एक नज़र: ‘नदी-रंग जैसी लड़की’ - पहाड़ी जीवन संघर्ष की दास्तान

मंजू कुमारी

सहायक प्रोफेसर (हिन्दी विभाग), राजकीय महाविद्यालय देहरा, काँगड़ा (हिमाचल-प्रदेश)
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कथाकार एस. आर. हरनोट का नया उपन्यास ‘नदी-रंग जैसी लड़की’ पहाड़ी जीवन संघर्ष की दास्तान कहता है। उपन्यास में समाज की बदलती स्वार्थी मानसिकता और प्रकृति के साथ हो रहे छेड़छाड़ को बहुत बारीकी से उजागर किया गया है। जीवनदायिनी सहज, शांत व निर्मल नदी की धारा को अवरुद्ध करके, प्रकृति से ही छेड़छाड़ नहीं की जा रही बल्कि उस पर निर्भर तमाम जिंदगियों को उनके जल, जंगल, जमीन को, उनके ही अस्तित्व व वजूद से भी विस्थापित किया जा रहा है। सरिता रूपी स्त्री जीवन संघर्ष की सफल दास्तान कहता यह उपन्यास जादुई यथार्थवादी शिल्प का अद्भुत उदाहरण है। लेखक अपनी भाषा के माध्यम से घटनाओं का यथार्थ चित्रगुम्फन प्रस्तुत करने में सफल हुआ है। इस उपन्यास की खासियत यह है कि लड़की का रूप धारण करके नदी स्वयं अपनी दारुण दास्तान को बयान करती है।

उपन्यास 20वीं सदी से लेकर 21वीं सदी में 2020-21 तक का एक सफल दस्तावेज के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत हुआ है। जिसमें प्रकृति और समाज के अंतर्संबंध एंव समाज में होने वाले परिवर्तन को भी उजागर किया गया है। उपन्यास की मुख्य पात्र सुनमा देई पिता मास्टर भागदत स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने पहाड़ों के प्रजामंडल आन्दोलन में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सुनमा देई की शादी उस समय की सामाजिक परम्परा के अनुसार जन्म से पहले ही तय कर दी गयी थी उसके ससुर देवीदत वजीर भी स्वतंत्रता सेनानी थे।

उपन्यास में जादुई गुडिया का जिक्र बहुत ही खूबसूरती से किया गया है जो अपना नाम शतु (नदी) बताती है और सुनमा को दादी बोलती है। इसी जादुई शतु के माध्यम से सहज, शांत, निर्मल धारा को अवरुद्ध कर जब बाँध की निर्मिति कर दी जाती है और नदी अपना अस्तित्व खोकर डरावना रूप धारण कर लेती है। जिसकी व्यथा स्वयं शतु (लड़की) व्यक्त करती है।

सुनमा देई उपन्यास की ऐसी पात्र है जो वैश्वीकरण के पूंजीवादी दौर मे भी प्रकृति व मानवीय सम्वेदना को महसूस करती है उनके जीवन में दुःख का पहाड़ तब टूट पड़ता है जब असमय उसके पति बालकराम की मृत्यु हो जाती है। यही से शुरू होती है एक स्त्री जीवन संघर्ष की दास्तान। सुनमा का सम्पूर्ण जीवन अपनी पंचायत के विकास और लोगों को न्याय दिलाने के लिए समर्पित रहा। उपन्यास में एक जगह जिक्र है कि सुनमा अपने संघर्षरत जीवन में सुनमा से दादी सुनमा कब बन गयी उसे इसका पता ही नहीं चला। अर्थात अपने जीवन संघर्ष में नदी की भांति शांत, सहज और प्रवाहपूर्ण जीवन की अबाध गति के साथ जीवन के अंतिम पडाव पर आ गई।

प्रकृति और समाज के सम्बन्ध को दो रूपों में देखा समझा जा सकता है। पहला वह जो अदृश्य (आंतरिक निर्मिति) और दूसरा बाह्य रूप से प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करना। अर्थात प्रकृति को महसूस करने से है। एक प्रसंग आता है- प्रकृति की ओर लौटो ऐसा कोई नारा नहीं दिया गया लेकिन प्रकृति से अपने आपको श्रेष्ठ समझने वाला मनुष्य पुनः प्रकृति में ही जीवन तलाशता हुआ नज़र आता है। “जिन खेतों की तरफ कोई मुडकर भी नहीं देखा करता अब दिन-भर उनकी झाड़ियों की कटाई और सफाई होने लगी है। सुनसान आँगन परिवारों से भरे रहते हैं। बूढ़े-बुजुर्ग जो घरों में अकेले रहते आये थे अब इस उत्सव जैसे माहौल को देखकर खुश थे मानों पहले जैसा जमाना लौट आया है। दादी सुनमा को गाँव की यह दुनिया अब समाचारों की दुनिया से बिलकुल अलग दिखने लगी थी जिसने उनके भीतर की अशांति, भय और विचलन को बहुत कम कर दिया था।”1

स्त्री जीवन संघर्ष की गाथा- उपन्यास एक साधारण स्त्री सुनमा से संघर्षरत सुनमा के जीवन की दास्तान को बया करता है। जिसके माध्यम हिमाचल प्रदेश बनने से लेकर वर्तमान इतिहास की महत्ता को बखूबी चित्रित किया गया है। उपन्यास की मुख्य पात्र सुनमा के माध्यम से देवभूमि कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत झांकी के साथ समाज में हो रहे बदलाव को भी सूक्ष्मता से रेखांकित किया गया है। अपनी बात रखते हुए सुनमा कहती हैं - “प्रधान जी, घर-जमीनें औरतों से भी चलती है। बस मेहनत और काम का जज्बा होना चाहिए। ...और वह दोनों मेरे में हैं। पर मैं उतने ही पैर पसारती हूँ जितनी चादर सहारा देती है। क्यार उजड़ है तो क्या हुआ, अगली बरसात में पानी लगा दूँगी। पर आप जानते हैं मेरे लिए घराट ही बहुत है। जमीन बेचने को नहीं होती प्रधान जी। कमाने-खाने को होती है। न भी कमाई जाये तो उजड़ रहे, पर है तो अपनी ही न। मुझे नहीं बेचनी है अपनी जमीन।”2 इंसान अपने जल, जंगल, जमींन से बहुत लगाव रखता है उससे अलग होकर वह अपने आपको जड़ से कटा हुआ महसूस करता है। उपन्यास में अपनों से बिछुड़ने की पीड़ा नदी के माध्यम से बताने की कोशिश की गयी है। “सुनमा को नदी भी अब अपनी ही तरह अकेली, असहाय और मृतप्राय लगने लगी थी। कितनी विडम्बना थी कि जिस सुनमा के भीतर वह नदी बहती रहती थी वह उसके बचाव के लिए कुछ नहीं कर पा रही थी। पर उसे लगता था कि जीवन भी एक बहती नदी ही की तरफ है...सुनमा से कितनी बेसहारा और बेजुबान जिंदगियाँ जुड़ी हैं,...उन्हें बचाकर जैसे वह कई नदियाँ को बचा लेगी ...बस इसी सोच के साथ उसका मन ठहर जाता...बहल जाता...कुछ संतोष कर लेता।”3 नदी स्वयं मानव रूप में प्रकृति और मानव के बीच सम्बन्ध स्थापित करती है। “मैं शतद्रु ...छोटा नाम शतु है दादी।”4
वैश्वीकरण का प्रभाव व समाज का बदलता यथार्थ- वैश्वीकरण का तात्पर्य बिना किसी रोकटोक के व्यापार प्रवाह से है जिसका मुख्य वाहक बाजार और सूचना प्रौद्योगिकी को माना जा सकता है। इन दोनों तंत्रों के माध्यम से वैश्वीकरण की प्रवृत्ति सम्पूर्ण विश्व पर अपना परचम लहराने में सफ़र हुआ है। वैश्वीकरण की विचारधारा भारतीय परिवेश और उसका साहित्यिक सृजन का विषय बनने की जहाँ तक बात है सन-1990-91 में सोवियत संघ के विघटन के बाद से शुरू होती है। वैश्वीकरण एक आर्थिक विचारधारा के रूप में भारत में प्रवेश करता है। जिसका उद्देश्य लाभ कमाने से रहा। लेकिन 21वीं सदी में वैश्वीकरण की विचारधारा आर्थिक क्षेत्र के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक गतिविधियों को भी प्रभावित किया है। जिसके परिमाण स्वरूप भारतीय समाज और संस्कृति पर उसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। आचार्य शुक्ल की माने तो साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्य अपने समय व समाज में हो रहे परिवर्तन को समाज की नब्ज को बहुत बारीकी से समझने का एक मात्र जरिया है। जब समय बदलता है तो साहित्य भी बदलना स्वाभाविक है। 21वीं सदी की यथार्थ दुनिया आभासी दुनिया में बदल रही है। प्रकृति सत्ता को नीचा दिखा मनुष्य अपनी विजय पताका फतह कर स्वयं को सृजनकर्ता समझने लगा है। जिसकी परिणति कृत्रिम समाज यानि आभासी दुनिया की निर्मिति से है। वर्तमान दुनिया जितनी समझदार और पढ़ी-लिखी हुई है जिसे विकास भी कह सकते हैं। वह संवेदनशून्य भी हुई है। ऐसे ही बदलाव को ग्रामीण समाज की रूपरेखा के माध्यम से बहुत ही सहज बिम्ब प्रस्तुति करने की कोशिश में एस. आर . हरनोट एक सफल कथाकार के रूप में हमारे सामने अपने नये उपन्यास नदी रंग जैसी लड़की के माध्यम से तमाम हाशिये के बिंदुओं को आकार देने में सफल हुए है। उपन्यास का शीर्षक ‘नदी रंग जैसे लड़की अर्थात नदी की व्यथा कथा को स्वयं नदी आकर सुनमा से कहती है। मनुष्य अपनी चकमक आभासी दुनिया में इतना व्यस्त हो गया है कि उसे किसी होने या न होने का कोई गम नहीं। नदी असहाय होकर स्वयं अपनी व्यथा की कथा कहती है। कोरोना जैसी महामारी की वजह से अचानक लॉकडाउन जैसी स्थिति पूरा देश ही नहीं पूरा विश्व एक तरह से बंद। वैश्विक महामारी का अद्भुत चित्रण, सब कुछ असहाय और बेसहारा, “दादी महसूस करती है कि कैसा समय आ गया है कि उन्हें अपने घर की चीजों से ही भय लगने लगा है। अपने ही हाथों से डर लगने लगा है। दरवाजों के हैंडल और कुण्डियाँ भयभीत करती हैं। टीवी पर अस्पतालों की अजीबोगरीब तस्वीरें हैं। डॉक्टरों और मरीजों ने अजीब तरह के कपड़े पहने हैं जैसे वे धरती पर नहीं है कहीं दूर आसमान में उड़ रहे हैं। रास्तों, पगडंडियों और नीचे से गुजरती सड़क पर पहले जैसी चहल-पहल नहीं है। उन पर कोई जीवन नहीं है। ...जैसे इस विकट समय ने बच्चे और बस्ते कहीं गायब कर दिये हैं। मास्टर गायब कर दिये हैं। मंदिरों की घंटियाँ ख़ामोश। किवाड़ बंद हैं। सबके पालनहार भगवान और देवता स्वयं कैद में हैं।”5 टेक्नोलोजी के दौर मैं प्राकृतिक रूप से जीवनयापन करना बहुत कठिन हो गया है। कहने के लिए बहुत बड़ा परिवार और दोस्तों की, लोगों की भीड़ में हम मौजूद हैं लेकिन सच्चाई यह है की एक साथ होने के बावजूद लोग अर्थात लोगों की भीड़ में शामिल होने के बाद भी लोग अकेला रहना ज्यादा पसंद करते हैं। किसी के पास न समय है और न ही धैर्य और न ही लोगों को किसी का भी हस्तक्षेप उन्हें पसंद होता है। सभी अपना जीवन अपनी तरह से जीना और महसूस करना चाहते हैं। इसलिए भी न चाहते हुए भी अकेले होते जा रहे हैं। कोरोना जैसी महामारी महामारी जरुर थी। लोगों का बहुत नुकसान भी हुआ। लेकिन अगर दूसरी तरह से सोचे तो अप्रत्यक्ष रूप से इंसानी फितरत को उसकी औकात बताते हुए उसे प्रकृति की ओर लौटो, अर्थात प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण की तरफ भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। उपन्यास में एक जगह सुनमा अपने बारे में जिक्र करते हुए कहती है- “उन्होंने कुछ रोज पहले अपने सोने के कमरे में रंगीन टीवी लगा लिया है और साथ केबल का कनेक्शन भी लिया है। वही उनका अब जैसे सहारा है। मन बहलाव का साधन है। वे देर रात तक चैनल बदल-बदल कर समाचार देखती हैं। नाटक या फ़िल्में देखने का उनका चाव ज्यादा नहीं है। इन दिनों रामायण और महाभारत वे देखती हैं जो दुबारा शुरू हो गये हैं।6 बदलते दौर में वृद्धावस्था का एक मात्र सहारा है टी बी। टेक्नोलॉजी के युग में उसके माध्यम से लोगों के बीच की दूरियाँ कम जरुर हुई हैं लेकिन आपसी सम्बन्धों के बीच की दूरिया बढती जा रही हैं। इस प्रकार आभासी दौर में वास्तविकता मात्र छलावा बनकर रह गया है।

नदी व अन्य प्राणी के अस्तित्त्व संकट का प्रश्न- वैश्वीकरण का यह युग पूंजीवादी विचारधारा का दौर है जहाँ पर वास्तविक दुनिया से अलग आभासी दुनिया अर्थात बनावटी दुनिया की चकमक लोगों को ज्यादा आकर्षित कर रही है। वैश्वीकृत दुनिया में मुख्य वाहक के रूप में बाजार और सूचना प्रौद्योगिकी है। जिसके माध्यम से पूरा विश्व वैश्वीकृत आभासी दुनिया में तब्दील हो रहा है। ऐसे समय में मानवीय संवेदनाएं शून्य पड़ती जा रही है और लोगों के विकास के लिए केवल पूँजी केन्द्रीय बनती जा रही है। “दादी सुनमा सोचती रहती कि लोगों को क्या हो गया है कि वे प्रकृति को ही लीलने के लिए हमेशा आतुर है। जल, जंगल और जमींन को नष्ट करने के लिए आमादा हैं। लोगों की धर्मशीलता खुदाई इंसानियत और साधुशीलता कहाँ गायब ही गयी।”7 दादी सुनमा के माध्यम से उपन्यासकार की भी चिंता यही है कि- “मनुष्य क्यों अपना आत्मनियंत्रण , पक्कापन और अविकार खोता चला जा रहा है। उसकी दिनोंदिन बढ़ती अकुलाहट, अशांति और खलबली न जाने किस विनाश की ओर ले जा रही है। अनाभूषित, अश्लील , निर्लज्ज और कंगाल-सा वह जिन्दा रह भी कहाँ गया है, एक मृत ठूंठ जैसा पल-पल झरझरा रहा है। फिर भी उसे ये सब कहाँ दिखता हैं? ”8 इसमें कोई संदेह नहीं है कि 21 वीं सदी बाजार व सूचना प्रौद्योगिकी का युग है। आभासी दुनिया की चकाचौध में आभासी पटल को ही वास्तविक दुनिया मानकर अपनी वास्तविकता को भूलता जा रहा है। “दादी सुनमा मनन करती है कि वह नदी अकेली नहीं है जिसका वर्चस्व, स्वतंत्रता और अल्हड़पन छीना गया है। अनगिनत हैं उसकी बहने, जो इस पुरुषत्ववादिता की शिकार हुई हैं। कोई सुरक्षित नहीं है... न यमुना, कावेरी,कृष्णा न गंगा, गोदावरी, गोमती और राप्ती। न करतोय, कोसी, चन्द्रभागा, स्पिति और न चम्बल, चिनाव, झेलम और ब्रह्मपुत्री। महानदी, शिप्रा, नर्मदा और दामोदरा भी कहाँ जीवित रही हैं। वध कर दिये गये हैं सभी के।”9 नदी अपनी दारुण व्यथा का वर्णन स्वयं बयाँ करती है- “बाँध के भीतर जैसे नदी मृतप्राय –सी थी। वेगहीन। सुनमा दादी को वह अत्यंत भयभीत लगती थी। डरी-सहमी हुई-सी। आतंकित और आकुल लगती। उसकी उद्विग्नता और कंपकंपाहट दादी को भीतर तक अशांत कर देती। नदी खुद भी अशांत ही तो थी। हवा के वेग जब पानी की सतहों पर दौड़ते तो नदी की थरथराहट कलेजा चीर देती थी। जड़ीभूत वह स्वतंत्र होना चाहती थी। बंधनमुक्त होना चाहती थी। दादी सुनमा से उसका संत्रास देखा नहीं जाता था।”10

“भई,किधर से आ रहे हो तुम लोग?
उसने एक सरसरी नज़र उन पर डाली। सोचा इस बूढी औरत को बताने का क्या लाभ? क़दम जैसे ही आगे बढ़ाये, दादी बहुत विनम्रता से कहने लगी,
“देखो, तुम्हारा मुँह और चाल बता रही है कि तुम बहुत दूर चलकर आये हो और भूखे भी हो। मुझे बताओं कि मैं तुम लोगों के लिए क्या कर सकती हूँ?

यह सुनकर उसके पाँव ठिठक गये। इस आश्वासन ने पीछे चल रहे साथियों को भी रोक दिया था। उनकी सूनी आँखों में अचानक एक उम्मीद की चमक पसर गयी।”11 उपन्यास में ऐसा लगता है कि दादी सुनमा को ईश्वर ने समाज कल्याण के लिए ही इस धरा पर भेजा हो और जादुई लड़की के माध्यम से समय समय पर सचेत भी कर रहा हो अपने फ़रिश्ते की तरह। एक प्रसंग आता है जिस समय जादुई लड़की दादी को सचेत करती हुई कहती है-“संभालकर रखना दादी इन पैसों को। लाखों में हैं न। बहुत भली जगह लगेंगे तुम्हारे ये पैसे। बहुत पुण्य क्माओगी तुम। बस जैसी हो न खुले दिल की वैसे ही रहना। कभी कंजूसी न करना। कुछ नहीं जाता साथ। पाप-पुण्य ही जाता है और अच्छायी पीछे रह जाती है। हो सकता है तुम्हारे ये पैसे किसी की मुसीबतों के वारिस बन जायें।”12 दूसरी तरफ कोरोना जैसी महामारी मानवता के प्रति सम्वेदनशून्य हो रही एक बड़ी आबादी को भी यह एहसास करवा देती है कि प्रकृति रुपी अदृश्य सत्ता से छेड़छाड़ व अपने आपको सर्वशक्तिमान मानना प्रकृति का दोहन करना कितना भयानक होता है। सुनमा दादी विचार करती है-“कितना अत्याचार हो रहा है इस दुनिया में और शायद इसीलिए आज लोग घरों में बंद हैं। उनके पास सब कुछ है। बंगले, गाड़ियाँ, धन, दौलत सब कुछ, पर देखो तो इस बीमारी की कोई दवा नहीं है। आज पैसा किसी काम का नहीं। यह कुदरत का इन्साफ ही तो है। जैसा बोओगे वैसा ही खाओगे और भोगोगे।”13

बेजुबानों की दास्तान- लेखक ने उपन्यास में अपने मुख्य पात्रों को जीतना जीवंत किया है उतना ही बेजुबानों की दास्ताँ कहने में भी पूरी रुचि ली है। चाहे वह प्रकृति का मानवीय रूप हो या खेत-खलियान, बाघू कुत्ता, गायें व अन्य जानवर की सम्वेदना। बाघू (पालतू कुत्ता ) अपने मालिक और मालकिन के प्रति बहुत ही वफादार रहा है। “इन सभी बेजुबानों में उनका कुत्ता बाघू बहुत परेशान था। सुनमा को उसका ध्यान ही नहीं रहता था। इन दिनों उसका भौकना भी नहीं सुनायी देता था अन्यथा वह किसी को आँगन में नहीं मानता था और रात-रात भर घर की रखवाली में भौकता रहता था। परन्तु बालकराम के जाने के बाद न जाने कितने लोग घर आये- गये पर मजाल है कि उसने किसी को कुछ कहा हो। उसका पता ही नहीं चलता कि वह है या नहीं।”14 बाघू कुत्ता (जो कि किन्नोरी नस्ल का कुत्ता था जिसकी खाशियत यह होती है कि वह बाघों से भी मुकाबला करने में सक्षम होता है। उपन्यास में बिल्ली का भी जिक्र है बेजुबान जानवर भले ही बोल नहीं सकते हैं लेकिन उन्हें महसूस सब कुछ होता है उन्हें भी स्नेह करने वाला उन्हें खिलाने-पिलाने वाला उन्हें प्रिय होता है। “देख बाघू! अब मेरा कौन है, तू ही तो है मेरे साथ। हम दोनों का मालिक अब नहीं रहा। तू इस तरह रोटी नहीं खायेगा तो मेरा साथ कैसे देगा रे। मुझे भी देख मेरा भी तो संसार छिनगया है, दुनिया लुट गयी है, मेरा भी अब कौन है। तू है, ये सफ़ेदी बिल्ली हैं, गोलू-बोलू दो बैल हैं, काली और भूरी गाय है, उनकी बछिया है। तू तो जानता है इतने पशुओं का अब अकेले-अकेले मुझसे नहीं होगा। नौकर चाकर भी कितने दिन रहेंगे। उनकी मेहनत- मजदूरी कौन देगा। तुझे ही तो रहना है मेरे साथ।”15 मानवीय सम्वेदना से युक्त व्यक्ति प्रकृति के चेतन-अचेतन, चर-अचर सभी प्राणियों से प्रेम करता है दोनों एक दूसरे के प्रति सम्वेदनशील होते हैं। सुनमा कहती है कि “पशु ही नहीं खेत, खलिहान और धान के क्यारों का भी यही हाल था। बहुत दिनों से किसी ने उनकी ख़बर नहीं ली थी। बालकराम का यह रूटीन होता कि वह फसलों के हरियाते व पकते समय रोज-रोज उनके बीच घूम-बैठकर उनसे खूब बातें किया करता था। लगता जैसा बीज बोने से लेकर फसलों के पकने तक बालकराम का साथ होना और रहना उनकी संजीवनी हो।”16

सुनमा के जीवन का दूसरा सहारा रहा बाघू, बाघू के जाने के बाद सुमगों से अत्यंत लगाव प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता एकता और आपसी उन्नति का सूचक है। “अरे सुन न सुमगो...इधर आ मेरे पास।” लड़की ने जैसे उसे एक अधिकार से पुकारा था। कुत्ता उठकर ऐसे चला आया मानों वही उसकी मालकिन हो। वह उसके पास बैठ गयी और समझाने लगी, देख सुमगो...दादी का ख्याल रखना। गाय का भी। दोनों एक जैसी है न।”17

लेखक सुनमा के माध्यम से विधवाओं की स्थिति पर भी अपनी लेखिनी चलाता हुआ धैर्यवान, कर्मठ, सहज व सुशील स्त्री बुद्धिमत्ता को बखूबी आकार देने में सफल हुआ है। अगर हम भक्ति काल में मीराबाई को देखे तो सुनमा का विद्रोह कही न कही मीरा का विद्रोह लगता है। सुनमा देई का हरिद्वार में स्वयं के द्वारा पिंड दान किया जाना भी अपने आपने परिवर्तन का प्रतीक है। वर्षों पुरानी परम्परा व मान्यताओं का खंडन है। पिता के रूप में देवदत्त का बेटी का हमेशा साथ देना अपने आपमें समाज में समानता व बदलाव का प्रतीक है। नदी की कथा-व्यथा का वर्णन जादुई लडकी व उसकी सहेलियों के माध्यम से सुनमा के साथ सहयोगी और समय-समय पर सलाहकार के रूप में भी चित्रित किया है। जिसका सम्बन्ध एक सहज संवेदनशील प्रकृति प्रेमी दुनिया की कल्पना को भी रेखांकित करती है।

जादुई यथार्थवादी शिल्प- जादुई यथार्थवाद का सम्बन्ध चित्रकला की दुनिया से है। बाद में साहित्य की दुनिया में इसका प्रयोग किया जाने लगा। सर्व प्रथम फ्रेचरोह ने जाडुई यथार्थवाद (Magical Realism) शब्द दिया। जादुई का अर्थ चमत्कार, भ्रम या सम्मोहन से है और यथार्थ का अर्थ वास्तविकता व सच्चाई से है। इस प्रकार दोनों का अर्थ हुआ दिमाग के अन्दर भ्रम और वास्तविकता का एक साथ आवाजाही। अर्थात वास्तविकता का कल्पना में और कल्पना का वास्तविकता में परिवर्तित हो जाना ही जादुई यथार्थवाद कहलाता है। दूसरे शब्दों में कहे तो मिथकीय व परिकथाओं के माध्यम से सत्य का उद्घाटन करना।

जादुई यथार्थवाद सौन्दर्य या फिक्शन की एक शैली है जिसमें असली दुनिया के साथ जादुई तत्त्वों का मिश्रण होता है। हालंकि यह सबसे अधिक एक साहित्यिक शैली के रूप में प्रयोग किया जाता है, जादुई यथार्थवाद फिल्म और दृश्य कला के लिए भी लागू होता है। जादुई यथार्थवाद या जादू यथार्थवाद साहित्य के लिए एक दृष्टिकोण है जो रोजमर्रा की जिन्दगी में कल्पना और मिथक को बचाता है। असली क्या है? काल्पनिक क्या है? जादुई यथार्थवाद की दुनिया में साधारण असाधारण हो जाता है और जादुई आम हो जाता है-18 दूसरे शब्दों में कहे तो जादुई यथार्थवाद केवल एक शैली नहीं है बल्कि एक (क्रिएटिव नैरेटिव प्रोसेस) अपनी बात करने का आधार है। वास्तविकता से वाकिफ करवाने का जरिया भी है। जादुई यथार्थवाद उत्तर औपनिवेशिक दौर में जो परम्परागत बनी बनायी व्यवस्था थी, सोचने समझने की शैली थी, उससे इतर, उससे अलग एक नयी व्याख्या प्रस्तुत करने का काम किया। इसके माध्यम से बनी बनायी चली आ रही पीढ़ी की विचार धारा को तोड़ने का प्रयास किया है। जादुई यथार्थवाद अपने व्यवहारिक स्वरूप में ऐसा दिखायी देता है जिसमें जो वास्तविकता है या जो भ्रम है उसकी पहचान करवाना मुश्किल काम है। इस टेक्नीक के माध्यम से जादुई यथार्थवाद हमारे सामने एक नये सच को प्रस्तुत करता है।
जादुई यथार्थवाद के इतिहास की बात करें तो सर्वप्रथम वुदरिंग हाइट्स (1848) और फ्रांज काफ्का के दुर्भाग्यपूर्ण ग्रेगोर में जादुई यथार्थवाद के तत्वों की पहचान की है जो एक विशाल कीट (द मेटामोफोर्सिस -1915) में बदल जाते हैं। हालांकि अभिव्यक्ति जादुई यथार्थवाद 20वीं सदी के मध्य में उभरा विशिष्ट कलात्मक और साहित्यिक आन्दोलन से निकला।

1925 में आलोचकों फ्रांज रोह (1890-1965) ने जर्मन कलाकारों के काम का वर्णन करने के लिए (magischer Realismus(magic Realism) शब्द का निर्माण किया। जिन्होंने नियमित विषयों को बेकार अलगाव के साथ चित्रित किया।

एस.आर. हरनोट अपने उपन्यास ‘नदी रंग जैसी लड़की’ में जादुई यथार्थवादी साहित्यिक शैली के माध्यम से बख़ूबी घटनाओ के चित्रों को पिरोने का काम किया है। एक प्रसंग आता है- “दादी जब आसमान की ओर देखती तो उसे नदी अपने ऊपर से बहती दिखायी देती। सहसा उन्हें लगता मानो उनकी गाय, खेत और खुद दादी कहीं बादलों के टापू पर आसीन हो और लड़की उस इन्द्रधनुष के सातों रंगों को लेकर क्षितिज से कहीं दूर चली जा रही हो। दादी कुछ पल इन्हीं निर्मितियों में मन्त्रमुग्घ हुई सी बैठी रहती और जब आँख खुलती तो लड़की को पास खेलता पाती।”19 अद्भुत वर्णन है। एक और प्रसंग आता है- “दादी सुनमा की नज़र बाँध पर पड़ती है। वहाँ झील नहीं है। एक नदी है जो चाँदनी हो गयी है। बहुत सी नदियाँ उसके साथ चल रही हैं। चाँद उनमें हिलोरे ले रहा है। नदियों से खेल रहा है। दादी की आँखें उस पर स्थिर हो जाती है। वह धीरे-धीरे एक कागज़ की नाव में परिवर्तित होने लगता है। नाव में शतु हैं। उसके साथ कई छोटी-छोटी लड़कियाँ बैठी हैं। सभी उसी की तरह सुन्दर, मनोहर और रूपवंत हैं। सभी ने नदी रंग की फ्राके पहन रखी हैं। फ्राकों की जेबों में चाँद की किरणों और नदी की लहरें हैं। हाथों में नदी के पत्थर हैं। दुर्लभ प्रजातियों के पुष्प हैं। उनकी खिलखिलाहटे चांदनी बनकर जल पर झिलमिला रही हैं। हवा के झोकें के साथ जब वे दादी के कानों से होती मन में उतरती है तो एक मीठी-सी टीस महसूस होती है।”20

“बच्चुआ” किधर चलना है?”
सभी एक स्वर में बोलती हैं, 
“बहुत-बहुत दूर दादी...जहाँ न कोई सरकार का आदमी हो और न कम्पनी का कोई मालिक। बस हम और तुम हो और हमारी मछलियाँ हों, ... और लोकगीत गाते किसान और मजदूर हों।”
नाव चल पड़ती है। 

इस प्रकार हम देखते हैं कि उपन्यास की शुरुआत जादुई गुड़िया से होती है जो शुरुआत में ही पाठकों के दिमाग में नयापन की झलक प्रस्तुत करती है। उपन्यास का शीर्षक अपने आपने प्रकृति का ही प्रतीकात्मक रूप है। नदी की दारुण व्यथा के माध्यम से स्त्री-जीवन संघर्षों को रेखांकित किया गया है। नदी (शतु) स्वयं “और हाँ, दादी, कल न मैं नदी की कथा सुनाऊंगी तुम्हें।”21 “अरे दादी! अकेली कहाँ ..? मेरी नाव जो मेरे साथ होती है। पर दादी वहाँ भी अब नदी नहीं है। कहीं...कहीं बची है। लोग रोज-रोज मशीनों में भर-भरकर कूटते हैं, पीसते हैं। वह बहुत जोर से चीखती और चिल्लाती रहती है और आग में लिपटकर निर्जीव हो जाती है।”22

उपन्यास के अंत में तमाम संघर्षों से गुजरते हुए सुनमा महसूस करती हैं कि - “उसके पास अब कुछ करने के लिए कोई काम नहीं है। कुछ भी शेष नहीं है। न पशु हैं न भेड़-बकरियाँ हैं। न पुश्तैनी घर है और न घराट। नदी भी नहीं है और न ही अपना साथ है।”23 दादी सुनमा का जीवन नदी के सहज प्रवाहपूर्ण धारा का भाग जैसा ही रहा। सुनमा का जादुई लड़की शतु के साथ नाव में बैठकर चले जाना यह सूचित करता है समाज में दिन-प्रतिदिन बदलती मानवीय मानसिकता की वजह से नदी स्वयं को अवरुद्ध पाकर किसी और लोक में पलायन करने पर मजबूत है। जिसकी परिणति हम लगातार हो रहे भौगोलिक परिवर्तन से समझ सकते हैं। वर्तमान समाज के लोग प्रकृति के साथ सामंजस्य नहीं बना पा रहे हैं क्योंकि भौतिकतावादी सोच हमें स्वार्थी और संवेदनाशून्य बनाती जा रही है। वर्तमान समय की मांग है कि अगर हम सहज, स्वस्थ जीवनयापन करना चाहते हैं तो प्रकृतिरूपी अदृश्य सत्ता की शक्ति को पहचानना होगा। उसका दोहन नहीं, संरक्षण करना होगा। इस भागमभाग दुनिया में ठहरकर पुनर्विचार करना होगा नहीं तो परिणति भयावह हो सकती है! निम्न कविता के माध्यम से अपनी बात कहना चाहूंगी।

अभिमान था उन्हें बहुत
अपने होने का,
पल भर में कमर टूट गई उनके घमण्ड की।
दुःख बस इतना है
बेबस और लाचार वो भी हो गए
जिनका कसूर था न कोई...।
चूर हो अपने घमण्ड में,
भू, आकाश, पाताल
फ़तह कर लेना,
विजय नहीं, अन्त नहीं,
प्रकृति सत्ता के विस्तार का...।
इंसानी फ़ितरत ने
अपनी ही कूटनीति से,
स्वयं राक्षस रूपी वायरस को गढ़ा।
शायद था नहीं उसे भी भान इसका।
अपनी तीखी कूटनीति की धार से
अपना भी कुनबा हो जाएगा तबाह।
अभी भी अक्ल नहीं आयी है उसे
अपने ही मद में,
हो सराबोर,
मदमस्त हो।
करता जा रहा है विश्व पटल पर आज भी,
मानवीय संवेदनाओं की अवहेलना।।
अब..!
जिसका मतलब है-तबाही,
केवल तबाही!
और कुछ भी नहीं!!
दुःख बस इतना है-
बेबस और लाचार वो भी हो गए
जिनका कसूर था न कोई...॥
(मंजू सरगम)


संदर्भ ग्रन्थ सूची:
1. एस. आर. हरनोट- नदी रंग जैसी लड़की, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 214
2. वही, पृष्ठ संख्या 80
3. वही, पृष्ठ संख्या 156
4. वही, पृष्ठ संख्या 174
5. वही, पृष्ठ संख्या 211
6. वही, पृष्ठ संख्या 210
7. वही, पृष्ठ संख्या 193
8. वही, पृष्ठ संख्या 194
9. वही, पृष्ठ संख्या 194
10. वही, पृष्ठ संख्या 195
11. वही, पृष्ठ संख्या 219
12. वही, पृष्ठ संख्या 183
13. वही, पृष्ठ संख्या 224
14. वही, पृष्ठ संख्या 63-64
15. वही, पृष्ठ संख्या 65
16. वही, पृष्ठ संख्या 66
17. वही, पृष्ठ संख्या 175
18. जादुई यथार्थवाद का परिचय - जैकी क्रेवेन, hi.eferrit.com/जादुई यथार्थवाद 
19. एस. आर. हरनोट- नदी रंग जैसी लड़की, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या10
20. वही, पृष्ठ संख्या 234
21. वही, पृष्ठ संख्या 175
22. वही, पृष्ठ संख्या 187
23. वही, पृष्ठ संख्या 209
24. सिंह, अमित कुमार- भूमंडलीकरण और भारत (परिदृश्य और विकल्प), सामयिक प्रकाशन नई दिल्ली 02


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