बाबुषा कोहली की कविताएँ

बाबुषा कोहली
1. संध्या राग
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(बड़े ग़ुलाम अली खान साहब की संगत में गुड़िया की रंगत )

स्मृतियों की छुअन भर से
छिल जाती साँझ की
कोमल त्वचा

जल भरे कटोरे
पलकों से ढाँकती
घाव पर
चन्द्रमा की चुटकी भर
हल्दी बाँधती
मास बीते
गलियाँ निहारती

गुड़िया
छिले कंठ के तीजे तार पे
जंगला भैरवी साधती

कि
"नैना मोरे तरस रहे आजा बलम परदेसी"


2. सितारे
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देखो तो !
सलामत है
सीपी में छुपा हिज्र का मोती?

गिनो तो !
कितनी गाँठें हैं
सब्र के पवित्र धागे में ?

बताओ तो !
आज की रात
आकाश इस क़दर रौशन क्यों है ?

 3. बावफ़ा
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पानी की गाँठ
से बाँध नाता
फिर
छूट नहीं पाती है

नदी नहीं देती
दरिया को दग़ा
गीली देह में
चख आत्मा का नेह
नमक का मोल
चुकाती है

 4. ठुड्डी का तिल
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अधूरी चाहना की थाप पर
श्वास का नृत्य
अधखिले स्वप्न में महकता
नींद का फूल

सूर्य से तेज
बहुत तेज दहकता
आधी रात का चंद्रमा

छूटे का कैसा अपार सौंदर्य
जीवन

अह !
उस सुंदर तिकोनी ठुड्डी पर
मोहक तिल-सी
मृत्यु 

5. बाबुषा@2am
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अपनी हथेली की जेब तो देखो
दुष्टू!

कहाँ गिरा आए तुम अपनी सबसे महँगी रेखा
किधर निकल गए थे खेलने
कैसी जगह है वो दलदली
कि मिट्टी के कपड़ों पर और मिट्टी छप गई है
आत्मा पर जम गई है धूल की मोटी परत
कौन-सा खेल का मैदान है वह

आओ!
आओ मेरे पास कि तुम्हें नहला दूँ
उतरो मेरे मन के गहरे ताल में
मेरे काँधे पकड़ लो बाबू
आँखों की जलन से मत घबराओ
कि साबुन की तीखी झार है प्रेम मेरा
आओ मेरे पास कि तुम्हें नहला दूँ
अपनी सूखी साँसों से पोछ दूँ तुम्हारी देह गीली

आ जाओ कान्हा!
तुम्हें सत्य की सफ़ेद क़मीज़ पहना दूँ
अपने रतजगों का निचोड़ा हुआ तेल मल दूँ तुम्हारे कपाल पर
माथे पाड़ दूँ नज़र का टीका
तुम्हाले चूँ चूँ आवाज़ वाले जूते पहना दूँ
तुम्हें थिलौने दिला दूँ
तुम्हाली गुलिया को छाली पिन्हा दूँ

तुम मेरी बंजर ममता के राजदुलारे हो आज की रात

ओ शैतान !
कुल्फ़ी वाला आया है देखो!
दरवाज़े घन्टी बजाता
रुको बाबू!
दौड़ो मत!

मैं दे रही हूँ अपनी आँखों की गुल्लक से सिक्के
तुम अपनी रेखाएँ दे कर कुल्फ़ी मत ख़रीदना

 6. स्वप्न में सुगंध
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जितना दिखता है खिड़की से
उतना ही तो नहीं होता आकाश का क्षेत्रफल 

उस अकड़े हुए पेड़ का नाम
अहं है शायद
जिसकी लकड़ियों से
बनती हैं छोटी-छोटी खिड़कियाँ 

फैली हथेली पर आकाश बरस पड़ता है
उँगलियों के बीच से रिसता हुआ
टप ... टप ... टप

अपरिमित के बीज से उगता हुआ
चेतना का निरन्वय फूल
फैलती हथेली
फैलता आकाश

और फैलती है पृथ्वी पर
बुद्ध की सुगंध