कन्यादान- डॉ. आरती स्मित

- डॉ. आरती स्मित

आरती स्मित 
दरवाज़े पर कॉलबेल बजते ही गीत बजने लगा ... 'तोरा मन दर्पण कहलाए ...' ।" अरे जेठ की  इस दुपहरी में कौन मरने आ गया? इस बुढ़ापे में सीधे से उठा भी तो नहीं जाता। 'हे राम! ओह! अब जान ही कहाँ बची है इन बूढ़ी हड्डियों में।" बड़बड़ाती हुई वह उठी। घंटी लगातार बजती ही जा रही थी।
  
"आ रहे हैं ... आ रहे हैं, अब दरवाजा तो न तोड़ो भाय! तनिक धीरज रखो।"  
" ऊँह! हे प्रभु! अब उठाय ले। इ घिसेट नै चाही ।" 
 खिड़की से झाँका तो डाकिया नज़र आया।
"माता जी, दरबाजा खोलिए! स्पीड पोस्ट है। साइन करना पड़ेगा। बाबूजी नै हैं क्या?"
"हैं ना! सोए पड़े हैं। अब इ लू में बाहर कहाँ रहेंगे? कुछ हो हवा गया त के देखेगा बेटा?" दरवाजा खोल कर बूढ़ी ने ज़वाब दिया। बढ़ती उम्र की अवशता और बच्चों के अलग -थलग बस जाने की पीड़ा चेहरे पर घनी हो उठी।
"इधर तनि छांह में आ जाओ, बहुते धूप है।"    
 "हाँ! माई, पानी मिलेगा?"  
"अभी लाते हैं, ऐसे इ चिट्ठी कहाँ से आया है बेटा?"" नोएडा से " 
"नोएडा से! के भेजा है?"
'पुनीता गुप्ता'
उसके पैर थरथरा उठे, सिर घूमने लगा। धीरे-धीरे चौकी पर बैठ गई। 'पुन्नु का  चिट्ठी! एतना बरस बाद! बूढ़ा माय-बाप का  याद आ ही गया  उसको।" बुदबुदाती हुई बोली। फिर उठकर पानी लाने चली गई।
 पानी पीकर पपड़ाए होंठ को सहलाता, डाकिया साइन लेकर चला गया। सूरज पूरे आक्रोश में था, सबकुछ जला डालने को उद्धत! दरवाज़े की कुंडी चढ़ाकर वह धीरे-धीरे पति के कमरे में आई। कांपते हाथ मानो पत्र का भार उठा पाने अक्षम हो रहे थे। सत्तर की थी ,पर वक़्त ने  पहले ही उसपर  बुढ़ापा ला  दिया था।

   " सुनौ! सुनौ न जरा! चिट्ठी आएल छै !" पति को नींद से जगाती वह दुहराती रही। अब भी पति के गुस्से से थरथर करती थी वह। पति ने करवट बदली, अर्धचेतना में ही पूछा। 'केक्कर छै ?' 
'पुन्नु के'
'पुन्नु के... ' करंट के झटके के साथ उनकी नींद खुल गई। फिर दोहराया, 'पुन्नु के चिट्ठी!!
'हूंम! आखिर ओकरा हमरौ सिनी के याद आइये गेलै।' 
"कि लिखकौ छै? पढ़ौ!" 
"तो ही पढ़ कै सुनाबौ न! एत्ता साल म बेटी त ऐलै नै, चिट्ठिए सही!" 
    कांपते हाथों से चिट्ठी खोली और पढ्ना शुरू किया, मगर स्वर ने साथ न दिया, पत्नी की ओर चुपचाप पत्र बढ़ा दिया। उसने आवाज़ संयत कर पढना शुरू किया :
    "प्यारी माँ!
     सादर प्रणाम!"
'जीती रह' दिल से निकला। आँखें धुंधलाने लगीं। आँचल के कोर से पोंछी जाती आँखें  आगे बढ़ीं,
 " माँ! वर्षों बाद तुम्हारे नाम पत्र लिख रही हूँ। तुम्हारा फोन नंबर मेरे पास नहीं हैं, होता तो भी शायद इतनी बातें फोन पर न कह पाती।इसलिए लिख रही हूँ, पर लगता है तुम अब भी सामने बैठी हो ... रसोई से फुर्सत पाकर सुस्ताती हुई।
   माँ! तुम्हें याद है, बाबा मेरी किसी भी बात को काटते नहीं थे, हर मांग पूरी करते थे। यहाँ तक कि बचपन में मुझे कौर खिलाए बिना खाते ना थे, और तो और जब मैं उनसे पैसे माँगती हुई उनकी मूंछें खींच देती, तो दीदी और तुम मुझे डाँटती पर बाबा हँसते रहते। थोड़ी बड़ी हो गई, तुम्हारी रोक-टोक शुरू हुई, पर बाबा ! उनके लिए तो छोटी बच्ची ही थी न! उनके दुलार में कभी कमी न आई। उस परिस्थिति में तुम भी जो कर कर सकती थी तुमने किया। सबसे मुठभेड़ कर मेरी पढ़ाई बंद होने से बचाया, नहीं तो मैं कॉलेज का मुँह भी ना देख पाती।"

 "ज़्यादा पढ़ -लिख ली, इसलिए तो दिमाग खराब हो गया। माइए बाप दुसमन नजर आने लगा" पत्र के बीच में पति की कटाक्ष से वह हतप्रभ हुई, पर टोकना उचित नहीं समझा और आगे पढ़ने लगी
  
   "मगर माँ! मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फैसला तुमलोगों ने बिना मेरी मर्ज़ी के, मर्ज़ी तो दूर, बिना मुझे बताए किया! हूं ... मैं तुम्हें या बाबा को  दोष नहीं दे रही, तुमलोगों ने वही किया जो वहाँ के समाज की रीत रही। जानती हूँ और अब महसूस भी कर सकती हूँ कि मेरे ब्याह में तुम कितनी बेबस रही होगी! बाबा ने तुम्हारी रजामंदी पूछी कहाँ होगी! उन्हें तो घर बैठे वर मिल गया, वह भी कमाऊ! बस, मान लिया कि उनकी लाडो सुखी रहेगी। हैसियत से बढ़कर खर्च किया, मुंहमागा दहेज दिया। बारातियों को संतुष्ट किया, फिर विवाह- मंडप पर कन्यादान की रस्म निभाकर दायित्व-मुक्त हो गए। बेटी के वर्तमान और भविष्य का ठेकेदार दामाद को मान लिया । क्या बाबा ने सचमुच मुझे पराया मान लिया था? सचमुच!!"

  'यही त हम औरत जात के किस्मत छकै' वह सुबकने लगी। चिट्ठी की हर पंक्ति मानो कठघरे में खड़ा कर रही थी जहाँ वह बेबस माँ  और पति  परंपरावादी निरंकुश पिता  सिद्ध होने की आशंका से घिरने लगे थे। पत्र लंबा था। कभी आँखें तो कभी स्वर बग़ावत करने लगते, लगातार पढ़ पाना कठिन होता जा रहा था। पति ने हिम्मत दी, वह फिर पत्र के हर शब्द के पीछे छिपे पुन्नु के जीवन के तूफ़ान को समझने और नापने का प्रयास करने लगी:
  " एक बात बताओ माँ! जब रिश्ता घर आया तो बाबा ने दहेज क्यों दिया? दहेज देकर जब वर खरीदा तो मुझे दान क्यों किया? कन्यादान की रीत निभाते हुए मेरा दायित्व वर को सौपा या मेरी साँसें गिरवी रख दी? उनकी लाडो समाज के बनाए  महज एक पारंपरिक  रस्म के कारण  व्यक्ति से वस्तु हो गई, जिसका दान कर दिया! और कह भी दिया कि आज से यह आपकी हुई। पुरोहितजी ने जब  कहा, कन्यादान के बाद कन्या पर पिता का अधिकार नहीं रहता, अब इसपर इसके पति का अधिकार होगा, तब बाबा चुप क्यों रहे माँ! कुछ कहा क्यों नहीं! क्या किसी रस्म में सचमुच इतनी ताक़त होती है  कि लड़की संवेदनशील  सचेतन से जड़ पुतला में बदली जा सके?
    बिकता वर  है, दान में कन्या दी जाती है, बग़ैर उसकी रजामंदी के! तुम कहोगी, 'यही रीत है' तो यह कैसी रीत है? और यह कैसी बेबसी कि समय के साथ उसे बदला न जा सके? एक ऐसी रीत जो पुरुष को स्वभाव से पत्नी के प्रति निरंकुश बना दे , उसका औचित्य क्या है? क्या कन्यादान का अर्थ कन्या के अस्तित्व का दान कर उसे हाशिये पर लटकाना है? पर मैं तुमसे किस ज़वाब की उम्मीद करूँ ? और भला क्यों? तुम भी तो घर के लिए एक वस्तु-मात्र ही रही, जिससे कभी मर्ज़ी नहीं पूछी गई। तुमने भी यही स्वीकार लिया। ... क्या हम स्त्रियाँ जन्म से ही कठपुतलियाँ होती हैं, जिसका सूत्रधार पहले पिता होता है बाद में कोई और!"

वह सकपकाई कि कहीं क्रोध में पति पत्र ही ना फाड़ दे, पर वो तो विचारों की अलग दुनिया में खोए थे, शायद पुरुष और पिता के बीच सामर्थ्य की गहरी खाई का कारण ढूँढने में निमग्न थे। उसे चुप देख, धीरे से टोका, ' आगे पढ़ौ' 

" माँ! तुम्हें याद है , मुझे विदा करते वक़्त बाबा फूट-फूटकर बच्चे की तरह रो रहे थे, मेरी विदाई के बाद भी घंटों रोते रहे थे, ... दीदी ने बताया था मुझे। फिर मेरे प्रति उनकी आँखों की नदी पूरी तरह सूख कैसे गई? क्या उन्होंने सचमुच मान लिया कि मैं पराई वस्तु हूँ जिसकी पीड़ा को जानने -समझने या निवारण का अब उनका अधिकार नहीं रहा। मेरी ज़िंदगी के हर झंझावात का कारण जानने के बाद भी वे तटस्थ रहे... पराई चीज़ के प्रति पूरी तरह निर्लिप्त भाव!  ये कैसा रस्मों-रिवाज है माँ? जो अपने ही आँगन की बेल को एक झटके में जड़ से अलग कर पराए उपवन की शोभा बना देता है।
   माँ! संस्कार के नाम पर तुमने जो पोटली थमाई, उसने मुझे जीता-जागता यंत्र बना डाला। जब धन देकर वर खरीदा ही था तो मेरी पसंद का खरीदती और उसकी डोर मेरे हाथ में देती ,ठीक विपरीत स्वभाव को मेरी किस्मत क्यों बना दिया? बेटियाँ दुख-दर्द  में मायके का मुँह ताकती हैं, मैंने भी तुम्हें जतलाने की कोशिश की,  पर परंपरावादी माता-पिता की तरह तुमदोनों ने भी सहनशीलता का पाठ पढ़ा दिया; तुम बेबसी की बूंदें ढुलकाती रही,कि मेरे हित में कुछ भी कहने का हक़ तुम्हारा नहीं है।
   माँ, ये बताओ ! आखिर ये हक़ छीना किसने? क्यों  और कैसे? पुरोहित ने दो मंत्र पढ़ दिए, बिना तर्क के रस्म के नाम पर सबने उसे स्वीकार लिया, यही ना!  बाबा तो तर्कशील व्यक्ति रहे, वे क्यों ढोते रहे इन परंपराओं को कि एक ही कोख से जन्मा बेटा अपना और बेटी पराई मानी जाए। नए रिश्ते क्या इसलिए जोड़े जाते हैं कि पुराने रिश्ते की खुशबू क्षीण कर दी जाए!
      तुम सोच रही होगी कि मैंने बचपन से तुमसे  इस तरह की और इतनी बातें कभी नहीं की, फिर आज विवाह के  पच्चीस वर्षों के बाद क्यों? जबकि उम्र की ढलान की ओर पग बढ़ रहे हैं। अब मैं वहाँ खड़ी हूँ जहाँ कल तुम खड़ी थी। फ़र्क़ इतना है कि तुम चाहकर भी अपनी बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पाई थी, लेकिन अव्यक्त भाव से मुझे मुक्ति का मतलब समझा गई थी... वह तुम्हारे अंतस की स्त्री की छटपटाहट थी, और तब मैंने वस्तु से व्यक्ति बनने का निर्णय लिया था ... फिर जो होना था वही हुआ, मैं छिलती रही ज़ख्म रक्तस्राव करते रहे और तुंम दोनों मेरे भाग्य की दुहाई देते रहे … तुम भूल  गई माँ कि मुक्ति के स्वर तुमने ही सुनाए थे मुझे । वही मेरी ताक़त बनी।
      तुम्हारी नातिन मन्नत अब तेईस  वर्ष की हो चुकी है। विज्ञान  के क्षेत्र में उसने पैर जमाने शुरू कर दिए। हाल ही में युवा प्रतिभा का पुरस्कार भी पाया उसने। पत्र लिखने का मुख्य कारण उसके जीवन का अहम फैसला है। अगले महीने उसकी शादी है। वर उसकी पसंद का है, कोई दहेज नहीं। परिवार सुशिक्षित और संकीर्णताओं से मुक्त है। दिल्ली में रहते हैं। वैवाहिक कार्यक्रम इस प्रकार है : दिन को कोर्ट मैरिज और रात को वरमाला और फेरे । कन्यादान की रस्म अदा नहीं की जाएगी। मन्नत आज मेरे जीवन का हिस्सा है तो कल भी रहेगी। इस विवाह में उपस्थित होकर अपना आशीर्वाद दो। बाबा को प्रणाम!”
                                            
                                                                                                                                तुम्हारी बेटी
                                                                                                                                     पुनीता

      कांपते हाथों से पत्र बंद किया। आँखों की झील में पच्चीस साल पहले की तस्वीर तैरने लगी ... पुनीता की। दुल्हन की लिबास में एक कठपुतली ... हवा में झूलती हुई जिसकी डोर एक पुरुष के हाथ से दूसरे के हाथ में दी जाती हुई  और पुरोहित की ध्वनि की अनुगूँज ... यजमान! कन्यादान सम्पन्न हुआ!!