ईश्वर और आइंस्टाइन

- मेहेर वान
मेहेर वान 
अल्बर्ट आइंस्टाइन वैज्ञानिक होते हुये भी अपने राजनैतिक विचारों के लिये काफ़ी मशहूर रहे। उनके तत्कालीन राजनैतिक परिदृश्य पर लिखे गये पत्र और दिये गये भाषण आज भी न सिर्फ़ प्रासंगिक हैं बल्कि कई बार अचंभित करते हैं। अल्बर्ट आइंसटीन ने धर्म और ईश्वर पर भी काफ़ी साफ़गोई से लिखा। यह पत्र उन्होंने सन 1954 में लिखा, उस समय वह अपनी मौत के काफ़ी करीब थे, उनकी तबियत ठीक नहीं रहती थी और सन 1955 में उनका देहान्त हो गया था। देहान्त के लगभग एक साल पहले उन्होंने जाने-माने दार्शनिक एरिक गट्काइंड को उनकी किताब “Choose Life: The Biblical Call to Revolt” पढ़्ने के बाद यह पत्र लिखा। इसी पत्र में उन्होंने लिखा है कि यह किताब उन्होंने अपने दोस्त ल्युजेन ब्राउवर के बार-बार आग्रह करने के बाद पढ़ी थी। इस पत्र में आइंस्टाइन ने धर्म और ईश्वर के बारे में काफ़ी खुलकर लिखा है। सन 2008 में जब इस पत्र की नीलामी होनी थी तो यह पत्र कई लोग खरीदना चाहते थे, इसे अल्बर्ट आइंस्टाइन का धर्म या ईश्वर पर अंतिम पत्र माना जाता है। जिसे यह पत्र नीलाम किया गया उसने 170,000 यूरो (लगभग 1 करोड़ 20 लाख रुपये) की बोली लगाई थी, यह अपने आप में बहुत बड़ी रकम थी। इस पत्र को खरीदने के लिये जाने माने वैज्ञानिक और लेखक रिचर्ड डाकिन्स ने भी बोली लगाई थी, पर वह हार गये थे।

प्रिंसटन 03.01.1954
प्रिय श्री गट्काइंड,
मित्र ब्राउवर की बारम्बार सलाह से प्रभावित होकर, मैंने आपकी किताब पढ़ी और मुझे यह किताब उपलब्ध करने के लिये आपका बहुत शुक्रिया। जिस बिन्दु ने मुझे प्रभावित किया, वह था: हम लोगों का तथ्यात्मक नजरिया जीवन और मानव समुदाय के सम्बन्ध में बहुत कुछ एक जैसा ही है। अहंकारोन्मुख आकांक्षाओं से स्वतंत्रता के लिये संघर्ष, पूर्णतया मानवीय तत्व पर ज़ोर के साथ जीवन को सुन्दर और महान बनाने के लिये आपके व्यक्तिगत आदर्श..! यह सबकुछ हमें गैर-अमेरिकी रवैये वाले लोगों के तौर पर एकीकृत करता है।
फिर भी, ब्राउवर की सलाह के बिना मैं आपकी किताब को पढ़ने में खुद को इतनी गंभीरता से नहीं लगाता क्योंकि यह जिस भाषा में लिखी गई है वह मेरे लिये दुर्गम है। ईश्वर शब्द मेरे लिये मानवीय कमज़ोरी की उपज और अभिव्यक्ति से बढ़कर कुछ भी नहीं है, बाइबिल, सम्माननीय परन्तु विशुद्ध रूप से आदिम, बहुत हद तक बचकाने उपाख्यानों/दिव्य-चरित्रों का संग्रह है। कोई व्याख्या, भले ही वह कितनी भी सूक्ष्म क्यों न हो, मेरे इस सम्बन्ध में विचार नहीं बदल सकती। मेरे लिये यहूदी धर्म तमाम अन्य धर्मों की तरह सबसे अधिक बचकाने अंधविश्वास का एक अन्य अवतार है। और वे यहूदी लोग, जिनसे मेरे खुशनुमा संबंध हैं, और जिनके सोच-विचारों से मेरा गहरा आकर्षण है, मेरे लिये अन्य लोगों से इतर किसी अलग तरह से विशेष नहीं हैं। जहाँ तक मेरा अनुभव है, ये (यहूदी) लोग किन्हीं अन्य मानव-समूहों से बेहतर नहीं हैं, यद्यपि ये सत्ता की ताकत की कमी से उपजी असाध्य बीमारी से बचे हुये हैं। अन्यथा मुझे इनके बारे में कुछ भी चिन्हित/चुना हुआ नहीं दिखाई देता।

सामान्य तौर पर, मुझे यह पीड़ादायक लगता है कि आप एक विशेषाधिकार युक्त अवस्था (यहूदी होने के कारण) में होने का दावा कर रहे हैं और अहंकार की दोहरी दीवार के ज़रिये इसकी वकालत कर रहे हैं, एक पुरुष के बतौर बाहिरी (दीवार) और एक यहूदी के बतौर। अगर कहा जाये तो, पुरुष के बतौर आप कारण-वाद से विचलन या फिर स्वीकार्य होने का, एक यहूदी होने के नाते एकेश्वरवादी होने का दावा कर रहे हैं। लेकिन कारणवाद सीमित होने पर सच्चे अर्थों में कारणवाद नहीं रहता, जिस तरह इसे हमारे अद्भुत स्पिनोजा ने पूरी गहराई के साथ, शायद पहली बार पहचाना है। और धर्मों में प्रकृति की जड़ात्मवादी व्याख्यायें सैद्धान्तिक रूप से एकाधिकार के द्वारा रद्द नहीं होनी चाहिये। इस तरह की दीवारों के द्वारा हम केवल एक तरह का निश्चित आत्म-कपट (की अवस्था) ही प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन इसके विपिरीत इससे हमारे नैतिक प्रयासों को गति नहीं प्राप्त होती है।

अब, जैसे कि मैं हमारे बौद्धिक विश्वास सम्बन्धी मतभेद को पहले काफ़ी साफ़गोई से दर्शा चुका हूँ, फिर भी यह मुझे स्पष्ट है कि  जरूरी बातों यथा, मानव व्यवहार के परीक्षण के मामले में, हम एक–दूसरे के काफ़ी करीब हैं। जो बात हमें अलग करती हैं वह फ़्रायड की भाषा में केवल बौद्धिक रूप से 'बनावटीपन' और 'तर्कसंगत होना' है। इसलिये मैं सोचता हूँ कि हम एक दूसरे को अच्छी तरह से समझेंगे अगर हम किन्हीं ठोस मुद्दों पर बाते करें।

दोस्ताना शुक्रिया और शुभकामनाओं सहित

आपका
आइंसटाइन
(हस्तलिखित पत्र का चित्र: इंटरनैट से साभार)