सुरेंद्र अरोड़ा की लघुकथाएँ


सुरेंद्र अरोड़ा
चीटियाँ

सूरज की रौशनी बिखरने के बाद भी उसने बंद दरवाजों के अंदर खुद को बिस्तर पर कैद कर रखा था। खिड़कियाँ तो उसने रात से ही नहीं खुलने दी थीं। इसी बीच उसे एक दस्तक का अंदेशा हुआ, उसने बेबस आवाज में पूछा,

"कौन है?"

"मैं हूँ!" उत्तर मिला तो वो फिर से मिमियाया "मैं कौन?"

"मैं जिंदगी... मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ।"
"तुम धोखेबाज हो, हमेशा ठगती हो। मुझे तुमसे डर लगता है, मैं तुमसे नहीं मिल सकता।"
"ठीक है दरवाजा मत खोलो, थोड़ी सी खिड़की ही खोल दो। मैं वहीं से तुमसे बात कर लूंगी।"
उसने खिड़की को जरा सा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि उसे वहाँ बहुत सारी चीटियाँ दिखाई दीं, जो एक के बाद एक लम्बी लाइन में दूर पड़े दाने की और बढ़ रही थीं, सब साथ थीं। उनमें एक दूसरे से आगे बढ़ने की कोई मारा-मारी नहीं थी, उनके बढ़ते कदम अपनी बारी का इन्तजार कर रहे थे जिनमें कि थकान का कोई लक्षण तक नहीं था। वह वहीं खड़ा हो गया। उसे लगा जिंदगी उसके घर में खेल रही है और सूरज की रौशनी में सारी सुबह नहा रही है।
उसने तुरंत दरवाजा पूरा खोल दिया।
जिंदगी बिना देरी किये उसके घर में कूद पड़ी।


कर्तव्य बोध

"जब से पदोन्नति हुई है, घर-गृहस्थी सब कुछ भूल गए हैं ऐसे व्यस्त हुए हैं कि यह भी याद नहीं कि आपका एक घर है... आपके लिए तो बस फाइलें हैं जो घर में भी पीछा नहीं छोड़ रहीं। न बच्चों की फ़िकर है और न ही अपनी" पत्नी ने चाय का कप देते हुए अपनी शिकायत दर्ज करवाई।

"गुस्सा मत करो प्लीज! लो सारी फाइलें एक तरफ रख दीं। तुम्हारी चाय कहाँ है? अपनी चाय लाओ, आज सबसे पहले बेगम के साथ की चाय का स्वाद, उसके बाद ही कुछ और।"

सिंह बाबू जो अब सिंह साहब बन चुके थे, अपने पुराने अंदाज में लौटे तो सुधा ने भी देरी नहीं की।

"आपका प्रमोशन मेरे तो जी का जंजाल बन गया है। घर के कामों के साथ-साथ अब बाहर के आपके हिस्से के काम भी मेरे जिम्में आ गए हैं।"
"शिकायत ही करती रहोगी या हमारे साथ सुबह की चाय का आनंद भी लोगी?" लम्बी श्वांस खींचते हुए सिंह साहब बोले।
"इन चोचलों के लिए मेरे पास टाइम हो तो बैठू। गृहस्थी के इतने काम निकले रहते हैं कि सुबह से शाम कब हो जाती है पता ही नहीं चलता। दीवाली सर पर है और आधे घर की झाड़-बुहार भी नहीं हो पायी, जब कि एक हफ्ते से इसी सब में लगी हूँ। जब तक आप अफसर नहीं थे तो कम से कम काम में कुछ सहारा तो था।" आज पत्नी की शिकायतों का पिटारा बंद होता नहीं लगता था।
तभी दरवाजे पर हल्की सी थाप ने उनका ध्यान भंग कर दिया, "यह सुबह-सुबह कौन आ मरा! काम वाली बाई को तो ग्यारह बजे बुलाया था।" सुधा बड़बड़ाई।
"जरा देखो तो कौन है।" सिंह साहब ने कहा तब सुधा ने जाकर दरवाजा खोला। देखने में अमीर पर सौम्य भाव लिए एक सज्जन खड़े थे। उनके एक हाथ में बड़ा सा गिफ्ट पैक था और दूसरे में गुलाब के ताजा फूलों का बड़ा सा गुलदस्ता। उनके पीछे खड़ी महँगी गाड़ी उनकी सम्पन्नता का बखान कर रही थी।
सज्जन ने हाथ जोड़कर बड़ी शिष्टतापूर्वक कहा," मैडम, सर हैं क्या? " सुधा के लिए यह अनुभव बेहद चौकाने वाला था। आश्चर्य के बादलों के बीच घिरी उससे बमुश्किल इतना कहा गया," ह.. हाँ, हाँ हैं। अभी बुलाती हूँ" सुधा ने पल्लू माथे तक खींचते हुए कहा।
"जी साहब और आप सबको दीवाली की मुबारकबाद देने आया था।" उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा।
अब तक सिंह साहब भी अपने आप ही कमरे से बाहर आ चुके थे, "कौन है? अरे मनोज जी आइए-आइए... अंदर आइए। इन सब की क्या जरूरत थी! आपको भी दीपावली मुबारक।"
"जी, कुछ नहीं सर बस छोटी सी भेंट है। अंदर फिर कभी। अब तो आना-जाना लगा ही रहेगा।" कहकर उन अमीर सज्जन ने हाथ जोड़ लिए।
सुधा अब भी हैरत से कभी उस सौगात को तो कभी जाते हुए उन सज्जन को देखत रही थी। अभी गिफ्टबॉक्स हाथों में लेकर ठंडी होती चाय की ओर बढ़ी ही थी कि दरवाजे पर एक और कार आकर रुकी और फिर यही घटनाक्रम सारे दिन दोहराया जाता रहा।
शाम होते-होते ड्राइंग रूम का हर कोना तरह-तरह के गिफ्ट आइटमों से भर गया। उसके वैवाहिक जीवन में ऐसी दीवाली पहले कभी नहीं आई थी।"
शाम के खाने पर सुधा सिंह साहब से बड़े मीठे अंदाज़ में कह रही थी, "मुझे नहीं पता था कि आपकी नई जिम्मेदारी इतनी अहम है। दिन भर फाईलें निपटा-निपटा कर आप तो बहुत थक जाते होंगे, तनिक आराम कीजिए। घर-बाहर के कामों की आप चिन्ता न करा करिए, मैं इतने सम्भालती थी तो दो और सही।"