लघुकथा: सृजन और विमर्श

- बलराम अग्रवाल
बलराम अग्रवाल

यह लेख 6-11-2014 को लिखा गया था। इससे पहले अंशत: इसकी कुछ बातें मैंने अक्टूबर 2014 में पंजाब में सम्पन्न 'अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन' में अपने वक्तव्य में कही थीं। इसे लिखवाने का मुख्य श्रेय तो भाई श्याम सुन्दर अग्रवाल जी को है, जिन्होंने सम्मेलन में पढ़ने के लिए किसी एक विषय पर पर्चा लिख लेने को कहा था। लेकिन उस समय मैं केवल कुछ बिंदु ही तय कर पाया था और उन्हीं पर मंच से अपनी बात कह दी थी। बाद में उन बिंदुओं पर विस्तार से बात करने को प्रेरित करने का श्रेय तीन व्यक्तियों को है--डॉ॰ उमेश महादोषी, मधुदीप और जगदीश कुलरियाँ। इन सभी का आभार।

दुनिया का, यहाँ तक कि आपसी सम्बन्धों का भी, बाजार में बदलते जाना आपको डराता है। उस पर आप एक बेहतरीन लघुकथा लिखते हैं। यह सब तो किसी हद तक समझ में आता है; लेकिन अपनी रचनाओं को लेकर आपका बाजारू हो उठना बाजार से आदमी और रिश्तों को बचाने की आपकी अकुलाहट को खोखला साबित कर देता है। यह किसी एक लेखक का चरित्र नहीं है बल्कि प्रकारान्तर से हम सभी उस घेरे में कैद हैं। 

यह नि:संदेह शोध का विषय बनता है कि हिन्दी के कुछ स्वनामधन्य प्राध्यापक अपनी आलोचकीय मेधा को एकाध पुस्तक अथवा एकाध रचनाकार पर ही क्यों टिकाए हुए हैं? पुस्तक और रचनाकार भी मुख्यत: वो, जिन्हें उन्हें कक्षा में पढ़ाना पड़ता है। हम लघुकथा की बात करते हैं। यह इस विधा की हार है कि गत लगभग पचास वर्षों में नए-पुराने किसी आलोचक ने इसको अपनी कलम से परखना जरूरी नहीं समझा; या फिर आलोचक की? इससे क्या यह सिद्ध नहीं हो जाता है कि वे आलोचना के बने-बनाए फ्रेम में ही चूहा-दौड़ करते रहने के अभ्यस्त हैं, अपनी आलोचकीय छवि के लिए नया फ्रेम उन्हें असुरक्षित लगता है। कम से कम लघुकथा के मामले में तो यह दावे के साथ कहा ही जा सकता है कि हिन्दी कथा का आलोचक नई पगडंडियाँ रचने का ‘रिस्क’ लेने का साहस नहीं जुटा पाता है। और आलोचना के मामले में यही वह बिंदु है जहाँ यह तय हो जाता है कि अनेक तरह की आकर्षक शब्दावली का प्रयोग करने के बावजूद आलोचक भी कमोबेश अपनी मार्केटिंग की ही चिंता से घिरा है, स्वतंत्र नहीं है। करीब-करीब उसी घेरे में कैद है जिसमें हम कुछ लेखकों को भी खड़ा देख रहे हैं। 
जो लेखक और आलोचक सामाजिक शुचिता और संस्कृति के संरक्षण को तरजीह देने की तरफदारी करते हैं, प्रगतिशीलता, आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता की रेस में शामिल लेखक और आलोचक उन पर दकियानूसी विचारों का पोषक होने का आक्षेप लगाकर उनकी चिंता को दरकिनार करते दिखाई देते हैं। 

पिछली सदी के सातवें-आठवें दशक की लघु्कथाएँ मुख्यत: बेरोजगारी, चौतरफा गरीबी, राजनीतिक दोमुँहेपन, सरकारी तन्त्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और सम्बन्धों में आते बिखराव की चिंताओं से लैस थीं। क्या आज ये सब मुद्दे खत्म हो गये हैं? नहीं। तो आज की लघुकथा में ये क्यों नहीं हैं? और,  हैं तो क्यों हैं? बावजूद इसके कि आज भी हमारा समाज इन पुरातन चिंताओं से मुक्त नहीं हो पाया है, मैं अपने आप को इन्हीं समस्याओं पर लघुकथा के चकराते रहने से पूरी तरह सहमत नहीं पाता हूँ। आज की लघुकथा अगर इन मुद्दों से आगे की, कुछ नवीन चिंताओं के आ जुड़ने, घनीभूत हो उठने और यदा-कदा पुरानी चिन्ताओं के भी परिवर्तित व परिवर्द्धित रूप में आ जाने की पैरवी कर रही है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। 

‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के दिसम्बर 2013 विशेषांक में सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी का एक साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है। उसमें एक स्थान पर वे कहते हैं, “…कहानी के केन्द्र में कोई एक बात ही होनी चाहिए। …कथानक में बिखराव से कहानी की कला भी नष्ट होती है।” अज्ञेय और राजेन्द्र यादव के बाद डॉ॰ त्रिपाठी तीसरे व्यक्ति हैं जिन्होंने ‘कहानी के केन्द्र में कोई एक बात’ होने की बात कही है। हमारा मानना है कि डॉ॰ त्रिपाठी का यह आकलन बहुत लेट, कहानी की सूरत बिगड़ जाना शुरू होने के 45-50 साल बाद आया है। कहानी की दुर्दशा को देखकर सही समय पर यह आकलन सबसे पहले अज्ञेय ने दिया था। ‘हिन्दी चेतना’ के कथा-आलोचना विशेषांक, अक्टूबर-दिसम्बर 2014 में लगभग इसी बात को असगर वजाहत ने यों कहा है, “इधर हिन्दी में कहानी किस्म के उपन्यास आने लगे हैं। लगता है, बेचारी कहानी को पीट-पीटकर उपन्यास बना दिया गया है ...” असगर साहब ने यह बात उपन्यास के सन्दर्भ में कही है; जब कि एकदम यही बात सातवें-आठवें दशक में छप रही कहानी पर भी लगभग ज्यों की त्यों लागू होती थी। साफ नजर आता था कि केवल लम्बाई बढ़ाने की नीयत से छोटी-सी एक बात को जबरन खींच-तानकर कहानी बनाने का करिश्मा किया गया है। कथा-प्रस्तुति के साथ इस जबरन खींच-तान के विरोध का नाम ही समकालीन लघुकथा है।

अपने दौर की कहानी के बिखराव से खुद को बचाते हुए आठवें दशक के कथाकारों ने विषय की एकतानता को केन्द्र में रखकर लघुकथा लिखना शुरू कर दिया था। कथानक के बिखराव को रोकते हुए उन्होंने कहानी की कला को नष्ट होने से बचाने की पुरजोर कोशिश की। हाँ, इतना जरूर हुआ; लेकिन पारम्परिक आलोचकीय दृष्टि उस मुहिम से खुद को जोड़ नहीं पाई। वस्तु के चुनाव और कथा-प्रस्तुति में अपने समय की चिन्ताओं से युक्त लघुकथाओं की पड़ताल आज बहुत जरूरी है। आज स्थिति यह है कि लघुकथा की सम्यक पड़ताल के बिना कहानी की पड़ताल लगभग अधूरी है। 

आठवें दशक से पहले की लघुकथा का स्वर मनुष्य को मुख्यत: उसका नैतिक चरित्र सुधारने का उपदेश देने वाला होता था। आठवें दशक से लघुकथा के उपदेशपरक चरित्र में बदलाव आना लक्षित होता है। बेशक, पहले भी उसके केन्द्र में मनुष्य ही था; लेकिन सम्प्रेषण के उसके माध्यम मानवेतर भी थे गोया कि उनके माध्यम से कही बात मनुष्य की समझ में आसानी से आएगी। लघुकथा का वह कलेवर पंचतंत्र और मोपासां से प्रभावित था, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। समकालीन लघुकथा ने पात्रों के मानवेतर होने से मुक्ति पाकर मनुष्य को उसकी समग्रता में अपनाना और चित्रित करना शुरू किया। उसने मनुष्य से मनुष्य की बात सीधे मनुष्य के माध्यम से कहने के समकालीन कहानी के तेवर से खुद को जोड़ना शुरू किया। इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि समकालीन लघुकथा ने मानवेतर पात्रों को पूरी तरह खारिज दिया है। हाँ, इसका यह मतलब अवश्य है कि पूर्वकालीन लघुकथा में जो पात्र प्रमुखत: प्रयुक्त होते आये थे, वे अब गौण हो गये हैं तथा मनुष्य और उसका मानसिक धरातल ही अब प्रमुख पात्र बन गए हैं। ‘कथानक’ गौण और ‘वस्तु’ प्रमुख हो गयी है। ‘चरित्र-चित्रण’ गौण और ‘वस्तु’ के अनुकूल पात्र-संयोजन प्रमुख हो गया है। ‘कथोपकथन’ ‘कथन-अनुकथन’ में ढलकर ‘वस्तु-प्रेषण’ में अधिक क्षिप्र हो गया है। ‘देशकाल और वातावरण’ बाहरी नेरेशन का अपना चोला त्यागकर बिम्ब और प्रतीक के रूप में स्वयं एक पात्र की तरह सक्रिय भूमिका निभाने लगे हैं। और अन्त में, ‘प्रभाव’—लघुकथा में यह कहानी की तरह अलग से कोई अवयव न होकर उसकी समूची देह में पसर गया है। प्रभाव की दृष्टि से अपनी समग्रता में समकालीन लघुकथा बहुआयामी कथा रचना है।

लिखित रूप में अभिव्यक्त होने के लिए आम बोलचाल में ‘लेखन’ शब्द का प्रयोग होता है। गोस्वामी तुलसीदास ने कृति को ‘वर्णानाम् अर्थसंघानाम्’ वर्णों का ऐसा समूह जो अर्थवान् हो, कहा है। ‘लिखने’ के अनेक सोपान हैं। इनमें पहला सोपान बेशक ‘लिखना’ ही है; लेकिन लघुकथा जैसी लघुकाय कथा विधा के साथ हो यह रहा है कि अधिकतर लोग नोट्स अंकित कर लेने को, विचार अथवा घटना के प्राथमिक स्तर को ‘लेखन’ समझ लेते हैं और अपने आप को लेखक होने की श्रेणी में खड़ा कर लेते हैं। वर्णों का समूह यानी शब्द और वाक्य जिन सोपानों से गुजरकर ‘रचना’ बनता है उन सोपानों से अक्सर हम गुजरना ही नहीं चाहते या कहें कि बहुत-से लेखक लघुकथा को उतना श्रम करने लायक रचना-विधा मानकर चलते ही नहीं हैं। ‘हिन्दी चेतना’ के कथा-आलोचना विशेषांक (अक्टूबर-दिसम्बर 2014) में ‘कथावृत्त:सर्जना और सम्प्रेषण की परिधि में’ शीर्षक अपने आलेख की शुरुआत वरिष्ठ कथाकार राजी सेठ ने यों की है - 
मेरे पास एक घटना है—निहायत सच्ची और आँखों देखी। क्या उसकी रचना बन सकती है? हो सकता है कुछ न कुछ बन जाए, पर कहानी नहीं बन सकती है। हालाँकि कहानी को मूलरूप से किसी घटना का ब्यौरा ही माना जाता है। यह सुनना अटपटा लग सकता है कि केन्द्र में किसी घटना का एकदम सच होना कहानी नहीं बन सकता। कहानी को अपना सच स्वयं अर्जित करना पड़ता है। स्वयं ढूँढ़ना पड़ता है और अपनी सृजनशक्ति से उसमें ऐसी अर्थवत्ता भरनी पड़ती है कि वह सच भी लगे और विश्वसनीय भी। कहानी में विश्वसनीयता घटना के सच होने मात्र से पैदा नहीं होती; उसे भी कथा-रचना में संरचना के एक जरूरी तत्व की तरह कमाना पड़ता है। वह जीवन के प्रति हमारी व्यावहारिक समझ और उस क्षेत्र में हमारे संवेदनात्मक विस्तार से हाथ लगती है। सच यह है कि घटना या घटनाओं का समूह रचना नहीं है; बल्कि घटना के सृजनात्मक इस्तेमाल का नाम रचना है जिसे हम रचकर ही अर्जित कर सकते हैं।
राजी सेठ का यह वक्तव्य लघुकथा पर भी ज्यों का त्यों लागू होता है। अनेक वरिष्ठ लघुकथा-लेखक नयी पीढ़ी के लेखकों को यह कहकर भ्रमित करते रहे हैं कि ‘लघुकथा’ लिखने के लिए घटनाएँ अखबार के पन्नों पर बिखरी पड़ी हैं। ऐसे वक्तव्य को पढ़ने के बाद उनकी बुद्धि पर आने वाले तरस का अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है। क्या वे नहीं जानते कि अखबार के पन्नों तक पहुँचने से बहुत पहले समूची घटनाएँ गली-मुहल्ले में, सड़कों-बाजारों और प्लेटफार्मों से लेकर रेल के डिब्बों तक में  बिखरी पड़ी होती हैं। अखबार या टीवी समाचार का हिस्सा वे बाद में बनती हैं। तो लघुकथा-लेखन में आने वाली नई पीढ़ी को हम उसके सांवेदनिक विस्तार से हटाकर अखबार के पन्नों तक संकुचित क्यों कर डालना चाहते हैं?

अनेक आलोचकों ने लघुकथा को ‘कौंध’ कहा है। हमारा मानना है कि संसार की हर रचना ‘कौंध’ का रचनात्मक विस्तार है—कहानी भी, उपन्यास भी, महाकाव्य भी। ‘कौंध’ प्रेम के, घृणा के, तिरस्कार के, लालच के, आकांक्षा के…गरज यह कि मानव स्वभाव के किसी भी बिंदु पर उद्भूत होकर विस्तार पाने की क्षमता से सम्पन्न होती है, बशर्ते कि समर्थ मस्तिष्क और सधे हुए हाथ उसे मिलें। नकारात्मक हो या सकारात्मक, ‘कौंध’ रचनाशीलता का प्रस्थान बिंदु है। घृणा के शिखर पर पहुँचकर यह मानसिक विकृत बन जाती है। विध्वंसात्मक रूप लेकर नागासाकी पर गिरती है, ‘वर्ल्ड ट्रेड सेंटर’ से टकराती है, तेजाब बनकर किसी खूबसूरत चेहरे को झुलसा डालती है। तिब्बत की गुलामी और बंगलादेश की आजादी कौंध का ही परिणाम हैं। कौंध न होती तो बैरिस्टर ही रह जाते करमचंद, महात्मा गाँधी न बन पाते। इसलिए ‘कौंध’ को काया की लघुता से न जोड़ा जाकर उसकी तीव्रता से जोड़ा जाना चाहिए, रचनाशीलता के रिक्टर पैमाने पर। किस केन्द्र से उठकर कौंध कहाँ तक की धरती को उद्वेलित कर डालेगी, कोई नहीं कह सकता। लघुकथाकारों को इस बारे में किंचित आत्म-सर्वेक्षण की भी आवश्यकता है। इस बारे में एक घटना को यहाँ उद्धृत करना आवश्यक लग रहा है—

विंस्टन चर्चिल एक बार अपने देश के एक पागलखाने का निरीक्षण करने गये। उन्होंने देखा कि एक पागल अपनी बायीं हथेली पर रखे काल्पनिक कागज पर दाएँ हाथ की उँगलियों में काल्पनिक कलम थामे कुछ लिख रहा है। उसके नजदीक जाकर उन्होंने पूछा, “क्या कर रहे हो?”
यह सवाल सुनते ही पागल ने कहा, “अन्धे हो? दिख नहीं रहा कि खत लिख रहा हूँ।”
उसकी इस मासूमियत पर चर्चिल मुस्कराए और पूछा, “किसके लिए लिख रहे हो?”
बोला, “खुद के लिए लिख रहा हूँ।”
“अच्छा! जरा बताओ कि खत में क्या लिखा है?”
इस पर पागल नाराजगी के साथ उनकी ओर देखने लगा। कुछ देर बाद बोला, “अजीब अहमक हो। भई, यह खत अभी लिखा जा रहा है। पूरा लिखा जाने के बाद इसे डाक में डाला जाएगा। उसके बाद यह मुझ तक पहुँचेगा। मैं इसे पढ़ूँगा। तभी पता चलेगा न कि इसमें क्या लिखा है। जो खत अभी मुझे मिला ही नहीं है, मैं कैसे बता सकता हूँ कि उसमें क्या लिखा है?”

वैसे तो हर रचनाकार के लिए यह एक मानक उद्बोधन है; लेकिन यह लेख क्योंकि लघुकथा के सन्दर्भ में है, इसलिए लघुकथाकारों से यह कहना मुझे बहुत उचित महसूस होता है कि वे इस पागलपन को अपने चरित्र में उतारने की कोशिश अवश्य करें। लिखी जाने के बाद लघुकथा को किसी पत्र-पत्रिका के संपादक के भेजने से पहले वे खुद को भेजने के लिए डाक में डालें। मिलने पर उसे पढ़ें और देखें कि उसमें क्या लिखा है? तात्पर्य यह कि अपनी रचना के पहले पाठक वे स्वयं बने और उसके आकलनकर्ता भी। स्वयं सन्तुष्ट होने के बाद रचना को आगे भेजें।

डॉ. उमेश महादोषी का कहना है कि “लघुकथा की स्थापना का चरण पूरी तरह संपन्न हो चुका है और अब उसे नई विधा की प्रशिक्षण कक्षा से बाहर लाना चाहिए।” लघुकथा सर्जना से जुड़े विमर्श में कई मुद्दों पर बात होती रही है। शुरू-शुरू में कहा जाता था कि देश में कागज के संकट ने लिखी जाने वाली रचना का आकार सीमित रखने का दबाव लेखक पर बनाया है। उसके बाद पढ़ने के लिए समय की कमी का रोना भी रोया गया। जिंदगी की भागमभाग और पता नहीं क्या-क्या। ये सारे आरोप और बहसें भी समय के साथ निरर्थक सिद्ध होकर ठंडी होती चली गईं। विमर्श के मामले में मैं डॉ॰ उमेश महादोषी की एक चिंता को यहाँ उद्धृत करना चाहूँगा। वह कहते हैं—“इस पर विधागत विमर्श पाँच दशक पूर्व जहाँ से शुरू हुआ था, सामान्यतः वहीं पर खड़ा दिखाई देता है। विमर्श के वही मुद्दे, वही पुरानी बातें हैं, जिन्हें लगातार दोहराया जा रहा है। चूंकि इन पर आवश्यकतानुरूप पर्याप्त बातें हो चुकी हैं तो अब इनकी पुनरावृत्ति मन को गहराई तक कचोटती हैं।” लघुकथा सृजन को उसके प्रारम्भ से रेखांकित करने और साहित्य के आलोचकों द्वारा उसकी पड़ताल कराके श्रृंखलाबद्ध प्रस्तुत करने का महत्त्वपूर्ण कार्य लघुकथाकार मधुदीप ने अपने हाथ में लिया है। ‘पड़ाव और पड़ताल’ नामक इस श्रृंखला की खूबी यह है कि आम तौर पर इसमें उन्हीं लेखकों को शामिल किया गया है जिनके पास यथेष्ठ संख्या में प्रभावपूर्ण लघुकथाएँ हैं; भले ही वे किसी न किसी रूप में लघुकथा आंदोलन का हिस्सा रहे हैं या एकदम नवोदित हैं। श्रृंखला के छठे खण्ड को लघुकथाकार डॉ॰ अशोक भाटिया ने संपादित किया है। इस खण्ड का मेरी नजर में विशेष महत्त्व है क्योंकि इसमें संकलित कथाकार लघुकथा की ‘नींव के नायकों’ में से कुछ हैं। श्रृंखला का भले ही यह छठा खण्ड है, लेकिन लघुकथा साहित्य के अध्येताओं को यह बताने-समझाने का यह आधार खण्ड है कि विशेषत: स्वाधीनता-पूर्व लघुकथा लेखन की विषयवस्तु क्या थी? तथा स्वाधीनता के बाद आम आदमी की उम्मीदें राजनेताओं, समाजसेवियों, धर्मगुरुओं और संस्कृतिकर्मियों के द्वारा कहाँ-कहाँ ध्वस्त हुई।

जहाँ तक विमर्श का सवाल है, इस श्रृंखला में लघुकथा की पड़ताल के लिए हिन्दी साहित्य के अनेक ऐसे आलोचकों को जोड़ा गया है जिन्होंने लघुकथा को अब से पहले इस दृष्टि से नहीं पढ़ा था कि उन्हें कभी इस विधा के आलोचना-कर्म से भी जुड़ना पड़ेगा। इनमें सबसे पहला नाम तो डॉ॰ कमल किशोर गोयनका का ही आता है, जिन्होंने सन् 1988 में ‘पड़ाव और पड़ताल’ के पहले खण्ड में लघुकथा आलोचना का गुरुतर दायित्व सँभाला था । साथ ही, इनमें कुछ ऐसे आलोचक भी शामिल हैं, जो एक रचनाकार के तौर पर तो पहले से ही काफी जाने-पहचाने जाते रहे हैं, लेकिन आलोचना पर उन्होंने कम ही काम किया है। कुल मिलाकर यह श्रृंखला समकालीन लघुकथा पर नए तरीके से आलोचना-दृष्टि डालने की शुरुआत करने वाली सिद्ध हो सकती है। मैं यह नहीं कहता कि इस श्रृंखला में कुछ कमजोर कथाकार या कुछ कमजोर लघुकथाएँ या कुछ कमजोर आलोचनाएँ शामिल नहीं होंगी; लेकिन यह जरूर कह सकता हूँ कि यह श्रृंखला लघुकथा-लेखन और आलोचन की अब तक की तस्वीर को लगभग साफ दिखाने वाला एक आईना जरूर सिद्ध होगी। 

अंत में, मैं यह बात अवश्य कहना चाहूँगा कि बदल चुके परिवेश में लघुकथा घटना-लेखन मात्र नहीं रह गई है। आज यह उलट स्थितियों का उलथा चित्रण मात्र भी नहीं है। अब यह पाठक के संवेदन-तंतुओं को झनझना देने की शक्ति से लैस है। इसलिए आलोचक बंधु भी इसे इसी त्वरा के साथ देखने-परखने पर ध्यान देना शुरू करें। लघुकथा की विधागत स्थिति को बताने के लिए जो जुमले अब तक कहे जा चुके हैं, उन्हें दोहराना अब बंद कर दें और स्थापना चरण के बाद लघुकथा के स्वरूप की स्थिति को व्यक्त करने की ओर ध्यान दें।
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