अनिता मण्डा की लघुकथाएँ

अनिता मंडा

1- मुखौटा

रात के बारह बज रहे थे। एक-एक करके बार में से सारे ग्राहक चले गए। मनोहर अपने मित्र श्यामलाल से मिन्नतें कर रहा था। "श्याम भाई, आज मेरे साथ चलिए आप, सुबह घर छोड़ आऊँगा।"
"नहीं यार सुन तो सही, थोड़ी देर रुक न, चले जाएँगे, कहाँ भागा जा रहा है घर।"
न चाहते हुए भी मनोहर श्यामलाल के आग्रह पर फिर से बैठ गया। श्यामलाल ने पैग को हलक में डालकर बैरे को बुलाया। "एक और ले आ!"
"साहब जी, टाइम हो गया अब जाने का।"
"तू जुबान लड़ानी रहने दे, ला जल्दी से!"
सुनते ही बैरा पैग लाने चला गया।
मनोहर ने श्याम लाल को समझाने की मुद्रा में कहा "श्याम भाई, होता रहता है ये सब, आप अपना मन ठीक कर लीजिए, चलिए अब।" नारी-विमर्श पर कई चर्चित आलेख लिख चुके श्याम बाबू अपने पूरे असली रंग में थे।
"यार! क्या होता रहता है, कल की आई छोकरी है वो उर्वशी! दो साल पहले साली को कोई जानता भी नहीं था, और अकादमी कर दिया उसके हवाले और हम जो बरसों से कलम घिस रहे हैं उनका क्या? दलितों के लिए, पिछड़े लोगों के लिए क्या कुछ नहीं लिखा!"
"मैं भी तो यही कह रहा हूँ श्याम भाई! लोग अन्धे होकर खरीद रहे हैं उसका उपन्यास। बेस्ट सेलर कृति बन गया है।"
"मनोहर, बेस्ट सेलर में और बेस्ट में फर्क होता है। है क्या उसकी किताब में ... बस वही रिश्तों की खींच-तान, रोना-धोना; अरे खाली बैठे लोगों के काम हैं ये।"
"श्याम भाई ट्रैजडी तो बड़ी तगड़ी रची है उसने, कुछ भी कहें।"
"तुम भी हो लिए न उसके पीछे, ये औरतें इससे ज्यादा लिख भी क्या सकती हैं, रोना-धोना बस; अरे ये हल्दी धनिये का हिसाब रखें तभी तक ठीक है। कागज काले करने से अच्छा है, रसोई में तड़का लगायें तड़का ... तड़का तो साली ने लगाया ही है, कहीं तो ... कहीं तगड़ी सैटिंग है इसकी, पर कोई सूत्र हाथ नहीं लग रहा।"
पैग खत्म, फिर से लड़के को आवाज लगाई, लड़का घबराया हुआ सा आया "साहब जी!"
"क्या साहब जी, पानी मिला के ला रहा है क्या साले, कुछ असर ही नहीं हो रहा, जा ढंग से बना के ला।"
"साहब जी अब जाना है हमें भी ..."
श्याम लाल में अचानक उनके उपन्यासों का वही खलनायक आ घुसा जो गरीबों को धूल-मिट्टी समझता था। उसने अपना आपा खो दिया और उठकर एक जोर से "तड़ाक" थप्पड़ जड़ दिया।
दुबला-पतला सा लड़का चक्कर खाता हुआ पास की टेबल से जोर से टकरा गया और दाँई कनपटी के पास खून झलक आया। फिर हिम्मत करके उठा "अभी लाया साहब जी," कहकर अंदर चला गया।
श्याम लाल अपनी झल्लाहट में अण्ट-शण्ट कहे जा रहा था। मनोहर ने चेतावनी दी, "अब यहाँ से जल्दी चलो श्याम जी, निकलने में ही भलाई है।"
लड़खड़ाते श्याम लाल को लेकर मनोहर दरवाजे तक पहुँचा तभी इंस्पेक्टर ने दरवाजा खोला अंदर से लड़का माथे को हाथ से दबाये हुए आया, उसकी टी-शर्ट पर खून के धब्बे थे।
श्याम लाल नशे में धुत आपे से बाहर हो गया है, गाली-गलोच पर अब उसका नियंत्रण नहीं था।
इंस्पेक्टर स्मार्टफोन से लड़के की और श्याम लाल की फोटो खींच रहा था। मनोहर बीच-बचाव करने आया, "इंस्पेक्टर साहब आप ये फोटो डिलीट कर दीजिए , श्याम भाई की बहुत इज्ज़त है साहित्य की दुनिया में, गरीबों के लिए बहुत कलम चलाई है इन्होंने ..."
"हाँ, लेकिन आज तो कलम चलाने वाले हाथ गरीब पर भी चल गए न" कहते हुए इंस्पेक्टर ने श्याम लाल को अपनी जिप्सी में बैठा लिया।
"श्याम भाई, आप चिंता मत करना, मैं सुबह आ रहा हूँ वकील लेकर।" मनोहर ने कहा।
"अभी कुछ कर मनोहर! सुबह तक तो ये खबर मिर्च-मसाले के साथ अख़बारों में होगी।"
श्याम लाल के मुँह पर हवाइयाँ उड़ रही थी।
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2- कसक

मैं और राजीव राखी के अगले दिन मेरे मायके से वापस ससुराल जाने के लिए प्लेटफॉर्म पर आ रहे थे की मेरी नज़र सामने से आ रही एक प्यारी सी पाँच-छः वर्ष की लड़की पर पड़ी। उसने एक अधेड़ से आदमी की अँगुली पकड़ी हुई थी, जिसकी गोद में लगभग दो साल का बच्चा था जो कि उसकी बढ़ी हुई तोंद पर अटका हुआ था। उस प्यारी सी बच्ची को देखते ही मेरे दिमाग में एक ही चेहरा उभर कर आया, मेरे साथ कॉलेज में पढ़ती थी- सविता!
हू ब हू सविता की फ़ोटो कॉपी थी वो एकदम मक्खन सी गोरी-चिट्टी, सुंदर मुस्कान, काले घने बाल। उसको देखते ही एक स्मृतियों का रेला मन में बह आया, जब हम सेकंडइयर में थे तभी उसका विवाह एक बड़े व्यवसायिक परिवार में हो गया था। मैं प्रेक्टिकल परीक्षाओं के कारण उसकी शादी में नहीं जा पाई थी क्योंकि शादी दूसरे शहर में आयोजित की गई थी, और फिर कभी उससे मिलना नहीं हुआ।
थोड़ा सा आगे चलते ही दो बड़े-बड़े ट्रॉली बैग्स के पास सविता खड़ी दिखाई दी, एक सेकण्ड को उसे देखकर यकीन कर पाना मुश्किल हो रहा था। 7-8 साल में वो कितना बदल गई थी। एकदम मॉडल जैसी फिट सविता की कमर पर मोटापे का घेरा जमा था, थुलथुले हाथों में हीरे के कँगन लश्कारे मार रहे थे। गोल-गोल अँगुलियों में बड़े-बड़े हीरों की अंगूठियां उसकी सम्पन्नता को प्रकट कर रही थी। मुझे देखकर उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गई -
"शिखा तू अब भी वैसी की वैसी ही है"
मेरे से हाथ मिलाते हुए उसने ध्यान दिया, मेरे हाथों में शादी का चूड़ा था।
"अब की है तूने शादी, क्या कर रही थी इतने साल बाद, साथ हैं क्या मियाँ जी?"
एक ही साँस में कई सवाल कर गई। मैंने उसके सवालों के जवाब दिये, राजीव के फोन पर जरूरी फोन आया हुआ था तो वे हमसे थोड़े दूर टहलते हुए बात कर रहे थे, मैंने उसको बताया कि ये हैं तेरे जीजू, तो उसका त्वरित प्रश्न था "लव मैरिज हुई है।"
"यही समझ लो, एक ट्रैनिंग में मुलाकात हुई थी"
"बहुत लकी हो तुम, बहुत हैंडसम हैं मेरे जीजू"
उसकी ये प्रतिक्रिया मुझे अजीब न लगती अगर एक ही बार कहा होता, उसने 10 मिनट की बात में तीन-चार बार यह बात दोहरा दी।
इतने में ट्रेन आ गई, मैं स्लीपर क्लास की तरफ जा रही थी तभी उसके बच्चे और पति एसी क्लास की तरफ जाते हुए मिले, एक बार फिर आमने सामने थे हम।
मैंने मुड़ कर देखा उसके होठों पर एक जबरदस्ती लाई हुई मुस्कान चिपकी थी।
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3-अँधेरा

आज करवा-चौथ का दिन था। हर साल की तरह स्वाति ने तैयारियाँ की, मेहन्दी रचाई, डॉ. साहब के पसंद की साड़ी पहनी, शृंगार किया, शाम को पार्क में कॉलोनी की औरतों के साथ व्रत की कथा सुनी, अच्छे पकवान बनाये। सब बहुत करीने से करती जा रही थी।
डोरबेल बजी, सामने पतिदेव डॉ. अजय थे, चौंक गई स्वाति, "आप, आज जल्दी आ गए"
"हाँ भई, मैं जल्दी नहीं आ सकता क्या, इसमें इतना चौंकने की क्या बात है?"
डॉ. अजय एक मनोवैज्ञानिक डॉक्टर हैं, बहुत व्यस्त भी और अनुशासन के पक्के भी, कभी अपने काम से छुट्टी नहीं लेते।
"आज पेशेंट कम थे जल्दी फारिग हो गया तो ..."
"चाय पिएँगे? मैं चाय बनाती हूँ" किचन की तरफ जाती हुई स्वाति ने कहा।
"नहीं चाय की इच्छा नहीं है अभी, आओ बैठो"
कभी-कभी वक़्त मिलता है तो अपने कई मरीजों की बड़ी रोचक कहानियाँ बताते हैं।
डॉ. साहब ने कहना शुरू किया "मेरे पास एक अजीब ही केस आया है, मरीज ने अपना नाम नहीं लिखा, टाइप की हुई चिट्ठी भेजी है"
"चिट्ठी"
"हाँ भई चिट्ठी, अजीब है, आज के जमाने में चिट्ठी कौन लिखता है, या तो मेल करते हैं या फोन करते हैं।"
"किसी परेशान औरत की चिट्ठी है, लिखती है उसे अब जिंदगी से कोई लगाव नहीं रहा, अपने घर से, पति से भी कोई लगाव नहीं रहा ... लिख रही है, ... हालाँकि वो नहीं जानती कि उसका पति उसे प्यार करता है या नहीं करता, पर जानना भी नहीं चाहती ... वो सालों से अपने पति के साथ रह रही है, बच्चे भी अब बड़े होकर सैटल हो गए हैं, उसे किसी और से भी प्यार नहीं है ... पर अब वह अपने पति को प्यार नहीं करती ... अजीब औरत है ... मेरे क्लीनिक आना चाहिए इसे"
"लिखती है, 'मेरे पति शहर के नामी गिरामी इंसान हैं पर वो घर में इंसानों को नहीं मशीनों को पसंद करते हैं जो समय पर पूरे परफेक्शन से काम करें, कभी कोई भूल न हो उनसे ... आगे लिखती है अब वो कोई चूक नहीं करती अपने काम में, कभी छुट्टी नहीं करती ... हर काम पूरे परफेक्शन के साथ करती है, जैसा उसके पति चाहते हैं ... वही करती है, कभी कोई शिकायत नहीं है उसके पति को उससे, वो उनकी हाँ में हाँ मिलाती है, सामाजिक रिश्ते-नाते, त्योहार सब निभाती है, पर उसे अब जीवन से प्यार नहीं है ... अजीब है।"
"आप पूरे तीन बार सुना चुके हैं ये चिट्ठी ... अब तक तो चाँद भी निकल आया होगा, मैं देखकर आती हूँ।"
आस-पास की छतों पर लोग जमा हैं, चाँद का इंतजार कर रहे हैं। स्वाति पूजा की थाली दीवार पर रख देती है, पीछे-पीछे डॉ. साहब भी चले जाते हैं, आसमान की ओर टकटकी लगाए डॉ. साहब फिर उसी चिट्ठी का प्रसंग छेड़ते हैं, "अजीब है, न एड्रेस लिखा है, न फोन नम्बर ..."
चाँद की प्रतीक्षा समाप्त होती है हर साल की तरह स्वाति दीपक जलाकर चाँद की पूजा करती है, और पति के चरण स्पर्श करती है, वो पहली करवा चौथ से ऐसे ही पूजा करती आई है।
डॉ. साहब चाँद की रोशनी में स्वाति को पूजा करते हुए देखते जाते हैं। तेजमय चेहरा पूरे चाँद के जैसी बिंदी माथे पर, लाल साड़ी पर जरी का बॉर्डर, एकदम नवोढ़ा लग रही है ... पर ये आँखें, उफ़्फ़ ... मैं क्यों नहीं पढ़ पाया इनको।
"अब मैं जवाब भी कहाँ भेजूँ उस चिट्ठी का?" पूजा का थाल लिए स्वाति के मुड़ते ही बोले।
"अगर भेज पाते तो क्या जवाब देते?" चाँद और दीपक की रोशनी में होठों के साथ आँखों में भी हरकत हुई इस बार।
स्वाति ने जिस हाथ से पूजा का थाल पकड़ा था, उसके नीचे अपनी हथेली लगाते हुए डॉ. साहब ने स्वाति की आँखों में झाँककर कहा "अगर मैं चिट्ठी का जवाब दे सकता तो कहता पूजा के थाल में यह दीपक है न, इसके नीचे भी अँधेरा है, ध्यान से देखो, पर इसका मतलब ये नहीं इसके जलने में कोई कमी है ... हो सकता है उसके पति भी इस दीपक की तरह ही हों। मैं उससे कहता ... बस एक अवसर दे, उसे अपनी भूल सुधारने का ..."

आँखों में जमी ख़ामोशी अब मोती बनकर टपकने को थी कि डॉ. साहब ने उसे अपने हाथों पर ठहरा लिया। चाँद मुस्कुराता हुआ इसका गवाह बना।
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