मुआवजा- राम निवास बाँयला

- राम निवास बाँयला         

राम निवास बाँयला 
पंछियों का घोंसलों में लौटने का वक़्त हो चुका था। जिले में नए आए समाज कल्याण अधिकारी भी सारे दिन फरियाद सुनकर शाम को ऑफिस से बाहर निकल अपनी सरकारी गाड़ी की तरफ बढ़ रहे थे। तभी अपने मृत पति का मुआवजा पाने की उम्मीद में हताश, लाचार एक नव-यौवना सुरक्षाकर्मी को धकियाते हुए आगे बढ़ी। 
उसने साहब से  सवाल किया, 
"किस रात आप के घर आ जाऊं साहब?"
 एक पल को सन्नाटा छा गया। सभी सकते में थे और इससे पहले कि अधिकारी कुछ समझ पाता कि महिला ने अपनी बात पूरी कर दी, 
"अब कोई और चारा नहीं बचा साहब। जब रिटायर होने वाले साहब ने ही यह फरमाइश रखी थी तो आप तो जवान हैं? अब नहीं टाला जा सकता वर्ना मेरा तो कुछ नहीं बच्चा भूखों मर जाएगा मेरा साहब।"
अधिकारी के लिए के इस तरह के हालात का सामना करने का यह पहला मौक़ा था। सिर्फ इतना ही कह पाए,
"अपना नंबर लिखवा दो, मैं बुला लूँगा।"

कुछ दिनों बाद बुलावा पाकर महिला उस रात साहब के घर पहुंची। बाहर दो गाड़ियाँ खड़ी हुई थीं, सुरक्षाकर्मी, चौकीदार सब मौजूद थे। साहब का घर रोशनी में नहाया, दुल्हन बना हुआ था। महिला दरवाजे पर पहुंचकर चौकीदार से कुछ कह पाती कि उससे पहले ही साहब ने दरवाजा खोला। साथ में आरती का थाल लिए खड़ी साहब की पत्नी ने मुस्कुराकर स्वागत किया, 
"पधारो! ननद बाई।"