेम साहब को समझ ही नहीं आया कि वह क्या प्रतिक्रिया दें कि तभी उनकी नज़र मुन्नू पर पड़ी, जो पता नहीं कब यह सब शोर सुनकर आकर वहीं खड़ा हो गया था और कौतूहल भरी निगाहों से यह सारा तमाशा देखने लगा था। । उसकी नज़रों में एक अजीब सी उत्सुकता भरी हुई थी। उसका बाल-मन और खाली अकड़ता हुआ पेट इस 'खा लो!’ और ‘नहीं खाना!' की खींचातानी को नहीं समझ पा रहा था। उसे देखते ही मेम साहब गुस्से में उबल पड़ीं, "तू क्या कर रहा हैं यहाँ मेरे सिर पर? जा के बाहर बैठ न! हाँ नहीं तो! चले आते हैं जाने कहाँ-कहाँ से भुक्खड़, नीयत लगाने को। तभी तो मेरे बच्चे का खाया-पिया सब उलटी हो गया! हुँह !"

मुन्नू सहमकर बाहर जाकर दरवाज़े के पास देहरी पर बैठ गया जहाँ मीना ने सेब के छिलके रख दिए थे। उन्हें देखकर उसकी मासूम आँखों में चमक आ गई। उसने एक पल को इधर-उधर देखा और फिर धीरे से एक छिलका उठाकर अपने मुँह में डाल लिया।


2- रस्म

बर्तन गिरने की आवाज़ से शिखा की आँख खुल गयी। घडी देखी तो आठ बज रहे थे , वह हड़बड़ा कर उठी।
“उफ़्फ़ ! मम्मी जी ने कहा था कल सुबह जल्दी उठना है , 'रसोई' की रस्म करनी है, हलवा-पूरी बनाना है… और मैं हूँ कि सोती ही रह गयी। अब क्या होगा…! पता नहीं, मम्मी जी, डैडी जी क्या सोचेंगे, कहीं मम्मी जी गुस्सा न हो जाएँ। हे भगवान!”
उसे रोना आ रहा था। 'ससुराल' और  'सास' नाम का हौवा उसे बुरी तरह डरा रहा था। कहा था दादी ने-
 "ससुराल है, ज़रा संभल कर रहना। किसी को कुछ कहने मौका न देना, नहीं तो सारी उम्र ताने सुनने पड़ेंगे। सुबह-सुबह उठ जाना, नहा-धोकर साड़ी पहनकर तैयार हो जाना, अपने सास-ससुर के पाँव छूकर उनसे आशीर्वाद लेना। कोई भी ऐसा काम न करना जिससे तुम्हें या तुम्हारे माँ-पापा को कोई उल्टा-सीधा बोले।”
शिखा के मन में एक के बाद एक दादी की बातें गूँजने लगीं थीं।
किसी तरह वह भागा-दौड़ी करके तैयार हुई। ऊँची-नीची साड़ी बाँध कर वह बाहर निकल ही रही थी कि आईने में अपना चेहरा देखकर वापस भागी-न बिंदी, न सिन्दूर -आदत नहीं थी तो सब लगाना भूल गयी थी। ढूँढकर बिंदी का पत्ता निकाला। फिर सिन्दूरदानी ढूँढने लगी…. जब नहीं मिली तो लिपस्टिक से माथे पर हल्की सी लकीर खींचकर कमरे से बाहर आई।
जिस हड़बड़ी में शिखा कमरे से बाहर आई थी, वह उसके चेहरे से, उसकी चाल से साफ़ झलक रही थी। लगभग भागती हुई सी वह रसोई में दाख़िल हुई और वहाँ पहुँचकर ठिठक गयी। उसे इस तरह हड़बड़ाते हुए देखकर सासू माँ ने आश्चर्य से उसकी तरफ़ देखा। फिर ऊपर से नीचे तक उसे निहारकर धीरे से मुस्कुराकर बोलीं,
“आओ बेटा! नींद आई ठीक से या नहीं ?”
खा अचकचाकर बोली,”जी मम्मी जी! नींद तो आई, मगर ज़रा देरी से आई, इसीलिए सुबह जल्दी आँख नहीं खुली …सॉरी…. ” बोलते हुए उसकी आवाज़ से डर साफ़ झलक रहा था।
सासू माँ बोलीं, ” कोई बात नहीं बेटा! नई जगह है… हो जाता है !”
शिखा हैरान होकर उनकी ओर देखने लगी, फिर बोली,
“मगर…मम्मी जी, वो हलवा-पूरी?”
सासू माँ ने प्यार से उसकी तरफ़ देखा और पास रखी हलवे की कड़ाही उठाकर शिखा के सामने रख दी, और शहद जैसे मीठे स्वर में बोलीं,
“हाँ! बेटा! ये लो! इसे हाथ से छू दो!”
शिखा ने प्रश्नभरी निगाहों से उनकी ओर देखा।
उन्होंने उसकी ठोड़ी को स्नेह से पकड़ कर कहा, “बनाने को तो पूरी उम्र पड़ी है! मेरी इतनी प्यारी, गुड़िया जैसी बहू के अभी हँसने-खेलने के दिन हैं, उसे मैं अभी से किचेन का काम थोड़ी न कराऊँगी। तुम बस अपनी प्यारी- सी, मीठी मुस्कान के साथ सर्व कर देना -आज की रस्म के लिए इतना ही काफ़ी है।”
सुनकर शिखा की आँखों में आँसू भर आए। वह अपने-आप को रोक न सकी और लपक कर उनके गले से लग गई ! उसके रुँधे हुए गले से सिर्फ़ एक ही शब्द निकला – “माँ !"


3- मन की मिश्री

हर दिन की तरह छोटे से पूजाघर में 'टिन टिन टिन टिन.…' घंटी की आवाज़ के साथ ही माता जी का 'जय राधे-कृष्णा' स्वर गूँज रहा था। पूजा समाप्त करके माता जी कुर्सी के हत्थे का सहारा लेकर उठीं और अपनी छड़ी के सहारे लँगड़ाते हुए क़दमों से पूजाघर से बाहर आयीं। उनके हाथ में छोटी सी तश्तरी में प्रसाद के रूप में कुछ मिश्री के दाने थे, जिन्हें वे घर के लोगों में बाँटने लगी थीं। तभी उनके सामने कमला पड़ी। उसने भी हाथ पसार दिया, मगर वे उसे अनदेखा करके, कुछ भुनभुनाते आगे बढ़ गयीं। कमला ने उदास होकर अपना हाथ पीछे खींच लिया और अपने काम में लग गई। यह आजकल त्रिपाठी जी के यहाँ का प्रतिदिन सवेरे का दृश्य होता था।
       कुछ दिनों पहले ही त्रिपाठी जी अपनी माता जी को अपने पास रहने के लिए, इस बड़े शहर में, लेकर आए था। घर में उनकी पत्नी, जो एक स्कूल में अध्यापिका थीं, दो बच्चे और काम करने के लिए एक लड़की कमला थी, जो घर का काम काफ़ी कुछ सँभाले हुए थी।
      माता जी ने आते ही कमला के बारे में पूछताछ की -कौन है? कहाँ की है? मगर जब उन्हें पता चला कि वो उन जैसी कुलीन, उच्च 'जाति' की नहीं है, तो उन्होंने हंगामा मचा दिया। वे उसके हाथ से खाना-पीना लेना तो दूर, अपना कोई काम उससे नहीं कराती थीं। बात-बात पर उसको नीचा दिखाती थीं। कमला जब भी माता जी से बात करना चाहती, तो वे उसे झिड़क देतीं। वह बेचारी चुपचाप आँसू बहाती हुई सामने से हट जाती थी। त्रिपाठी जी एवं उनकी पत्नी ने माता जी को बहुत समझाने की कोशिश की मगरवे टस से मस न हुईं। यहाँ तक कि वे अपना खाना भी स्वयं बनाती थीं।
    एक दिन दोपहर को घर में माता जी अकेली थीं। कमला को उन्होंने रोज़ की तरह घर के मुख्य द्वार के बाहर बिठाया हुआ था ; क्योंकि जिस समय वे अपना खाना बना रही होतीं उस समय कमला को वहाँ आने की इजाज़त नहीं थी।
               सुबह से काम में लगी हुई कमला थकी हुई थी, अंदर अभी एक घंटा जाने नहीं मिलेगा, यह सोचकर उसकी आँख लग गई कि तभी अचानक बहुत ज़ोर की किसी आवाज़ से उसकी आँख खुल गई, साथ ही,
'हाय राम! मैं मर गई !"
की दर्द-भरी चीख उसके कानों में पड़ी। वह चौंककर उठ बैठी ! सोचने लगी कि ये तो दादी जी की आवाज़ है। मगर फिर वह उठते-उठते रुक
गई,
"हुँह ! होगी! मुझे क्या! मुझे तो बाहर बैठने का हुक़्म दिया है ! मैं क्यों जाऊँ ! और फिर अगर यह मेरा वहम् होगा तो दस बातें और सुनाएँगी।"
वह वापस  बैठ गई । मगर चीख़ों की आवाज़ लगातार आने लगी,
"अरे! कोई है! कोई तो आओ ! हे भगवान! मैं क्या करूँ!"
   आख़िर कमला से रहा न गया। वह धीरे से उठकर भीतर गई और वहाँ का नज़ारा देखकर वह भी चिल्ला पड़ी,
"अरे दादी जी! आप कैसे गिरीं?"
     माता जी को ज़मीन पर गिरा देखकर वह घबरा गई थी । जल्दी से आगे बढ़ी, अपना हाथ बढ़ाया, पर फिर डरकर पीछे खींच लिया ! माता जी गुस्से और तक़लीफ़ के मिले-जुले स्वर में बोलीं,
" अरे! मेरा मुँह क्या देख रही है? बुला किसी को जल्दी से, जो मुझे उठाए !"
कमला बोली,
"क्या करूँ दादी जी? यहाँ तो आसपास कोई है नहीं ! साहब-मेम साहब को फ़ोन लगाऊँ ? मगर उनको भी यहाँ आते-आते घंटे-दो घंटे लग जाएँगे।"
 माता जी फिर कराहने लगीं !
एक पल को कमला ने कुछ सोचा और हिम्मत करके आगे बढ़ी। माता जी,
"अरे तू दूर हट!"…
कहती रहीं ,मगर उसने अपने दोनों हाथों से माता जी को बाँहों के नीचे से पकड़कर उठाया और उन्हें सहारा देकर उनके कमरे में ले जाकर लिटा दिया। इसके बाद उनके घुटनों और कमर में तेल लगाया। माता जी चुपचाप आँखे बंद किए सब करवाती रहीं। उस दिन घर के किसी भी सदस्य को इस दुर्घटना के बारे में कुछ भी पता नहीं चला।
       अगले दिन सुबह-सवेरे जब माता जी पूजा करके निकलीं, तो सबके मुँह खुले के खुले रह गए- माता जी कमला का सहारा लेकर
पूजाघर से आ रही थीं- प्रसाद की तश्तरी कमला के हाथों में थी और उसके मुँह के अंदर ही नहीं, चेहरे पर भी मिश्री- सी मुस्कान खिल गई थी।

4- ख़ास आप सबके लिए!

गर्म-गर्म गुजिया एक सुंदर प्लेट में सजी हुई मेज़ पर रखी हुई थीं। वह अपने मोबाइल से भिन्न-भिन्न एंगल से उस गुजिया से सजी प्लेट का फ़ोटो खींच रही थी-मगर उसके मन का फ़ोटो नहीं आ रहा था।  वह बहुत जल्दी में लग रही थी और इसलिए खीझ भी रही थी। मेज़ के दूसरे कोने में उसका लैपटॉप रखा हुआ था, जिसमें वह बीच-बीच में झाँक कर आती थी और उसकी बेचैनी और भी बढ़ जाती थी- यूँ लग रहा था मानों वह किसी 'रेस' में भाग लेने की तैयारी कर रही हो। इतने में उसका बेटा चिंटू खेलकर आया और इतनी सारी गुजिया देखकर उससे रहा न गया और  "अहा! गुजिया! मम्मा ! बहुत ज़ोरों की भूख लगी है!" कहकर प्लेट पर झपट पड़ा।
 'चटाक् '...  की आवाज़ के साथ एक और आवाज़ गूँजी...
" दो मिनट का सब्र नहीं है! कोई मैनर्स नाम की चीज़ भी सीखी है? भुक्क्ड़ की तरह टूट पड़े बस!"
फिर सन्नाटा छा गया। चिंटू प्लेट तक पहुँच भी न पाया। उसे अपना क़सूर भी न समझ आया। बस अपना गाल सहलाता हुआ, सहम कर ठिठक गया।
वह बड़बड़ाती हुई फिर से गुजिया की प्लेट का एंगल सही करने लगी।
इतने में एक संकोचभरी आवाज़ आई,"बहू ! अगर तुम खाली हो गई हो तो गुजिया ले आना, भगवान जी को भोग लगा दें?"
"आती हूँ!... सबको अपनी ही पड़ी है! हुँह !"
कहती हुई वह लैपटॉप पर बैठकर कुछ करने लगी। थोड़ी ही देर में उस 'गुजिया की प्लेट' की फ़ोटो फ़ेसबुक पर लगी हुई थी , और उसका शीर्षक था- "ख़ास आप सबके लिए!"
कुछ ही मिनटों में उस फ़ोटो पर ढेरों 'लाइक्स' और 'वाह! वाह! गृहिणी हो तो आप जैसी !' - कमेंट्स आने लगे और वह गर्व से फूली नहीं समाई।
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