उपेंद्रनाथ अश्क की सलाह, नए लेखक के लिये

अनुराग शर्मा
उपेंद्रनाथ अश्क
उस समय की बात है जब मैं बीएससी का छात्र था। शैक्षणिक रूप से हिंदी का साथ समाप्त हो चुका था लेकिन दिल में हिंदी थी। तुकबंदियाँ तो पहले भी की थीं परंतु अब मैं कहानियाँ लिखना आरम्भ कर चुका था। अब तक किये हर काम की तरह मैं कथालेखन भी अच्छी तरह करना चाहता था। मैंने अपनी लिखी एक शुरुआती कहानी अपने कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष को दिखाई जो उन्हें बहुत अच्छी लगी और उसे उन्होंने कॉलेज की पत्रिका के लिये मांग लिया। उसके बाद उनके साथ अच्छी कहानी की विशेषताओं पर हमारी काफ़ी बातचीत हुई।

विभागाध्यक्ष जी से कथालेखन के अकादमीय पक्ष की जानकारी हुई। साथ ही मैं किसी सफल लेखक से सम्वाद करके उनका पक्ष भी जानना चाहता था। उस समय एक कथा लेखक के रूप में मन्नू भण्डारी, शिवानी, और उपेंद्रनाथ अश्क के नाम चर्चा में थे। तीनों का लेखन मुझे पसंद था। सोशल मीडिया तो तब था नहीं। लेकिन अश्क द्वारा इलाहाबाद में एक दुकान खोलने पर तथाकथित बुद्धिजीवियों के एक वर्ग में भारी क्षोभ था। और इस कारण अश्क जी एक बार फिर साहित्यिक खबरों के केंद्र में थे।

अश्क जी का पत्र
इंटरनैट-पूर्व युग था। हिंदीभाषी मध्यवर्ग में वीसीआर/पी का प्रवेश भी नहीं था। बदायूँ में कैलाश टाकीज़ और बरेली में कुमार टाकीज़ के समोसे मशहूर थे। अंग्रेज़ी फ़िल्में ले-देकर कभी कभार बरेली छावनी स्थित बिना बालकनी वाले छोटे से नटराज में लगा करती थीं। फ़ाउंटेन पैन, कॉपी-किताबों आदि की दुकान चलाना अच्छा व्यवसाय था। फ़ाउंटेन पैन को तड़ीपार करने में जी-जान से जुटे सस्ते बाल-पॉइंट पैन तब डॉटपैन कहलाते थे और अभीतक कुछ घरों में बचे हुए विक्टोरियन पैन, शायद अपने होल्डर के कारण होल्डर ही कहलाते थे। किसी भी घर की सबसे स्मार्ट डिवाइस कैलकुलेटर हुआ करती थी।

 यह तब की बात है जब केसियो की पहली क़्वार्ट्ज़ घडियों ने हमारी ज़िंदगी में दस्तक नहीं दी थी और आज के कुछ रईस ब्रांड सुलभता से उपलब्ध थे। यूँ समझिये कि यह वह ज़माना था जब मर्द लोग बैलबॉटम नाम का शरारा शान से पहनते थे। जिन घरों में टीवी होता था, उनके एंटीना मुहल्ले के कबूतरों और जंगल से धावा मारने वाले बंदरों को बहुत प्रिय थे। हिंदी साहित्य का प्रतिनिधित्व उस समय सारिका के पास था। नवनीत, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादम्बिनी और धर्मयुग सरीखी पत्रिकायें भी खासी बिकती थीं। और तो और, मुरादाबाद से अरुण नामक एक साहित्यिक पत्रिका भी आती थी जिसकी पहुँच कम से कम बरेली-बदायूँ तक तो थी ही। अखबार में नाम तभी आता था जब या तो आपके चाचा पत्रकार हों या किसी लड़की को छेड़ते समय पकड़े जाने पर पुलिस ने पकड़कर आपका सिर घुटा दिया हो।

प्राइवेसी के प्रति पश्चिमी रवैया भारत के लिये निपट अनजाना था। दरवाज़े पर लगी तख्तियों में लोगों के नाम के साथ पता, डिग्री, पद आदि, वह सबकुछ होता था जो आज उनके विज़िटिंग कार्ड तक में नहीं मिलेगा।   पत्रिकाओं में भी रचना के लेखक के नाम के साथ, उनका पता, और अगर धनी हुए तो फ़ोन नम्बर भी लिखा रहता था।

ऐसी ही किसी रचना से मैंने एक पता नोट किया, 5 खुसरो बाग रोड, इलाहाबाद। थोड़ी सी दिमाग़ी जद्दोज़हद के बाद एक चिट्ठी लिख दी, उपेंद्रनाथ अश्क के नाम। क्या वे जवाब देंगे? क्या उनके पास पाठकों के पत्र पढ़ने और उनके उत्तर देने का समय होगा? और फिर, जो अब इतनी चर्चा में है, क्या पाठकों की पत्रोत्तरी में लगने से उनकी उस दुकान की ग्राहकी पर असर नहीं पड़ेगा?

आर्थिक संकटों में उलझे एक प्रतिष्ठित लेखक को मेरे कारण कम से कम तकलीफ़ हो इसलिये मैंने लिफ़ाफ़े में उनके पत्र के साथ-साथ अपना पता लिखा एक अंतर्देशीय पत्र भी रख दिया जिसका महत्व बाद में पता लगा।

कुछ ही दिन में जवाब आ गया। मेरे प्रश्न का उत्तर देते समय उन्होंने अपनी उंगलियों के गठिया और टाइपिस्ट की अनुपस्थिति के कारण प्रशंसकों के पत्रों का उत्तर देने में आने वाली कठिनाई का ज़िक्र करते हुए यह दर्शाया कि टिकट लगे जवाबी लिफ़ाफ़े ने उनके उत्तर की सम्भावना को बढ़ाया।

अनुराग शर्मा
सामान्य शिष्टाचार के अतिरिक्त पत्र में अश्क जी द्वारा नये लेखक को दी गई सलाह के प्रमुख बिंदु निम्न थे:
  • लिखने से पहले पढ़ो, खूब पढ़ो।
  • प्रसिद्ध साहित्यिक रचनाओं की विशेषताओं को पहचानो।
  • असफलता से निराश न हो।
  • अच्छी कहानियों में सत्य होता है कोरी कल्पना नहीं, काल्पनिक कथाएँ शीघ्र ध्वस्त होती हैं। 
पत्र मैंने सम्भाल कर रखा है। इतना सम्भाल कर रखा है कि आज जब यह आलेख लिखने बैठा हूँ तो सारा घर पलटने के बावजूद उस पत्र को ढूंढ नहीं पा रहा हूँ।  सो, अभी उसके एक पुराने चित्र से काम चलाइये। बाद में जब पत्र मिल जायेगा तो उसका गद्य एक अन्य आलेख में प्रस्तुत करने की सम्भावना है।